“संघ में हमें सिखाया जाता था कि अहिंसा कायराना है”, आरएसएस छोड़ने वाले दलित अधिकार कार्यकर्ता भंवर मेघवंशी

सौजन्य : रफकट प्रोडक्शन

1980 के दशक में दलित समाज से आने वाले 13 साल के भंवर मेघवंशी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा में जाना शुरू किया. तब उन्हें संघ के बारे में बहुत ज्यादा पता नहीं था. शाखा में मेघवंशी ने मुसलमानों से नफरत करने का पाठ सीखा और उन्हें अपने हिंदू होने पर गर्व था. संघ में रहते हुए वह हिंदू राष्ट्र के प्रति समर्पित हुए और सैन्य तालीम भी ली. बाद में उन्हें एहसास हुआ कि संघ का नजरिया सवर्णों और दलितों में भेदभाव करने वाला है.

फिलहाल मेघवंशी एक पत्रकार और कार्यकर्ता है. 2019 में उनकी किताब आई थी मैं एक कारसेवक था. हाल में इस किताब का अंग्रेजी अनुवाद आई कुड नॉट बी हिंदू : द स्टोरी ऑफ ए दलित इन द आरएसएस नाम से नवयाना ने प्रकाशित की है.

आरएसएस में उनके अनुभव के बारे में पत्रकार सुशील कुमार ने उनसे बातचीत की.

 सुशील कुमार : आप कब से कब तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में सक्रिय रहे?

भंवर मेघवंशी : मैं 1987 से 1991 तक सक्रिय था. मैंने 1990 की पहली कारसेवा में हिस्सा लिया. मैं तो घर से निकला था बाबरी मस्जिद तोड़ने के लिए लेकिन वहां तक पहुंच नहीं पाया क्योंकि उस समय मुलायम सिंह की सरकार थी. हम उस वक्त उनको “मुल्ला मुलायम सिंह” कहते थे यानी कि मौलाना मुलायम. तो उस समय उनकी सरकार ने मुझे टुंडला स्टेशन के पास से गिरफ्तार कर लिया और दस दिनों तक आगरा जेल में रखा. तब तक वहां जो कारसेवा होनी थी वह हो चुकी थी. फिर हम अपने घर लौट आए.

कुमार : बतौर स्वंयसेवक आपने क्या सीखा?

मेघवंशी : देखिए कई सारी चीजें सीखने को मिली. पहली चीज मैंने प्रतिक्रिया करना सीखा. जाहिर है हम प्रतिक्रियावादी बन गए. दूसरी चीज, जो लोग मेरे गांव, पंचायत में नहीं थे, उनको एक काल्पनिक दुश्मन समझकर उनसे लड़ना, हराना और नफरत करना सीखा.

कुमार : क्या शाखा में लड़िकयां भी होती थीं?

मेघवंशी : शाखा में सभी पुरुष ही होते हैं. इसलिए वहां पुरुषार्थ की ही बात की जाती थी. जाहिर सी बात है कि वहां महिलाओं के लिए कोई स्थान नहीं होता था. यूं देखिए तो पुरुषार्थ का मतलब मर्दानगी से है, पितृसता से है. पुरुषार्थ का अर्थ है कि जो भी आप जिंदगी में करना चाहते हैं, पुरुषार्थ के जरिए उसे स्थापित किया जा सकता है.

कुमार : शाखा में आपको नफरत का पाठ कैसे सिखाया गया?

मेघवंशी : उसे ऐसे समझिए कि मेरी पंचायत में मुसलमान नहीं है. यहां तक कि मेरे घर तक किसी भी मस्जिद की अजान नहीं सुनाई देती है, बावजूद इसके, मेरे मन में मुसलमानों के लिए घृणा भर दी गई. सीधे तौर पर यह कह कर नहीं भरी जाती थी कि आपको मुसलमानों से घृणा करनी है बल्कि यह कह कर कि हम आर्य हैं, हमारा देश है, हम सर्वश्रेष्ठ हैं और हमारा ही खून सर्वश्रेष्ठ है. और ये जो मुसलमान लोग हैं वे मलेच्छ हैं, इन्होंने ही बाहर से आकर हमारे ऊपर आक्रमण किया, हमारे देश को लूटा, हमारी संस्कृति को बर्बाद किया, मंदिर तोड़ कर मस्जिदें बनाईं और नालंदा जैसे विश्वविद्यालय को नष्ट कर दिया. इस देश में जो भी बुरी स्थिति आई, चाहे वह जाति की हो, छुआछूत की हो या घूंघट की हो, यह सब इन लोगों की देन है. तो यह सब बातें दिमाग में धीरे-धीरे ऐसी भरी कि जब कोई मुसलमान दिखता था तो महसूस होता था वह सब बुराइयों की जड़ है. उन्होंने सोमनाथ मंदिर तोड़ा, इन्होंने ही रामजन्मभूमि मंदिर को बर्बाद कर दिया. यह इतनी सरलता और सहजता से होता है कि आपको महसूस ही नहीं होता है कि कब आपका दिमाग इन बातों से भर गया.

कुमार : संघ में मिलिट्री ट्रेनिंग किस रूप में मिलती है?

मेघवंशी : हर स्वंयसेवक को प्रथम वर्ष, द्वितीय वर्ष और तृतीय वर्ष की ट्रेनिंग करनी होती है. इसे ऑफिसर ट्रेनिंग कैंप यानी ओटीसी कैंप कहते हैं जो थर्ड ईयर में होती है. इसमें बकायदा चाकू, भाला, लाठी और बंदूक की ट्रेनिंग दी जाती है. मैंने खुद सुतली बम और पेट्रोल बम बनाना सीखा है. यह अनिवार्य होता है क्योंकि जब आप धर्मयुद्ध में हो तो फिर इसके बिना कैसे काम चल सकता है?

कुमार : अरएसएस के संगठन तंत्र के बारे में बताइए?

मेघवंशी : संघ का संगठन तंत्र उसके स्वंयसेवक हैं जो जमीनी काम कर रहे हैं. शाखा उसकी प्रमुख फैक्ट्री है. उसी से निकलकर क्षमता के अनुसार अलग-अलग संगठन में जाते हैं. जो छात्र हैं, वे एबीवीपी में जांएंगे. अगर उनकी उदंड प्रवृति है तो वे बजरंग दल या दुर्गावाहिनी में जाएंगे. जो धार्मिक है वह भारत विकास परिषद या सत्संग मंडल में जाएगा. लेकिन मुख्यतौर पर जो लोग नजर आते हैं वह तीन-चार जगहों पर नजर आएंगे. दंगा-फसाद में बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद के रुप में दिखते हैं, कॉलेज परिसर में एबीवीपी के रुप में दिखते हैं और वही लोग बाद में राजनीति में भी दिखते हैं. हालांकि बजरंग दल-विहिप के लोग भी राजनीति में दिखते हैं. बुनियादी तौर पर कोई फर्क नहीं है. बहुत साफतौर पर बताया जाता है कि अहिंसा बहुत ही कायराना चीज है और इसी कायरता की वजह से हम हजारों साल तक गुलाम रहे हैं. सिखाया यही जाता है शठे शाठ्यम समाचरेत् यानी जैसे को तैसा. अभी बहुत लोग आश्चर्य करते हैं कि जेएनयू या अन्य जगहों पर ये लोग डंडा, सरिया लेकर या मास्क पहनकर आ गए हैं. मुझे लगता है कि इसमें आश्चर्य करने की कोई बात ही नहीं होनी चाहिए. हिंसा को संघ परिवार में सदैव ऊंचा स्थान प्राप्त रहा है और यहां तक कि सारे ब्राह्मण ग्रंथों में यह कहा गया है कि वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति. हमें तो सिखाया ही गया है कि “लाठी में गुण बहुत है, सदा राखिए संग.” हम तो उससे निकल कर आए हैं. तो हो सकता है लोगों को लगे कि यह क्या है लाठी लेकर कैंपस में घुस आए, ज्ञान के मंदिर में. लेकिन हमें तो यह सिखाया ही गया था कि लाठी को हमेशा संग रखिए और लाठी की भाषा में जवाब दीजिए. तो यह जो पूरा तंत्र है, वह पूरा लठतंत्र है. आज अपको जो दिख रहा है वह इसलिए क्योंकि अब इनके वीडियो लोगों के सामने आ रहे हैं.

मैंने अपनी किताब में भी जिक्र किया है कि उस वक्त यानी 1993 में जब हम एबीवीपी के खिलाफ लड़ रहे थे और हमने एक नया संगठन बनाया था : विद्यार्थी अधिकार रक्षक संघ. हमारे संगठन के अध्यक्ष को इसी तरीके से घेरकर मारा गया और उसके सिर में पेंचकस घुसेड़ दिया गया और उसको वहीं मरा छोड़कर चले गए. तो हिंसा उनके लिए कोई नई बात नहीं है. हिंसा के लिए वहां (आरएसएस में) बहुत सम्मान है.

कुमार : आप बागी क्यों हो गए?

मेघवंशी : उसके पीछे एक कहानी है. मैं शाखा में जाते हुए भी बीच-बीच में कुछेक सवाल पूछता रहता था. मेरे स्कूल के भूगोल के टीचर शाखा लगाते थे. वह अपने भूगोल के पीरियड में कहते थे कि सूर्य आग का गोला है और शाम को शाखा में आकर सूर्य नमस्कार करवाते थे और बताते थे कि हनुमानजी इतने वीर थे कि उन्होंने सूर्य को निगल लिया था. तो मैंने पूछा, “गुरुजी सूर्य आग का गोला है या देवता है, क्या है?”

मैं प्रचारक बनना चाहता था तो हमें सवाल पूछने से यह कहकर रोका गया कि “हमें प्रचारक चाहिए, विचारक नहीं चाहिए.” जो भी (“ज्ञान”) नागपुर से आता है, उसको “ठीक वैसा ही लोगों तक पहुंचाने वाले लोग चाहिए.” मुझसे कहा गया कि “बंधु, प्रचारक के बजाय विस्तारक बनो, हिंदुस्तान के गांवों में जाओ. क्योंकि जब प्रचारक बनोगे और लोग तुमसे जाति पूछेंगे और लोगों को पता चला कि तुम दलित हो, वंचित समुदाय से हो तो कहीं कोई ऐसा व्यवहार कर सकता है जो तुम्हें ठीक नहीं लगेगा और उसके बाद तुम्हारे अंदर नकारात्मक प्रतिक्रिया होगी. जितना तुम सकारात्मक काम करते हुए फायदा पहुंचा सकते हो, उतना नकारात्मक काम करते हुए नुकसान पहुंचा सकते हो. हालांकि आमतौर पर संघ में दलित शब्द का उपयोग नहीं किया जाता. मेरी ऐसी छवि भी हो गई थी कि “यह बहुत सारे सवाल करता है.”

बाद में यह हुआ कि 12 मार्च 1993 को भीलवाड़ा में “मंदिर सौंपो, या गद्दी छोड़ो” आंदोलन हुआ. उसी दिन हमारी रैली का और दोपहर की नमाज का समय लगभग एक था. हमें जहां से गुजरना था वह मस्जिद वाला मुस्लिम बहुल गुलमंडी इलाका था. हालांकि राज्य में उस वक्त बीजेपी की सरकार था. प्रशासन ने कहा कि आप अपना रास्ता बदल लीजिए या थोड़ा सा इधर–उधर कर लीजिए. हमने पुलिस से कहा कि गुलमंडी पाकिस्तान में है क्या कि हम उधर से नहीं गुजर सकते, हम उधर से ही होकर जाएंगे. इसी कशमकश में पीछे से कोई पत्थर ले आया और दो-तीन पत्थर पुलिस को लगे. पुलिस ने पहले हवाई फायरिंग की लेकिन हालात पुलिस से बेकाबू हो गए तो पुलिस ने फायर कर दिया. उस फायरिंग में दो लोग मारे गए और दोनों संयोग से हिंदू थे और उनका रैली से कोई लेना-देना भी नहीं था. एक व्यक्ति जो रात में काम पर जाता था और दिन में सोता था, उसने जब बाहर फायरिंग की आवाजें सुनी तो बाहर निकल कर देखने लगा ओर उसे गोली लग गई. और दूसरा व्यक्ति शहर में सामान खरीदने आया था. वह भी पुलिस की गोली का शिकार हो गया. राम के नाम पर संघ ने उन दोनों को शहीद मान लिया. उन दोनों की अस्थि कलश यात्रा निकाली गई. वह अस्थि कलश यात्रा मेरे घर पर आई तो मेरे घर में सबके लिए खाना बनाया गया. मेरा परिवार और मेरे पिताजी इस विचारधारा के कभी प्रशंसक नहीं रहे. मेरा संघ में जाना उनको पसंद नहीं था. मैं जब भी संघ के कार्यक्रम में जाता तो मेरे पिताजी को अच्छा नहीं लगता था. मेरे पिताजी कहते थे कि ये ठीक लोग नहीं हैं. मुझे लगता था कि मेरे पिताजी ही ठीक नहीं हैं क्योंकि मेरे पिताजी कांग्रेसी थे और कांग्रेस तो है ही हिंदुओं की विरोधी. सो वह क्यों चाहेंगे कि हम शाखा या संघ के कार्यक्रम में जाएं. तो अंत में यह हुआ कि जो खाना बनाया गया उसके लिए कहा गया, “हम लोग तो खा लेंगे, लेकिन जो साधु-संत आए हैं उनके लिए थोड़ी मुश्किल होगी. आप ऐसा कीजिए कि हमें यह खाना पैक करके दे दीजिए और हम इस खाने को अगले गांव में जाकर खा लेंगे.” लेकिन अगले गांव में हमारे यहां पका खाना खाने के बजाय उन्होंने एक ब्राह्मण के घर जाकर अलग से खाना बनवाया और मेरे यहां के खाने को रास्ते में फैंक दिया. यह खबर मुझे दूसरे दिन मिली. उसके बाद मैंने उनके पास जाकर कहा, “पहली बात कि आप ने हमारे घर खाना नहीं खाया और उसे पैक करके ले गए और उसे खाने के बजाय फैंक दिया. जबकि मैं तो आपके लिए अयोध्या में मरने को तैयार था, मैं आपका जिला प्रमुख हूं, मैं आपके साथ मिलकर हिंदू राष्ट्र बनाना चाह रहा हूं, उसमे मेरी जगह कहां है?”

इसके बाद एक बहस शुरू हो गई. उन्होंने कहा कि वह बहुत मामूली सी बात है और मैं उसे बड़ी बात बना रहा हूं. उन्होंने समझाया, “जो लोग गाड़ी में बैठे थे, उनके हाथों में खाना था, जैसे ही गाड़ी मुड़ी, हाथों से खाना गिर गया. गिरे हुए खाने को तो हम नहीं खा सकते न.” लेकिन सच तो यह था कि खाना फैंका गया था, सड़क के एक तरफ. खाना अगर गिरता तो सड़क के बीचों-बीच गिरता. यह बहस कई महीनों तक चलती रही और बगावती तौर पर हमने यह सवाल पूछना शुरू किया, “आपके हिंदू राष्ट्र में दलितों की जगह कहां है?”

कुमार : संघ की नजर में हिंदू राष्ट्र क्या है?

मेघवंशी : संघ की नजर में हिंदू राष्ट्र एक ब्राह्मण राष्ट्र है. वर्ण व्यवस्था, चार वेद, मनुस्मृति के आधार पर संघ इस देश को चलाना चाहता है. उस हिंदू राष्ट्र में मेरे जैसी दलित या अछूत जातियों, विधर्मी, मलेच्छों या पश्चिम के धर्मों पर विश्वास करनेवालों की स्थिति दोयम दर्जे की होगी. मुझे लगता है कि संघ के हिंदू राष्ट्र में शूद्र या अछूत दास होंगे और मुसलमान या विधर्मी दोयम दर्जे के होंगे.