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पाकिस्तान ने हाल ही में तुर्की और सऊदी अरब के साथ मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर करके एक बड़ी भू-राजनीतिक जीत हासिल की है. इस त्रिपक्षीय समझौते के तहत तीनों देशों में से किसी एक पर होने वाले हमले को सभी पर हमला माना जाएगा. इन तीन देशों में एक नाटो का सदस्य है, दूसरा खाड़ी का एक अमीर राजतंत्र है और तीसरा परमाणु हथियारों से लैस है.
हालांकि इसके महत्वपूर्ण बिंदू और देशों की ज़िम्मेदारियों को सार्वजनिक नहीं किया गया है, लेकिन यह समझौता पाकिस्तान को उसके आस-पास के इलाकों में बड़ी कूटनीतिक बढ़त दिलाता है. तुर्की के पास सैन्य क्षमता और रक्षा विशेषज्ञता है, सऊदी अरब वित्तीय संसाधन और रणनीतिक वज़न के मामले में बड़ा देश है, जबकि पाकिस्तान के पास एक बड़ी पेशेवर सेना, परमाणु हथियार और सुरक्षा सहयोग का अनुभव है. इस समझौते को मुख्य रूप से पश्चिम एशिया में अस्थिरता और इस क्षेत्र में भविष्य में अमेरिकी सुरक्षा भूमिका को लेकर अनिश्चितता का एक मुकम्मल जवाब माना जा रहा है. भारत की राजनीतिक और सैन्य स्थिति पर इसके असर की बात एक तरफ़, लेकिन पाकिस्तान की घरेलू राजनीति के लिए इसके नतीजे बहुत अच्छे नहीं लग रहे.
इस समझौते जैसी हर बाहरी कूटनीतिक जीत, पाक सेना के लिए जीवनरक्षक घोल की तरह है. पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर के लिए यह समझौता अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता का एक नया एहसास दिलाता है, जिससे उन्हें पाकिस्तान को पश्चिम और दक्षिण एशिया में एक उभरती हुई ताक़त के तौर पर पेश करने का मौक़ा मिला है. यह ध्यान भटकाने का एक आसान ज़रिया है, क्योंकि राजनीतिक दमन और आर्थिक पतन के बोझ तले देश का सामाजिक ताना-बाना बिखर रहा है.
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