बिहार में दलितों के गांव भूप नगर में फ्लोराइड युक्त पानी से विकलांग होते लोग

16 फ़रवरी 2021
60 साल के बुलाकी मांझी 2001 से 2010 तक पंचायत के मुखिया थे. गांव की समस्या के बारे में उन्होंने बताया, “हमारे टाइम में उतना फंड नहीं आता था. 50 हजार रुपए तक ही फंड होता था, जिससे गली का कुछ सोलिंग का काम करवाया था.”
साभार : मो. असग़र खान
60 साल के बुलाकी मांझी 2001 से 2010 तक पंचायत के मुखिया थे. गांव की समस्या के बारे में उन्होंने बताया, “हमारे टाइम में उतना फंड नहीं आता था. 50 हजार रुपए तक ही फंड होता था, जिससे गली का कुछ सोलिंग का काम करवाया था.”
साभार : मो. असग़र खान

देश की राजधानी दिल्ली जाने वाला नेशनल हाइवे-2 और बिहार के गया जिला के आमस प्रखंड मुख्यालय से दक्षिण की दिशा में महज पांच किलोमीटर की दूरी पर दलितों का भूप नगर गांव, जहां मुख्य रूप से मांझी और भोक्ता समाज के लोग रहते हैं, विकास की पहुंच से कोसो दूर दिखाई देता है. 22 वर्ष पूर्व यहां के लोगों को पता लगा कि समूचा गांव एक त्रासदी की चपेट में है, जो साल दर साल असमय मौत और शारीरिक अक्षमता के रूप में विकराल होती जा रही है. दरअसल इस गांव के भू जल में फ्लोराइड की मात्रा सामान्य से कई गुणा ज्यादा है.

गांव वालों के मुताबिक दो दशक पूर्व ही वैज्ञानिकों ने जांच रिपोर्ट में कहा था कि यहां के पानी में अत्याधिक फ्लोराइड है, जिसका सेवन स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है. हाल ही में बिहार सरकार की संस्था किलकारी बिहार बाल भवन ने भी 20.04.2019 को अपनी जांच रिपोर्ट में कहा है कि यहां के पीने के पानी में प्रति लीटर 8 मिलीग्राम फ्लोराइड है, जो बच्चों के लिए और भी हानिकारक है. भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) ने भी प्रति लीटर पानी में फ्लोराइड की मात्रा 1.0 मिलीग्राम तय की है. जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) के अनुसार, यह मात्रा 1.5 मिलीग्राम से अधिक नहीं होनी चाहिए.

पहाड़ों से होते हुए पथरीले रास्ते को पार कर जब करीब 55 घर और लगभग 450 की आबादी वाले भूप नगर गांव में मैं दाखिल हुआ, तो कमोबेश हर घर में शारीरिक अक्षमता देखने को मिली. जैसे पैरों की टेढ़ी-मेढ़ी हड्डियां, लाठी लेकर चलते और चारपाई पर लाचार पड़े लोग. इन्हीं लोगों में शामिल 45 साल के शहदेव मांझी भी हैं जिनका 16 साल का बेटा दशरत मांझी विकलांगता का दंश झेलते हुए इसी महीने चल बसा. शहदेव मांझी खुद भी जन्मजात दाहिने पैर से विकलांग हैं और थोड़ा बहुत लंगड़ाते हुए चल तो लेते हैं लेकिन औरों की तरह मजदूरी या कोई दूसरा काम नहीं कर पाते हैं. वह लंगड़ाते हुए मेरे पास आकर कहते हैं, “पैर से नहीं बनता है. जोड़-जोड़ में दर्द है. कमर से भी झुक नहीं पाता हूं. मेरा बेटा दस साल तक ठीक था लेकिन उसके बाद वह भी पैरों से लाचार हो गया. पैर की हड्डी टेढ़ी हो गई थी. बिस्तर पर ही पड़ा रहने लगा था और धीरे-धीरे दोनों पैरों से पतला हो गया. जब उसकी मौत हुई तो सिर्फ कंकाल जैसा बचा था.”

वह आगे बताते हैं, “अब मेरे दो बेटे बचे हैं, जो ज्यादा समय बाहर रहते हैं. 15 साल का अखिलेश अभी तो गांव में ही है और 25 साल का राकेश गुजरात के सूरत में मजदूरी कर रहा है. पांच बेटियां हैं जिनमें से तीन की शादी हो गई है. अभी दो बेटियां और हैं शादी के लिए.” शहदेव ने अपनी तीन बेटियों की शादी कम उम्र ही कर दी है. 17 साल की तीसरी बेटी की शादी पिछले साल ही की है.

गांव में दाखिल होते ही पांच घर के बाद दाहिने तरफ 40 साल के संजय मांझी का घर है. वह बताते हैं कि उनके ऊपर 12 महीने कर्जा रहता है. कर्जा तोड़ने के लिए वह मजदूरी करते हैं. लेकिन जब भी कर्जा टूटता है शरवन (12) या जीतन(10) का पैर टूट जाता है और उनके मरहम-पट्टी के लिए उन्हें फिर से कर्जा लेना पड़ता है. शरवन और जीतन दोनों ही संजय मांझी के बेटे हैं, जो जन्मजात से ही विकलांग है. दोनों का घुटना चपटा है. जबकि उसके नीचे और ऊपर की हड्डियां टेढ़ी हैं और दोनों के हाथ की भी हड्डियां ऐसी ही हैं. मिट्टी की दीवार से लगकर बैठे दोनों बच्चों की ओर इशारा करते हुए संजय मांझी कहते हैं, “दोनों का पैर चपटा है, हाथ टेढ़ा है. हाथ के बल घिसट कर चलते हैं और थोड़ा-सा भी फिसलने पर पैर टूट जाता है. दस-दस बार से ज्यादा दोनों का पैर टूट चुका है. शरवन का पैर टूटे अभी एक महीना भी नहीं हुआ. आप देखिए इसके पैर में पट्टी भी लगी हुई है.”

मो. असग़र खान रांची, झारखंड के फ्रीलांस पत्रकार हैं. द वायर, न्यूजलॉन्ड्री और अन्य मीडिया संस्थानों में लिखते हैं.

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