रोना विल्सन : सलाखों के भीतर भी कर्तव्य की चिंता

रोना विल्सन राजनीतिक कैदियों की रिहाई की एक समिति के संस्थापक सदस्य हैं. वे 15 वर्षों से मानवाधिकारों के लिए अभियान चला रहे हैं.
साभार : रोना विल्सन परिवार
रोना विल्सन राजनीतिक कैदियों की रिहाई की एक समिति के संस्थापक सदस्य हैं. वे 15 वर्षों से मानवाधिकारों के लिए अभियान चला रहे हैं.
साभार : रोना विल्सन परिवार

मार्च 2012 में, राजनीतिक बंदियों की रिहाई के लिए अभियान चलाने वाले रोना जैकब विल्सन ने देश की सुरक्षा एजेंसियों द्वारा आतंक रोधी कानूनों के दुरुपयोग पर हैदराबाद में आयोजित सेमिनार को संबोधित किया. रोना ने 1990 के दशक से लेकर गैर -कानूनी गतिविधि (रोकथाम) संशोधन अधिनियम , 2012 (यूएपीए) तक आते-आते भारत में आतंक रोधी कानूनों के विकास और इन कानूनों के वर्तमान स्वरूप पर बात रखी.  रोना ने कहा, यूएपीए ने, ''नेशनल काउंटर-टेररिज्म सेंटर सहित इंटेलिजेंस ब्यूरो को, किसी भी व्यक्ति को जिसे वे भारतीय राज्य के हितों के विपरीत काम करने वाला मानते हैं, न सिर्फ गिरफ्तार करने बल्कि जांच करने और मार देने का अधिकार भी दिया है.” रोना ने राजनीतिक बंदियों की रिहाई के लिए समिति (सीआरपीपी) के प्रतिनिधि के रूप में सेमिनार को संबोधित किया था. वे सीआरपीपी के संस्थापक सदस्य और जनसंपर्क सचिव हैं. उनका भाषण केवल बीस मिनट का था. लेकिन छह साल बाद उनके जीवन में जो घटा, उसकी चेतावनी उसमें थी.

6 जून 2018 को पुणे और दिल्ली पुलिस की एक संयुक्त टीम ने रोना को दिल्ली के मुनिरका गांव में उनके एक कमरे के किराए के मकान से गिरफ्तार किया. उस दिन देश के अलग-अलग हिस्सों में चार अन्य कार्यकर्ताओं को भी गिरफ्तार किया गया था. ये हैं, दलित-अधिकार कार्यकर्ता सुधीर धवले,  वकील सुरेंद्र गाडलिंग, विस्थापन के मुद्दे पर काम करने वाले कार्यकर्ता महेश राउत और प्रोफेसर शोमा सेन. पांचों पर प्रतिबंधित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) से संबंध रखने और यूएपीए की विभिन्न धाराओं के तहत आरोप लगाए गए हैं.

पुलिस के अनुसार ये लोग शीर्ष शहरी नक्सल हैं और 1 जनवरी 2018 को महाराष्ट्र के कोरेगांव में हुई जातीय हिंसा के लिए जिम्मेदार हैं. इन पर हिंसा के एक दिन पहले “एल्गर परिषद” को संगठित करने का भी आरोप है. एल्गर परिषद, 1818 में कोरेगांव की लड़ाई में उच्च-जाति मराठा सैनिकों के खिलाफ ब्रिटिश सेना की महार रेजिमेंट की जीत का जश्न मनाने के लिए आयोजित कार्यक्रम है. पुणे पुलिस का दावा है कि गिरफ्तार कार्यकर्ताओं ने अगले दिन दंगों को उकसाने के लिए एल्गर परिषद का इस्तेमाल किया और माओवादी गुटों ने इसकी फंडिंग की थी. पुलिस ने रोना पर "राजीव गांधी की तरह" प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की साजिश रचने का आरोप लगाया है. यह आरोप एक पत्र पर आधारित था जिसके बारे में पुलिस का दावा है कि वह रोना के पास से बरामद हुआ था. पुणे पुलिस ने 17 अप्रैल 2018 को रोना के घर छापा मारा था और उसका लैपटॉप, फोन और अन्य लिखित सामग्री जब्त कर उसके सभी पासवर्ड भी ले लिए थे. रोना और अन्य कार्यकर्ताओं को फिलहाल पुणे की यरवदा केंद्रीय जेल में रखा गया है और उनकी जमानत याचिका लंबित है जिसकी सुनवाई की कोई तारीख तय नहीं है.

संजय काक के अनुसार, “राजनीतिक कैदियों के लिए रोना के काम के चलते ही उन्हें गिरफ्तार किया गया है” क्योंकि रोना "हमारे समाज के सबसे हाशिए पर रहने वालों की रिहाई के लिए कड़ी मेहनत कर रहे थे.”

केरल के कोल्लम के 47 वर्षीय रोना पुदुच्चेरी जाने से पहले राज्य में रहते थे. नब्बे के दशक की शुरुआत में रोना दिल्ली चले आए और गिरफ्तारी के दिन तक वहीं रहे. इस साल जनवरी में , मैं कोल्लम में रोना के परिवार से मिली. घर की छत पर गुब्बारे लटक रहे थे. एक दिन पहले उनके बड़े भाई रॉय की बेटी का पहला जन्मदिन मनाया गया था. यदि रोना बाहर होते तो शायद यहां होते. रॉय ने कहा, "हमारी यह रिवायत है कि हम सभी क्रिसमस में साथ होते हैं." रोना “आम तौर पर केवल क्रिसमस और पारिवारिक समारोह में यहां आते हैं. गिरफ्तारी के बाद दो अवसरों पर रॉय ने रोना से मुलाकात की है.

आतिरा कोनिक्करा करवां की रिपोर्टिंग फेलो हैं.

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