उत्तर प्रदेश में अजान पर रोक के मामले में सरकार ने अदालत में दाखिल किया झूठा हलफनामा

16 मई 2020
कोविड-19 महामारी से लड़ने के लिए लागू राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन के दौरान रमजान की पूर्व संध्या पर दिल्ली की जामा मस्जिद के बंद दरवाजों के सामने खड़ा मजदूर. उत्तर प्रदेश में रमजान के दौरान अजान देने पर मुसलमानों के खिलाफ हिंसा की रिपोर्टें सामने आई हैं.
प्रखर सिंह / एएफपी / गैटी इमेजिज
कोविड-19 महामारी से लड़ने के लिए लागू राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन के दौरान रमजान की पूर्व संध्या पर दिल्ली की जामा मस्जिद के बंद दरवाजों के सामने खड़ा मजदूर. उत्तर प्रदेश में रमजान के दौरान अजान देने पर मुसलमानों के खिलाफ हिंसा की रिपोर्टें सामने आई हैं.
प्रखर सिंह / एएफपी / गैटी इमेजिज

इलाहाबाद हाई कोर्ट में उत्तर प्रदेश सरकार ने हलफनामा दायर कर कहा है कि 24 मार्च को हुई राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन की घोषणा के साथ ही अजान को राज्य में प्रतिबंधित कर दिया गया था. उस हलफनामे को पढ़ने से लगता है कि भारतीय जनता पार्टी की राज्य सरकार को अजान और नमाज का फर्क नहीं पता. उत्तर प्रदेश की मस्जिदों में लॉकडाउन के बाद लोग नमाज पढ़ने के लिए वैसे भी इकट्ठा नहीं हो रहे हैं लेकिन हलफनामे में कहा गया है कि यदि अजान की अनुमति दी गई तो हो सकता है कि लोग नमाज पढ़ने के लिए मस्जिद इकट्ठा होने लगें और ऐसा हुआ तो या सार्वजनिक हित के लिए ठीक नहीं होगा क्योंकि इससे लोगों में संक्रमण फैलने का खतरा बढ़ जाएगा.

राज्य सरकार ने यह हलफनामा बहुजन समाज पार्टी के गाजीपुर के सांसद अफजाल अंसारी की जनहित याचिका के जवाब में दाखिल किया है. 26 अप्रैल को अंसारी ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के मुख्य जज को एक पत्र लिखकर उन्हें राज्य भर में हो रहीं उन घटनाओं से अवगत कराया था जिनमें स्थानीय पुलिस, प्रशासन और उपद्रवी तत्व मुसलमानों को अजान देने नहीं दे रहे हैं. उन्होंने पत्र में बताया है कि अजान के मामले में सरकार का कोई दिशा-निर्देश नहीं है बल्कि सिर्फ मस्जिदों में पढ़ी जाने वाली नमाज पर प्रतिबंध है. अंसारी ने पत्र में लिखा है कि हर कोई किसी मौखिक आदेश के बारे में बता रहा है लेकिन उसके सोर्स या जारी करने वाली संस्था की जानकारी का खुलासा नहीं कर रहा है. कोई भी अजान पर प्रतिबंध लगाने वाले लिखित आदेश को नहीं दिखा रहा है.

अंसारी के उस पत्र को जनहित याचिका मानकर अदालत ने सुनवाई की है. अप्रैल के आखिर में जब यह खबर सामने आई कि उत्तर प्रदेश के मस्जिदों में अजान देने से लोगों को रोका जा रहा है तब अधिकारियों ने इस बात से इनकार किया था कि अजान पर किसी तरह का प्रतिबंध है. लेकिन सरकार अपने जवाबी हलफनामे में, जो उसने मई में दायर किया है, पुराने रुख से एकदम उलट गई है और उसने ना सिर्फ लॉकडाउन की पूरी अवधि में अजान पर प्रतिबंध लगे रहने की बात की है बल्कि यह भी कहा है कि इस अवधि में किसी भी मस्जिद में अजान नहीं दी गई है. मुझे कई इमामों और मुअज्जिनों ने बताया कि सरकार का यह दावा पूरी तरह गलत है और लॉकडाउन के शुरुआती हफ्तों में मस्जिदों से अजान दी जा रही थी और इसे अचानक ही अप्रैल के अंत में प्रतिबंधित कर दिया गया. सांसद अंसारी ने मुझे बताया कि सरकार ने अदालत से झूठ बोला है कि अजान को मार्च में रोका गया था. उन्होंने बताया, “यह दावा आधारहीन है क्योंकि यदि ऐसा होता तो हम अप्रैल तक याचिका दायर करने के लिए नहीं रुके होते.”

अप्रैल में गोरखपुर से लेकर गाजीपुर तक अजान देने पर मुस्लिमों के खिलाफ हुई हिंसा के समाचार सामने आए थे. कई जिलों में इमामों ने बताया कि कोरोना महामारी के चलते मुसलमान अपने घरों में ही नमाज अदा कर रहे हैं. अजान का मकसद सिर्फ मुस्लिम लोगों को नमाज का वक्त बताना होता है, तो भी कई मामलों में स्थानीय पुलिस और जिला प्रशासन ने बल प्रयोग कर अजान पर प्रतिबंध लगाया और कई अन्य स्थानों में मुसलमानों ने खुद इस बात की सहमति जताई कि वे लाउडस्पीकर पर अजान नहीं देंगे. जिला प्रशासन ने मुस्लिम अल्पसंख्यकों को अपने धार्मिक विश्वास और सुरक्षा के बीच किसी एक को चुनने के दबाव डाला है.

गोरखपुर शहर से 35 किलोमीटर दूर बनकटा गांव की गरीब नवाज मस्जिद आमतौर पर जोहर या दोपहर की नमाज के लिए भरी रहती है लेकिन 26 अप्रैल को राष्ट्रीय लॉकडाउन के एक महीने बाद वहां सिर्फ दो ही व्यक्ति मौजूद थे जबकि वह रमजान का पहला इतवार था. फिजिकल डिस्टेंसिंग का पालन करने के लिए अधिकांश मुस्लिम घरों में ही नमाज अदा कर रहे हैं. मस्जिद के मुअज्जिन अब्दुल रहमान ने मुझे बताया कि उस दिन मस्जिद का लाउडस्पीकर सुधारा गया था और इसलिए उन्होंने लाउडस्पीकर से अजान देने की सोची थी. उनकी अजान के कुछ ही मिनटों बाद 5-6 लोग मस्जिद में घुस आए.

अशफाक एज स्वतंत्र पत्रकार हैं और दिल्ली में रहते हैं.

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