सिर्फ कूटनीति तक सीमित नहीं रहा नेपाल-भारत तनाव

नवंबर 2019 में काठमांडू में विपक्षी पार्टी नेपाली कांग्रेस का छात्र संगठन नेपाल स्टूडेंट यूनियन के सदस्यों द्वारा आयोजित विरोध कार्यक्रम. भारत सरकार ने धारा 370 को निरस्त करने के बाद एक नया राजनीतिक मानचित्र जारी किया था जिसमें कालापानी को अपनी सीमाओं में दिखाया था. भारत के इस फैसले के विरोध में नेपाल में कई प्रदर्शन हुए.
सरोज बैजू / नूर फोटो / गैटी इमेजिस
नवंबर 2019 में काठमांडू में विपक्षी पार्टी नेपाली कांग्रेस का छात्र संगठन नेपाल स्टूडेंट यूनियन के सदस्यों द्वारा आयोजित विरोध कार्यक्रम. भारत सरकार ने धारा 370 को निरस्त करने के बाद एक नया राजनीतिक मानचित्र जारी किया था जिसमें कालापानी को अपनी सीमाओं में दिखाया था. भारत के इस फैसले के विरोध में नेपाल में कई प्रदर्शन हुए.
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9 जुलाई को नेपाल के केबल ऑपरेटरों ने अचानक भारत के सभी निजी समाचार चैनलों के प्रसारण को बंद करने की घोषणा कर दी. ऑपरेटरों ने यह फैसला जी न्यूज के एक शो के विरोध में लिया था जिसमें दिखाया गया था कि काठमांडू में चीनी राजदूत होउ यानछि ने नेपाल के प्रधानमंत्री खड्ग प्रसाद शर्मा ओली को "हनी ट्रैप" में फंसा लिया है यानी अपने वश में कर लिया है. भूभाग को लेकर दोनों देशों के बीच मई में हुए विवाद के बाद ऐसी आधारहीन और बेतुकी रिपोर्टें भारतीय मीडिया में आती रही हैं.

ऑपरेटरों की उस घोषणा के एक सप्ताह के अंदर दोनों देशों की सीमा पर तनाव एक बार फिर बढ़ गया. इस बार इसलिए कि ओली ने हिंदू देवता राम का असली जन्मस्थान भारत की अयोध्या में न होकर नेपाल के बीरगंज के पास बताया था. अभी हाल ही में भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा अयोध्या में नए राम मंदिर की आधारशिला रखने के बाद ओली ने नेपाल के उस क्षेत्र के पास जहां वह अयोध्या होने का दावा करते हैं, राम, सीता और लक्ष्मण की प्रतिमाओं का निर्माण करने का सुझाव दिया. हिंदुत्व के सबसे पोषित विश्वासों में से एक पर ओली के प्रहार से मचा कोहराम इस बात का संकेत था कि जब तक दोनों देशों के बीच संबंधों में तनाव बना रहेगा, तब तक पुराने विवादों को नई जमीन पर फिर से उभारा जाएगा. सरकार द्वारा नहीं बल्कि ऑपरेटरों द्वारा लगाए गए अस्थायी प्रतिबंध से नेपाल और भारत के बीच जारी कूटनयिक गतिरोध के जन असंतोष में तबदील होने का जोखिम है.

दोनों देशों के बीच विवादित क्षेत्र कालापानी के ऊपर एक हाईपास के माध्यम से मानसरोवर के लिए भारत के एक नई लिंक रोड खोलने से तनाव की शुरुआत हुई. नेपाल में जानकार इस प्रकरण की शुरुआत नवंबर 2019 में मानते हैं. तब भारत सरकार ने कश्मीर से अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के बाद एक नया राजनीतिक मानचित्र जारी किया था. उसमें कालापानी को भारत ने अपनी सीमा में शामिल कर लिया था. भारतीय क्षेत्रों के भीतर कालापानी को शामिल करना कोई नई घटना नहीं थी क्योंकि स्वतंत्र भारत ने आधिकारिक मानचित्रों में हमेशा इन अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को दिखाया है. फिर भी यह ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के बीच 1816 की संधि का उल्लंघन ही है. 1816 की संधि भारत के साथ नेपाल के पश्चिमी सीमा को निर्धारित करती है.

क्षेत्र के शुरुआती औपनिवेशिक नक्शे नेपाल के वर्तमान दावों का समर्थन करते हैं. 1870 के दशक तक अंग्रेजों के आधिकारिक नक्शों ने न केवल काली नदी का नाम बदल दिया जो संधि के अनुसार प्राकृतिक सीमा थी, और उसके पूर्व में रहि एक छोटी सी नदीको काली नाम दिया, बल्कि सीमा को उस छोटी नदी से भि पूर्व कालापानी में स्थानांतरित कर दिया जो तिब्बत से कुछ किलोमीटर दक्षिण में था. 1960 के दशक तक उस कार्टोग्राफिक अतिक्रमण ने कालापानी में भारतीय सेना की मजबूत उपस्थिति का रुप ले लिया था. इन परिवर्तनों का विरोध नेपाल में निरंकुश राजशाही के अंत के बाद जन्मे नए राजनीतिक वर्ग और मुक्त मीडिया ने 1990 के दशक में शुरू किया.

कालापानी एजेंडा तब से नेपाल में राष्ट्रवादी राजनीति का हिस्सा बन गया है. वर्षों से काठमांडू ने राजनयिक स्तर पर इस मुद्दे को जीवित रखने की कोशिश की है. लेकिन इस क्षेत्र पर भारतीय आधिपत्य कमोबेश बन चुका है. भारतीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का मई में नई सड़क का उद्घाटन उस यथास्थिति की क्रूर याद है. दो सप्ताह तक राजनयिक बातचीत के बाद, घरेलू राजनीतिक दबावों में आकर ओली सरकार ने नेपाल का एक नया नक्शा जारी किया जिसमें 335 वर्ग किलोमीटर का अतिरिक्त विवादित क्षेत्र नेपाल के अंदर दिखाया गया है.

शुभाङ्ग पाण्डे हिमाल साउथएशिया के कार्यकारी संपादक हैं. यह दक्षिण एशियाई राजनीति, इतिहास और संस्कृति पर काम करने वाला एक डिजिटल प्रकाशन है. उनका ट्विटर हैंडल @shubhangap है.

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