संसद में उठा धुआं भारत की बीमारी का लक्षण, देना होगा ध्यान

28 दिसंबर 2023
13 दिसंबर 2023 को संसद पर धुआं बम से हमला हो गया. संसद में घुसपैठ करने वाले युवाओं ने हमले की तारीख बहुत सावधानी से चुनी, जिससे सुरक्षा की गारंटी देने के मोदी सरकार के दावों की पोल खुल जाए.
विकिमीडिया कॉमन्स
13 दिसंबर 2023 को संसद पर धुआं बम से हमला हो गया. संसद में घुसपैठ करने वाले युवाओं ने हमले की तारीख बहुत सावधानी से चुनी, जिससे सुरक्षा की गारंटी देने के मोदी सरकार के दावों की पोल खुल जाए.
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भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने 8 अप्रैल 1929 को दिल्ली केंद्रीय विधान सभा में धुआं बम और पर्चे फेंकने की सार्वजनिक आलोचना का जवाब देते हुए एक बयान लिखा, “हम मानव जीवन को शब्दों से परे पवित्र मानते हैं. हम न तो कायरतापूर्ण अत्याचारों के अपराधी हैं... न ही हम 'पागल' हैं जैसा कि... कुछ लोग मानते होंगे.'' फ्रांसीसी चैंबर ऑफ डेप्युटी पर बमबारी करने वाले एक अराजकतावादी, ऑगस्टे वैलेन्ट के कामों से प्रेरित होकर, दोनों क्रांतिकारियों का मकसद दो दमनकारी बिलों के पारित होने का विरोध करना था. उन्होंने इस कृत्य के बाद आत्मसमर्पण कर अपनी बात को अदालत के जरिए दूर-दूर तक पहुंचाने की योजना बनाई थी. सिंह और दत्त को "गैरकानूनी और बदनियती से जानलेवा विस्फोट करने" के लिए आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई.

13 दिसंबर 2023 को भारतीय संसद में जो दृश्य दिखे वे 94 साल पहले की उस घटना की याद ताजा करते हैं. मनोरंजन डी और सागर शर्मा ने देश का ध्यान उन गंभीर समस्याओं की ओर आकर्षित करने के लिए लोकसभा में स्मोक बम फेंका, जो सरकार और टेलीविजन स्टूडियो में सुनी नहीं जा रही हैं, मसलन मंहगाई, तानाशाही, मणिपुर की स्थिति और सबसे ऊपर, बेरोजगारी. ऐसा न हो कि उन्हें राष्ट्र-विरोधी करार दिया जाए, वीडियो में दिखाया गया है कि मनोरंजन और शर्मा ने "भारत माता की जय" के नारे लगाए. दोनों को उनके बाकी साथियों के साथ गिरफ्तार कर लिया गया और उन पर आतंकवाद विरोधी गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम के तहत आरोप लगाए गए. पुलिस को अभी तक आरोपियों और किसी आतंकी समूह या राजनीतिक दल के बीच कोई संबंध नहीं मिला है.

आतंकवाद अब नकारात्मक अर्थों वाला एक शब्द बन गया है. लेकिन एक सदी पहले, यह सिर्फ एक युक्ति थी. भगत सिंह के साथी क्रांतिकारियों में से एक, भगवती चरण वोहरा ने एमके गांधी की "बम के पंथ" की आलोचना पर अपनी प्रतिक्रिया, "बम का दर्शन" लेख में समझाया. वोहरा ने लिखा, "आतंकवाद क्रांति का एक आवश्यक और अपरिहार्य चरण है. आतंकवाद संपूर्ण क्रांति नहीं है और क्रांति आतंकवाद के बिना पूरी नहीं होती.”

संसद में घुसपैठ करने वाले युवाओं ने अपनी तारीख बहुत सावधानी से चुनी, जिससे सुरक्षा की गारंटी देने के मोदी सरकार के दावों की पोल खुलती दिखे. ठीक 22 साल पहले 13 दिसंबर को पाकिस्तान के हथियारबंद आतंकवादियों ने संसद पर हमले की कोशिश की थी. हमला नाकाम कर दिया गया लेकिन नौ लोगों की जान चली जाने के बाद. इस घटना से पूरा देश और खुद दक्षिण एशिया हिल गया, जिसके चलते वाजपेयी सरकार को सशस्त्र बलों को पाकिस्तानी सीमा पर तैनात करना पड़ा. कम से कम दो मौकों पर दोनों देश चिंताजनक रूप से युद्ध के करीब थे, लेकिन छह कठिन महीनों के बाद तनाव कम हुआ. आखिरी नतीजा रहा कि 798 भारतीय सैनिक मारे गए. कारगिल युद्ध के दौरान भारत ने केवल 527 सैनिक खोए थे.

ताजा घटना में किसी की मौत नहीं हुई लेकिन संसद की सुरक्षा में सेंधमारी 2001 के हमले से भी ज्यादा शर्मनाक है. सबसे कमजोर कड़ी मैसूर से भारतीय जनता पार्टी के सांसद प्रताप सिम्हा थे जिन्होंने आगंतुकों के लिए पास की सिफारिश करके घुसपैठियों को लोकसभा में घुसने की सुविधा की. इसमें एक प्रमाणीकरण शामिल था कि पास के लिए अनुशंसित व्यक्ति को वह जानते थे. सिम्हा से पूछताछ नहीं की गई है. पूरी संभावना है कि अगर उनकी जगह कोई विपक्षी सांसद होता तो अब तक आरोप लग चुके होते और जांच शुरू हो चुकी होती. हालांकि सिम्हा ने इस पर एक बयान जारी किया है.

सुशांत सिंह येल यूनि​वर्सिटी में हेनरी हार्ट राइस लेक्चरर और सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च में सीनियर फेलो हैं.

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