हिंदू राष्ट्र की आधारशिला रखता अयोध्या फैसला

06 दिसंबर 2019
केविन इलंगो/कारवां
केविन इलंगो/कारवां

आमतौर पर हिंदू राष्ट्र का नक्शा पूरे भारतीय उपमहाद्वीप को ऊपर से नीचे तक केसरिया रंग में सराबोर दिखाता है. कुछ लोगों को इस रंग में एकता की उदात्त दृष्टि दिखाई देती है लेकिन मैं उस कीमत के बारे में सोचती हूं जो इस एकरूपता को हासिल करने के लिए इमारतों, संस्कृतियों और लोगों के हिंसक और दर्दनाक खात्मे से चुकानी पड़ेगी. 6 दिसंबर 1992 को हिंदुओं की भीड़ ने सोलहवीं सदी की ऐतिहासिक और दुर्लभ मस्जिद की ईंट दर ईंट उखाड़ कर शुद्धीकरण कर दिया. जिस काम को उस भीड़ ने कानून को ताक पर रख कर किया था उसे इस साल भारत की सर्वोच्च अदालत ने कानूनी मोहर लगा दी.

9 नवंबर को पांच जजों की पीठ ने फैसला सुनाया कि क्योंकि कुछ आधुनिक हिंदू मानते हैं कि एकदम उसी जगह भगवान राम पैदा हुए थे, इसलिए बाबर कालीन मस्जिद के ध्वंसावशेष पर आधुनिक हिंदू मंदिर बनाया जाए. शीर्ष अदालत का ताजा फैसला आधुनिक विश्वास पर आधारित है और इसका उन्नीसवीं सदी से पहले के इतिहास से कोई लेना-देना नहीं है. फैसले का ज्यादातर हिस्सा उपनिवेशवाद से पहले के अतीत के बारे में गलत बयानी करता है. हिंदुत्व विचारधारा के साथ कदमताल करते हुए, अदालत ने ऐतिहासिक हकीकत और सभी धर्मावलंबियों के साथ समान व्यवहार के दिखावे तक को त्याग दिया.

फैसले की शुरुआत दो बिल्कुल अलग-अलग विचारों की तुलना से होती है. फैसले की शुरुआत में कहा गया है : "हिंदू समुदाय इस (विवादित अयोध्या संपत्ति) पर भगवान विष्णु के अवतार भगवान राम का जन्मस्थान होने का दावा करता है. मुस्लिम समुदाय इस पर पहले मुगल सम्राट बाबर द्वारा निर्मित ऐतिहासिक बाबरी मस्जिद होने दावा करता है.” अदालत ने इन दो दृष्टिकोणों को तुलना की जो ऐतिहासिक हकीकत से बिल्कुल अलग है.

सभी इतिहासकार इस बात से सहमत हैं कि सोलहवीं शताब्दी की शुरुआत से ही बाबरी मस्जिद के नाम से जानी जाने वाली एक मस्जिद 1992 तक विवादित स्थल पर कायम थी. कांसप्रेसी थ्योरी को मानने वालों को छोड़कर सभी जीवित लोग इस बात से सहमत हैं कि 1990 के दशक की शुरुआत तक अयोध्या के उस स्थान पर एक प्रमुख मस्जिद मौजूद थी. यह किसी मुकदमे में किसी वादी का "दावा" भर नहीं है, यह इतिहास में अच्छी तरह से दर्ज एक तथ्य है.

मोटे तौर पर, आज धरती पर जीवित ज्यादातर लोग - जिनमें हिंदू भी शामिल हैं - राम के जीवन के बारे में सोचते तक नहीं हैं और वे राम के जन्म को इतिहास में घटी कोई वास्तविक घटना भी नहीं मानते हैं.

ऑड्री ट्रुश्के न्यू जर्सी के रटगर्स विश्वविद्यालय में दक्षिण एशियाई इतिहास की असिस्टेंट प्रोफेसर हैं.

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