उत्तर प्रदेश में अजान पर रोक के मामले में सरकार ने अदालत में दाखिल किया झूठा हलफनामा

कोविड-19 महामारी से लड़ने के लिए लागू राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन के दौरान रमजान की पूर्व संध्या पर दिल्ली की जामा मस्जिद के बंद दरवाजों के सामने खड़ा मजदूर. उत्तर प्रदेश में रमजान के दौरान अजान देने पर मुसलमानों के खिलाफ हिंसा की रिपोर्टें सामने आई हैं. प्रखर सिंह / एएफपी / गैटी इमेजिज
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16 May, 2020

इलाहाबाद हाई कोर्ट में उत्तर प्रदेश सरकार ने हलफनामा दायर कर कहा है कि 24 मार्च को हुई राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन की घोषणा के साथ ही अजान को राज्य में प्रतिबंधित कर दिया गया था. उस हलफनामे को पढ़ने से लगता है कि भारतीय जनता पार्टी की राज्य सरकार को अजान और नमाज का फर्क नहीं पता. उत्तर प्रदेश की मस्जिदों में लॉकडाउन के बाद लोग नमाज पढ़ने के लिए वैसे भी इकट्ठा नहीं हो रहे हैं लेकिन हलफनामे में कहा गया है कि यदि अजान की अनुमति दी गई तो हो सकता है कि लोग नमाज पढ़ने के लिए मस्जिद इकट्ठा होने लगें और ऐसा हुआ तो या सार्वजनिक हित के लिए ठीक नहीं होगा क्योंकि इससे लोगों में संक्रमण फैलने का खतरा बढ़ जाएगा.

राज्य सरकार ने यह हलफनामा बहुजन समाज पार्टी के गाजीपुर के सांसद अफजाल अंसारी की जनहित याचिका के जवाब में दाखिल किया है. 26 अप्रैल को अंसारी ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के मुख्य जज को एक पत्र लिखकर उन्हें राज्य भर में हो रहीं उन घटनाओं से अवगत कराया था जिनमें स्थानीय पुलिस, प्रशासन और उपद्रवी तत्व मुसलमानों को अजान देने नहीं दे रहे हैं. उन्होंने पत्र में बताया है कि अजान के मामले में सरकार का कोई दिशा-निर्देश नहीं है बल्कि सिर्फ मस्जिदों में पढ़ी जाने वाली नमाज पर प्रतिबंध है. अंसारी ने पत्र में लिखा है कि हर कोई किसी मौखिक आदेश के बारे में बता रहा है लेकिन उसके सोर्स या जारी करने वाली संस्था की जानकारी का खुलासा नहीं कर रहा है. कोई भी अजान पर प्रतिबंध लगाने वाले लिखित आदेश को नहीं दिखा रहा है.

अंसारी के उस पत्र को जनहित याचिका मानकर अदालत ने सुनवाई की है. अप्रैल के आखिर में जब यह खबर सामने आई कि उत्तर प्रदेश के मस्जिदों में अजान देने से लोगों को रोका जा रहा है तब अधिकारियों ने इस बात से इनकार किया था कि अजान पर किसी तरह का प्रतिबंध है. लेकिन सरकार अपने जवाबी हलफनामे में, जो उसने मई में दायर किया है, पुराने रुख से एकदम उलट गई है और उसने ना सिर्फ लॉकडाउन की पूरी अवधि में अजान पर प्रतिबंध लगे रहने की बात की है बल्कि यह भी कहा है कि इस अवधि में किसी भी मस्जिद में अजान नहीं दी गई है. मुझे कई इमामों और मुअज्जिनों ने बताया कि सरकार का यह दावा पूरी तरह गलत है और लॉकडाउन के शुरुआती हफ्तों में मस्जिदों से अजान दी जा रही थी और इसे अचानक ही अप्रैल के अंत में प्रतिबंधित कर दिया गया. सांसद अंसारी ने मुझे बताया कि सरकार ने अदालत से झूठ बोला है कि अजान को मार्च में रोका गया था. उन्होंने बताया, “यह दावा आधारहीन है क्योंकि यदि ऐसा होता तो हम अप्रैल तक याचिका दायर करने के लिए नहीं रुके होते.”

अप्रैल में गोरखपुर से लेकर गाजीपुर तक अजान देने पर मुस्लिमों के खिलाफ हुई हिंसा के समाचार सामने आए थे. कई जिलों में इमामों ने बताया कि कोरोना महामारी के चलते मुसलमान अपने घरों में ही नमाज अदा कर रहे हैं. अजान का मकसद सिर्फ मुस्लिम लोगों को नमाज का वक्त बताना होता है, तो भी कई मामलों में स्थानीय पुलिस और जिला प्रशासन ने बल प्रयोग कर अजान पर प्रतिबंध लगाया और कई अन्य स्थानों में मुसलमानों ने खुद इस बात की सहमति जताई कि वे लाउडस्पीकर पर अजान नहीं देंगे. जिला प्रशासन ने मुस्लिम अल्पसंख्यकों को अपने धार्मिक विश्वास और सुरक्षा के बीच किसी एक को चुनने के दबाव डाला है.

गोरखपुर शहर से 35 किलोमीटर दूर बनकटा गांव की गरीब नवाज मस्जिद आमतौर पर जोहर या दोपहर की नमाज के लिए भरी रहती है लेकिन 26 अप्रैल को राष्ट्रीय लॉकडाउन के एक महीने बाद वहां सिर्फ दो ही व्यक्ति मौजूद थे जबकि वह रमजान का पहला इतवार था. फिजिकल डिस्टेंसिंग का पालन करने के लिए अधिकांश मुस्लिम घरों में ही नमाज अदा कर रहे हैं. मस्जिद के मुअज्जिन अब्दुल रहमान ने मुझे बताया कि उस दिन मस्जिद का लाउडस्पीकर सुधारा गया था और इसलिए उन्होंने लाउडस्पीकर से अजान देने की सोची थी. उनकी अजान के कुछ ही मिनटों बाद 5-6 लोग मस्जिद में घुस आए.

रहमान ने मुझे बताया कि घुसपैठियों ने धमकाते हुए पूछा अजान किसने दी. रहमान ने बताया कि इलाके के एक बुजुर्ग इंसान जैनुद्दीन ने अजान दी थी लेकिन उन्हें बचाने के लिए रहमान ने कह दिया कि मैंने अजान दी थी. उन्होंने बताया, “उन्होंने मुझे धमकी दी कि दुबारा ऐसा ना हो.” रहमान ने उन लोगों को बताया कि सिकरीगंज पुलिस स्टेशन के एसएचओ जटाशंकर से उन्होंने अजान की मंजूरी ली है. “यह सुनना था कि वे लोग मुझे पीटने लगे.” रहमान ने बताया कि उन लोगों उन्हें कम से कम 4-5 बार मारा और रैक से कुरान निकालकर जमीन पर फेंक दी. तीन कुरान मस्जिद के बाहर और दो मस्जिद के अंदर फेंक दी.

मस्जिद में हो-हल्ला सुनने के बाद 25 साल के सोनू अली भागकर मस्जिद पहुंचे और इस कोशिश में कि हमलावर भाग ना पाएं, अली ने मस्जिद का दरवाजा बंद कर दिया और पुलिस को सूचना दी. उन्होंने बताया कि उन्होंन कम से कम पांच हमलावरों की नाम से पहचान कर ली थी. पांचों उनके गांव के ठाकुर थे. लेकिन हमलावर भागने में सफल हो गए. अली ने याद किया, “इसके बाद हमलावर 25-35 लोगों को लेकर वापस आए और मेरे भाई को मारने लगे. मेरे अब्बू अजमत अली ने हमें बचाने की कोशिश की लेकिन उन गुंडों ने अब्बू को ईटों, बांस के लाठियों और पत्थरों से पीटा. मेरे अब्बू का सर फट गया और पैर टूट गया.” रहमान के अनुसार, मस्जिद से करीब 100 मीटर की दूरी पर दो पुलिस वाले ड्यूटी पर मौजूद थे लेकिन वे अली और उनके पिता की मदद के लिए नहीं आए. उन्होंने बताया कि पुलिस को हस्तक्षेप करने में एक घंटा लग गया, वह भी जब रहमान, जैनुद्दीन और सलीम अंसारी ने उनसे मिन्नतें कीं. सलीम अंसारी मस्जिद समिति के मेंबर हैं.

दूसरे दिन पुलिस ने दोनों समुदायों के बीच सुलह करा दी. सुलाह के लिए हुई बैठक में करीब 50 ठाकुर और 20 मुसलमान मौजूद थे. अली ने बताया कि ठाकुर समुदाय गांव का बहुसंख्यक तबका है और गांव में ठाकुरों की आबादी लगभग आधी है और मुसलमान सिर्फ 15 फीसदी हैं. केवल 4 मुस्लिम परिवार ही मस्जिद के पास रहते हैं. रहमान ने बताया कि उस बैठक में ठाकुर लोगों ने लिखित समझौता किया कि ऐसी चीज दुबारा नहीं होगी, लेकिन हमलावरों के ऊपर कोई केस दर्ज नहीं किया गया. ठाकुरों ने अजान ना होने देने की मांग की थी लेकिन गांव में अजान की औपचारिक अनुमति दे दी गई.

रहमान ने बताया कि बाद में पुलिस ने गांव में 12 पुलिसकर्मियों की तैनाती कर दी और सिकरीगंज के एसएचओ जटाशंकर नेम खुलकर कहा था कि मस्जिद ने अजान के लिए लाउडस्पीकर के इस्तेमाल की मंजूरी ली थी. “उन्होंने कहा कि हमने मस्जिद के अधिकारियों को लंबे समय पहले लाउडस्पीकर इस्तेमाल करने की मंजूरी दी थी.” रहमान ने यह भी बताया कि पुलिस ने हमले के खिलाफ एफआईआर इसलिए दर्ज नहीं की क्योंकि किसी शिकायत नहीं की.

जटाशंकर ने मुझे बताया कि दोनों पक्षों के प्रभावशाली लोगों और 16 वरिष्ठ पुलिस अधिकारी बैठक में मौजूद थे. मौजूद लोगों में गोरखपुर के अपर पुलिस अधीक्षक विपुल श्रीवास्तव और गोरखपुर के खजानी शहर के सब डिविजनल मजिस्ट्रेट विपिन कुमार जिनके क्षेत्राधिकार में बनकटा आता है, थे. जटाशंकर ने कहा कि दोनों समुदायों ने लिखित फैसला किया कि गांव में सांप्रदायिक सद्भाव बगाड़ने का कोई काम भविष्य में नहीं होगा. बीजेपी के खजानी के विधायक संत प्रसाद ने शुरू में तो यह कहा कि अजान के लिए मुसलमानों पर हमले की खबर फर्जी है लेकिन फिर स्वीकार किया कि ऐसा हुआ है. उन्होंने इसे छोटी-मोटी बात बताते हुए कहा, “वह एक मामूली घटना थी और उसे अपने आप हल कर लिया गया.”

स्थानीय पुलिस राज्य प्रशासन के अनुसार गांव में वह विषय सुलझा लिया गया लेकिन अली ने मुझे बताया कि ठाकुरों के सामने पुलिस की नहीं चली. अली ने बताया कि उनके परिवार ने शिकायत दर्ज ना कराने का फैसला इसलिए किया क्योंकि ठाकुर समुदाय गांव में बहुत ताकतवर है. अली ने समझाया कि गांव ठाकुर गांव में बहुसंख्यक हैं. “हम गांव के दक्षिण में रहते हैं जहां सिर्फ 4 मुस्लिम परिवार हैं. अगर हम उनके खिलाफ शिकायत करते हैं तो वह हमें चैन से जीने नहीं देंगे.”

बनकटा में अजान शुरू हो गई है लेकिन डर नहीं. 2 मई को रहमान ने मुझे बताया था, “आज जब मैं नदी से लौट रहा था तो रास्ते में मुझे वही पांच ठाकुर मिले जिन्होंने मुझ पर हमला किया था.” उन्होंने रहमान को धमकी दी, “ये मल्ला लोगों को और मारना है.” रहमान ने आगे कहा कि यह सुनकर वह डर गए. “वे लोग इतने ताकतवर हैं कि उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता.”

उत्तर प्रदेश के गाजीपुर में पुलिस और स्थानीय प्रशासन ने मुस्लिमों की मदद का नाटक तक नहीं किया. गाजीपुर के सिकंदरपुर मस्जिद के इमाम लॉकडाउन के पहले अपने गांव चले गए थे और 21 साल के मोहम्मद अजहरुद्दीन उनकी जिम्मेदारी संभाल रहे थे. 19 अप्रैल को अजहरुद्दीन और उनके साथी आसिफ अंसारी मस्जिद में वजू कर रहे थे कि पुलिस की 4 गाड़ियां मस्जिद के सामने आकर रुकीं. फिर सादी वर्दी में दो पुलिस वाले मस्जिद के अंदर घुस आए. अकबरुद्दीन ने मुझे बताया, “मैं अपना चेहरा और हाथ धो रहा था कि पुलिस वाले ने मेरा गिरेबान पकड़ कर मुझे उठा लिया. मुझे वजू पूरी करने नहीं दी.”

अजहरुद्दीन ने बताया कि स्थानीय करंदा पुलिस स्टेशन के इंस्पेक्टर मस्जिद के बाहर खड़े थे और अजहरुद्दीन से उन्होंने पूछा कि क्या वह अजान देता है. अजहरुद्दीन ने कहा कि इसके बाद पुलिस वाले उन्हें तकरीबन 8:30 बजे करंदा पुलिस स्टेशन ले गए और उनके दोस्त को और उनको स्टेशन परिसर के अंदर पीटा. इसके बाद दोनों को जमीन पर बैठा कर कहा गया कि लॉकडाउन में अजान पर प्रतिबंध लगा है. अजहरुद्दीन बताया कि उन पर भारतीय दंड संहिता की धारा 188 और 269 के तहत मामला दर्ज किया गया. जो सार्वजनिक आदेश का पालन ना करने और बीमारी फैलाकर लोगों की जान को खतरे में डालने से संबंधित धाराएं हैं. रात करीब 12:30 बजे अजहरुद्दीन और आसिफ को जमानत पर छोड़ा गया.

लेकिन पुलिस ने दावा किया है कि उन लोगों ने दोनों को इसलिए पकड़ा था क्योंकि वे मास्क नहीं पहने थे. करंदा पुलिस स्टेशन के एसएचओ धर्मेंद्र पांडे ने मुझे बताया, “उन्हें पकड़ने का अजान से कोई लेना-देना नहीं है. उस दिन हम लोग कोबिड से संबंधित दिशानिर्देश की घोषणा कर रहे थे. हम मस्जिद में घुसे तो देखा कि वहां लॉकडाउन के नियमों का पालन नहीं हो रहा है और इसलिए हमने उन्हें हिरासत में ले लिया और मामूली मुकदमा दर्ज कर बाद में रिहा कर दिया. अजहरुद्दीन ने बताया कि यह दावा गलत है क्योंकि वजू में मास्क नहीं पहना जा सकता. “वजू के लिए आपको अपना चेहरा, कान, हाथ और माथा पानी से अच्छे से धोना होता है.”

अजहरुद्दीन ने बताया, “हम लोग सभी नियमों का और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कर रहे थे. मस्जिद में ज्यादा से ज्यादा सिर्फ तीन लोग नमाज अदा करते हैं जबकि पुलिस वालों की संख्या ज्यादा थी. उन लोगों ने हमसे अपराधियों सरीखा व्यवहार किया. पुलिस स्टेशन ले जाते वक्त वे लोग हमें अजान के बारे में पूछ रहे थे.” अजहरुद्दीन ने बताया कि उन लोगों ने उनसे पूछा था कि अजान किसने दी. ऐसा कोई सरकारी निर्देश नहीं है जो यह कहता है कि मस्जिद की दीवारों के अंदर या किसी भवन में मास्क पहनना जरूरी है. जब मैंने इस बारे में पांडे से पूछा तो उन्होंने कहा, “उनकी गिरफ्तारी का नमाज और अजान से कोई लेना नहीं है. ये लोग मास्क नहीं लगाए थे और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन ना करते हुए सड़कों पर घूम रहे थे. हम धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं करते हैं. हमारी टीम में मुस्लिम अधिकारी भी हैं.” अजहरुद्दीन ने बताया कि उस दिन से उन्होंने लाउडस्पीकर पर अजान नहीं दी है. उन्होंने कहा, “मैं एक छात्र हूं और इसलिए डर गया हूं क्योंकि वे लोग मुझे फर्जी केस में फंसा सकते हैं.”

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इसी तरह का एक मामला गाजीपुर के दिलदार नगर इलाके की दरगाह मस्जिद में सामने आया. 24 अप्रैल को सुबह 4 बजे  दिलदार नगर स्टेशन से दो पुलिस वालें मोटरसाइकिल पर मस्जिद आए और मुअज्जिन मुहम्मद मुर्तजा खान को बुलाया किया. खान ने कहा कि वह उस समय फज्र (सुबह की नमाज) के लिए तैयार हो रहे थे. उन्होंने कहा कि पुलिस वालों ने उन्हें बताया कि अजान पर प्रतिबंध है और "जिस किसी ने भी ऐसा करने की हिम्मत की तो उस पर आईपीसी की धाराओं के तहत दर्ज किया जाएगा." खान ने कहा, "23 मार्च के बाद से केवल मैं और दो अन्य मस्जिद के कर्मचारी मस्जिद से नमाज अदा करते थे और अजान देते थे. अब वे कह रहे हैं कि लाउडस्पीकरों पर अजान नहीं दी जा सकती है.”

खान ने जोर देकर कहा कि पुलिस के पास अजान को प्रतिबंधित करने का कोई लिखित आदेश नहीं है. उन्होंने कहा कि जिलाधिकारी ओम प्रकाश आर्य ने ''ऐसा कोई आदेश'' जारी नहीं किया था और कहा कि ''स्थानीय पुलिस सिर्फ गुंडागर्दी कर रही है.'' गाजीपुर के सांसद अंसारी ने मुझे पुलिस द्वारा जारी नोटिस की एक फोटो भेजी थी जो जिले की मस्जिदों पर चिपके हुए हैं. नोटिस में लिखा है कि जमात में नमाज पढ़ने से संक्रमण फैल जाएगा और ऐसे मे ना केवल वह व्यक्ति जिसने अजान दी है बल्कि वे सभी जो नमाज पढ़ने के लिए इकट्ठा होंगे उन पर मुकदमा चलाया जाएगा.

लगता कि नोटिस मुस्लिमों नेताओं पर अजान दे कर नमाज के लिए लोगों को इकट्ठा कर संक्रमण फैलाने का आरोप लगा रहा है. नोटिस में आगे लिखा है, "वर्तमान परिस्थितियों में संक्रमण को रोकने के बजाय लोगों को किसी धार्मिक स्थान पर एकत्र होने के लिए कहना ... लॉकडाउन का उल्लंघन है ... और यह महामारी फैलने की पूरी संभावना पैदा करता है.” नोटिस में 2017 का केसी जैकब बनाम भारतीय संघ के मामले नोट करते हुए कहा गया है कि अजान से होने वाले किसी भी सार्वजनिक नुकसान को लॉकडाउन का उल्लंघन करने वालों से वसूला जाएगा.

दिलदार नगर पुलिस स्टेशन के एसएचओ दिलीप कुमार सिंह ने कहा कि अजान पर कोई प्रतिबंध नहीं था. जब मैंने उनसे नोटिस और खान की शिकायत के बारे में पूछा तो एसएचओ बात बनाते दिखे. उन्होंने कहा, "हम केवल लॉकडाउन नियमों का पालन कर रहे हैं. आप डीएम साहब से संपर्क कर सकते हैं."

गाजीपुर के जिला मजिस्ट्रेट आर्य ने भी कहा कि प्रशासन "केवल लॉकडाउन नियमों को लागू कर रहा है." जब मैंने उनसे कोरोनावायरस और अजान के बीच के संबंध के बारे में पूछा तो सवाल के जवाब में एक लंबी चुप्पी मिली. आर्य ने हालांकि इस बात से इनकार नहीं किया कि अजान देने पर प्रतिबंध है. यह पूछे जाने पर कि यह कब तक जारी रहेगा उन्होंने जवाब दिया, “हमें लाउडस्पीकरों में अजान देने को शुरू करने के बारे में ऊपर से कोई आदेश नहीं मिला है. अगर हमें ऊपर से कोई आदेश मिलता है तो हम अजान को फिर से शुरू करा देंगे.”

गाजीपुर के पुलिस अधीक्षक ओम प्रकाश सिंह का मानना है कि अजान के मुद्दे को ज्यादा तूल दिया जा रहा है. सिंह ने कहा कि देश भर में अजान पर प्रतिबंध है लेकिन उन्हें समझ नहीं आ रहा कि लोग इसे मुद्दा क्यों बना रहे हैं. जब मैंने बताया कि लॉकडाउन के दौरान किसी मस्जिद में नमाज के लिए केवल इकट्ठा होने पर प्रतिबंध है तो सिंह ने दावा किया कि अजान नमाज का एक हिस्सा है. वह फिर से वही बात कर रहे थे कि वह राज्य प्रशासन के दिशानिर्देशों को लागू कर रहे हैं. जब मैंने उनसे प्रतिबंध के बारे में लिखित आदेश मांगा तो उन्होंने फोन काट दिया. बाद में उन्होंने मेरा फोन नहीं उठाया. फिर मुझे उनके अधीनस्थ का फोन आया. पुलिस अधिकारी ने अपना नाम नहीं बताया और खुद को सिंह का सहायक बताया. उसके साथ फोन पर बातचीत लगभग पूछताछ जैसी थी. बातचीत में मेरा व्यक्तिगत विवरण और यहां तक कि मेरा घर का पता भी पूछा गया.

इन जैसी बातों के चलते ही अंसारी को उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखना पड़ा. उन्होंने लिखा कि पुलिस ने मुस्लिमों को धमका है कि "अगर किसी ने मस्जिदों से अजान देने की हिम्मत की तो उस पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत मामला दर्ज किया जाएगा. बिना किसी कारण के मस्जिदों के कुछ इमामों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई हैं." अंसारी ने उल्लेख किया कि प्रतिबंध संविधान द्वारा दी गई धर्म की समानता और स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है.

"उनका कहना है कि अजान को मस्जिद में भीड़ ना होने देने के लिए रोका गया है," अंसारी ने मुझे बताया. अंसारी ने कहा, "लॉकडाउन के बाद से मुसलमानों ने तय किया था कि तरावीह सहित अन्य नमाज अपने घरों पर अदा की जाएगी और मस्जिद के बजाय घर से कुरान पढ़ी जाएगी. एक व्यक्ति रमजान के पाक महीने के दौरान रोजा शुरू और खत्म करने तथा संबंधित नमाज के समय के बारे में मुसलमानों को सूचित करने के लिए अजान देता है. मस्जिद से अजान के कारण कोई भी कोरोना से प्रभावित नहीं होता.” उन्होंने कहा, “अजान कोई अपराध नहीं है. वे हमारे मौलिक अधिकारों को नहीं छीन सकते. मुझे पूरा विश्वास है कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला हमें इंसाफ दिलाएगा.” मामले का फैसला सुरक्षित रखा गया है और फैसला कब सुनाया जाएगा अभी यह तय नहीं हुआ है.

फिलहाल लगता नहीं कि राज्य सरकार प्रतिबंध हटाएगी. वह अदालत के सामने भरोसेमंद जिरह भी नहीं कर सकी. हलफनामे में लॉकडाउन की घोषणा के बाद 24 मार्च को गृह मंत्रालय द्वारा जारी दिशानिर्देशों का उल्लेख किया गया था, जिसमें कहा गया था कि "किसी भी धार्मिक जमावड़े की इजाजत नहीं होगी." उसमें गाजीपुर के जिला मजिस्ट्रेट और राज्य सरकार द्वारा एक ही तारीख को जारी किए गए परिपत्रों का भी उल्लेख है लेकिन वे भी केवल धार्मिक जमावड़ों को प्रतिबंधित करते हैं, अजान को नहीं.

राज्य ने झूठा दावा किया है कि लॉकडाउन लागू होने के बाद से किसी भी धार्मिक स्थान पर कोई गतिविधि नहीं हुई है. 25 मार्च को एक धार्मिक समारोह में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ के वीडियो से भी राज्य सरकार का झूठ उजागर होता है. लॉकडाउन के पहले दिन, आदित्यनाथ राम लल्ला की मूर्ति को स्थानांतरण समारोह के लिए अयोध्या गए थे. उस समारोह में कथित रूप से 50 से अधिक लोगों ने भाग लिया था.

राज्य के हलफनामे में दिल्ली में मार्च के मध्य में इस्लामिक संगठन तबलीगी जमात द्वारा आयोजित एक वार्षिक सम्मेलन में भाग लेने वालों के बीच नोवेल कोरोनवायरस के प्रकोप का भी उल्लेख था. हलफनामे में कहा गया है कि गाजीपुर से इसमें उपस्थित लोगों का पता लगाया गया था और उन्हें क्वारंटीन कर बाद में छोड़ा गया था. इस तर्क में तबलीगी जमात के सम्मेलन और अजान पर प्रतिबंध के बीच कोई संबंध स्थापित नहीं होता. यह मुस्लिम समुदाय को अलग-थलग करने वाली एक राजनीति लगती है.

इस मुद्दे पर हाई कोर्ट को लिखने वाले अंसारी अकेले नहीं हैं. कांग्रेसी नेता और पूर्व कैबिनेट मंत्री सलमान खुर्शीद और वरिष्ठ अधिवक्ता एस. वसीम ए. कादरी ने भी अजान पर रोक को चुनौती देने वाले पत्र अदालत को भेजे हैं. अपने पत्र में खुर्शीद ने उत्तर प्रदेश के दो अन्य जिलों, फर्रुखाबाद और हाथरस में अजान को प्रतिबंधित करने की घटनाओं का जिक्र किया है.

फर्रुखाबाद जिले के मऊदरवाजा पुलिस स्टेशन का कथित तौर पर 26 अप्रैल का एक नोटिस सोशल मीडिया पर शेयर हुआ है. नोटिस में कहा गया है, "यह आपके संज्ञान में लाया जाता है कि संक्रामक कोरोना के प्रकोप और 25 अप्रैल 2020 से रमजान के महीने की शुरुआत को देखते हुए जिला कलेक्टर ... ने आदेश दिया है कि मस्जिद के अंदर नमाज पढ़ने के लिए अजान देने में लाउडस्पीकर का उपयोग नहीं किया जा सकता. यह सूचित किया जाता है कि सभी को अपने घरों में नमाज अदा करनी होगी. अगर कोई इस नोटिस का उल्लंघन करता हुआ पाया जाता है तो कानून के अनुसार कड़ी कार्रवाई की जाएगी.” यह नोटिस मऊदरवाजा पुलिस स्टेशन के एसएचओ जय प्रकाश शर्मा की ओर से जारी है.

जब मैंने एसएचओ से संपर्क किया, तो उन्होंने कहा कि पुलिस स्टेशन ने ऐसा कोई नोटिस जारी नहीं किया है. शर्मा ने कहा, "यह पूरी तरह से फर्जी है और कुछ उपद्रवियों द्वारा मस्जिदों के सामने नोटिस लगाए गए थे. फर्रुखाबाद में अजान पर प्रतिबंध नहीं लगाया गया है. हर मस्जिद में अजान देने और नमाज अदा करने की इजाजत मुअज्जिन को दी गई है.” उन्होंने कहा कि फर्रुखाबाद पुलिस ने नकली नोटिस के पीछे के अपराधी को खोजने के लिए एक जांच शुरू की थी.

मैंने फर्रुखाबाद के जिलाधिकारी मानवेंद्र सिंह से संपर्क किया. जब मैंने कहा कि मैं केरल का एक पत्रकार हूं, तो उन्होंने जवाब दिया, "केरल में बैठकर फर्रुखाबाद के बारे में क्यों परेशान हो रहे हो?" जब मैंने उन्हें नोटिस और जिले की स्थिति के बारे में जानकारी के लिए दबाव दिया, तो उसने कॉल काट दिया.

हाथरस के सिकंदरा राव कस्बे की सराय उमथा बेगम मस्जिद के इमाम मुहम्मद शकील ने मुझे बताया कि 27 अप्रैल को वह रोजा खोलने वाले ही थे कि चार बाइकों पर आठ पुलिसकर्मी मस्जिद में आए. उन्होंने कहा कि एक सब इंस्पेक्टर ने उनसे कहा, ''अजान आपकी मस्जिद से हो रही है. यदि आप इसे नहीं रोकते हैं तो जो कानूनी कार्रवाई होगी उसके लिए पूरी तरह से आप ही जिम्मेदार होंगे. ” शकील ने उन्हें लिखित आदेश दिखाने के लिए कहा. “पुलिस ने जवाब दिया कि यदि आपको कोई संदेह है तो पुलिस स्टेशन आइए हम आपको सब कुछ दिखा देंगे. एसएचओ आपकी शंका को दूर करेगा.” उस दिन मगरिब की नमाज बिना लाउडस्पीकर पर अजान दिए पढ़ी गई.

"लॉकडाउन की शुरुआती अवधि में हमने अधिकारियों के साथ एक बैठक की," शकील ने मुझे बताया. "उस बैठक में उन्होंने कहा कि केवल तीन से पांच लोगों को लॉकडाउन के दौरान मस्जिद के अंदर नमाज पढ़ने की इजाजत होगी. उन्होंने अजान के बारे में कुछ भी नहीं बताया था. नमाज के लिए जमात पर प्रतिबंध है लेकिन अजान की इजाजत है." शकील ने कहा कि रमजान की शुरुआत से पहले अप्रैल के अंत में स्थानीय पुलिस, उप-विभागीय मजिस्ट्रेट और लगभग 15 अन्य लोगों के साथ इसी तरह की बैठक आयोजित की गई थी. उस बैठक में, उन्होंने याद किया, अजान पर कोई प्रतिबंध नहीं लगा था. "उन्होंने कहा कि आप अजान कर सकते हैं लेकिन मस्जिद के अंदर दो से अधिक व्यक्तियों के साथ नमाज नहीं पढ़ सकते. हम इस पर सहमत थे कि मस्जिद में अधिकतम पांच लोग नमाज अदा करेंगे. ”

बाद की स्थानीय मीडिया रिपोर्टों ने उल्लेख किया कि अजान पर प्रतिबंध लगाने का निर्णय जिला मजिस्ट्रेट, पुलिस अधीक्षक और स्थानीय सामुदायिक नेताओं के बीच हुई एक बैठक के बाद लिया गया था. लेकिन शकील को बैठक में नहीं बुलाया गया. "उन्होंने समुदाय के तीन-चार लोगों के साथ बैठक की," उन्होंने बताया. "मैंने अखबार में इसके बारे में पढ़ा." हाथरस में ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन की युवा शाखा के नेता नौमान गौहर के मुताबिक, "समुदाय के किसी भी प्रभावी नेता और प्रभावशाली व्यक्तियों को बैठक में आमंत्रित नहीं किया गया था." उन्होंने कहा कि जो लोग पिछली बैठकों में शामिल हुए थे, वे रमजान के दौरान हुई बैठक का हिस्सा नहीं थे. उन्होंने कहा, "हम में से ज्यादातर को बैठक के बारे में कुछ पता ही नहीं है." "पुलिस ने कस्बे के तीन या चार दलालों के साथ बैठक की थी."

हाथरस के पुलिस अधीक्षक गौरव बंसवाल ने मुझे बताया कि प्रतिबंध इसलिए आवश्यक था क्योंकि बहुत से लोग अजान के बाद नमाज अदा करने के लिए इकट्ठा हो जाते. "बहुत भीड़ हो जाती," उन्होंने कहा, "यह नियम मंदिरों पर भी लागू होता है."

शकील ने मुझे बताया, "वे कह रहे हैं कि मस्जिद से अजान सोशल डिस्टेंसिंग के मानदंडों का उल्लंघन करेगी. सरकार ने अब दारू के ठेके खोल दिए हैं. हजारों लोग शराब खरीदने के लिए कतार पर खड़े थे. क्या इससे सामाजिक दूरी का उल्लंघन नहीं होता है? अजान और सामाजिक दूरी के बीच क्या संबंध है? लॉकडाउन शुरू होने के बाद से हम पांच से अधिक लोगों की जमात में नमाज नहीं पढ़ रहे थे. मस्जिद से अजान सुनने के बाद वे लोग घर में नमाज पढ़ रहे हैं. ”

अंसारी ने इस बात पर भी जोर दिया कि मुस्लिम समुदाय अजान के कारण सामाजिक दूरी के मानदंडों का उल्लंघन नहीं कर रहा. "इस्लाम का इससे भी बेहतर संकट प्रबंधन है," उन्होंने तर्क दिया. अंसारी ने पैगंबर मोहम्मद के जीवन की एक घटना सुनाई, "पैगंबर के जीवन में एक मिसाल मिलती है कि जब लोगों को मस्जिद जाने में मुश्किल हो रही थी तो पैगंबर ने अपने मुअज्जिन को अजान में दो आयातें शामिल करने का आदेश दिया और लोगों से घरों में नमाज पढ़ने के लिए कहा. पैगंबर ने एक रास्ता दिखाया था कि अगर जीवन में कोई संकट की स्थिति आती है तो घर पर नमाज पढ़ना बेहतर है. ”

हाथरस के जिला मजिस्ट्रेट प्रवीण कुमार लक्षकार ने बताया कि अजान पर प्रतिबंध लगाने का आदेश ऊपर से आया था. "ऊपर से का क्या मतलब है?" मैंने पूछा. "मुख्यमंत्री," कुमार ने जवाब दिया. आदित्यनाथ के कार्यालय ने इस बारे मेरे फोन कॉल और ईमेल का जवाब नहीं दिया.