एनआरसी से देश के मुसलमानों में घबराहट

23 सितंबर 2019
अवैध आव्रजकों के लिए भारत के पहले बंदी केंद्र का निर्माण कार्य असम के गोलपाड़ा जिले में आरंभ हो चुका है. इसका खर्च केंद्र सरकार वहन कर रही है.
जीशान ए लतीफ/कारवां
अवैध आव्रजकों के लिए भारत के पहले बंदी केंद्र का निर्माण कार्य असम के गोलपाड़ा जिले में आरंभ हो चुका है. इसका खर्च केंद्र सरकार वहन कर रही है.
जीशान ए लतीफ/कारवां

1 सितंबर को भारतीय सिविल लिबर्टीज यूनियन के ट्विटर हैंडल में पुणे (महाराष्ट्र) के एक मुस्लिम ने राष्ट्रीय नागरिक पंजीका (एनआरसी) के बारे में सवाल पूछा. 31 अगस्त को प्रकाशित एनआरसी की अंतिम सूची से तकरीबन 19 लाख लोगों को बाहर कर दिया गया है. बाहर किए गए लोगों के पास विदेशी नागरिक अधिकरण के सामने अपनी नागरिकता साबित करने के लिए 120 दिन का समय है.

जब उस व्यक्ति को यह कहा गया कि एनआरसी केवल असम के लिए है तो उसका जवाब था, “अगर इसे पूरे भारत में लगाया गया तो क्या होगा? मैं समय रहते सारे कागजात इकट्ठा कर लेना चाहता हूं.” उस आदमी ने यह भी बताया कि उसके दादा 1930 में महाराष्ट्र आ गए थे और वह असम का रहने वाला नहीं है.

एनआरसी की अंतिम सूची आने के बाद भय का माहौल बन गया है मुस्लिमों को डर है कि यदि ऐसा अभ्यास पूरे भारत में किया गया तो इसका क्या असर पड़ेगा. भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने एनआरसी जैसे अभ्यास को दिल्ली और पश्चिम बंगाल सहित अन्य राज्यों में चलाए जाने की मांग की है. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बार-बार इसे “राष्ट्रीय परियोजना” बनाने की बात कही है. गुवाहाटी में पूर्वोत्तर राज्यों के मुख्यमंत्रियों को संबोधित करते हुए अमित शाह ने कहा था, “नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन के बारे में अलग-अलग लोगों ने विचार व्यक्त किए हैं लेकिन मैं साफ-साफ कह देना चाहता हूं कि भारत सरकार एक भी अवैध घुसपैठिए को देश में रहने नहीं देगी. यह हमारी प्रतिबद्धता है.”

राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर को अपडेट करने के बारे में जारी गजट अधिसूचना ने उपरोक्त घबराहट में आग में घी का काम किया है. सोशल मीडिया पर लोगों को अपने पहचान पत्र और सरकार द्वारा जारी दस्तावेजों को तैयार रखने के संदेश शेयर किए जा रहे हैं.

भारतीय सिविल लिबर्टीज यूनियन की सदस्य और कानून की छात्रा शिवांगी शर्मा ने मुझे बताया, “हम से संपर्क करने वाले अधिकांश लोग मुस्लिम है. अधिकतर हमें ग्रामीण इलाकों या देश के बाहर रहने वाले मुसलमान फोन या ईमेल कर रहे हैं. वे लोग जानना चाहते हैं कि उनको किन दस्तावेजों की जरूरत पड़ेगी.” शिवांगी ने बताया कि एक सितंबर से उसने तकरीबन 60 ट्विटर और फेसबुक संदेशों के जवाब दिए हैं और कई लोगों से फोन पर बात की है.

तुषार धारा कारवां में रिपोर्टिंग फेलो हैं. तुषार ने ब्लूमबर्ग न्यूज, इंडियन एक्सप्रेस और फर्स्टपोस्ट के साथ काम किया है और राजस्थान में मजदूर किसान शक्ति संगठन के साथ रहे हैं.

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