“चलो दिल्ली” रैली में दिखी सीएए-एनआरसी के खिलाफ आंबेडकरवादियों के देशव्यापी विद्रोह की झांकी

14 मार्च 2020
कारवां के लिए उत्कर्ष
कारवां के लिए उत्कर्ष

“यह युद्ध सिर्फ मुसलमानों के खिलाफ नहीं है. यह युद्ध डॉ. आंबेडकर के संविधान के खिलाफ भी है.” मंच से थोल थिरुमावलवन गरज रहे थे.

थिरुमावलवन तमिलनाडु के सांसद हैं और विड़ूदलाई चिरुतैगल कच्ची (लिबरेशन पैंथर्स पार्टी) के अध्यक्ष भी. वह दमदार तमिल में भाषण दे रहे थे जिसे शायद वहां मौजूद बहुत से लोग समझते भी न हों. तकरीबन एक हजार लोगों की भीड़ सिर हिला-हिला कर उनकी बातों से अपनी सहमति जता रही थी और जब उनकी गर्जन विराम लेती तो “जय भीम” के नारे लगने लगते. यह दृश्य था 4 मार्च को जंतर-मंतर में हुई “चलो दिल्ली रैली” का जिसका आयोजन देशभर के आंबेडकरवादी संगठनों ने किया था. इस रैली का आह्वान वंचित बहुजन आघाड़ी के प्रकाश आंबेडकर ने किया था जो महाराष्ट्र में उत्पीड़ित जातियों के समूहों का गठबंधन है. महाराष्ट्र में इस गठबंधन की मजबूत उपस्थिति है.

थिरुमावलवन से पहले वाला भाषण उत्तरी तेलंगाना के छौंक वाली तेलगू में था. यह क्षेत्र खनन के लिए जाना जाता है. थिरुमावलवन के भाषण के बाद महाराष्ट्र के सूखा प्रभावित विदर्भ की तीखी मराठी में भाषण हुआ. लेकिन इन मिलीजुली बोलियों और भाषाओं में उत्पीड़ित समूह राज्य से अपनी पहचान और तेजी से दक्षिणपंथी धुर की ओर खिसक रही देश की राजनीति से संविधान को बचाने की मांग कर रहे थे. वहां अपनी बात रखने वाले लोगों को कहना था कि देश के कोने-कोने में हो रहे नागरिकता संशोधन कानून, राष्ट्रीय नागरिक पंजिका और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर के खिलाफ आंदोलनों को नजरअंदाज किया जा रहा है. इन लोगों का कहना था कि केवल मुसलमान ही इन नीतियों का विरोध नहीं कर रहे हैं, जैसा कि सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी दावा कर रही है, बल्कि अन्य उत्पीड़ित समूहों और आंबेडकरवादी संगठन भी सरकार की इन नीतियों के खिलाफ मुसलमानों के साथ एकजुटता दिखाते हुए उठ खड़े हुए हैं.

मैंने भीड़ में खड़े विशाखापट्टनम के अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़ा वर्ग, मुस्लिम मोर्चा के संयोजक एरमल्ला राम से बात की. उन्होंने आंध्र प्रदेश में पिछले 3 महीनों से जारी राजनीतिक उठापटक के बारे में मुझे बताया. उन्होंने कहा कि पहले अधिकांश दलित संगठन केवल अपने मामलों पर ध्यान दिया करते थे और राष्ट्र में हो रहे बड़े बदलावों पर गौर नहीं करते थे लेकिन “भारत बंद के बाद हमने समझ लिया कि हम भी अपने मुस्लिम भाइयों की तरह ही सत्ता के निशाने पर हैं और इसलिए हम सड़कों पर उतर आए.” वह फरवरी में आयोजित भारत बंद की बात कर रहे थे जो सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले के खिलाफ था जिसमें अदालत ने कहा था कि, “यह एक स्थापित कानून है कि राज्य सरकार को सार्वजनिक पदों में आरक्षण देने के लिए निर्देश नहीं दिया जा सकता. इसी तरह राज्य प्रमोशन के मामलों में अनुसूचित जाति और जनजाति को आरक्षण देने के लिए बाध्य नहीं है.” उत्पीड़ित जातियों के संगठनों के लिए यह संविधान द्वारा उन्हें प्राप्त सुरक्षा से वंचित करने जैसा था. ठीक उसी तरह जैसा कि सत्तारूढ़ सरकार मुसलमानों के साथ कर रही है. 

दलित-मुस्लिम सेना (इंदौर) के दिलकर राव अंभोरे ने मुझे बताया, “महाराष्ट्र में मुस्लिमों की अगुवाई में हो रहे प्रदर्शनों में अंबेडकरवादियों की उपस्थिति बढ़ रही है. जनवरी से मुस्लिम औरतों ने इंदौर में सीएए और एनआरसी विरोधी बहुत सारे प्रदर्शन आयोजित किए. उनमें सबसे महत्वपूर्ण प्रदर्शन शहर के मुस्लिम बहुल बड़वाली चौकी में हुआ. जब इन प्रदर्शनों में पुलिस ने कार्रवाई की तो बहुत कम दलित मदद के लिए पहुंचे थे, लेकिन बंद के बाद आंबेडकरवादी संगठनों ने आसपास के ग्रामीण इलाकों से दलितों को समर्थन के लिए बुलाया.” अंभोरे ने आगे बताया, “अब हम वहां जाते हैं ताकि पुलिस के हमलों से उन्हें बचा सकें. हम उनके लिए खाना भी पकाते हैं. वे हमारा बनाया खाना खाते हैं. हम सब साथ बैठ कर खाना खाते हैं. क्या खुद को हिंदू कहने वाले ऐसा करेंगे?”

अभय रेजी कारवां की एडिटोरियल फेलो हैं.

Keywords: Anti-CAA Protests Scheduled Tribes Scheduled Castes
कमेंट