महज दो सप्ताह के अंतराल में दिखाई दीं दो घटनाएं भारतीय राजनीति के विरोधाभासी चरित्र को दर्शाती हैं. सितंबर के शुरू में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अजय सिंह बिष्ट ने घोषणा की कि तैयार हो रहे मुगल म्यूजियम का नाम बदलकर छत्रपति शिवाजी महाराज म्यूजियम कर दिया जाएगा. अपनी हिंदू कट्टरवादी छवि के अनुरूप आदित्यनाथ ने घोषणा की, “कैसे हमारे हीरो मुगल हो सकते हैं?” आजकल राजनीति में मुसलमानों को बाहर का बताने के लिए मुगल शब्द का इस्तेमाल होता है.
एक सप्ताह बाद मुख्यमंत्री एक अलग ही अंदाज में प्रस्तुत हुए. इस बार वह व्यवसाय को बढ़ावा देने वाले एक वैश्विक नागरिक का रूप धारण किए हुए थे. मौका था “इन्वेस्ट यूपी” नामक उच्च स्तरीय सशक्त समिति की बैठक का, जो निवेश से संबंधित मंजूरी और अन्य संबंधित प्रक्रियाओं को दुरुस्त करने के लिए बनाई गई राज्य की एजेंसी है. उस मीटिंग में आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश को ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी बना देने के महत्वकांक्षी लक्ष्य की घोषणा की और भारतीय और विदेशी निवेशकों को राज्य में कारोबार शुरू करने का आमंत्रण दिया. उन्होंने राज्य को एक ऐसे मुख्य निवेश गंतव्य बनाने की बात की जो सौर ऊर्जा और जैव ईंधन जैसे 21वी शताब्दी के आधुनिक उद्यमों को बढ़ावा देगा.
राजनीति की यह दोमुंही बात भरमा सकती है. उस नेता को क्या समझा जाए जो बाजार की स्वतंत्रता वाले प्रगतिवादी “उधार” दृष्टिकोण की बात भी करता है और अतीत से चिपकी “कट्टर” सांस्कृतिक राजनीति का प्रदर्शन भी करता है?
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के जमाने में उपरोक्त किस्म के विरोधाभास भारतीय राजनीति का पैकेज डील है. यह आर्थ-राजनीतिक पैकेज उस लोकप्रिय मान्यता के विपरीत है जिसमें माना जाता है कि उदार राजनीति और उदार बाजार एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. माने पूंजी लोकतंत्र को मजबूत कर दुनिया में बेलगाम स्वतंत्रता को बढ़ावा देती है. लेकिन ऐसा लगता है कि पूंजी लोगों पर कठोरता से नियंत्रण रखने वाले ऐसे बहुसंख्यकवादी शासनों को मजबूत भी करती है जो आजादी पर रोक लगाते हैं. बाजार का लालच देकर अमीरों और ताकतवर लोगों से सौदा किया जाता है. पिछले साल जम्मू-कश्मीर से विशेष दर्जा हटा लेने में यह लेनदेन साफ दिखा था. इसमें उम्मीद की गई थी कि राज्य के भीतर दमन को निवेशकर्ता इन बाजारों में संभावित बड़ी घुसपैठ के मद्देनजर नजरअंदाज कर देंगे.
1990 के दशक में कांग्रेस ने उदारीकरण की नींव रखी लेकिन वह मोदी हैं जिन्होंने इसका इस्तेमाल भारतीय राजनीति में हिंदुत्ववादी उग्र राष्ट्रवाद को मजबूत बनाने के लिए किया. 2014 से पहले, जब वह मुख्यमंत्री थे, उन्होंने निवेशकर्ताओं को गुजरात मॉडल बेचने के लिए पूंजीवादी लालचों का इस्तेमाल किया. यह वाइब्रेंट गुजरात के रूप में सामने आया. वाइब्रेंट गुजरात अंतरराष्ट्रीय निवेशकर्ताओं का हर दो साल में होने वाला शिखर सम्मेलन है जिसमें वह अपनी लोकप्रिय मजबूत नेता की छवि का प्रचार करते थे. बाद में इसे “अच्छे दिन” कहा गया. इसमें हिंदू सभ्यता कि पुनर्स्थापना और आर्थिक विकास का वादा था. इससे उन्हें 2014 की चुनावी सफलता भी मिली. अब आदित्यनाथ इसी रास्ते पर जब चल पड़े हैं, तो नवउदारवादी आर्थिक विकास ने न केवल धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक राजनीति से दूरी बना ली है बल्कि वह हिंदू राष्ट्रवादी प्रोजेक्ट को मजबूती भी दे रहा है.
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