70 साल बाद उम्मीदों पर कितना खरा उतरा भारतीय संविधान

संविधान को लागू करने के जिम्मेदार संविधान सभा के सदस्य. इनमें मुख्य रूप से हिंदू और उच्च जाति के पुरुष थे.
बर्ट हार्डी/पिक्चर पोस्ट/गैटी इमेजिस
संविधान को लागू करने के जिम्मेदार संविधान सभा के सदस्य. इनमें मुख्य रूप से हिंदू और उच्च जाति के पुरुष थे.
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वह कौन सी बात है जो भारत को सबसे अलग देश बनाती है? अन्य किसी देश में भारत जितनी धार्मिक, भाषाई और जातीय विविधताएं नहीं हैं. कुछ एक पश्चिम यूरोपीय और नई दुनिया के देशों में ही भारत जितनी नस्लीय विषमता पाई जाती है. विषमता का कारण औपनिवेशिक दौर की गुलामी, दास व्यापार, एक स्थान से दूसरे स्थान में पलायन और आजादी मिलने के बाद वैश्विक दक्षिण से उत्तर की तरफ विस्थापन रहा है. यहां के समुदायों में शुद्धता और अशुद्धता की धारणाओं पर आधारित व्यवस्था व्यापक रूप से विद्दमान हैं यानी नातेदारियों में बंधा समाज, ऊंच-नीच की जन्मना मान्यता और सहगोत्रीय विवाह. जाति व्यवस्था जैसी भीषण ऊंच-नीच की मान्यता दुनिया में और कहीं मौजूद नहीं है.

ऐसा नहीं है कि औपनिवेशिक शासन में मात्र भारत ने ही उदार-लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था को चयन किया था. फिर भी, इसका क्षेत्रीय विस्तार, जनसंख्या, सामाजिक विविधता और आर्थिक पिछड़ेपन की व्यापकता ने इसे दूसरे लोकतांत्रिक देशों से अलग बना दिया है. पश्चिम में औद्योगिक और आर्थिक उन्नति के लंबे समय बाद सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार का विस्तार महिलाओं तक हुआ. इससे बेहद अलग परिस्थितियों में भारत ने लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित एक राजनीतिक ढांचा खड़ा किया है. अगर आपातकाल के 21 महीनों को छोड़ दें तो इसने अच्छा काम किया है और इसकी एक वजह संविधान है. 1950 में लागू होने के बाद से ही इसे खूब प्रशंसा मिली है.

लेकिन अब लगभग 70 साल बाद जब देश में हो रहे आम चुनावों में संघ परिवार के एक हिस्से के सत्ता में लौटने का डर है. संघ ऐसा संगठन है, जिसने अपनी बातों और कामों से संविधान में मौजूद उदारवादी तत्वों के प्रति विरोध प्रकट किया है. ऐसे में यह समय है जब गणतंत्र के मूलभूत चार्टर पर आलोचनात्मक बहस की जाए.

संविधान अपनी आकांक्षाओं पर कितना खरा उतरा है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसमें सांस्कृतिक और अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा के लिए क्या है?

संविधान का मूल्यांकन, मूल्यांकन करने वाली राजनीतिक मान्यतों से प्रभावित होता है. उदारवादियों या समाजवादी लोकतंत्रों के उलट मेरा मानना ​​है कि एक अधिक न्यायपूर्ण, समतावादी, लोकतांत्रिक और पारिस्थितिक रूप से स्थायी देश और दुनिया, केवल पूंजीवाद और इससे संबंधित राजनीतिक ढंचों के मिट जाने से आ सकती है. मेरा मानना है उदार लोकतंत्र की भी एक सीमा है जो उपरोक्त प्रकार की दुनिया और देश के निर्माण में बाधक है. मेरे लिए यह दिवास्वपन ही है कि आज का नवउदारवादी पूंजीवाद और उसके तई मिलने वाली आजादी और सामाजिक लाभों को शनै: शनै: विस्तार दिया जा सकता है और धन और शक्ति की असमानता को बड़े स्तर पर कम किया जा सकता है.

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