पंजाब में आम आदमी पार्टी का दिशाहीन सियासी सफर

18 फ़रवरी 2022
15 फरवरी 2022 को आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय कनवीनर और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पार्टी के विधानसभा चुनाव प्रत्याशी दलजीत भोला और मदन लाल बग्गा के साथ लुधियाना में रोड शो करते हुए.
गुरप्रीत सिंह / हिंदुस्तान टाइम्स / गैटी इमेजिस
15 फरवरी 2022 को आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय कनवीनर और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पार्टी के विधानसभा चुनाव प्रत्याशी दलजीत भोला और मदन लाल बग्गा के साथ लुधियाना में रोड शो करते हुए.
गुरप्रीत सिंह / हिंदुस्तान टाइम्स / गैटी इमेजिस

2014 के लोक सभा चुनाव का वक्त था. एक शाम पंजाब के लुधियाना जिले के कस्बा सुधार में आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार हरिंदर सिंह खालसा के पक्ष में एक चुनावी जुलूस निकल रहा था. जुलूस में हर वर्ग के लोग शामिल थे. “कदी हां कर के कदी ना कर के, वोट झाड़ू नूं पा दे नीं तूं लंबी बांह करके. असीं देश बदलना है, असीं पंजाब बदलना है, असीं बेईमानां राज बदलना है.” नौजवान खुद-ब-खुद आम आदमी पार्टी के पक्ष में ऐसे गीत, बोलियां और टप्पे जोड़ कर गा रहे थे. जुलूस में शामिल नौजवान जसविंदर सिंह ने मुझे बताया था कि उन्होंने अपने गांव में दोस्तों के साथ मिल कर आप का प्रचार शुरू किया है. उन्होंने कहा, ''शुरुआत में तो पारंपरिक पार्टियों से जुड़े गांव के नेताओं ने हमे रोकने की कोशिश की पर जब हम नहीं रुके तो गांव के और लोग भी हमारे साथ जुड़ने लगे. वीर जी! मैं हरिंदर सिंह खालसा जी को अच्छी तरह जानता भी नहीं पर आप और केजरीवाल को दिल्ली में हमने 49 दिनों में देख लिया. हम भी यह चमत्कार पंजाब में देखना चाहते हैं. हम आम लोग हैं. हमारे साथ कोई बड़ा नेता नहीं है. इन आम लोगों में से ही नेता बनेंगे जो पंजाब और देश की तस्वीर संवार देंगे.'' जसविंदर पूरे जोश खरोश के साथ बोलते ही चले गए. ''पंजाब के लोग अकाली और कांग्रेस दोनों से परेशान हैं इन्होंने हमारे पंजाब को बर्बाद कर दिया. निराशा के इस आलम में मेरे जैसे नौजवान के लिए दो ही रास्ते हैं या तो देश छोड़ कर विदेश चले जाएं या फिर हथियार उठा लें. आप ने मेरे जैसों को राह दिखाई है कि वोट के रास्ते पंजाब को लूटने वालों को सबक सिखाया जाए.’’

2022 के पंजाब विधान सभा चुनाव में जहां मीडिया की सुर्खियों में आप का धुंआधार प्रचार दिख रहा है वहीं आप के सत्ता में आने की भविष्यवाणी भी होने लगी हैं. इस बीच जसविंदर जैसे कितने ही वॉलंटियर और कार्यकर्ता ऐसे हैं जिन्हें अपने सपने टूटते हुए या टूट चुके नजर आ रहे हैं. वह खुद को ठगा हुआ महसूस करते हैं. पंजाब में आम आदमी पार्टी की राजनीति का एक पहलू यह भी है.

दिसंबर 2013 में दिल्ली में 49 दिनों की केजरीवाल सरकार ने भ्रष्टाचार के खिलाफ उठाए कदम, जन-लोकपाल बिल, 1984 के कत्लेआम मामले में जांच के लिए एसआईटी गठित करने जैसे तमाम ऐसे फैसले लिए थे जिसने प्रवासी पंजाबियों के दिल जीत लिए थे. पंजाब के हताश-निराश नौजवानों को केजरीवाल और उनके साथियों ने भगत सिंह को याद करना, इंकलाब जिंदाबाद और व्यवस्था परिवर्तन जैसे नारों से अपनी ओर खींचना शुरू किया. पंजाब में वामपंथी पृष्ठभूमि वाले लोग और मानव अधिकार कार्यकर्त्ता, लिबरल तबका आम आदमी पार्टी से जुड़ने लगे. आप के नेताओं ने सिस्टम से असंतुष्ट हुए कॉमरेडों और थक-हार चुके सिख संगठनों को (जिनमें से कुछ की पृष्ठभूमि खालिस्तानी या उग्र सिख विचारों के थे) भी अपने साथ जोड़ा. डॉ. धर्मवीर गांधी, एच. एस.फूलका और डॉ. दलजीत सिंह जैसी शख्सियतों के आप से जुड़ने के कारण पार्टी को पंजाब में और बल मिला. कई सालों बाद वामपंथी और पंथक ग्रुप एक झंडे के नीचे इकठ्ठे दिखाई देने लगे. उस समय पंजाब के कई विद्वान तो यहां तक कहने लगे थे कि पंजाब का लंबे समय से दिल्ली से टूटा हुआ संवाद फिर कायम होने लगा है. केजरीवाल और उनके साथी पंजाबियों के हीरो बन गए. जिसके चलते 2014 के लोकसभा चुनाव में जहां आम आदमी पार्टी को पूरे देश में शिकस्त मिली वहीं पंजाब में उसने 4 सीटें जीतीं.

पटियाला से डॉ. धर्मवीर गांधी ने परनीत कौर (कैप्टन अमरिंदर सिंह की पत्नी और तत्कालीन केंद्रीय मंत्री) को करीब 21 हजार मतों से हराया. फतेहगढ़ साहिब से हरिंदर सिंह खालसा 54 हजार से अधिक मतों के फर्क से कांग्रेसी उम्मीदवार साधू सिंह धर्मसोत से विजयी हुए. संगरूर हलका से भगवंत मान, सुखदेव सिंह ढींडसा से 2 लाख 17 हजार मतों के फर्क से विजय हुए और फरीदकोट से प्रो. साधू सिंह 1लाख 82 हजार मतों के फर्क से जीते. पंजाब में आप को 24 फीसदी से अधिक वोट मिले थे. यह चारों निर्वाचन क्षेत्र मालवा के वामपंथी और लोक संघर्षों वाले इलाके हैं. मौजूदा किसान आंदोलन का गढ़ भी मालवा क्षेत्र रहा है.

पंजाब के राजनीतिक चिंतकों का मानना है कि आप उस वक्त 8 से 10 सीटें जीत सकती थी पर पार्टी हाईकमान ने पंजाब को कम करके आंका. लुधियाना सीट से आप के उम्मीदवार एच. एस. फूलका अपने निकटम प्रतिद्वंदी कांग्रेस के रवनीत बिटू से सिर्फ 19 हजार मतों से हारे थे. आनंदपुर साहिब से आप के हिम्मत सिंह शेरगिल बेशक तीसरे नंबर पर थे लेकिन विजयी उम्मीदवार अकाली दल के प्रेम सिंह चंदूमाजरा से वह महज 44 हजार वोटों से पीछे रह गए थे. हिम्मत सिंह शेरगिल चुनाव प्रचार के दौरान लोक सभा हलका में पड़ते एक विधान सभा क्षेत्र मंन तो जा ही न सके थे.

शिव इंदर सिंह स्वतंत्र पत्रकार और पंजाबी वेबसाइट सूही सवेर के मुख्य संपादक हैं.

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