संवैधानिक मूल्यों को आरएसएस के मूल्यों से बदलता मोदी का भारत

05 जनवरी 2024
28 मई 2023 को वीडी सावरकर की जयंती पर नए संसद भवन का उद्घाटन कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी.
एएनआई फोटो
28 मई 2023 को वीडी सावरकर की जयंती पर नए संसद भवन का उद्घाटन कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी.
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यह 10 अक्टूबर को द कारवां की ओर से 2023 शोरेनस्टीन पत्रकारिता पुरस्कार स्वीकार करते समय स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय में दिए गए मुख्य भाषण का एक संपादित अंश है.

मैं जानता हूं कि मैं इसराइल और गजा में सामने आ रही भयावहता की पृष्ठभूमि में बोल रहा हूं. ऐसे वक्त में पत्रकारिता की जरूरत पर जोर देने की कोई वजह नहीं है. हमारे खयाल, हमारा ज्ञान, हमारी राय, यहां तक कि क्या हो रहा है, इसके बारे में हमारी समझ भी पत्रकारिता के जरिए आकार ले रही है. संकट के वक्त पत्रकारिता दुनिया को समझने का एक बुनियादी जरिया बन जाती है. इस हद तक बुनियादी कि हम भूल जाते हैं कि पत्रकारिता के दूसरे पहलू भी हैं. मेरा मानना है कि पत्रकारिता का एक अहम काम हमें आने वाले खतरों से, उन त्रासदियों से आगाह करना है जो हमारा इंतजार कर रही हैं. मैं पत्रकारिता के इस काम का जिक्र उन खतरों के बारे में बात करने के लिए करना चाहता हूं जो भारत में पहले ही सामने आ चुके हैं लेकिन देश के बाहर पूरी तरह से महसूस नहीं किए गए हैं.

मैं पुरस्कार के लिए शोरेंस्टीन सेंटर का शुक्रिया अदा कर शुरुआत करना चाहता हूं. हमारे पहले आए नाम हमें उस सम्मान का अच्छा अहसास कराते हैं जो हमें दिया गया है. मैं जानबूझकर "हम" रहा हूं क्योंकि मैं यहां एक संस्था, द कारवां के प्रतिनिधि के रूप में खड़ा हूं. पत्रकारिता को अक्सर व्यक्तियों के काम के रूप में देखा जाता है, जिसमें पत्रकार नई—नई स्टोरी ब्रेक करते हैं और स्तंभकार राय लिखते हैं और एंकर इसे आगे पहुंचाते हैं. लेकिन आखिरकार जो संस्थान इन गतिविधियों को संचालित करते हैं वह कुछ मूल्यों के लिए प्रतिबद्ध हैं. ऐसी संस्थाओं के बिना पत्रकारिता जिंंदा नहीं रह सकती. कारवां एक ऐसी ही संस्था है. जिन मूल्यों को लेकर हम प्रतिबद्ध हैं, वे हैं कठोरता, सत्यता और जिसके पास भी शक्ति है उसके प्रयोग की जांच करने की प्रतिबद्धता.

पत्रकारिता करने का दावा करने वाले किसी भी संस्थान में यह एक सामान्य बात होनी चाहिए और इसे सहज लिया जाना चाहिए. लेकिन, आज भारत में ऐसा नहीं है. ऐसा कहा जा सकता है कि पत्रकारिता करने वाले संस्थानों की संख्या मुट्ठी भर है. ऐसा वक्त है जब भारतीय मीडिया बुनियादी ढांचे, प्रौद्योगिकी और कर्मचारियों की संख्या के मामले में इतना फल-फूल रहा है जितना पहले कभी नहीं था. हर शाम, प्राइमटाइम पर या अंग्रेजी और हिंदी अखबारों के ओपिनियन पेजों में हम नरेन्द्र मोदी सरकार द्वारा सत्ता के इस्तेमाल की जांच करने वाले किसी भी व्यक्ति के प्रति नफरत और कट्टरता की झलक पाते हैं. मैं यहां देश के दक्षिण के बारे में बात नहीं कर रहा हूं, लेकिन ये मीडिया आउटलेट एक अरब भारतीयों के लिए जानकारी का प्राथमिक स्रोत हैं. उनमें कठोरता की कोई भावना नहीं है और सत्यता के प्रति कोई प्रतिबद्धता नहीं है. वे निश्चित रूप से सत्ता में बैठे लोगों से सवाल पूछने से दूर रहते हैं. वे केवल सरकार की शक्ति को बढ़ाते हैं.

मीडिया की यह विफलता 2014 में मोदी के सत्ता में आने से शुरू नहीं हुई, बल्कि तब से यह प्रवृत्ति और ज्यादा बढ़ गई है. भारतीय मीडिया का मालिकाना बड़े पैमाने पर उन समूहों के पास है जिनके कई दूसरे कारोबारी हित हैं. हमारी अर्ध-उदारीकृत अर्थव्यवस्था में, सरकार की नाराजगी के चलते होने वाले नुकसान यह तय करते हैं कि ये समूह सरकार की जरूरतों के मुताबिक हों. लेकिन यह पूरी कहानी नहीं है. मीडिया का एक बड़ा हिस्सा बनिया कारोबारी जाति के लोगों के पास है. इनमें से ज्यादातर मालिक मौजूदा सरकार की वैचारिक परियोजना को लेकर प्रतिबद्ध हैं.

हरतोष सिंह बल कारवां के कार्यकारी संपादक और वॉटर्स क्लोज ओवर अस : ए जर्नी अलॉन्ग द नर्मदा के लेखक हैं.

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