काशी विश्वनाथ कॉरिडोर या बाबरी पार्ट टू?

27 अप्रैल 2019
प्रसिद्ध काशी विश्वनाथ मंदिर से सटी है ज्ञानवापी मस्जिद. 2018 से अब तक उत्तर प्रदेश सरकार ने काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के लिए मंदिर के आसपास 45 हजार वर्ग फीट बराबर की जमीन खाली कराई है.
रफकट प्रोडक्शन
प्रसिद्ध काशी विश्वनाथ मंदिर से सटी है ज्ञानवापी मस्जिद. 2018 से अब तक उत्तर प्रदेश सरकार ने काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के लिए मंदिर के आसपास 45 हजार वर्ग फीट बराबर की जमीन खाली कराई है.
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15वीं सदी में कबीर ने ठेठ बनारसी में लहजे में कहा था, “तू कहता कागद की लेखी, मैं कहता आंखन की देकी. मैं कहता सुरझावनहारी, तू देता उरझाई रे.”

कागज पर काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के आसरे जिस ऐतिहासिक विकास का सब्जबाग पूरे देश को दिखाया जा रहा है, दरअसल वह विकास के नाम पर एक खतरनाक उलझन पैदा करती है. वहीं दूसरी ओर बिना किसी उलझन के हमारी आंखें विकास के इस सरकारी भ्रम को अयोध्या से 200 किमी दूर काशी में दूसरे अयोध्या के रुप में कॉम्युनल कॉरिडोर की खिंची जा रही लकीर की शिनाख्त कर रही हैं.

सरकारी परियोजना काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के तहत 600 करोड़ की लागत से काशी विश्वनाथ मंदिर-ज्ञानव्यापी मस्जिद के पूर्वी छोर और मणिकर्णिका घाट के बीच अब न तो छोटी गलियां बची हैं और न ही गलियों में समाया हुआ कोई मोहल्ला. यहां न कोई मकान-दुकान है और न लोग रह गए हैं. 600 परिवारों के विस्थापन और परंपरागत रोजगार एवं हजार सालों से गंगा के तट पर जीते आ रहे समाज के ध्वंस के बाद और जमींदोज किए जा चुके 300 मकानों के रास्ते अब जो दिखता है तो वह समतल हो चुका खुला मैदान है. इस समतल मैदान के जरिए ही एक-डेढ़ किमी दूर मणिकर्णिका के घाट से अब जो दिखता है वह है काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद का साथ-साथ होना.

मंदिर-मस्जिद के साथ-साथ होने में हमारी मजहबी सियासत को अपना एक सुनहरा भविष्य दिख रहा है. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 24 फरवरी 2017 को तमिलनाडु के कोयंबटूर में शिवभक्तों की सार्वजनिक सभा में जो कहा वह भी इसी ओर इशारा करता है. मोदी ने उस भाषण में काशी से कोयंबटूर का जिक्र करते हुए दावा किया कि “यह काशीविश्‍वनाथधाम एक प्रकार से भोले बाबा की मुक्ति का पर्व है. ऐसे जकड़ा हुआ था हमारा बाबा, चारों तरफ दीवारों में फंसा हुआ था”. मोदी ने आगे दावा किया, “कितने सदियों से यह स्थान दुश्मनों के निशाने पर रहा. कितनी बार ध्वस्त हुआ, कितनी बार अपने अस्तित्व के बिना जिया, लेकिन यहां की आस्था ने उसको पुनर्जन्म दिया, पुनर्जीवित किया, पुनर्चेतना दी.”

2 मार्च 2019 को कुछ लोगों ने प्रशासन की मदद से मस्जिद की दीवार के पास एक गड्ढा कर नंदी देवता की एक पुरानी मूर्ति गाड़ने की कोशिश की.

सुशील कुमार स्वतंत्र पत्रकार हैं.

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