महिला आरक्षण विधेयक के नाम पर जनता को ठगती मोदी सरकार

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भारतीय जनता पार्टी नीत सरकार को इस महीने संसद का विशेष सत्र शुरू होने से पहले ही पता रहा होगा कि विपक्ष के विरोध के बीच ‘संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026’ को पारित करने की उसकी कोशिश नाकाम होगी. 17 अप्रैल, 2026 को लोकसभा में इस विधेयक को 230 के मुक़ाबले 298 वोटों से मंज़ूरी मिल गई, लेकिन यह संवैधानिक संशोधन के लिए ज़रूरी दो-तिहाई बहुमत से काफ़ी कम था. तो फिर, सरकार ने उस विशेष सत्र को आगे क्यों बढ़ाया, जिसका अंत प्रधानमंत्री के तौर पर नरेन्द्र मोदी के कार्यकाल की पहली बड़ी विधायी हार के रूप में हुआ? इसका स्पष्ट जवाब है कि इस पूरी कवायद का असली मक़सद हार जाना ही था.

इसकी राजनीतिक पटकथा हार के बाद नहीं, बल्कि उससे पहले ही लिखी जा चुकी थी. जिस दिन महिला आरक्षण को एक पैकेज के रूप में संसद में पेश किया गया, ठीक उसी दिन सरकार ने एक अधिसूचना भी जारी की कि महिला आरक्षण अधिनियम, 2023 को लागू कर दिया गया है. राष्ट्रपति की मंज़ूरी मिलने के ढाई साल बाद इसे अमल में लाया गया. इस पल तक का लंबा इंतज़ार अपने आप में एक कहानी है. सरकार यह स्पष्ट नहीं किया कि कानूनन आरक्षण लागू करने के लिए अगली जनगणना का इंतज़ार करना होगा और वास्तविक क्रियान्वयन कम से कम 2029 तक या शायद 2034 में हो. फिर भी सरकार ने दावा कर दिया कि उसने महिला बिल लागू कर दिया है.

ऐसा दावा करने के पीछे सरकार की मंशा भारत की महिलाओं के सामने यह प्रचारित करना था कि उनके आरक्षण को विपक्ष ने रोक दिया. जो बात अनकही रह गई, वह यह थी कि सरकार ने ख़ुद ही महिला आरक्षण को एक बड़े पैकेज के साथ नत्थी कर इसे रोकने का रास्ता तैयार किया है. उसने इसे परिसीमन, जनगणना का समय और लोकसभा के विस्तार जैसे मुद्दों के साथ मिला कर ऐसा किया है.

अगर सरकार महिला आरक्षण को सच में पारित करना चाहती थी, तो उसने इस कानून का स्वरूप कुछ और ही रखा होता. इसके बजाए, उसने ऐसा रास्ता चुना जिससे विवाद और हार, दोनों, का होना लगभग तय था.

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