अदालत ने खारिज की सुरेश वत्स की याचिका, नहीं हटेगी बलात्कार के आरोप की खबर

11 फ़रवरी 2020
अपनी शिकायत में असिस्टेंट प्रोफेसर ने लिखा कि जब उन्होंने वत्स को अपने करीब आने से मना किया तब वत्स ने उन्हें धमकीयां देना शुरू कर दिया.
अपनी शिकायत में असिस्टेंट प्रोफेसर ने लिखा कि जब उन्होंने वत्स को अपने करीब आने से मना किया तब वत्स ने उन्हें धमकीयां देना शुरू कर दिया.

31 जनवरी को बीजेपी नेता सुरेश चंद वत्स ने दिल्ली उच्च न्यायलय में फरवरी 2015 में हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित लेख के विरोध में उस पर कारवाई करने की मांग करते हुए याचिका दायर की. लेख में कहा गया है कि वत्स के खिलाफ बलात्कार और यौन हमले का मामला दर्ज किया गया था. वत्स दिल्ली में हो रहे विधानसभा चुनाव में शकूर बस्ती क्षेत्र से बीजेपी के टिकट पर मैदान में उतरे है. बीजेपी नेता ने उच्च न्यायालय से कहा कि उन्हें बलात्कार के आरोप से बरी कर दिया गया था इसलिए यह न्यूज रिपोर्ट “पूर्व दृष्टाया मानहानिकारक” है. न्यायलय ने सुनवाई वाले दिन ही याचिका को खारिज कर दिया.

2015 में वत्स आम आदमी पार्टी के सतेंद्र जैन से विधानसभा चुनाव हार गए थे. इस साल 8 फरवरी को फिर से जैन और वत्स आमने-सामने हैं.

वत्स शैक्षणिक संस्थान विवेकानंद इंस्टिट्यूट ऑफ प्रोफेशनल स्टडीज के संस्थापक और चेयरपर्सन भी हैं. फरवरी 2015 में एक असिस्टेंट प्रोफेसर द्वार की गई शिकायत के आधार पर दिल्ली पुलिस ने वत्स के खिलाफ बलात्कार, यौन हिंसा, यौन उत्पीड़न, कपड़े उतारने की मंशा से हमला करने, पीछा करने और धमकी देने के लिए मामला दर्ज किया था. असिस्टेंट प्रोफेसर ने अपनी शिकायत में कहा कि उनपर अक्टूबर 2013 में यौन हमला हुआ था और केस उत्तरी-पश्चिमी दिल्ली के मौर्य नगर एनक्लेव पुलिस थाने में दर्ज हुआ था.

जनवरी 2018 में दिल्ली की सत्र अदालत ने भारतीय दंड सहिता की धारा 376 के तहत बलात्कार के आरोपी वत्स को बरी कर दिया था लेकिन अन्य मामलों से जुड़ी कारर्वाही जारी रही. इस साल, वत्स ने उच्च न्यायालय में कहा कि ऐसी खबरों की अभी भी मौजूदगी जिनमें उनपर बलात्कार का आरोप है, दिल्ली विधानसभा चुनाव में उनकी छवी को प्रभावित कर सकता है. वत्स ने न्यायालय से बिना सुनवाई के एकतरफा आदेश सुनाते हुए हिंदुस्तान टाइम्स की वेबसाइट और गूगल पर उनसे जुड़े लेख हटाने का आदेश देने की गुहार लगाई.

“मैं सहमत नहीं हूं,” दिल्ली उच्च न्यायालय के जज राजीव सहाय एंडलॉ ने याचिका खारिज करते हुए अपने आदेश में कहा. “यह अभियोगी पर है कि वह जनता को बताए कि उसे आईपीसी की धारा 376 जैसे आपराधिक मामले में बरी कर दिया गया है. यह एक कानूनी प्रावधान भी है कि जनता को अपने उम्मीदवार के बारे में पूरी जानकारी होनी चाहिए.” न्यायालय ने अपने आदेश में कहा, “इस मामले में न्यायालय का दखल जनता को उनके क्षेत्र से उचित उम्मीदवार चुनने के मौके से वंचित करेगा.”

अर्शु जॉन कारवां के सहायक संपादक (वेब) है. पत्रकारिता में आने से पहले दिल्ली में वकालत कर रहे थे.

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