रणवीर सिंह : नए सितारे की चमक

साभार : बीसीसीएल
साभार : बीसीसीएल
19 March, 2019

भोपाल के मेरियट होटल के अहाते में शोरशराबे के बीच, रणवीर सिंह के दरवाजे के बाहर मैं अन्य दर्जन भर लोगों के साथ खड़ी थी. यह नवंबर के अंत की बात थी और सुबह के 10 बजने वाले थे. रणवीर मुंबई से -सुबह की फ्लाइट से कुछ ही घंटे पहले पहुंचे थे. मैंने उन्हें हवाई जहाज में गर्दन के तकिये के साथ, ट्रैकसूट में देखा था. एक रात पहले ही उनके मैनेजर ने मुझे बताया था कि “वे कत्तई भी सुबह जल्दी उठने वाले आदमी नहीं हैं.”

हवाई जहाज में, फिल्मी सितारे की मौजूदगी ने बाकि के यात्रियों में कौतुहल मचा दिया था. दो लड़कियों पर तो दीवानगी इस कदर हावी हुए जा रही थी कि उन्होंने रणवीर के बॉडीगार्ड से उनके ऑटोग्राफ के लिए मिन्नतें करना शुरू कर दी. मेरी बगल में बैठे, एक अधेड़ उम्र के आदमी ने मुझसे जानना चाहा कि क्या कोई फिल्मी सितारा भी फ्लाइट में उनके साथ सफर कर रहा है? मैंने रणवीर का नाम लिया और मिलिट्री स्टाइल की नीली टोपी, जैकेट, रंगीन मैडल और तमगों के साथ बड़ा सा चश्मा पहने अखबार में उनकी छपी फोटो दिखाई. आदमी ने फोटो पर सरसरी नजर दौड़ाई और अखबार मुझे वापस थमा दिया.

सुबह की रोशनी में धूप का चश्मा लगाए, जब वे एयरपोर्ट पर उतरे तो उनका बहुत जोर-शोर से स्वागत किया गया. प्रशंसकों ने उन्हें चारों तरफ से घेर लिया. मुंबई से कैमरा टीम उनके साथ आई थी, जो लगातार शूट किए जा रही थी. टर्मिनल से बाहर निकलकर सिंह कार में बैठ कर वहां से चल दिए. इस छोटे से प्रकरण ने, मौजूद लोगों के बीच खासी जिज्ञासा जगा दी थी. उनके वहां से निकलते ही सब अपने-अपने मोबाइल फोन पर तस्वीरें चेक करने लगे. सिंह के साथ आए उनके असिस्टेंट, कन्वेयर बेल्ट पर उनके सामान आने का इंतजार करने लगे. मुबई के मौसम की माफिक उन्होंने हलके-फुल्के गर्म कपड़े डाले हुए थे और अब भोपाल की सर्दी में वे बेतरह ठिठुर रहे थे.

सिंह के सहायकों और उनके मेक-अप मैन के साथ, मैं होटल पहुंची. दो घंटे बाद, मैं भी उनके कमरे के सामने जुटे इवेंट मैनेजर, मार्केटिंग के लोग, रिपोर्टर्स और बाकि के काफिले के साथ शामिल हो गई. ये सभी बॉलीवुड की प्रचार मशीन का हिस्सा थे. इस हलचल के केंद्र में, गले में प्लास्टिक के बैज पहने युवा लड़के-लड़कियों की एक छोटी सी टोली अपने स्मार्टफोन और लैपटॉप के साथ दिन के कार्यक्रम के इंतेजामातों में जुटी थी.

मुझे एक तुड़ामुड़ा सा कागज थमाया गया. ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित फिल्म, बाजीराव मस्तानी, जो कुछ ही हफ्तों में रिलीज होने वाली थी, के प्रचार के लिए सिंह भोपाल आए थे. उक्त फिल्म, अट्ठारवीं सदी में मराठा साम्राज्य के पेशवा, बाजीराव (रणवीर सिंह) और बुंदेलखंड की आधी मुसलमान राजकुमारी, मस्तानी (दीपिका पादुकोण) की मशहूर प्रेम कहानी पर आधारित है. भोपाल में सिंह का पूरा दिन, कार्यक्रमों से पटा पड़ा था. पहले उन्हें मीडिया और “पार्टनर” के कई समूहों को इंटरव्यू देने थे. उसके बाद उन्हें प्रेस कांफ्रेंस में हिस्सा लेना, एक स्थानीय प्रतिस्पर्धा के विजेताओं को पुरस्कार बांटना, सबसे महत्वपूर्ण कार्यक्रम “मल्हारी” गाने का लोकार्पण करना और पास के मॉल में विजय यात्रा भी निकालनी थी. इस गाने को फिल्म की प्रचार सामग्री में, विजय-गान के रूप में प्रस्तुत किया गया था. इस बात की बहुत कम उम्मीद की जा रही थी कि सिंह मॉल या होटल से बाहर कहीं और भी जाएंगे क्योंकि उन्हें शाम चार बजे की फ्लाइट से मुंबई वापस लौटना था.

कुछ चुनिंदा लोगों का उनके कमरे में आना-जाना जारी था. कमरे के बाहर उनका बॉडीगार्ड, सहायकों और मेक-अप मैन से बातें कर रहा था. हर दूसरे पल, कॉरिडोर लोगों से खचाखच भर जाता और इंतजाम में लगे कर्मचारी उन्हें कांच के दरवाजे के दूसरी तरफ बने रेस्टोरेंट में ले जाते. जब भी दरवाजा खुलता, अंदर से आवाजें आने लगतीं : “यह संस्करण बंद हो जाएगा...बॉस, मेरे लिए हर चीज जरूरी है...उन्हें तैयार तो होने दो.” जैसे-जैसे वक्त बीतता जा रहा था, इन आवाजों में कठोरता और आग्रह बढ़ता जाता था. एक समय पर, मैंने झुंझलाहट भरी आवाज सुनी, “अरे, नहा रहा है, न.”

आखिरकार, सिंह के मैनेजर ने दरवाजा खोला और हममें से कुछ लोगों को अंदर आने का इशारा किया. मैं अंदर दाखिल हुई तो लैपटॉप से लगे एक पोर्टेबल स्पीकर से तेज थाप वाला संगीत गूंज रहा था. सिंह ने सफेद कुर्ते के ऊपर चमकीले, बूटेदार गहरे नीले और भूरे रंग का फ्रॉककोट और नीचे नीले रंग का चूड़ीदार पाजामा पहना हुआ था. वे धूप का चश्मा भी लगाए हुए थे. उनके छोटे बालों, सर पर चोटी तथा मूंछों पर रोबीले बांकों की तरह मोम की पोलिश लगी थी. जब हम अंदर दाखिल हुए तो वे संगीत की धुन पर थिरक रहे थे और हवा में घूंसे चला रहे थे. “वूहहह,” कैमरे के नजदीक आकर उन्होंने हुंकार भरी, जो उनकी हर हरकत को रिकॉर्ड कर रहा था. “य्याहह्ह्ह!”

संगीत धीमा होते ही वहां जमा रिपोर्टरों ने, सिंह की “अप्रत्याशित ऊर्जा” और उनके डैशिंग दिखने की तारीफ की. रेडियो चैनल की एक टीम उनकी तरफ बढ़ी और अपने रिकॉर्डर ऑन कर दिए. एक ने उनसे हिचकते हुए पूछा, “क्या हम इंटरव्यू शुरू कर सकते हैं?” सिंह का जवाब आया, “जरूर.”

बाजीराव मस्तानी और उन्हें भोपाल कैसा लगा जैसे सवालों के बाद, रिपोर्टर ने उनसे पूछा, “आपकी जीवनी की पहली पंक्ति क्या होनी चाहिए?” सिंह ने कुछ देर सोचने के बाद जवाब दिया, “वह एक अच्छा इंसान था.” रिपोर्टर इस जवाब से बहुत मुतास्सिर हुआ और उसके मूंह से अनायास ही निकला, “वाह...अच्छा अब हमें कुछ एंडोर्समेंट चाहिए होंगे.”

मैं इंटरव्यू देते सिंह को देखती रही, जिनमें वे हर नए रेडियो चैनल के लिए कहते : “हाय, मैं हूं रणवीर सिंह और आप मुझे सुन रहे हैं...” उन्होंने अपने कपड़ों से संबंधित और बाजीराव के किरदार के लिए अपना सर मुंडाने को लेकर पूछे गए सवालों के भी जवाब दिए. एक पत्रकार ने उनसे पूछा, हमें उस पल के बारे में बताइए जब उस्तरे ने आपके बालों को छुआ. इस दौरान, वे लगातार खिड़की के बाहर देखते रहे और रिपोर्टरों से आंख नहीं मिलाई. “यहां कितनी हरियाली है.” कई रिपोर्टरों ने उन्हें उपहार दिए जिनमे न्युटेला के डिब्बों से लेकर भोपाल के मशहूर कपड़े के बटुओं तक शामिल थे. “वाह, बहुत खूब,” बटुओं को बारीकी से परखते हुए सिंह ने कहा. और फिर, “यह क्या है?” वे लगातार ब्लैक कॉफी की चुस्कियां लेने में मशगूल थे. विजय यात्रा के दौरान उनके द्वारा बोले जाने वाले शब्दों की नकल करने की भी गुजारिश की गई, “आदाब भोपाल, सलाम भोपाल, आके मिलियो.”

जब सारे इंटरव्यू खत्म हो लिए तो सिंह, कैमरा क्रू की तरफ दुबारा मुड़े. “आप लोग रिकॉर्ड कर रहे हैं, ना?” कैमरे के पीछे बैठी लड़की से उन्होंने पूछा. “ट्रिपल स्पीड, बेबी...ट्रिपल स्पीड,” उन्होंने चुटकी बजाते हुए कहा. “मेरे साथ तुम्हे ट्रिपल स्पीड से काम करना पड़ेगा.”

करीब बीस मिनट बाद, जब वे कमरे से बाहर निकले तो सामने उनका इंटरव्यू लेने के लिए एक और पत्रकार खड़ी थी. उस वक्त वे उससे बात नहीं कर पाए इसलिए उन्होंने उसके गले में बांह डाल दी और खचाखच भरे कॉरिडोर में लोगों को इधर-उधर छितराते हुए अपनी टीम के साथ तेजी से आगे बढ़ने लगे. “तेज, तेज,” उन्होने कहा, “हम ऐसे ही काम करते हैं.”

रणवीर के लिए 2015 का अंत बहुत निर्णायक था. बॉलीवुड में उन्हें पांच वर्ष हो चुके थे और उन्होंने अभी-अभी 30 की उम्र को छुआ था. इससे पहले जिन सात फिल्मों में उन्होंने हीरो का किरदार निभाया, उनमें उनका रिकॉर्ड व्यावसायिक और आलोचनात्मक दृष्टि से अनियमित ही रहता आया था. एक ऐसे उद्योग, जहां युवा टैलेंट के लिए खुद को स्थापित करना इतना आसान नहीं होता, उसी उद्योग में अपनी मजबूत जगह बनाने की जद्दोजेहद में वे लगे थे.

अपनी पहली ही फिल्म, बैंड बाजा बारात से वे गुमनामी के अंधेरे से अचानक मशहूरी की चकाचौंध रोशनी में आ गए. फिल्म में उन्होंने, पहले से ही अपनी धूम के झंडे गाड़ चुकी, अनुष्का शर्मा के साथ काम किया था. उस वक्त दस करोड़ रुपए की लागत से बनी यह कोई महंगी फिल्म नहीं थी, लेकिन इसका निर्माण यशराज फिल्म्स स्टूडियो ने किया था. फिल्म न केवल, बॉक्स ऑफिस पर अत्यंत सफल रही बल्कि इसकी सफलता, आंकड़ों के हिसाब किताब से कहीं आगे निकल गई.

यह एक रोमांटिक कॉमेडी थी, जिसमे सिंह ने छोटे शहर के एक ऐसे नौजवान का किरदार निभाया था, जो बड़े शहर में ‘कुछ’ करके दिखाना चाहता है. इसने विश्लेषकों और दर्शकों, दोनों का दिल जीत लिया. फिल्म को अपने समय के निर्धारक छायाचित्र के रूप में आज भी याद किया जाता है. इस शानदार शुरुआत के साथ, सिंह ने 2011 में एक औसत दर्जे की सफलता हासिल करने वाली लेडीज वर्सिज रिक्की बहल में काम किया. यह भी एक रोमांटिक कॉमेडी थी. जुलाई 2013 में, उनकी अगली फिल्म लुटेरा आई. इस फिल्म ने उन्हें अपनी अभिनय क्षमता के विस्तार को शालीनता और गहनता के साथ निभाने का मौका दिया. 1950 के बंगाल की पृष्ठभूमि में बनी इस दु:खांत प्रेम कथा को बहुत सराहा गया, लेकिन बॉक्स ऑफिस पर यह कुछ खास कमाल नहीं कर पाई. कम बजट वाली फिल्मों में सिंह एक अच्छे कलाकार के रूप में तो शोहरत बटोर रहे थे, लेकिन बड़े स्टेज पर खुद को साबित करना अभी बाकि था.

उसी साल नवंबर में रिलीज होने वाली गोलियों की रासलीला राम-लीला ने इसको भी बदल डाला. यह फिल्म एक विस्तृत और महंगा निर्माण थी, जिसमे सिंह के बरक्स फीमेल लीड में सितारों की दुनिया में शीर्ष पर आसीन, दीपिका पादुकोण को रखा गया था. धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के आरोपों और विरोध प्रदर्शनों तथा कोर्ट केसों के बावजूद, फिल्म बॉक्स ऑफिस पर हिट रही. यह सिंह के फिल्मी करियर की सबसे बड़ी हिट थी. इसने सौ करोड़ से ज्यादा की कमाई की और कई पुरस्कार अर्जित किए. पर्दे पर, सिंह और पादुकोण की केमिस्ट्री की भी खूब तारीफ हुई. सिंह की गिनती अब उन सितारों में होने लगी थी, जो केवल एक शानदार एक्टर ही नहीं थे, बल्कि एक ऐसे एक्टर भी थे जिन पर बॉक्स ऑफिस पर धमाल करने के लिए भी भरोसा किया जा सकता था.

अगले दो सालों में, यह उत्साह ठंडा पड़ चुका था. 2014 में आई दो फिल्में, गुंडे और किल दिल कुछ खास असर नहीं छोड़ पाईं. 2015 के मध्य में, वे फिर से एक टूटते अमीर परिवार को लेकर बनी रोमांटिक कॉमेडी, दिल धड़कने दो में दिखे. इस फिल्म ने सम्मानजनक बिजनेस किया. परिवार के युवा बेटे के रूप में, सिंह के किरदार की भूरी-भूरी प्रशंसा हुई, लेकिन फिल्म की सफलता का श्रेय सभी सशक्त कलाकारों में वितरित हो गया. उस साल रिलीज होने वाली, बाजीराव मस्तानी उनकी एकमात्र फिल्म थी और सिंह को एक जबरदस्त हिट की तलाश थी.

बाजीराव मस्तानी, बिना शुबाह उनका अब तक का सबसे बड़ा दांव और परीक्षा थी. 120 करोड़ की लागत से बनी इस फिल्म का जब प्रीमियम हुआ, तो ये भारत में अब तक की सातवीं सबसे महंगी फिल्म थी. सिंह को एक ऐसी फिल्म के लिए चुना गया गया था, जिसके लिए करीब एक दशक पहले सुपर स्टार सलमान खान का चुनाव हुआ था. इस फिल्म के लिए पादुकोण और प्रियंका चोपड़ा जैसे शीर्ष सितारों की सूची में, वे सबसे कम भरोसेमंद कलाकार थे. सिंह ने इस फिल्म के लिए पूरे साल कड़ी मेहनत की और शूटिंग के दौरान कई चोटों को भी सहा. मीडिया की मानें तो उन्होंने इसके लिए अपने मेहनताने को भी कम कर दिया था. यह नहीं मालूम कि कितना. और बदले में फिल्म के मुनाफे में हिस्सेदारी की मांग रखी. वित्तीय नुकसान को अगर एक पल के लिए अलग भी रख दें तो भी फिल्म के असफल होने पर बॉलीवुड का भरोसा उन पर से पूरी तरह टूट जाता. दांव पर बहुत कुछ लगा था.

जब मैं सिंह से मिली, वे बाजीराव मस्तानी के प्रमोशन के लिए 12-12 घंटे कड़ी मेहनत कर रहे थे. हर बातचीत के अंत में, वे गुजारिश करते, “प्लीज, इस फिल्म को जरूर देखिएगा. हम सभी ने इसमें बहुत मेहनत की है.” पांच हफ्तों तक चलने वाले इस यात्रा क्रम में, जो उन्हें मुंबई के उनके अड्डे से पूरे देश के भ्रमण पर ले जाने वाला था, भोपाल उसमें एक पड़ाव भर था. सिंह के कमरे के बाहर कॉरिडोर में, मैंने कई आयोजकों से पूछा कि गाने के लांच के लिए भोपाल को ही क्यों चुना गया? “क्योंकि मेरा मानना है, यह पेशवाओं के लिए बहुत जरूरी शहर था,” एक युवा ने बिना अपने फोन से सर उठाए अपनी राय व्यक्त की. उसकी बला से हम कहीं और भी हो सकते थे.

आज के बॉलीवुड में ख्याति दिलाने वाले प्रचार तामझाम के साथ, सिंह को सड़कों पर देखना मेरे लिए किसी सीख से कम नहीं था. बाजीराव मस्तानी के रिलीज से कुछ दिन पहले फिल्म पत्रकार और आलोचक अनुपमा चोपड़ा ने फेसबुक पर लिखा, “इस हफ्ते जो मैंने सबसे हैरतअंगेज बात सुनी वह थी कि बाजीराव मस्तानी की प्रचार टीम पर एक करोड़ रूपया खर्च किया जा रहा है.” उन्होंने आगे लिखा, “जिसका मतलब है कि निर्माता, फिल्म के प्रचार के लिए प्रमुख कलाकारों के हेयरस्टाइल, मेक-अप, सुरक्षा, स्टाइलिस्टस और स्टाफ को इतनी बड़ी रकम मुहैय्या करवा रहे हैं....” भारत में, फिल्मी सितारे की चमक-धमक बनाए रखना आज एक दर्शनीय खेल बन चुका है. ये सितारे आज ब्रांड बन चुके हैं, जिन्हें चौबीसों घंटे अपनी सार्वजनिक छवि को लेकर चौकन्ना रहना पड़ता है. इनके हर तरफ कैमरे मौजूद रहते हैं, इन्टरनेट पर फौरन तस्वीरें लोड हो जाती हैं और खराब बालों के साथ एक दिन भी दिखना, खासा भारी पड़ सकता है, क्योंकि वह छवि हमेशा के लिए नेट पर रहने वाली है. इसका सीधा मतलब हुआ कि एक सितारे को हमेशा, हर वक्त सुंदर, आकर्षक दिखना जरूरी है. “आप एक बार भी बुरे लगे,” टैलेंट मैनेजर ने बताया, “और मीडिया आपकी धज्जियां उड़ा देगा.”

बैंड बाजा बारात की स्वप्निल शुरुआत और लुटेरा में बतौर बेहतरीन एक्टर खुद को स्थापित करने के बाद ही सिंह को व्यावसायिक रूप से महत्वकांक्षी प्रोजेक्ट में आजमाया गया.

जितना समय मैंने उनके साथ गुजारा, सिंह ने खुद को हमेशा एक मिलनसार सितारे के रूप में पेश किया. यहां तक कि उनसे छोटी से छोटी बातचीत भी गर्मजोशी से भरी होती और वे कभी भी अपने आसपास के लोगों की तारीफें करने से नहीं चूकते. उनके मूंह से निकले हर वाक्य के बीच में व्हूप्स, हाई फाइव और बंद मुट्ठी से अभिवादन शामिल होता. वे हाथ मिलाने या हवा में चुंबन देने की बनिस्पत, गले मिलना और गालों पर चुंबन देना ज्यादा पसंद करते. वे लगातार और बहुत सजीव एवं सहज भाव से खुद को सबका दोस्त और एक बढ़िया इंसान के रूप में प्रस्तुत करते रहते.

लेकिन सिंह के आकर्षण में एक धार भी है. इसका बहुत कुछ लेना-देना उनकी ड्रेस सेंस से है. हर कपड़े को वे पूरे आत्मविश्वास के साथ पहनते हैं, चाहे वे उत्कृष्ट किस्म के सूट हों या सुपर मारिओ कॉस्ट्यूम. उनके अंदाज ने, आभासी कुटीर उद्योगों को जन्म दिया है : “रणवीर सिंह बॉलीवुड के फैशन आइकॉन” या “रणवीर के शर्मसार कर देने वाले फैशन के पल” जैसे टाइटल के साथ. पीआर एजेंसी की देखरेख में हासिल की गई इस पूर्णता और महंगे लेकिन नीरस समकालीनों के बीच, इसने सिंह के चारों तरफ जोखिम भरा और अस्थिरता का आभामंडल बना दिया है.

फिल्म के पर्दे के बाहर, मीडिया के सामने भी उनके इस अंदाज ने इसमें इजाफा किया है. 2014 में, वे कंडोम के विज्ञापन में दिखाई देने वाले पहले प्रमुख बॉलीवुड सितारे बने, जो सांकेतिक रूप से यौन उत्तेजना जगाने वाला एक म्यूजिक विडियो था. उसी साल दिसंबर में उन्होंने कॉमेडियन द्वारा अपना मजाक उड़वाने के लिए खुद को दर्शकों के सामने प्रस्तुत किया. जब इस शो का वीडियो वायरल हुआ तो सिंह समेत इसके आयोजक और इसमें हिस्सा लेने वाले लोगो ने खुद को कानूनी जंजाल में फंसा पाया. उनका अब तक का पेशेवर सफर, एक लिहाज से नए तरीके के अतिरंजित बॉलीवुड स्टार बनाने वाला रहा है. वे नए नियम रचने के लिए न सही, लेकिन बने बनाए नियमों को अपनी तरह से ढालने और उन्हें तोड़ने-मरोड़ने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं. उनकी अब तक की सफलता को देखकर लगता है, वे इसमें जरूर कुछ तो सही ही कर रहे होंगे. पिछले साल के अंत तक उनकी गिनती, फिल्म उद्योग के दस सबसे महंगे कलाकारों में होने लगी थी.

जो लोग सिंह को बॉलीवुड में उनके शुरुआती दिनों से जानते हैं उन्हें मालूम है कि वे अपने काम को लेकर हमेशा ऊर्जा से लबरेज रहते हैं. बॉलीवुड में काम करने वाले एक शख्स ने बताया कि असिस्टेंट डायरेक्टर से शुरुआत करने वाला यह नौजवान “अपने म्यूजिक और डांस के साथ पार्टियों में आ धमकता और सबका मनोरंजन करने लगता था. वह वहां पर ऐसे दिखाता मानो कोई ऑडिशन दे रहा हो.” आज इतनी सफलता हासिल करने के बाद भी उसमे वही ऊर्जा है. उन्होंने बताया, “मैं जब भी उन्हें देखता हूं तो सोचता हूं कि वे अभी भी ऑडिशन दे रहे हैं – “आज भी वे प्रदर्शन के लिए लालायित रहते हैं; वे पूरी संजीदगी से लोगों का प्यार पाना चाहते हैं.”

मैं सिंह से पहली बार नवंबर के मध्य में मिली. वे अभी-अभी मुंबई के सबअरब्स में अंधेरी स्थित यशराज फिल्म्स के स्टूडियो के अंदर बाजीराव मस्तानी की शूटिंग से फारिग हुए थे. जब मैं तयशुदा समय पर उनसे मिलने पहुंची तो वे अलग-अलग टीमों के साथ मीटिंगों में व्यस्त थे. मैं शीशे के बने कैबिन के बाहर, फोयर में उनका इंतजार करने लगी. बीच में उन्होंने केबिन से ही धुंधले शीशे की दीवार में साफ दिखने वाले हिस्से से बाहर झांका. दीवार पर चेहरा सटाकर उन्होंने मछलियों जैसा मूंह बनाया और उंगलियां उठाकर “दो मिनट” का समय मांगा. मीटिंग अभी जारी ही थी कि मैंने देखा, वे बैचैनी में पांव से अपनी चप्पलें हिला रहे हैं और ऊंगली में उलझा कर अपने बालों के छल्ले बना रहे हैं. वे ज्यादा देर तक स्थिर नहीं रह सकते थे. उनसे मिलने वाले कुछ और लोग पास ही बैठे थे और उनकी मूंछों पर चर्चा कर रहे थे. “शर्त लगा लो फिल्म के रिलीज के एक दिन बाद, वे अपनी मूंछें साफ कर लेंगे,” एक नौजवान ने ऐलान किया. “अगले दिन जो भी हो, वे मूंछें मुंडा कर ही छोड़ेंगे,” उसने अपनी बात को और जोर देकर कहा.

सिंह को बाहर आने में दो मिनट से ज्यादा ही लगे, लेकिन आखिरकार वे नमूंदार हुए और मेरी तरफ बढ़ने लगे. नजदीक आने पर वे मुझे अपनी ऑनस्क्रीन इमेज के मुकाबले, कदकाठी में ज्यादा हल्के और गिट्ठे नजर आए. मेरी अपेक्षा के बिलकुल उलट. मैंने हाथ मिलाने के लिए हाथ आगे बढ़ाया लेकिन उन्होंने मुझे झप्पी दे दी.

कुछ ही मिनटों में, हमें एक कैबिन में ले जाया गया. मैंने उनसे सवाल पूछना शुरू किया. उन्होंने मेरा रिकॉर्डर हाथ में उठाया और कमरे में अर्धगोलाकार घूमते हुए उसमे बोलना शुरू कर दिया. मैं उनके घूमने के मुताबिक अपना सर लगातार बायें से दायें और दायें से बायें घुमाए जा रही थी, मानो धीमी गति से टेनिस बॉल को नेट के इधर-उधर जाते देख रही हूं.

रणवीर सिंह भवनानी, पश्चिमी मुंबई में बांद्रा के पास, खार नामक जगह पर एक संपन्न परिवार में अपनी बड़ी बहिन के साथ पले-बड़े. उनके पिता जगजीत सिंह एक व्यवसायी हैं, जो ऑटोमोटिव पार्ट्स का फुटकर व्यापार करते हैं. “लेकिन वे कभी भी एक ही बिजनेस के साथ नहीं बंधे रहे,” सिंह ने मुझे बताया. “उन्होंने लैदर, हॉस्पिटैलिटी और मेडिकल बिजनेस में भी हाथ आजमाया. हमेशा धक्कमपेल में लगे रहना मैंने उन्ही से सीखा है. आप हर समय एक ही चीज नहीं करते रह सकते. कई चीजें एक साथ चलती रहनी चाहिए.”

सिंह ने बताया बचपन में “मैं टीवी के सामने बैठने वाला मोटू-गोलू बच्चा हुआ करता था – एक फिल्मी कीड़ा. असल में मुझमें मनोरंजन का जूनून सवार था. जो भी मेनस्ट्रीम था, मैं उसका कंज्यूमर था.” वे अपना समय उस वक्त की हिट फिल्में देखने में बिताते – शहंशाह से लेकर हम और रामलखन से लेकर रैम्बो तक. लेकिन “मैं पिटी हुई फिल्में भी देखा करता था,” उन्होंने याद करते हुए बताया. “मेरी नानी के पड़ोस में एक के पास अंदर बाहर फिल्म की वीएचएस टेप थी. मैंने उस फिल्म को इतनी बार देखा कि मुझे गिनती भी याद नहीं.”

जब सिंह फिल्में नहीं देख रहे होते थे तो वे बॉलीवुड एक्टरों के बारे में फिल्मफेयर और सिने ब्लिट्ज जैसी पत्रिकाओं को पढ़ते रहते या अपनी पसंदीदा फिल्मों के दृश्यों की नकल उतारते रहते. “कभी मैं हम का टाइगर बन जाता, तो कभी कंबल लपेट कर शहंशाह. इन किरदारों को निभाने वाले एक्टरों का मैं दीवाना हुआ करता था.” इसी दौरान, भारत में केबल टीवी का आगमन हुआ और “इसने मेरी जिंदगी ही बदल डाली,” उन्होंने कहा. केबल टीवी ने सिंह का परिचय, अपने घर और शहर से बाहर की दुनिया से करवाया. खासकर अमरीकी फिल्मों और कार्यक्रमों से. वे उनके बोलने-चालने और चलने-फिरने के लहजे और ढंग से भी वाबस्ता होने लगे. जिस तरह उन्होंने हिंदी फिल्मों को आत्मसात किया था, उनको भी कर लिया.

बहुत जल्द उन्हें एहसास हो गया कि उनकी दिलचस्पी बॉलीवुड का हिस्सा बनने में है. एक बात उन्हें खासतौर पर याद है: जब वे अभी “चार या पांच साल के रहे होंगे,” उन्होंने कहा, वे अपनी दादी के साथ किसी की जन्मदिन पार्टी में गए. थोड़ी देर बाद “दादी पार्टी में बुरी तरह से बोर होने लगी.” उस समय हम फिल्म का गाना जुम्मा चुम्मा दे दे, देश भर में धूम मचा रहा था और तभी यह गाना बज उठा. अपनी दादी का प्रोत्साहन पाकर, सिंह इस गाने पर थिरकने लगे. “शुरू में सिर्फ वहां हम दोनों ही थे; और वे ताली बजा रहीं थीं. फिर अचानक किसी का ध्यान हमारी तरफ गया कि कोने में एक मोटू-गोलू बच्चा, जुम्मा चुम्मा गाने पर नाच रहा है. एक-एक करके वहां मजमा लगने लगा. म्यूजिक का वॉल्यूम तेज कर दिया गया और अचानक सभी मेहमान वहां जमा हो गए. सभी सीटियां और तालियां बजाने लगे.” पब्लिक में तारीफ पाने का यह सिंह का पहला अनुभव था. “मुझे लगा, ‘यह तो कमाल हो गया!’ तभी मैंने यह फैसला कर लिया कि मैं एक परफोर्मर बनूंगा. हालांकि उस वक्त इसे मैं न अभिव्यक्त कर पाया था, न पूरी तरह से समझ पाया था. लेकिन मैंने महसूस कर लिया था.” 

अपनी तमाम मिलनसारिता के बावजूद, सिंह अपने जीवन के कुछ वाकयों के बारे में बहुत प्राइवेट हैं.

सिंह ने स्कूल में अपनी पढ़ाई के दौरान अपने हुनर को निखारा. हर साल स्कूल के सालाना जलसे में वे आकर्षण का केंद्र बन जाते. “साल का वह दिन मेरे चमकने का होता,” उन्होंने गर्व के भाव से कहा. मैं अधिकतर नाटकों में प्रमुख भूमिका निभाता. नाच-गाने के रोल में भी मेरा अहम किरदार होता.” उन्होंने याद किया कि वे खेलकूद और पढ़ाई-लिखाई में भी ठीक-ठाक ही थे – “सिवाय मैथ्स के, जिसमे मैं हर साल फेल होता था” – लेकिन, “मैं अभिनय करने में बहुत लाजवाब था.”

फिल्मी सितारा बनने के अपने सपने के आगे सिंह को बहुत से रोड़े पड़े नजर आते थे. “जब मैं स्कूल में था तो इस उद्योग में भाई-भतीजावाद का बहुत चलन था,” उन्होंने कहा. “जब मैं अपने आसपास देखता तो मुझे चारों तरफ वही लोग दिखाई देते जो निर्माताओं या निर्देशकों के बेटे थे. ऋतिक रौशन, अभिषेक बच्चन, जायद खान – ये सभी बड़ी फिल्मी हस्तियों की औलादें थीं. यह भी तय था कि सबसे बेहतरीन मौके, इन्ही की झोली में जाएंगे.”

सिंह के परिवार के बॉलीवुड से दूर के संबंध थे. एक्टर अनिल कपूर की पत्नी, उनकी मां की रिश्तेदार थीं. जब सिंह बड़े हो रहे थे, कपूर अपने करियर के शिखर पर थे. “हम उन्हें पार्टियों में देखते और आहें भरते,” सिंह ने बताया. “मैं पूरी तरह से मंत्रमुग्ध था.” उन्होने आगे कहा, मुंबई में पलने-बढ़ने का मतलब था, “आप लोगों को तो जानेंगे ही. लेकिन कोई भी आपको मौका देने की गारंटी नहीं लेता था. यह बात मुझे 15 साल की उम्र में ही समझ आ गई थी. सो मैंने भी दिन में सपने देखना छोड़ दिया.”

स्कूल खत्म करने के बाद मौका तलाशने के दौरान, सिंह ने कॉपीराइटिंग में हाथ आजमाया. 2003 में, 18 साल की उम्र में वे विज्ञापन में अपना करियर बनाने के इरादे से अमेरिका रवाना हुए और वहां उन्होंने डिग्री हासिल करने के लिए इंडिआना यूनिवर्सिटी में दाखिला ले लिया. यहां उन्हें नई-नई बातें और सिनेमा के अलग स्टाइल के बारे में पता चला. “मैंने पहली बार टैक्सी ड्राइवर देखी और इसने मेरी जिंदगी बदल डाली,” उन्होंने कहा. “”मुझे लगा, अरे वाह! ऐसी भी पिक्चर बनती है?”

फिल्मों की अपनी भूख मिटाने के लिए, सिंह ने कैंपस परिसर में किराए पर फिल्में मुहैया कराने वाली लाइब्रेरी में काम खोज लिया. “धंधा बहुत मंदा था,” उन्होंने कहा, “सो मेरा ज्यादातर वक्त एपोक्लिप्स नाउ, स्केयरफेस, तथा कुब्रिक की फिल्में देखने में व्यतीत होता और इससे मेरी कमाई भी हो जाती.”

शुरू में, सिंह का इरादा ग्रेजुएशन के बाद शिकागो या न्यू यॉर्क में कुछ साल काम करने के बाद मुंबई लौटने का था. लेकिन दूसरे ही साल, जब सेमेस्टर की शुरुआत से पहले उन्हें अपना नाम पंजीकृत करवाने में देर हो गई तो उन्होंने पाया कि उनके सामने बेसिक लेवल एक्टिंग कोर्स करने का विकल्प अभी बचा था. लिहाजा, उन्होंने इसके लिए अपना नाम दे दिया.

इस कोर्से में, उन्होंने खुद को “अलग-अलग किस्म के लोगों के समूह के बीच पाया – उनमें अफ्रीकी मूल के अमरीकी, कोरियाई, अमेरिका के दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों तथा बिजनेस और डॉक्टरी पढ़ने आए छात्र भी शामिल थे.” पहली ही क्लास में, टीचर ने छात्रों से अपना परिचय देने की बजाए उनसे कुछ परफॉर्म करके दिखाने के लिए कहा. “किसी ने नाच कर दिखाया, किसी ने लतीफा सुनाया,” सिंह ने बताया, “सबकी फटी हुई थी.” जब उनकी बरी आई उन्होंने खुद से पूछा कि वे ऐसा क्या जानते हैं जिसे वे करके दिखा सकते हैं, “और यह एक दीवार फिल्म का एकालाप था.”

उन्होंने जैसे-तैसे अमिताभ बच्चन द्वारा बोली गई लाइन कमरे में मौजूद लोगों के सामने दोहरा दीं – ‘हम दोनों एक साथ इसी फुटपाथ से उठे थे, लेकिन आज तुम कहां रह गए और मैं कहां पहुंच गया.” किसी को कुछ समझ नहीं आया. जब वे बोल चुके तो, “सभी छात्रो ने धीरे-धीरे तालियां बजाईं. अपनी सीट पर वापस लौटते हुए जब सभी ने मेरी पीठ थपथपाई तो मुझे बरसों पहले पब्लिक में तारीफ पाने का स्वाद याद हो आया. मैंने सोचा, ‘यही तो मैं चाहता हूं! फक एडवर्टआइसिंग! फक कॉपीराइटिंग! मैं एक एक्टर बनूंगा.’”

उस शाम उन्होंने अपने पिता को फोन किया और अपने मंसूबे बता दिए. परिवार के सदस्य उनके साथ खड़े थे लेकिन सभी चाहते थे कि वे पहले अपनी पढ़ाई पूरी कर लें. सिंह ने बताया कि अगले दो सालों तक वे जितने एक्टिंग कोर्स कर सकते थे उन्होंने किए और सभी में “प्रवीणता हासिल” की. वे अपनी किस्मत आजमाने 2007 में मुंबई लौटे. “तो क्या हुआ अगर मेरे पास सफल होने का लाखों में सिर्फ एक मौका था? जब तक वक्त मेरे साथ है, मैं कोशिश करता रहूंगा.”

मैं एक होटल से दूसरे होटल, सिंह का पीछा करते हुए एक कांफ्रेंस हॉल में पहुंची जहां बहुत से रेडियो और कैमरा क्रू उनका इन्तेजार कर रहे थे. फोटोग्राफरों और कैमरामेनों का जत्था उनको घेरे खड़ा था. लोगों के भीड़ के बीच से मैंने, सवालों के जवाब देने के लिए उन्हें अपना आसन ग्रहण करते हुए देखा. होटल के कुछ कर्मचारी अपने-अपने मोबाइल फोन से उनकी तस्वीर लेने के लिए करीब आ रहे थे, लेकिन सिंह के सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें रोक दिया.

एक रिपोर्टर ने पूछा कि वे “मीडिया से हमेशा बाखुशी बातें करते हैं.” सिंह का जवाब था, “मुझे लोग पसंद हैं.” एक और शख्स ने उनसे सवाल किया, “क्या आप असल जिंदगी में भी वैसे ही हैं जैसे पर्दे पर दिखते हैं?” जिसके जवाब में वे बोले, “मुझे लगता है उदास रहना मेरी फितरत में है.” वे उन मोटिवेशनल ऑडियो बुक्स के बारे में यह बताने से पहले कि कैसे उन किताबों ने उनकी बाजीराव मस्तानी शूटिंग के दौरान कंधे पर लगी चोट से उभरने में मदद की, जब किसी ने उनसे अपनी पसंदीदा किताबें बताने के बारे में पूछा तो उनका कहना था, “जी, मैं किताबें नहीं पढ़ता.”

सभी क्रू मेंबर, सिंह के लिए ‘लोगो’ बने तोहफे छोड़ जाते. इस दौरान वे अपना धूप का चश्मा लगाए रहे. बीच में एक समय वे उठकर खिड़की की तरफ भी गए और कमरे में मौजूद लोगों की तरफ पीठ करके अपना मेक-अप ठीक करते रहे. करीब आधे घंटे के बाद, तमाम इंटरव्यू समेत सिंह कई रेडियो प्रोग्रामों और चैनेलों को एंडोर्स और 18 मग साइन कर चुके थे, जिनमे तरह-तरह के संदेश होते थे जैसे “विद लव, रणवीर.” काम खत्म होने तक वे भोपालवासियों के नाम नए वर्ष और क्रिसमस की शुभकामनाओं के संदेश भी रिकॉर्ड करवा चुके थे.

अब वे परेड के लिए तैयार थे. हम निकलने के लिए तैयार हो ही रहे थे कि किसी ने मेरे हाथ में “बाजीराव मस्तानी का क्रू” छपा पास थमा दिया. हम एलिवेटर में, उनके हट्टेकट्टे गार्डों से घिरे हुए चढ़े. तभी सिंह का सहायक भी उनके कमरे से उनका लैपटॉप और स्पीकर लिए कहीं से आ धमका. दरवाजा जब बंद हुआ तो सिंह ने हममें से किसी से कहा “मैं किसी भी जगह अपने थीम म्यूजिक के बगैर नहीं जाता.” वे कीबोर्ड की तरफ बढ़े. “असल में, यही सही वक्त है.”

तेज ताल के संगीत की धमक की तर्ज पर, सिंह एलीवेटर से बाहर निकले और अंधेरे कॉरिडोर में सर्विस एंट्रेंस से होते हुए, जो पार्किंग लॉट की ठंडी हवा वाले रास्ते से गुजरता है, चलकर गए, जहां से ताजे गोबर की तेज गंध आ रही थी. चार घोड़ों वाला एक सुनहरा रथ दरवाजे पर उनका इंतजार कर रहा था. रथ के पास ही बड़ी-बड़ी मूंछों वाले एक दर्जन दरबान अपने काठ के भाले लिए खड़े थे. उनके साथ 30 और लोग थे जो चटकीली पीली धोतियों में ढोल पीट रहे थे. हमारे सामने एक मॉल था, जिसके चारों ओर अलग-अलग ब्रांडों के बोर्ड चमक रहे थे; और नीचे पूरे इलाके में प्रोमिनेड फैला था. इसके मुहाने पर लगाए बेरिकेड के पीछे, एक बड़ी भीड़ जमा हो गई थी. भीड़ में से कुछ बेरिकेड तोड़कर अंदर घुस आए और सिंह के जितने आसपास हो सकता था खड़े हो गए. प्रोमिनेड के दूसरी तरफ एक खुला मंच बना था.

सिंह उस सुनहरे रथ पर सवार हो गए. सशत्र गार्डों से लैस रथ ने, ढोल की ऊंची होती ताल के साथ कूच किया. सिंह ने जैसे ही वहां जमा प्रशंसकों की तरफ अभिवादन में अपना हाथ हिलाया तो उन्होंने भी अपनी उत्साही गर्जना से उनका अभिवादन स्वीकार किया. उनको देखकर मुझे ऐसा लगा कि मानो उनको सैकड़ों की तादाद में जमा प्रशंसकों की तारीफ से असीम ऊर्जा मिलती हो. बेरिकेड के पार सड़क की दूसरी तरफ की छतों, पेड़ों और बिलबोर्डों पर बैठे फैंस के मुंह से अपना नाम सुनकर वे बड़े जोश में हाथ हिला-हिला कर उन्हें प्रसन्न और हवा में उन पर चुंबनों की बरसात कर रहे थे. सैकड़ों हाथों में, सैकड़ों स्मार्टफोन उनकी हर हरकत को रिकॉर्ड किए जा रहे थे. सामने स्टेज पर एक खूबसूरत एंकर, संतरी-सुनहरे रंग के लहंगा-चोली में उनको लुभाने वाली जुबान बोल रही थी. “बाजीराव जल्दी आओ, मत तड़पाओ,” भीड़ से भी तेज आवाज में वह जोर-जोर से गुहार लगा रही थी.

धीमे-धीमे बढ़ती हुई यात्रा खत्म होने के बाद, सिंह के रथ को स्टेज के पास रोक दिया गया. बॉडीगार्डों की एक कड़ी उनको प्लेटफॉर्म तक ले गई. उन्होंने दिल खोलकर एंकर की खूबसूरती में कसीदे और उसे फूल भेंट किया. उन्होंने छेड़खानी वाले लहजे में कहा, “ऐहे, शरमा गई!.” वे भीड़ को लुभा रहे थे. एंकर के चुटकीले सवालों पर शकीले स्वांग करने के बाद उन्होंने लोकल अंदाज में जमा प्रशंसकों को संबोधित किया. “भोपाल. क्या होरिया है?” इसके बाद उन्होंने सभी से फिल्म देखने की गुजारिश की.

एंकर के नेपथ्य में चले जाने के बाद, पीली धोती पहने कई डांसर स्टेज पर आ गए. सिंह ने उनके साथ नाचना शुरू कर दिया. वे मल्हारी गाने की एक ही धुन पर थिरक रहे थे. वहां न लाइट और ना कोई स्पेशल इफेक्ट दिया गया था. पुराने स्टाइल के स्टेज शो की तरह कोई धुंआ भी नहीं निकल रहा था. सिंह, डांसरों और तेज म्यूजिक के अलावा वहां कुछ नहीं था. सिंह उछलते-कूदते, तेजी से सर हिलाते, ताल से ताल मिलाते हुए हवा में हाथ हिलाते रहे.

म्यूजिक रुक गया और सहायक डांसरों की फौज स्टेज से नीचे उतर गई. उन्होंने एंकर और प्रशंसकों के साथ मजाकिया छेड़खानी शुरू कर दी. तमाशे के खत्म होने का समय आ गया था. लेकिन अचानक ही सिंह को कुछ और सूझा. वे दुबारा डांस करना चाहते थे. किनारे पर खड़ी, मैं देख रही थी कि आयोजक, सिंह की इस अनायास फरमाइश से सकते में आ गए और दुबारा संगीत शुरू करने की जुगत लगाने लगे. डांसरों को स्टेज पर जमा किया गया. सिंह ने फिर से नाचना शुरू कर दिया और प्रशंसकों ने भी इस अनापेक्षित शुरू हो गए तमाशे का भरपूर मजा लेना शुरू कर दिया.

और फिर करीब आधे घंटे बाद यह तमाशा भी खत्म हो गया. सिंह ने कार्यक्रम में आने के लिए प्रशंसकों का शुक्रिया अदा किया और बड़े प्यार से एंकर को स्टेज के किनारे तक छोड़ने गए. वहां माइक खराब होने पर एंकर की आयोजकों से झड़प हो गई. इस बीच सिंह, तेजी से मॉल में दाखिल हुए, जहां अगला इवेंट होना बाकि था. बॉडीगार्डस उन्हें लगातार उनके करीब आती भीड़ से बचाने में लगे थे. जब सिंह, मॉल के पिछले कॉरिडोर से निकलने लगे तो मैं भी कुछ आयोजकों के साथ एलीवेटर में घुस गई. कांच की लिफ्ट से नीचे झांकते हुए मैंने भीड़ की आवाजों की दिशा से आती, सिंह के कदमों की आहटों को महसूस किया.

उस दिन परेड शुरू होने से पहले की जा रही तैयारियां करते वक्त मैंने पार्किंग लॉट का चक्कर लगाया था. मूंछों वाले “गार्ड” और धोती पहने ढोल वाले वहां पहले से ही इवेंट के शुरू होने का इंतजार कर रहे थे. मुझे बताया गया कि मूंछों वाले लोग, अमूमन शादियों और रिसेप्शन पार्टियों में मंडप के गेट पर दरबान का काम करते हैं. जब मैंने पीली धोती पहने एक नौजवान डांसर से पूछा कि वह वहां किसलिए आया है तो उसका जवाब था: “हीरो आ रहा है.” मैंने पूछा कौन हीरो? उसके जवाब से यह भी अंदाजा लगाया जा सकता था कि आज रणवीर अपने सफर में कहां से कहां आ पहुंचे हैं; और यह भी कहा जा सकता था कि उन्हें अभी और कितना आगे आगे जाना है. उसका यह आत्मविश्वास से भरा जवाब था: “सलमान खान.” इस पर मजाक उड़ाते दोस्तों के ठहाकों से वे जरा भी विचलित नहीं हुए.

21 साल की उम्र में मुंबई में रहते हुए सिंह ने खुद को एक ऐसे संघर्ष के बीच पाया, जिसे उनके करियर का डीलक्स रूप भी कहा जा सकता है. जब इस दौर के बारे में मैंने उनसे बात करनी शुरू की तो उन्होंने साफगोई से स्वीकार कि अपने पांव जमाने में उनको एक लंबा समय भी लग सकता था, अगर उनका परिवार उनका साथ न देता. “उन्होंने कभी भी मुझ पर यह कहकर जोर नहीं डाला कि, “बेटा, अब वक्त आ गया है कि तुम पारिवारिक काम में हाथ बंटाओ,” उन्होंने कहा. उनके सबसे बुरे वक्तों में भी उनके पिता ने अपने एक्टर बनने का सपना देखने वाले बेटे का खर्चा उठाना जारी रखा और उनकी जिम फीस, ट्रेनर, और सेहत बनाने वाले सप्लीमेंटस का खर्चा उठाते रहे. “मैं जानता हूं कि मेरे मां-बाप को यह खर्च चुभता था लेकिन उन्होंने कभी इसे मुझ पर जाहिर नहीं होने दिया.”

भोपाल में पांच घंटे चले इस लंबे कार्यक्रम के दौरान सिंह ने सितारा होने का किरदार बखूबी निभाया. प्रवीण वाजपेयी/हिंदुस्तान टाइम्स/ गैटी इमेजिस

सेट का अनुभव पाने के लिए, सिंह ने अपने डायरेक्टर दोस्त शाद अली को असिस्ट करना शुरू कर दिया. वे अधिकतर विज्ञापन शूट करते. “हम महीने में तीन-चार विज्ञापन करते. मैं बहुत मेहनत कर रहा था,” उन्होंने याद किया. दो साल काम करने के बाद, सिंह ने बहुत से नए संपर्क बना लिए थे लेकिन उनका चेहरा बिगड़ने लगा था. “मेरी आंखों के नीचे काले धब्बे उभर आए थे. मेरा वजन भी बढ़ गया था. मैंने खुद से कहा, ‘बेटा, ऐसे तो मैं एक्टर बनने से रहा.’”

यह सब छोड़छाड़ कर वे एक्टिंग कोच किशोर नमित कपूर के साथ लग गए. बॉलीवुड में एक्टर बनने का ख्वाब देखने वाले अभिलाषियों की नजर में कपूर की साख किसी इंस्टीट्यूशन से कम नहीं थी. इस सफर में उनका अनुभव मिलाजुला रहा. “उनकी कई क्लासें विशुद्ध हिंदी फिल्मों वाली होतीं थीं,” उन्होंने कहा. वे पिछले दशकों से हावी स्टाइल यानी मेलोड्रामा पर बहुत जोर देते थे. “जैसे वे आपको इस एकालाप पर महारत हासिल करनी होती थी: ‘मां की चिता पे रोना और बदले का वादा करना,’” उन्होंने कहा. “मेरे हिसाब से एक्टिंग का यह स्टाइल अब घिसपिट चुका था.” इसके बावजूद सिंह दुबारा से परफॉर्म करने लगे थे और पहले की तरह प्रशासकों की तालियों के बीच फलफूल रहे थे.

संजय लीला भंसाली के साथ, बाजीराव मस्तानी में सिंह दूसरी बार काम कर रहे थे. “उन्होंने मुझसे कहा, जाओ अपने किरदार में ढलकर आओ. फिर वे पहली बार अपने बाजीराव से सेट पर ही मिले.” साभार : इरोस इंटरनेशनल

सिंह ने यह कोर्स बीच में ही छोड़ दिया और थिएटर का रुख किया. “मुझे अपना कर्ज चुकाना जरूरी लगा. कुछ ऐसा कि ‘माथा टेकना जरूरी है,’” उन्होंने कहा.  लेकिन उन्होंने पाया कि जिस जाने-माने लेखक निर्देशक मकरंद देशपाण्डेय का प्रोडक्शन वे ज्वाइन करना चाहते थे वे उन्हें लेने को तैयार ही नहीं थे. हफ्तों तक प्रयास करने के बाद, सिंह रिहर्सल तक घुस पाने में सफल रहे और “मैंने एक्टरों के लिए उनके चाहने न चाहने के बावजूद उपयोगी होना शुरू कर दिया.” वे पूरे प्रोडक्शन के लिए सफाई करते, उन्हें चाय-पानी लाकर देते और कॉस्टयूम में उनकी मदद करते. जल्दी ही वे यूनिट के लिए अनचाहे से ऐसे इंसान बन गए जिसके बिना काम नहीं चल सकता था. “क्योंकि मैं कॉस्टयूम की पेटी को टेम्पो में लादने से लेकर सेट बनाने तक के हर छोटे-मोटे कामों में लगा था.” आखिर उन्होंने अपने लिए टीवी कैमरामैन का छोटा सा दो लाइनों वाला रोल हासिल कर लिया. "उस रोल को पाकर भी",” पब्लिक के सामने परफॉर्म करने के ख्याल से उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा, "जो दुबारा से उनके खुद पर यकीन का नतीजा था."

इस बीच सिंह को अब तक फिल्म रोल के लिए ऑडिशन पर बुलाया जाने लगा था. हालांकि उन्ही दोस्तों के द्वारा जिन्हें वे अपने अस्सिस्टेंट डायरेक्टर के दिनों से जानते थे. “और मुझे हर फिल्म में रोल भी मिल जाता,” उन्होंने कहा. लेकिन वे सभी रोलों को ठुकरा देते. उन फिल्मों के भी जो “अच्छे बजट से बन रही थीं और जिनके रिलीज होने पर अच्छे प्रदर्शन की खबरें आई थीं.” वे अक्सर निर्माताओं को निराश कर देते, जिन्हें समझ ही नहीं आता कि वे मौकों को ऐसे क्यों अपने हाथ से जाने दे रहे हैं. “मैं किसी बड़े ब्रेक की तलाश में था,” सिंह ने कहा, “हालांकि मैं नहीं जानता था कि मुझे कैसे रोल की तलाश थी. न ही मेरी कोई प्लानिंग थी. मेरा यह फैसला या तो बहुत बहादुरी भरा था या बेवकूफी भरा”.

यह असमंजस का समय भी अचानक यूं ही खत्म हो गया, सिंह ने मुझे बताया, जब उनका “वो पल” आया. “एक दिन मैं अपनी ही तरह संघर्षरत एक्टरों की संगत में बैठा था और उन्होंने कहा, पास ही पिक्चर की शूटिंग है, चल के देखते हैं.” जब उन्होंने कलाकारों के नाम बताए तो, सिंह को पता चला कि यह तो वही फिल्म है जिसे वे ठुकरा चुके हैं. “मैंने सोचा क्या मैंने खुद ही अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार ली है? मुझे बड़ा-पाव खाते और चाय पीते हुए यहां नहीं बैठे रहना है! मुझे इस वक्त वहां होना चाहिए, एक्टिंग करनी चाहिए!” उस रात उन्होंने अपना एक पोर्टफोलियो बनाने का फैसला किया.

“यह कोई ऐन्वई सा पोर्टफोलियो नहीं हो सकता था क्योंकि बतौर अस्सिस्टेंट डायरेक्टर मुझे इस बात का एहसास था कि अधिकतर पोर्टफोलियो रद्दी की टोकरियों में नजर आते हैं,” उन्होंने कहा. “इसे पहला इम्प्रेशन डालना चाहिए. अगर कोई देखे तो वह अगला पृष्ठ खोलने को मजबूर हो जाए. और फिर अगला. जब तक उन्हें यह न लगे, ‘फक, मैं इसे नजरंदाज नहीं कर सकता.’”

सिंह खुद के ही आर्ट डायरेक्टर बन बैठे. उन्होंने हर शॉट, हर सेट-अप खुद ही डिजाइन किया,” और फोटो लेने के लिए एक प्रसिद्ध फोटोग्राफर रखा. उन्होंने मुझे बताया, वे इतना बड़ा खर्च उठाने की हालत में नहीं थे “लेकिन मेरे पिता ने इसका भी खर्चा उठाया.” सिंह पोर्टफोलियो को छपवाना और उस पर कॉफी टेबल बुक की जिल्द चढ़ाना चाहते थे. लेकिन यह इतना महंगा काम था कि इसके लिए उनके पास पैसे नहीं थे. अपने एक दोस्त के पिता की मदद से उन्होंने उनकी प्रिंटिंग शॉप में रियायती दर पर फोटो छपवाए. शर्त यह थी कि प्रिंटिंग आधी रात से सुबह छह बजे तक ही हो पाएगी. पैसा बचाने के लिए उन्होंने फोटों को काटने का काम भी खुद किया. “एक बार बनकर तैयार होने के बाद यह कमाल का पोर्टफोलियो बना था.” मैंने उनसे पूछा क्या उसकी कॉपी आज भी उनके पास है तो उन्होंने बड़े गर्व के साथ कहा, “बिल्कुल है, मेरे पास बहुत सी कॉपियां हैं. मेरे ख्याल से मेरी मां ने एक तो अपनी तिजोरी में भी रखी हुई है.”

अपने इस “परिचय पत्र” से लैस, सिंह ने, जिसे वे संघर्षशील एक्टर का उद्यम बताते हैं, अपना संघर्ष नए सिरे से शुरू किया. वे पोर्टफोलियो अपने हाथों में लिए चलते और हर उस आदमी को थमा देते जो मायने रखता था. “मैं रेस्टोरेंट में लोगों के पास जा धमकता, साथी एक्टरों और असिस्टंट डायरेक्टरों को अपना पोर्टपोलियो थमाता, यहां तक कि ट्रैफिक लाइटों तक पर,” उन्होंने कहा. इस सफर में उनको “मनोरंजन उद्योग के अप्रिय चेहरे” को भी देखने का अनुभव हुआ.” उन्होंने याद करते हुए बताया कि एक जाने-माने निर्माता ने उन्हें एक बार अपने दफ्तर में बुलाया और जान बूझकर अपने दोस्तों को खुश करने के लिए उन पर अपना कुत्ता छोड़ दिया. फिर एक बार एक कास्टिंग डायरेक्टर ने उन्हें अंधेरी में अपने घर पर बुलाया. जब वे वहां पहुंचे तो वह “बस मेरी पैंट उतारना चाहता था.”

शानू शर्मा, उनके हिमायतियों में से एक थीं. वे उनकी करीबी दोस्तों में थीं और खुद भी कास्टिंग डायरेक्टर के रूप में अपने पांव जमाने की जुगत में लगीं थीं. कॉलेज से घर वापस आते हुए एक बार सिंह, शानू की पार्टी में जबरन जा घुसे. थोड़ी देर बाद, दोनों 1989 की हिट मूवी रामलखन की धुन पर थिरक रहे थे. वे अब उनको ऑडिशन के लिए सीन को रिहर्स करवा रहीं थीं. एक तरह से बॉलीवुड फिल्मों के प्रति अपने प्यार को दोनों मिलकर साझा कर रहे थे.

2010 में, एक शाम को जब वे “एक बहुत खूबसूरत लड़की” के साथ डेट पर थे तो अचानक उनके फोन की घंटी बजी. यह शानू का फोन था. “लेकिन मैं पूरी तरह से अपनी डेट में डूबा हुआ था,” सिंह ने बताया, इसलिए उन्होंने फोन नहीं उठाया. शानू फोन करती रही. उनका ध्यान उस तरफ न जाए इसलिए उन्होंने फोन को उल्टा रख दिया. थोड़ी देर बाद जब फोन देखा तो उस पर सात मिस्ड कॉल और एक मेसेज था. यह दो शब्दों वाला मेसेज था: “आदि, फुल स्टॉप. चोपड़ा, फुल स्टॉप.”

सिंह और अर्जुन कपूर के साथ कास्टिंग डायरेक्टर शानू शर्मा. सिंह के स्टारडम के सफर में शानू उनकी साथी रही हैं. “अब मुझे मालूम है कि जब मैं उनसे मिली तो मेरे दिल की आवाज सही थी. मुझे खरे सोने की पहचान है,” शानू ने कहा. साभार : शानू शर्मा

अब तक देर दोपहर हो चुकी थी, सिंह अपने शेड्यूल से लेट चल रहे थे. मॉल की लिफ्ट से मैंने एक छोटे से हॉल में प्रवेश किया, जहां उनको प्रतिस्पर्धा के विजेताओं से मिलना था. मेरे वहां पहुंचने के थोड़ी ही देर बाद, सिंह ने हॉल में प्रवेश किया और सीधे स्टेज की तरफ बढ़ गए. उन्होंने विजेताओं से मुख़्तसर सी बात की, जो पारंपरिक वेशभूषा में वहां बैठे थे. कुछ ही मिनटों बाद वे सभी को टाटा बाय-बाय कर रहे थे. लेकिन निकलने से पहले उन्होंने बाजीराव मस्तानी की एक लाइन सुना दी: “बाजीराव ने मस्तानी से मोहब्बत की है, ऐय्याशी नहीं.” इस जज्बे ने वहां मौजूद लड़कियों का दिल जीत लिया और वे खड़े होकर खुशी में झूमने लगीं. सिंह के वहां से चले जाने के बाद भी उनका उत्साह नहीं थमा था.

एक और अंधेरे कॉरिडोर से होते हुए, मैं सिंह के पीछे-पीछे एक छोटे से मूवी थिएटर में दाखिल हुई. यहां पर मीडिया के लिए पूरा “मल्हारी” गाना दिखाया जाना था. थिएटर करीब आधा भरा हुआ था. सिंह आगे की पंक्ति में आकर बैठ गए. रोशनी कम कर दी गई. और गाने का विडियो पर्दे पर बजने लगा. सिंह ने अपना धूप का चश्मा निकाल लिया. पर्दे पर बाजीराव, जजीरों से बंधे और हेलमेट पहने नृतकों की फौज के साथ नाच रहे थे. जहां पर मैं बैठी हुई थी वहां से मैंने देखा कि सिंह गाने के बोल बुदबुदा और अपना सर हिला रहे थे. वे पर्दे पर दिख रहे किरदार के साथ अपनी भोहें और आंखें मिचकाते जाते थे. जब रोशनी वापस आई तो वे दर्शकों की तरफ देखकर मुस्कुराए. “गुड शिट, मस्त है, बॉस,” उन्होंने कहा.

जब गाना दुबारा बजाया गया तो सिंह स्क्रीन के सामने स्टेज पर चढ़ गए. यहां एक बार फिर महिला एंकर ने मोर्चा संभाल लिया. सिंह ने फिर से उनकी जमकर तारीफ की, “तुम आज बहुत कमाल लग रही हो”, कहकर उन्होंने उसे गुलाब का फूल थमाया. फिर एक बड़ी सी कुर्सी पर बैठ गए. उन्होंने चश्मा चढ़ा लिया था और सवालों के जवाब देने के लिए तैयार बैठे थे.

एक रिपोर्टर ने उनसे फिल्म को लेकर हुए विवाद के बारे में सवाल दागा: मस्तानी के वंशजों ने शिकायत की थी कि फिल्म को लेकर उनसे कोई विमर्श नहीं किया गया. सिंह ने रिपोर्टर से कहा वे इस संबंध में निर्माता से सवाल कर सकती हैं, लेकिन रिपोर्टर नहीं मानीं, “मैडम, मैं बतौर एक्टर महज अपना काम और इस फिल्म का प्रचार कर रहा हूं”, उन्होंने ठंडे दिमाग और इज्जत से जवाब दिया. “आप भी अपना काम करें और यह सवाल सही लोगों से पूछे.” इवेंट के बीच में ही रिपोर्टर ने सिंह को टोकते हुए कहा, “रणवीर, फिल्म हिंदी में है, आप हिंदी में बोलिए.” सिंह ने उसकी तरफ बिना देखे ही कहा, “ठीक है, सर. इतना गुस्सा होने की क्या बात है, प्यार से बोल देते.”

प्रेस कांफ्रेंस के बाद, सिंह पीछे के कॉरिडोर से होते हुए थिएटर से निकल कर वापस होटल की तरफ रवाना हो गए. उधम मचाती भीड़ उनके पीछे अब भी लगी थी, हालांकि अब तक काफी लोग जा चुके थे. पूरे कार्यक्रम के आयोजन में करीब पांच घंटे लगे और सिंह ने बिना किसी ब्रेक के इसे अंजाम दिया. कार्यक्रम के अनुसार अब उन्हें अपने कमरे में लौटना और लंच करना था. मैं उनके साथ-साथ चलने लगी. वे मुझे देखकर मुस्कराए. “कैसा चल रहा है?” मैंने पूछा. “पता नहीं,” उन्होंने इमानदारी पूर्वक कहा, “मेरे लिए बताना मुश्किल है.”

2010 की शुरुआत में सिंह को, अंधेरी में स्थित यशराज फिल्म्स के दफ्तर में मनीष शर्मा के सामने ऑडिशन के लिए बुलाया गया, जो अपनी पहली फिल्म बैंड बाजा बारात का निर्देशन करने वाले थे. उन्होंने अपना पहला ऑडिशन बहुत शानदार तरीके से दिया और फिर अगले दो हफ्तों तक मनीष ने उन्हें कई बार बुलवाया. “कभी वे मुझे डांस, कभी कॉमेडी, कभी डीडीएलजे का सीन परफॉर्म करने के लिए कहते,” उन्होंने कहा. दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे यशराज की सबसे सफल फिल्मों में से एक है. लेकिन सिंह ने बाताया कि उनकी परफॉर्मेंस, हर सीन के साथ खराब होती चली गई. उसके ऊपर वे हर बार ट्रैफिक में फंस जाते और लेट पहुंचते, जिसके कारण उन्हें लगा “मैं सीरियस नहीं हूं.”

ऑडिशन के इस राउंड के बाद, सिंह को एक और मीटिंग के लिए बुलाया गया. सिंह ने मुझे अपने खास नाटकीय अंदाज में बताया कि जब वे इंतजार कर रहे थे, “दरवाजा जोर से खुला और किसी हवा के झोंके की तरह...आदित्य चोपड़ा कमरे में प्रकट हुए, या कहो, अवतरित हुए. एक पल के लिए तो जैसे मेरे दिल ने धड़कना बंद कर दिया हो.” चोपड़ा सीधे मुद्दे की बात पर आ गए. “वे बोले, ‘तुम क्यों अपनी बर्बादी करने पर तुले हो?’” सिंह ने याद करते हुए बताया. अंत में, स्टूडियो ने उन्हें “एक आखिरी मौका” और देने का निर्णय किया. “आज तक मैंने उनसे नहीं पूछा कि यह मौका उन्होंने मुझे क्या सोच कर दिया था.”

यह फाइनल स्क्रीन टेस्ट था. जब यह हो गया तो सिंह को चोपड़ा के साथ एक और बार मीटिंग के लिए बुलाया गया. उनके ऑफिस में बैठे हुए, हिंदी फिल्मों के बादशाह ने, सिंह से कहा कि उन्हें चुन लिया गया है. “मैंने उन्हें सपाट चेहरे से सुना,” सिंह ने बताया, “और फिर मैं केबिन से बाहर आ गया. यह अनुभव बहुत अभिभूत करने वाला था. मेरे घुटनों में तो जैसे जान ही न बची हो, और मैं फर्श पर गिर पड़ा और रोना शुरू कर दिया.” एक या दो मिनट के बाद, चोपड़ा ने उन्हें इसी हालत में पाया. सिंह ने उन पलों को याद करते हुए बताया, “उन्होंने अपना हाथ मेरे गले में डाला और मेरी पीठ थपथपाते हुए कहा, ‘तू कर लेगा.’”

सिंह फिल्म साईन करने के तुरंत बाद वे मनीष के साथ रेकी के लिए दिल्ली रवाना हो गए जहां बैंड बाजा बारात की शूटिंग होनी थी. “उस वक्त उन्हें कोई नहीं जानता था तो हम ऐसा करना गवारा कर सकते थे,” मनीष ने मुझे बताया जब दिसंबर में मैं उनसे मिली. डायरेक्टर सिंह को रोज एक काम दे देते, जैसे, “आज तुम्हे डीटीसी बस पकड़कर लोगों के बर्ताव पर ध्यान देना है. जैसा कहा गया था उन्होंने वैसा ही किया. “रणवीर ने एक कॉलेज में क्लास भी अटेंड की लेकिन उन्हें वहां से भगा दिया गया,” डायरेक्टर ने याद किया.

जब बैंड बाजा बारात आई तो बिट्टू के किरदार में सिंह को बहुत सराहा गया. फिल्म में उन्होंने एक ऐसे लड़के का किरदार निभाया था जो उत्तर प्रदेश के एक छोटे शहर से आया है और दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ता है. उसे किसी भी कीमत पर वापस जाकर पारिवारिक गन्ने की खेती नहीं करनी थी इसलिए वह वापिस नहीं जाना चाहता. मनीष ने मुझे बताया कि सिंह ने दिल्ली के लौंडे का अपना किरदार इतनी बखूबी निभाया कि लोग उनसे अक्सर पूछते थे कि क्या उन्होंने किसी दिल्ली वाले को इस रोल के लिए चुना था. आज तक भी उनके द्वारा निभाया गया बिट्टू का किरदार लोगों के जहन से निकल नहीं पाया है और उनकी सबसे यादगार परफॉरमेंस के रूप में याद किया जाता है. भोपाल में, प्रशंसकों ने उनसे बैंड बाजा बारात की लाइनों को बोलने की गुजारिश की. कई पत्रकारों ने भी उनसे बिट्टू की कसम दोहराने की मिन्नत की: “ब्रेड पकोड़े की कसम.”

मनीष और बाकि सभी ने भी यह पाया कि सिंह बतौर एक्टर अपने काम को बहुत बारीकी और समर्पण के साथ समझ कर अंजाम देते हैं. यह उनकी ‘सब-चलता-है’ की सार्वजनिक छवि के बिलकुल उलट है. “स्क्रिप्ट पढ़ते वक्त या वर्कशॉप के दौरान वे हमेशा नोट्स बनाते रहते थे,” डायरेक्टर ने बताया. “वे अपने हर सीन का दिमाग में खाका तैयार कर लेते हैं और अपने हर किरदार का ग्राफ उनके पास होता है.” उन्होंने कहा, सिंह के पास “अपनी कला के प्रति बच्चों जैसा समर्पण है.” सिंह के साथ दो फिल्मों में काम करने वाली, परिणीति चोपड़ा ने भी उनके बारे में कुछ ऐसा ही कहा, जब मैंने उनसे जनवरी में फोन पर बात की. “हमारी साथ-साथ पहली फिल्म लेडीज वर्सेस रिकी बहल में हर सीन से पहले वे स्ट्रेचिंग या शॉट देने से पहले प्राणायाम करते,” उन्होंने कहा. “उस पल में घुसने के लिए” सिंह कुछ भी करने को तैयार हो जाते, और पूरी लगन से. जिसका मतलब ”किरदार में घुसने के लिए वे गोल-गोल छलांगे लगाना भी हो सकता था और सुबह चार बजे उठकर वर्जिश करने लग जाना भी.”

विश्लेषकों की नजर में दूसरी बार उन्हें एक कमाल का किरदार निभाने का मौका लुटेरा में मिला. इस फिल्म में सिंह ने वरुण का किरदार निभाया था, जो एक शांत किस्म का नौजवान ठग है और जो उसी औरत के परिवार को ठग लेता है जिससे वह प्यार करता है. फिल्म के डायरेक्टर, विक्रमादित्य मोटवानी ने मुझे ईमेल पर बताया कि उन्होंने सिंह का चुनाव सोच समझकर किया था जो अब तक सिर्फ रोमांटिक कॉमेडी फिल्मों में ही दिखाई दिए थे. वरुण का किरदार, उन्हें लगा कि “ऐसा दिखना चाहिए जिस पर सब यकीन कर सकें.” सिंह के पास, उनके अनुसार, “खुला और विश्वसनीय चेहरा है और जब ऐसा इंसान आपसे धोखा करता है तो आपका दिल टूट सकता है.” मनीष शर्मा की तरह मोटवानी भी, सिंह के काम और उनकी तरक्की से बहुत प्रभावित थे. “वे बहुत ही अप्रत्याशित हैं, जो उन्हें बहुत रोमांचक बना देता है. आप उनकी फिल्में इसलिए भी देखने जाते हैं क्योंकि आपको पता नहीं होता कि वे क्या कर जाएंगे. और यही उनकी खासियत है.”

मनीष ने बताया कि सिंह के पूरे रवैये के केंद्र में उनकी यह काबलियत है कि वे खुद को अपने किरदार में पूरी तरह जज्ब कर लेते हैं. “यह रोल पाने के लिए सिर्फ ‘सिक्स पैक’ रखने तक सीमित नहीं है. अगर वे बाजीराव का किरदार निभा रहे हैं तो यह भी मायने रखता है कि वे कितने कप कॉफी पिएंगे, जिससे उनके अंदर बाजीराव का किरदार जन्म ले सके.”

सिंह के मुताबिक बाजीराव मस्तानी के लिए उनकी तैयारी अब तक कि सबसे मुश्किल तैयारियों में से एक थी क्योंकि इसमें “अलग किस्म की एक्टिंग” की दरकार थी. “मैं कई हफ्तों तक सबसे अलग-थलग रहा...दोस्तों और परिवार वालों से भी नहीं मिला,” उन्होंने भोपाल में रिपोर्टरों को बताया. “मुझे खुद को पीछे छोड़ना था. मैं सिर्फ पढ़ाई, अपना उच्चारण सुधारने, फिल्में और डाक्यूमेंट्री देखने में लगा रहता.” बाजीराव के किरदार को निभाने के लिए गहनता की जरूरत थी. ऊपर से उनको महीने भर तक कंधे की चोट भी सहनी पड़ी. “इस सब कठिनाइयों ने मुझे बतौर एक्टर और इंसान बदल डाला.”

बजीराव मस्तानी का निर्देशन संजय लीला भंसाली ने किया था, जो सिंह के साथ पहले भी गोलियों की रासलीला – राम-लीला बना चुके थे. इसी फिल्म ने उन्हें पहले-पहल सही मायनों में स्टारडम दिलवाया था. फिल्म में सिंह के देहाती गुजराती लहजे और गठे हुए बदन की खूब सराहना हुई. सिंह ने कहा डायरेक्टर ने उनकी तैयारियों पर भरोसा जताया और मुझसे कहा, “जाओ, और खुद को अपने किरदार में ढालो.” सिंह ने पत्रकारों को बताया, “पहली बार वे बाजीराव से सेट्स पर ही मिले.” अपने कई साक्षात्कारों में सिंह ने स्वीकारा है कि उनके इस अप्रत्याशित स्टारडम से पहले, उन्हें शुरुआत में अपने पैर जमाने में काफी वक्त लगा.  अपने इस दौर के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा, “उस वक्त मैं...उस वक्त मैं अपनी अभिनय क्षमता को लेकर बहुत गुरूर में रहता था.” पर्दे और पर्दे के बाहर उनके व्यक्तित्व ने उनकी छवि, भांड या मसखरे की बना डाली थी. उन्हें अपना यह किरदार खेलने में बहुत मजा भी आता था.

जब मैं दिसंबर में शानू शर्मा से मिली, मैंने उनसे सिंह के स्टारडम के इस पहलू के बारे में पूछा. शानू, रणवीर के करीबी दोस्तों में से हैं. उन्होंने 2010 में, यशराज फिल्म्स स्टूडियो ज्वाइन किया और जल्द ही सिंह को बैंड बाजा बारात दिलवा दी. उन्होंने मुझे बताया कि सिंह के कपड़ों का अंदाज, मीडिया स्ट्रेटजी से ज्यादा कुछ नहीं. “अब तो उनका भड़कीला-चटकीलापन बहुत हद तक कम हो गया है. वे इससे कहीं ज्यादा बदतर हुआ करते थे. या कहें, बेहतर! एक बार वे मेरे घर अमरीकी कॉमिक और फिल्म के किरदार की तर्ज पर काले-सफेद सितारों वाले ‘क्रो’ की तरह बन कर आ गए. हम उनके इस ‘गेट अप’ में सड़क पर पान खाने भी गए.” इसलिए जब भी सिंह, चटकीली पिंक शर्ट और नीचे हरे रंग की ट्रैकपैंट पहनते हैं तो वे आंखें भी नहीं मिचकातीं. “यह उनके लिए बहुत सामान्य बात है.”

सिंह की सफलता ने शानू के उन पर शुरुआती भरोसे को सही साबित किया. “मुझे पता है कि जब मैं उनसे पहले-पहल मिली तो उनको लेकर मेरा अनुमान बिलकुल सही था कि मुझे खरे सोने की परख थी.” आज भी जब वे नए टेलेंट की तलाश करती हैं तो वे सालों पहले के उसी पल को याद करती हैं जब उन्होंने सिंह को परखा था. “मैं उसी माद्दे को अलग-अलग रूपों में तलाशती हूं.” शानू ने कहा सिंह, “पानी की तरह हैं. आप उन्हें कटोरे में रख सकते हैं या जल-प्रपात से नीचे फेंक सकते हैं या किसी नुकीली चट्टान की दरारों के बीच बिठा सकते हैं. वे खुद को उस हालात में ढाल ही लेंगें.”

शानू को रणवीर साठ के अल्हड़ दशक के बॉलीवुड स्टार शम्मी कपूर की याद दिलाते हैं. कपूर अपने नटखट शैतान स्टाइल और लापरवाह डांस के लिए जाने जाते थे. “आज भी कोई उनकी नकल नहीं कर सकता...लडकियां तो जैसे उनकी दीवानी थीं.” इंडस्ट्री में दूसरे लोगों को वे नब्बे के दशक में बॉलीवुड पर फतह हासिल करने वाले शाहरुख खान के उत्थान की याद दिलाते हैं. पत्रकार और विश्लेषक अनुपमा चोपड़ा ने कहा दोनों में दीवानों जैसी ऊर्जा और आकर्षण है, जिसे वे “अपरंपरागत आकर्षण” बताती हैं.

शानू ने मुझे बताया कि सिंह की सबसे बड़ी खासियत उनकी अपील का दायरा है. “सिर्फ ‘इन्स्टाग्राम क्राउड’ ही उनका दीवाना नहीं है. रिक्शेवाले, टैक्सीवाले, और ब्यूटी पार्लर की लड़कियां भी उनके साथ ‘कनेक्ट’ करती हैं. मेरे साथ काम करने तमाम लोग उन्हें बहुत पसंद करते हैं. वे हमेशा लड़कियों के साथ फलर्ट और लड़कों की तारीफों के पुल बांधते रहते हैं.” उनकी एक खासियत यह है कि “उस पल में सभी को यकीन दिला देते हैं कि वे सिर्फ उनके हैं...वे इतने अपने लगते हैं कि बार के बाहर खड़ी लड़की भी उनसे बात करने की हिम्मत जुटा सकती.”

एक बार सिंह के अपने कमरे में घुसने के बाद मैंने उन्हें फिर नहीं देखा. अपनी तमाम मिलनसारिता के बावजूद, सिंह अपने जीवन के कुछ पहलुओं के बारे में बहुत प्राइवेट हैं और वे ‘बाउंड्री’ खींचना जानते हैं. सार्वजनिक तौर पर जब भी मेरी उनसे मुलाकात हुई मैंने उन्हें हमेशा असीम ऊर्जा से लबरेज पाया लेकिन उनके एक बार कमरे के अंदर दाखिल होते ही दरवाजा निर्ममता से बंद हो जाता है. वे बाहर तभी निकलते हैं जब पूरी तरह से तैयार हों. उनकी टीम ने बताया कि सुबह के वक्त उनसे बात करना लगभग नामुमकिन है. उन्हें अपनी कार में भी लोग पसंद नहीं और वे तब तक इंटरव्यू नहीं देते जब तक पूरी तरह से तैयार न हो जाएं. अपनी इस सार्वजनिक छवि के विपरीत मैंने सिंह में खासे मिलनसार और एक अत्यंत निजी इंसान का मिश्रण पाया.

इसकी एक मिसाल उनके और बाजीराव मस्तानी की नायिका दीपिका पादुकोण से उनके रिश्ते को लेकर है, जो किसी खुले रहस्य की भांति है. सिंह अपने इस रिश्ते के बारे में कोई बात करना पसंद नहीं करते. उन्होंने बार-बार कहा है कि उनके जीवन के कई ऐसे पहलू हैं जो बहुत बेशकीमती हैं और जिनमें वे नहीं घुसना चाहेंगे. “इसलिए इसे ‘पर्सनल लाइफ’ कहते हैं, न,” उन्होंने बातचीत के दौरान एक पत्रकार से बात करते हुए कहा. सिंह अपने परिवार के बारे में भी बहुत संवेदनशील हैं और उसे सार्वजनिक नजरों से दूर रखना चाहते हैं. जब मैंने उनके एक दोस्त से अपनी कहानी के लिए उनकी बहन से बात करने की मंशा जताई तो मुझे बहुत प्यार से इंकार कर दिया गया और बताया गया कि अगर मैंने ऐसा किया तो सिंह को यह अच्छा नहीं लगेगा.

शाम तक हमें बताया गया कि मुंबई वापसी की हमारी फ्लाइट विलंबित हो गई है. जब मैं होटल से एअरपोर्ट के लिए रवाना हुई उस वक्त शाम के पांच बज चुके थे. हवाई जहाज में मुझे फर्स्ट क्लास में एक सीट पर बिठाया गया, जिसकी बगल वाली सीट, सिंह के लिए खाली छोड़ी गई थी. वे जहाज में मेरे आने के कुछ मिनटों बाद ही आए. इत्तेफाक से हवाई जहाज में बीच के रास्ते के दूसरी तरफ एक्टर, राजनीतिक कार्यकर्त्ता और पूर्व सुंदरी गुल पनाग बैठी हुईं थीं. मुझे पता चला, सिंह उनसे पहले कभी नहीं मिले थे, लेकिन फिर भी वे उनकी बगल में जाकर बैठ गए और दुनिया जहान की बातें करना शुरू कर दिया. उन्होंने उनकी तारीफों के पुल बांधने शुरू कर दिए और कहा कि उनका तो दिल ही टूट गया था जब उन्हें पता चला कि वे शादीशुदा हैं!

डेढ़ घंटे की फ्लाइट में मैंने सिंह से बातों का सिलसिला आगे बढ़ाया. जब जहाज नीचे उतरने लगा तो उन्होंने शिकायत की कि उनके कान का दर्द बढ़ता जा रहा है. पनाग ने इलाज सुझाया और गर्म पानी का कप मंगवाया. सिंह ने गुल के मशविरे के अनुसार जब भाफ लेने के लिए कान से कप लगा रखा था, तब भी वे उनके गुणगान में व्यस्त थे. वे जोर-जोर से ठहाके लगा रहे थे और उनके चेहरे पर लगातार मुस्कान फैली हुई थी. “डॉक्टर गुल”, उन्होंने कहा. “न्यूरोफिजिसिस्ट गुल! अब आप क्या करेंगी?

शाम ढलने के काफी देर बाद हम नीचे उतरे. जैसे ही जहाज ने जमीन को छुआ, सिंह ने अपने दोनों मोबाइलों को ऑन किया और ट्विटर पर भोपाल में आज के इवेंट पर प्रतिक्रियाएं चेक करने लगे. यह एक लंबा दिन था लेकिन उन्हें अभी और काम था. सिंह ने मुझे बताया उन्हें एअरपोर्ट से सीधे अंधेरी जाना था, जहां प्रियंका चोपड़ा के साथ उन्हें एक और प्रचार कार्यक्रम में हिस्सा लेना था. जब जहाज रुका तो सिंह ने अपना धूप का चश्मा लगा लिया और खिड़की से बाहर झांकने लगे. मैंने उनसे पूछा क्या उन्हें इस पागलपन में वाकई मजा आता है, या यह सब उनके सार्वजनिक व्यक्तितत्व का हिस्सा है. सिंह जवाब देने से पहले, या शायद थकान के कारण, थोड़ा ठिठके. “कभी-कभी तो मेरे पास भी इस सवाल का जवाब नहीं होता,” उन्होंने कहा.

एअरपोर्ट से निकलने के कुछ ही देर बाद मैंने देखा पनाग ने ट्विटर पर पोस्ट किया है: “बेहद दिलकश @रणवीरऑफिसियल से (विलंबित) फ्लाइट में मुलाकात हुई. उन्होंने मेरी शाम कामयाब बना दी!!”

जहाज से उतरने से पहले, रणवीर ने मुझसे कहा कि हमारी बातचीत अगले कुछ हफ्तों तक यूं ही चलती रहेगी. इस वादे पर मोहर लगाने के लिए मैंने उनसे पूछा, ब्रेडपकोड़े की कसम? “हे, वह बहुत सीरियस मामला है,” उनका जवाब था और उन्होंने इस वादे पर अपनी मुट्ठी की मुहर लगा दी. जब कुछ दिनों बाद मैंने उन्हें मेसेज भेजा तो उनका जवाब तो आया लेकिन उसमे लिखा था, “सॉरी, मुझे नहीं लगता कि मैं यह सिलसिला आगे जारी रख पाऊंगा. उम्मीद है तुम्हारे पास लिखने के लिए पर्याप्त माल हो गया होगा.”

बाजीराव मस्तानी दुनियां भर में शुक्रवार के दिन 18 दिसंबर को रिलीज हुई. अगले दिन मैंने पादुकोण का ऑनलाइन विडियो देखा, जिसमे वे रणवीर की मूंछे नोच रही थीं. यशराज फिल्म्स स्टूडियो में, हफ्तों पहले की गई भविष्यवाणी सच होने जा रही थी. बॉक्स ऑफिस पर बाजीराव मस्तानी बॉलीवुड के सबसे प्रचलित स्टार शाहरुख खान की दिलवाले को कड़ी टक्कर दे रही थी. इंडस्ट्री के कुछ जानकारों के मुताबिक दिलवाले सबको पीछे छोड़ देने वाली थी. लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता रहा, बाजीराव मस्तानी बाजी मारती चली गई. तीसरे हफ्ते के बाद, केवल भारत में ही इसने 167 करोड़ रुपए की कमाई कर ली थी. जनवरी के अंत तक यह फिल्म सिनेमा हॉलों में डटी रही और इसकी घरेलू कमाई 180 करोड़ रुपए के पार जा पहुंची.

फिल्म की सफलता का अच्छा खासा श्रेय रणवीर को मिला, जो अपने प्रदर्शन के लिए बहुत तारीफें बटोर रहे थे. साल के अंत में, जब पुरस्कारों की बारी आई तो फिल्म ने कई पुरूस्कार जीते और सिंह को भी बेस्ट एक्टर के कई अवार्डों से नवाजा गया. वे हर कहीं मौजूद थे. उनकी तस्वीरें और चर्चा चारों ओर छाई रहीं: अवार्ड लेते हुए, फिल्म पत्रिकाओं में और हजारों बधाइयों के संदेशों का ट्वीट पर जवाब देते हुए. बॉलीवुड पर करीबी नजर रखने वालों के मुताबिक बाजीराव मस्तानी ने सिंह के फिल्मी करियर को वह हवा दी थी जिसकी वे आस लगाए बैठे थे. पत्रकार और फिल्मी कारोबार पर नजर रखने वाली कोमल नाहटा ने सिंह के प्रदर्शन को “सुपर स्टार बनाने वाला” बताया. अनुपमा चोपड़ा ने स्वीकारा कि उनको शुरू में शक था कि सिंह इस किरदार के साथ न्याय कर पाएंगे. क्योंकि उनके मुताबिक “इस रोल के लिए बहुत संजीदगी की जरूरत थी” और “बैंड बाजा बारात से बिल्कुल अलग किस्म की ऊर्जा.” लेकिन उन्होंने कहा सिंह ने मराठी लहजे में दक्षता हासिल करने के अलावा बाजीराव के द्वंद्वों का भी बेहतरीन चित्रण कर दिखाया. “कोई नहीं जानता अगला स्टार कौन होगा,” उन्होंने मुझसे कहा, “लेकिन मुझे लगता है हमें इस बात की तारीफ करनी चाहिए कि उन्होंने इस किरदार के लिए अपना पूरा एक साल देने की हिम्मत दिखाई, जो अगर असफल रहता तो उन्हें दस साल पीछे धकेल सकता था.”

इस बीच सिंह के अगले प्रोजेक्ट के बारे में सुगबुगाहटें होने लगीं थीं. अक्टूबर के महीने में वे एक विडियो में नजर आए जो उनके द्वारा फोन पर खुद से बनाया और यूट्यूब पर अपलोड किया गया विडियो था. इसमें उन्होंने एलान किया कि उन्हें यशराज फिल्म्स की अगली फिल्म बेफिक्रे के लिए ‘कास्ट’ किया गया है, जिसकी शूटिंग अप्रैल महीने में शुरू होगी. इस फिल्म का निर्देशन खुद आदित्य चोपड़ा कर रहे थे, जो सात सालों के अंतराल के बाद निर्देशन में अपनी वापसी करने वाले थे. यह अपने आप में एक बड़ी खबर थी. चोपड़ा ने अब तक केवल तीन फिल्मों का निर्देशन किया था और तीनों ही सुपर हिट रहीं थीं. सिंह के लिए यह एक और सपने के साकार होने जैसा था.

विडियो में उन्होंने बस इतना भर ही कहा. इस विडियो में सिंह, आदित्य चोपड़ा के दफ्तर के बाहर खड़े दिखाई दे रहे थे. यह वही कमरा था जिसमे उनको बैंड बाजा बारात के लिए चुने जाने की खबर दी गई थी. कैमरे की तरफ देख कर वे कहते हैं: “पांच साल बाद मैं उसी दफ्तर में घुसा. वे मुझे सोफे पर बिठा कर कहते हैं, ‘रणवीर, मैं तुम्हें अपने अगली फिल्म में ले रहा हूं.’” सिंह ने कहा, पिछली मीटिंग की तरह उन्होंने कोई तुरंत प्रतिक्रिया नहीं दी. लेकिन फिर वे कॉरिडोर तक चलकर गए और ठीक उसी जगह पर जहां वे पहली मीटिंग के बाद फूट-फूट कर रो पड़े थे: “मैं ऑफिस से बाहर निकला. मैंने कॉरिडोर में चलना शुरू किया और एक बार फिर उसी जगह पर आकर ठिठक गया और सोचने लगा कि आदि सर के साथ काम करने का मेरा सपना साकार हुआ.” बॉलीवुड फिल्म की तर्ज पर, सिंह ने कहा उन्हें फिर से उसी जगह पर तेज रुलाई आ गई. “और एक बार फिर से,” चोपड़ा वहां आए, और उन्होंने “मुझे रोता हुआ देखकर, मुझे अपनी बांहों में समेटते हुए कहा, ‘तू कर लेगा.’”

बॉलीवुड में कंडोम के विज्ञापन करने वाले पहले एक्टर बनने जैसे सिंह के कई फैसले ऐसे प्रयोग हैं जो उन्हें एक डेरिंग फिल्म स्टार बनाते हैं. साभार : नैना रेधू

(द कैरवैन के फरवरी 2016 अंक में प्रकाशित कवर स्टोरी का अनुवाद राजेन्द्र सिंह नेगी ने किया है. अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहा क्लिक करें.)