एनआरसी से देश के मुसलमानों में घबराहट

अवैध आव्रजकों के लिए भारत के पहले बंदी केंद्र का निर्माण कार्य असम के गोलपाड़ा जिले में आरंभ हो चुका है. इसका खर्च केंद्र सरकार वहन कर रही है. जीशान ए लतीफ/कारवां
Elections 2024
23 September, 2019

1 सितंबर को भारतीय सिविल लिबर्टीज यूनियन के ट्विटर हैंडल में पुणे (महाराष्ट्र) के एक मुस्लिम ने राष्ट्रीय नागरिक पंजीका (एनआरसी) के बारे में सवाल पूछा. 31 अगस्त को प्रकाशित एनआरसी की अंतिम सूची से तकरीबन 19 लाख लोगों को बाहर कर दिया गया है. बाहर किए गए लोगों के पास विदेशी नागरिक अधिकरण के सामने अपनी नागरिकता साबित करने के लिए 120 दिन का समय है.

जब उस व्यक्ति को यह कहा गया कि एनआरसी केवल असम के लिए है तो उसका जवाब था, “अगर इसे पूरे भारत में लगाया गया तो क्या होगा? मैं समय रहते सारे कागजात इकट्ठा कर लेना चाहता हूं.” उस आदमी ने यह भी बताया कि उसके दादा 1930 में महाराष्ट्र आ गए थे और वह असम का रहने वाला नहीं है.

एनआरसी की अंतिम सूची आने के बाद भय का माहौल बन गया है मुस्लिमों को डर है कि यदि ऐसा अभ्यास पूरे भारत में किया गया तो इसका क्या असर पड़ेगा. भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने एनआरसी जैसे अभ्यास को दिल्ली और पश्चिम बंगाल सहित अन्य राज्यों में चलाए जाने की मांग की है. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बार-बार इसे “राष्ट्रीय परियोजना” बनाने की बात कही है. गुवाहाटी में पूर्वोत्तर राज्यों के मुख्यमंत्रियों को संबोधित करते हुए अमित शाह ने कहा था, “नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन के बारे में अलग-अलग लोगों ने विचार व्यक्त किए हैं लेकिन मैं साफ-साफ कह देना चाहता हूं कि भारत सरकार एक भी अवैध घुसपैठिए को देश में रहने नहीं देगी. यह हमारी प्रतिबद्धता है.”

राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर को अपडेट करने के बारे में जारी गजट अधिसूचना ने उपरोक्त घबराहट में आग में घी का काम किया है. सोशल मीडिया पर लोगों को अपने पहचान पत्र और सरकार द्वारा जारी दस्तावेजों को तैयार रखने के संदेश शेयर किए जा रहे हैं.

भारतीय सिविल लिबर्टीज यूनियन की सदस्य और कानून की छात्रा शिवांगी शर्मा ने मुझे बताया, “हम से संपर्क करने वाले अधिकांश लोग मुस्लिम है. अधिकतर हमें ग्रामीण इलाकों या देश के बाहर रहने वाले मुसलमान फोन या ईमेल कर रहे हैं. वे लोग जानना चाहते हैं कि उनको किन दस्तावेजों की जरूरत पड़ेगी.” शिवांगी ने बताया कि एक सितंबर से उसने तकरीबन 60 ट्विटर और फेसबुक संदेशों के जवाब दिए हैं और कई लोगों से फोन पर बात की है.

जयपुर की संस्था बजट एनालीसिस एंड रिसर्च सेंटर के संयोजक निसार अहमद मानते हैं, “लोगों में जबरदस्त डर है. सोशल मीडिया में मुझे संदेश मिल रहे हैं कि मैं अपने सारे सर्टिफिकेट तैयार रखूं. पिछले एक महीने में ऐसे संदेशों की संख्या बढ़ गई है. मेरे फैमिली ग्रुप, स्कूल के दोस्तों की ग्रुप में और अन्य दोस्तों के ग्रुपों में ऐसे संदेश लगातार आ रहे हैं.”

निसार मूल रूप से बिहार के रहने वाले हैं लेकिन पिछले एक दशक से वह राजस्थान में काम कर रहे हैं. पिछले साल उनके पिता का इंतकाल हो गया लेकिन मौत से पहले वह अपनी पुश्तैनी जायदाद निसार के नाम नहीं करा पाए थे. निसार बताते हैं कि वह इस काम को प्राथमिकता दे रहे हैं ताकि वह साबित कर सकें कि वह उसके मालिक हैं. वह कहते हैं, “संपत्ति होना कुछ साबित नहीं करता. जिस तरह के बयान बीजेपी दे रही है उससे लगता है भारतीय होने के लिए आपको 10 पीढ़ियों का हिसाब देना होगा. इससे मुसलमान ज्यादा डरे हुए हैं क्योंकि सरकार कह रही है कि वह पड़ोसी देशों से आने वाले हिंदू, सिख और ईसाइयों के लिए चीजें आसान बनाने के लिए नागरिकता कानून में संशोधन लाएगी.”

भारतीय नागरिक कौन है? इस सवाल से पैदा होने वाली घबराहट को शांत करने के लए कुछ लोग सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर रहे हैं ताकि चीजों को स्पष्ट किया जा सके. हैदराबाद की नालसर विधि विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर फैजान मुस्तफा ने 24 अगस्त को एक वीडियो अपलोड किया था जिसका शीर्षक था “भारतीय नागरिक कौन है, राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर कोई एनआरसी नहीं है.” यह वीडियो मुस्तफा की उस वेब सीरीज का हिस्सा है जिसमें वह कानून संबंधित जानकारियां लोगों को देते हैं. इस वीडियो को देखने वालों की संख्या मुस्तफा के अन्य वीडियो को देखने वालों की संख्या से बहुत अधिक है. निसार अहमद ने मुझे बताया कि मुस्तफा का वीडियो सोशल मीडिया और व्हाट्सएप ग्रुप में वायरल हो गया और इसने कई लोगों को राहत दी.

उस वीडियो में मुस्तफा ने समझाया है कि 26 जनवरी 1950 और 30 जून 1987 के बीच भारत में पैदा हुए सभी लोग भारतीय नागरिक हैं. 30 जून 1987 और 2 दिसंबर 2000 के बीच पैदा होने वाले लोग उस स्थिति में भारतीय माने जाएंगे यदि उनके मां-बाप में से कोई एक भारतीय नागरिक है. इसके बाद पैदा होने वाले लोगों को भारतीय नागरिक तभी माना जाएगा जब उनके माता-पिता दोनों भारतीय हों या मां-बाप में से एक भारतीय हो और दूसरा अवैध आव्रजक न हो.

मुस्तफा ने मुझे बताया कि कई लोग मुझे घबराहट में फोन या ईमेल कर कह रहे थे कि यदि एनआरसी देशभर में लागू हुआ तो इसकी कट ऑफ डेट 19 जुलाई 1949 होगी जबकि असम में यह 1971 थी. मुस्तफा ने आगे बताया कि एनआरसी की अंतिम सूची प्रकाशित होने से पहले मुसलमानों में व्याप्त तनाव चरम पर पहुंच गया था और लोग ऐसे दस्तावेज इकट्ठा करने लग गए थे जो 1949 के थे. भारतीय संविधान के अनुसार जुलाई 1949 से पहले भारत आकर बसने वाले स्वतः भारतीय नागरिक बन गए यदि उनके माता-पिता या दादा-दादी भारत में पैदा हुए थे. इस तारीख के बाद आने वाले लोगों को अपना पंजीकरण कराना पड़ा.

मुस्तफा ने बताया, “सत्ताधारी पार्टी के वक्तव्यों से लगता है कि ये लोग एनआरसी को राष्ट्रव्यापी रूप में लागू करना चाहते हैं. भारतीय नागरिक होने को लेकर जारी भ्रम के अलावा लोगों में अपने नामों की वर्तनी की गलतियों को लेकर भी चिंताएं हैं. मुस्तफा ने बताया कि एक दिन पहले उन्हें उत्तर प्रदेश से एक ईमेल मिला था जिसे भेजने वाली महिला ने बताया था, “उनके पिता का नाम जफर सिद्दिकी है लेकिन दस्तावेज में वह अलग तरीके से लिखा है. छोटी-छोटी गलतियों के लिए लोग सताए जा रहे हैं.”

सोशल मीडिया में अलग-अलग तरह के संदेशों के चलते भी भ्रम की स्थिति में इजाफा हो रहा है. इसे समझाने के लिए भारतीय सिविल लिबर्टीज यूनियन के सोशल मीडिया को संभाल रहीं सनोबर फातमा से मैंने बात की. फातमा ने मुझे व्हाट्सएप का एक संदेश फॉरवर्ड किया. उसका शीर्षक था, “राष्ट्रीय नागरिक पंजिका की अपडेट प्रक्रिया (1 अप्रैल 2020- 30 सितंबर 2000)”. यह तारीख राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर को अपडेट करने की है न कि एनआरसी की. इसमें दो सूचियां हैं. सूची नंबर एक में 14 दस्तावेज बताए गए हैं जिनमें हैं 1971 तक मतदाता रोल, भूमि रिकॉर्ड, बीमा प्रमाणपत्र और पासपोर्ट. सूची नंबर दो में जन्म प्रमाण पत्र और राशन कार्ड जैसे दस्तावेज शामिल हैं.

फातमा ने बताया, “ऐसी गुमराह करने वाली जानकारियों की बाढ़-सी आ गई है. लोग अर्ध निर्मित भवनों की तस्वीरें बंदी केंद्र बता कर शेयर कर रहे हैं. लोग कहते हैं कि चीन में जैसा उइघुर मुस्लिमों के साथ हो रहा है वैसा अब भारत के मुस्लिमों के साथ किया जाएगा. जब फातिमा ने इस संंदेश की सच्चाई जानने के लिए फॉरवर्ड करने वालों को फोन लगाया तो पता चला ऐसा “मौलाना ने बताया है.” जब फातमा ने मौलाना से इस बारे में पूछा तो उन्होंने ऐसे किसी भी संदेश को भेजने की बात से इनकार कर दिया .

इस घबराहट को समझा जा सकता है. अवैध आव्रजकों के लिए भारत के पहले बंदी केंद्र का निर्माण कार्य असम के गोलपाड़ा जिले में आरंभ हो चुका है. इस केंद्र का निर्माण खर्च केंद्र सरकार वहन कर रहे हैं. राज्य में ऐसे 11 केंद्रों के निर्माण की योजना है.

स्वयंसेवी एजेंसियों के परिसंघ के कार्यकारी निदेशक मजहर हुसैन कहते हैं, “सिर्फ मुस्लिमों में नहीं बल्कि हिंदुओं में भी घबराहट है.” मजहर की संस्था सामाजिक न्याय के लिए काम करने वाले संगठनों का नेटवर्क है. कुछ लोग पहले से ही दस्तावेज इकट्ठा कर लेना चाहते हैं और अपने दस्तावेजों की गलतियों को सुधारना चाहते हैं. वह कहते हैं कि अभी एनआरसी को राष्ट्रव्यापी स्तर पर लागू करने की बात नहीं है लेकिन जिस तरह के बयान सत्तारूढ़ पार्टी के सदस्य दे रहे हैं उससे कुछ भी मान लेना कठिन है. असम की एनआरसी प्रक्रिया में “गंभीर कमजोरियों” के चलते भी देश के मुसलमान घबराए हुए हैं.

दिल्ली के वकील अनस तंविर असम एनआरसी मामलों में मदद कर रहे हैं. उन्होंने भारतीय सिविल लिबर्टीज यूनियन के काम में मदद करनी शुरू की है और उन्हें उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल से मुसलमानों और खुद के परिवार वालों के फोन आ रहे हैं. तंविर वाराणसी के रहने वाले हैं और कहते हैं कि उनके पास ऐसे दस्तावेज हैं जो बताते हैं कि उनका परिवार 1857 से उत्तर प्रदेश में रह रहा है. वह कहते हैं, “मेरा सरनेम तंविर है और इसे कई तरीकों से लिखा जा सकता है.” उन्होंने बताया कि उन्हें परिवार वालों के फोन आ रहे हैं कि किन दस्तावेजों को तैयार रखना है. तंविर को 1980 के दशक में मुंबई जा चुके उनके रिश्तेदारों के भी फोन आ रहे हैं.

वह कहते हैं, “लोग कुछ ज्यादा ही डरे हुए हैं लेकिन यह डर अकारण नहीं है. गृह मंत्री अमित शाह देशभर में एनआरसी प्रक्रिया को लागू करने के संबंध में कई सारे वक्तव्य दे चुके हैं और उनके अध्यक्षीय भाषण में भी इसका जिक्र था. हमें तैयार रहना चाहिए.”