किसान आंदोलन : सरकार दोहरा रही वही खेल जो पहले ले जा चुका है पंजाब को बर्बादी की ओर

02 फ़रवरी 2021
शाहिद तांत्रे
शाहिद तांत्रे

26 जनवरी की घटनाओं की दक्षिणपंथी व्याख्या में एक जाना-पहचाना पैटर्न दिखाई पड़ता है यानी दिल्ली पहुंचे किसानों को उग्रवादी, खालिस्तानी और राष्ट्र-विरोधी बताना. संभवतः सभी के लिए अभिनेता दीप सिद्धू जैसे लोगों पर लाल किले पर प्रदर्शनकारियों को झंडा फहराने के लिए उकसाने का आरोप लगाना सरल है और किसान नेताओं ने भी दावा किया है कि चरमपंथी तत्वों ने आंदोलन पर कब्जा कर लिया था. लेकिन उस दिन जो भी हुआ वह अप्रत्याशित नहीं था. सरकार और किसान यूनियनों के नेताओं को निश्चित रूप से ऐसा कुछ होने की संभावना रही होगी और लेकिन उन्होंने इससे निपटने के लिए कुछ नहीं किया.

सितंबर में कृषि कानूनों के पारित होने के बाद से ही इन कानूनों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए थे. ये विरोध पहले डेढ़ महीने तक पंजाब में जारी रहे और फिर नवंबर के आखिर तक ये दिल्ली के बाहरी इलाकों तक पहुंच गए. इस लंबी अवधि में सरकार से बातचीत का कोई नतीजा नहीं निकला और आंदोलनकारी बेसब्र होने लगे. आंशिक रूप से आंदोलनकारियों का हौसला बढ़ाए रखने के लिए किसान नेताओं ने गणतंत्र दिवस पर एक ऐतिहासिक ट्रैक्टर मार्च की योजना बनाई थी. किसान नेताओं और दिल्ली पुलिस के बीच पहले कुछ दिनों तक रैली के मार्ग को लेकर सहमति नहीं बन सकी. आखिरकार रैली से मात्र दो दिन पहले दोनों पक्ष रैली को दिल्ली के बाहरी इलाकों तक सीमित रखा गया. इस पर कोई हैरानी नहीं कि यह फैसला कार्यकर्ताओं की उन अपेक्षाओं से बहुत कम था जो उन्हें किसान यूनियन के नेताओं ने दिखाई थी.

24 जनवरी की रात से आंदोलन में युवा किसानों के बीच की बेचैनी खुले तौर पर सामने आने लगी. आंदोलन का नेतृत्व कर रहे प्रमुख यूनियनों में से एक किसान मजदूर संघर्ष समिति के महासचिव सरवन सिंह पंढेर ने 25 जनवरी की दोपहर को घोषणा की कि उनके किसान निर्दिष्ट मार्ग का पालन नहीं करेंगे. पंढेर के भाषण के बाद यह तय था कि बड़ी संख्या में आंदोलनकारी निर्धारित मार्ग को नहीं मानेंगे. इस आशंका के बाबत हाथ में 15 घंटे रहने के बावजूद यह हैरान करने वाली बात है कि दिल्ली पुलिस ने इसके लिए तैयार नहीं की.

26 जनवरी को घटी घटनाओं ने यह दिखा दिया कि किसान नेतृत्व ने आंदोलनकारियों की भावनाओं को व्यक्त तो किया लेकिन वह उन्हें नियंत्रित नहीं रख सका. आंदोलन को करीब से देखने वाले लोगों को इसका आभास पहले से ही था. यहां तक ​​कि आंदोलन स्थल का दिल्ली के बाहरी इलाके में होना भी अकास्मत है और यह नौजवान काडर के त्वरित फैसलों का नतीजा है. जब किसान यूनियनों ने इस आंदोलन को पंजाब से बाहर ले जाना शुरू किया तब नेताओं के पास दिल्ली आने की कोई स्पष्ट योजना नहीं थी. पंजाब और हरियाणा की सीमा पार करते समय शंभू गांव जैसे स्थानों पर पुलिस द्वारा रास्ता रोकने पर कई आंदोलनकारियों ने मामले को अपने हाथों में ले लिया और नाकाबंदी को तोड़ दिया. कोई आंदोलन जितना लंबे समय तक स्वीकार्य समाधान के बिना चलता है, उतना ही अधिक उसके नियंत्रण के बाहर हो जाने आशंका रहती है.

ऐसी स्थितियों में आंदोलनकारियों की आवाज की प्रतिध्वनि सिख धर्म के मूल्यों में होगी. यह आंदोलन की प्रकृति से स्पष्ट था. हालांकि इसका नेतृत्व वामपंथी कर रहे हैं लेकिन आंदोलनकारी किसान की बड़ी संख्या सिख है और आंदोलन की मांगे निरंतर रूप से पहचान की राजनीति में व्यक्त होती है. 18वीं शताब्दी के सिख जनरल बघेल सिंह की तस्वीर को गणतंत्र दिवस की रैली में पंजाब से आए हर दूसरे ट्रेक्टर पर लगाया गया था. बघेल सिंह ने दिल्ली में मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय की घेराबंदी की थी और उन पर जीत हासिल की थी. उन्होंने शहर में आयात होने वाले सामानों पर कर लगाया और इस कर को शहर के अधिकांश प्रमुख गुरुद्वारों के निर्माण करने के लिए उपयोग किया.

हरतोष सिंह बल कारवां के पॉलिटिकल एडिटर और वॉटर्स क्लोज ओवर अस : ए जर्नी अलॉन्ग द नर्मदा के लेखक हैं.

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