असम के बंगाली मुस्लिमों को जबरदस्ती बेदखल कर रही बीजेपी सरकार

मई, 2016 में बीजेपी के सत्ता में आने के बाद से बेदखली, असम में एक नियमित घटना बन गई है.
अनुपम नाथ/एपी
मई, 2016 में बीजेपी के सत्ता में आने के बाद से बेदखली, असम में एक नियमित घटना बन गई है.
अनुपम नाथ/एपी

4 मार्च को असम वन सेवा अधिकारियों, पुलिस अधिकारियों और अर्धसैनिक बलों की एक टीम ने मध्य असम के होजाई और कार्बी आंगलोंग जिलों के सीमाई इलाके में रहने वाले 500 से ज्यादा परिवारों को बेदखल कर दिया. इस दौरान एक स्थानीय समूह द्वारा फेसबुक पर पोस्ट किए गए एक वीडियो में 22 वर्षीय महिला कुलसुम बेगम को देखा जा सकता है, जो अपने नवजात बच्चे के साथ जमीन पर लेटी है. उसने महज दो घंटे पहले अपने बच्चे को जन्म दिया है. वीडियो में एक स्थानीय पत्रकार कार्बी आंगलोंग के जंगलों के सहायक सरंक्षक से पूछ रहा है, "आप इतने संवेदनहीन कैसे हो सकते हैं? आप एक एसीएफ अधिकारी हैं, आप इसे अस्पताल क्यों नहीं भेजते." कैमरा पीड़िता की तरफ घूमता है और रिपोर्टर पूछता है, "बच्चा जिंदा है?"

बेगम और उसके नवजात को बेदखली वाली जगह पर दो रातें गुजारनी पड़ीं क्योंकि उसके पास अस्पताल जाने के लिए पैसा नहीं था. गांव वालों ने संसाधन जुटाकर उसे नजदीक के होजाई सिविल अस्पताल में भर्ती कराया, जहां से उसे गुवाहाटी मेडिकल कॉलेज और अस्पताल रेफर कर दिया गया. मैं अस्पताल में बेगम की 50 वर्षीय सास रमीसा खातून से मिला, जिन्होंने मुझे अपने परिवार के बेदखली की खौफनाक कहानी बताई. उन्होंने कहा कि यह बेदखली अभियान बिना किसी पूर्व सूचना के 2 मार्च को शुरू हुआ था. अगले दिन रविवार था, इसलिए किसी को बेदखल नहीं किया जाना था, लेकिन बेगम के परिवार ने अभियान के डर से अपना घर तोड़ना शुरू कर दिया. बेगम के पति ने छत की टिन शीटों को हटा दिया, लेकिन अपने बच्चे के जन्म को देखते हुए दीवारों को खड़ा रहने दिया. अगले दिन सुबह लगभग आठ बजे उसकी पत्नी को बेटा हुआ.

खातून बताती है कि इसके थोड़ी देर बाद लगभग आठ अधिकारी उनके घर पहुंचे और किचन की छानबीन शुरू कर दी. खातून पहचान नहीं पाई कि वे पुलिस अधिकारी थे या अर्धसैनिक बल. अचानक उन्होंने अपना सामान बाहर ले जाना शुरू कर दिया. खातून ने मुझे बताया, "जैसे ही मैं अंदर वापस आई, मैंने देखा कुलसुम फर्श पर पड़ी है. मैंने उसे पेड़ों के पीछे छिप जाने को कहा और बच्चे को उठा लिया. मुझे डर था कि वे उसे मार डालेंगे." खातून ने बताया कि कुलसुम चल नहीं पा रही थी क्योंकि पुलिस वालों ने उसके साथ मारपीट की थी. बेगम का पति उसे बाहर लेकर गया, जिसके बाद वह बेहोश हो गई. खातून के मुताबिक, सरकार की तरफ से कोई भी बेदखली की जगह या अस्पताल में उनसे मिलने नहीं आया. मेरी यात्रा के तीन दिन बाद चोट के कारण वह मर गई. उसका बच्चा बच गया, लेकिन उसके देवर फरिदुल इस्लाम के अनुसार, “बच्चे को पीलिया हुआ है और वह 24 मार्च से जीएमसीएच के आईसीयू में भर्ती है”.

जब कुलसुम अपनी जिंदगी और मौत की लड़ाई लड़ रही थी तो उसे अवैध घुसपैठिए और खतरनाक अतिक्रमणकारी की तरह देखा गया बेगम के बच्चे का रोना अब भी मेरे कानों में गूंज रहा है. उसका एकमात्र कसूर उसके मां-बाप की पहचान है, जिसे लेकर वह जन्मा है. आजकल ऐसा लग रहा है कि वह पहचान असम में एक गुनाह बन गई है.

पिछले कुछ महीनों से असम में बीजेपी की लोकप्रियता घट रही है. पार्टी से मोहभंग की शुरुआत 2016 में नागरिकता संशोधन बिल पेश करने के बाद हुई, जिसमें मुस्लिमों के अलावा दूसरे शरणार्थियों को नागरिकता देने का प्रावधान है.

अब्दुल कलाम आजाद स्वतंत्र शोधकर्ता हैं जो पूर्व में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस (गुवाहाटी) से जुड़े थे.

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