“लक्षद्वीप को गुजरात का उपनिवेश बनाया जा रहा है”, स्थानीय लोगों पर कहर बरपा रहे प्रशासक प्रफुल्ल पटेल के अलोकतांत्रिक फैसले

स्थानीय लोगों को अपने रोजगार, शिक्षा और अन्य अधिकारों की चिंता सता रही है.
साभार : अब्दुल रहिमन
स्थानीय लोगों को अपने रोजगार, शिक्षा और अन्य अधिकारों की चिंता सता रही है.
साभार : अब्दुल रहिमन

5 दिसंबर 2020 को भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता प्रफुल्ल खोड़ा पटेल ने केंद्र शासित प्रदेश (यूटी) लक्षद्वीप के प्रशासक का कार्यभार संभाला. पटेल, जो पहले से ही एक अन्य केंद्र शासित प्रदेश के प्रशासक हैं, को एक ऐसे पद पर नियुक्त किया गया जो इस द्वीपसमूह में परंपरागत रूप से सेवानिवृत्त नौकरशाहों के लिए होता है. लक्षद्वीप में उनका कार्यकाल आरंभ से ही विवादास्पद रहा है. पद पर आसीन होने के छह दिन बाद पटेल ने बित्रा द्वीप पर एक बर्फ संयंत्र के उद्घाटन कार्यक्रम में बाहर से आने वालों के लिए लागू यूटी के कोविड-19 प्रोटोकॉल की धज्जियां उड़ा दीं.

प्रोटोकॉल के तहत यूटी में बाहर से आने वालों के लिए होम क्वारंटीन अनिवार्य था. पिछले प्रशासन की कठोर मानक संचालन प्रक्रिया के कारण तब तक यूटी में वायरस संक्रमण का एक भी मामला नहीं आया था. कल्पेनी द्वीप के निवासी साजिद मन्नेल ने मुझे बताया, “यहां लोग महीनों से कोविड नियमों का पालन कर रहे थे. इसलिए 9 दिसंबर से लोगों ने विरोध प्रदर्शन करते हुए उनके खिलाफ पोस्टर लगाए जो क्वारंटीन नियमों का पालन नहीं कर रहे थे.”

22 दिसंबर को लक्षद्वीप प्रशासन ने बाहर से आने वालों के लिए अनिवार्य क्वारंटीन नियमों को हटा दिया. मन्नेल ने मुझे बताया कि लक्षद्वीप में लोगों का मानना ​​है कि पटेल ने आलोचना से ध्यान भटकाने के लिए कोविड-19 प्रतिबंध हटाए. “उन्हें विरोध पसंद नहीं आया इसलिए उन्होंने मानक संचालन प्रक्रिया को हटाने का आदेश दे डाला," मन्नेल ने कहा. ठीक तीन हफ्ते बाद लक्षद्वीप में कोरोनवायरस का पहला मामला सामने आया और 10 जून 2021 तक यूटी में संक्रमण के 8874 मामले दर्ज किए गए. महज 66000 से अधिक की आबादी में 42 मौतें दर्ज की गईं.

यह विरोध पटेल और द्वीपों के निवासियों के बीच तकरार की श्रृंखला का पहला मामला था. अपनी नियुक्ति के बाद के महीनों में पटेल ने ऐसे कई कार्यकारी निर्णय लिए हैं जिससे अशांति पैदा हुई है और लोगों में भारी चिंता फैल गई है. यहां अधिकांश अनुसूचित जनजातियों के मुस्लिम हैं. स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों ने मुझे बताया कि पटेल ने द्वीपों में वायरस के प्रसार को रोकने के लिए बनी कोविड-19 सावधानियों को हटा दिया और बाद में स्थानीय लोगों की तृतीयक चिकित्सा देखभाल तक पहुंच को भी कमजोर बना दिया. जनवरी में पटेल ने प्रिवेंशन ऑफ एंटी-सोशल एक्टिविटीज रेगुलेशन- जिसे आमतौर पर गुंडा एक्ट कहा जाता है- का मसौदा पेश किया जिसके बारे में निवासियों और स्थानीय नेताओं ने मुझे बताया कि यह केंद्र शासित प्रदेश में असंतोष को दबाने का एक प्रयास है. प्रशासन ने पटेल के फैसलों से उपजे विरोध पर नकेल कसना शुरू कर दिया है.

इसके अलावा पटेल ने अप्रैल में लक्षद्वीप विकास प्राधिकरण विनियमन का मसौदा पेश किया. विवादास्पद प्रावधानों वाला यह मसौदा मूल निवासियों को असुरक्षित करते हुए व्यापक उपयोग के लिए भूमि को जब्त करने की अनुमति प्रशासन को देता है. प्रशासन के इन फैसलों ने स्थानीय लोगों की आजीविका को गंभीर रूप से प्रभावित किया है. व्यापक शिकायतें मिली हैं कि पटेल की कार्यशैली एकतरफा है. वह द्वीपवासियों के साथ कोई परामर्श नहीं करते और संसद के मौजूदा सदस्य मोहम्मद फैजल सहित स्थानीय जनता का कोई भी प्रतिनिधि उनसे नहीं मिल सकता. पटेल के फैसलों ने लक्षद्वीप और पड़ोसी राज्य केरल दोनों में व्यापक गुस्से और विरोध को जन्म दिया है.

आतिरा कोनिक्करा करवां की रिपोर्टिंग फेलो हैं.

Keywords: Praful Khoda Patel lakshadweep Kerala CPM environmental damage
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