खानपान की आजादी

गोमांस के लिए संघर्ष एक जनवादी अधिकार

कलाकार चंद्रू की सिली-बुनी कामधेनु (2003) यह बताती है कि गाय, भले ही वर्तमान हिंदू धर्म में पूजी जाती है और जिसका बहुत सम्मान किया जाता है, वह एक जानवर ही है जो खाती है, गोबर करती है और अन्य जानवरों की तरह मर जाती है. जब गाय मर जाती है, तो उसकी लाश को ठिकाने लगाने का काम उन लोगों पर छोड़ दिया जाता है जिन्हें हिंदू जड़वादी सबसे ज्यादा कलंकित मानते हैं यानी दलित.
चंद्रू / साभार एस आनंद
कलाकार चंद्रू की सिली-बुनी कामधेनु (2003) यह बताती है कि गाय, भले ही वर्तमान हिंदू धर्म में पूजी जाती है और जिसका बहुत सम्मान किया जाता है, वह एक जानवर ही है जो खाती है, गोबर करती है और अन्य जानवरों की तरह मर जाती है. जब गाय मर जाती है, तो उसकी लाश को ठिकाने लगाने का काम उन लोगों पर छोड़ दिया जाता है जिन्हें हिंदू जड़वादी सबसे ज्यादा कलंकित मानते हैं यानी दलित.
चंद्रू / साभार एस आनंद

रोहित वेमुला ने 18 दिसंबर 2015 को अपनी फेसबुक पोस्ट में लिखा, “उपकुलपति ने अगर हमसे कहा होता कि हमारा निलंबन इसलिए किया जा रहा है क्योंकि हमने पिछले हफ्ते आंबेडकर जयंती, बाबरी मस्जिद विध्वंस दिवस और गोमांस उत्सव का आयोजन किया था, तो हमारे लिए यह बहुत फक्र की बात होती.” इससे एक दिन पहले, हैदराबाद यूनिवर्सिटी प्रशासन ने, जहां से रोहित अपनी पीएचडी कर रहे थे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के नेताओं के साथ मारपीट करने के इल्जाम में उनकी और चार अन्य छात्रों की बर्खास्तगी पर मोहर लगा दी थी. ये पांचों बर्खास्त किए गए छात्र दलित और आंबेडकर स्टूडेंट एसोशिएसन के सदस्य थे. 6 दिसंबर के दिन, जो बी.आर. आंबेडकर की बरसी और बाबरी मस्जिद ढहाए जाने का भी का दिन है, आंबेडकर स्टूडेंट एसोशिएसन ने एक कार्यक्रम का आयोजन किया था, जिसमें सार्वजनिक तौर पर गोमांस परोसा गया. यह त्रिपक्षीय हमला, हिंदुत्व की राजनीति के पैरोकारों को नागवार गुजरा: एक तो जाति-विरोध के सबसे महान प्रतीक को याद करना; दूसरा, हिंदू दक्षिणपंथियों द्वारा राजनीतिक हिंसा के सबसे बड़े प्रतीकात्मक कृत्य को गलीज हरकत के रूप में याद करना; और तीसरा, खुलेआम गोमांस परोसना. यही वह घटना थी, जिसने रोहित को जनवरी 2016 में अपना सबसे सशक्त राजनीतिक कदम उठाने के लिए बाध्य किया – यानि आत्मदाह. वे अपने पीछे एक नोट छोड़ गए, जिसका शीर्षक था: “मेरा जन्म एक जानलेवा हादसा था.” इस नोट में उन्होंने यूनिवर्सिटी प्राधिकारियों, तथा व्यापक स्तर पर, समूचे समाज को अपने साथ किए गए दुर्व्यवहार के लिए जिम्मेवार ठहराया.

हालांकि, हैदराबाद यूनिवर्सिटी में बीफ उत्सव का आयोजन करने वाला आंबेडकर स्टूडेंट एसोशिएसन पहला संगठन नहीं था. अपने पक्ष को दृढ़ता से पेश करने तथा विद्रोह के स्वरों को मुखर करने वाले ऐसे आयोजन पहले भी यहां किए जा चुके थे. अप्रैल 2011 में, हैदराबाद की इंग्लिश एंड फॉरेन लैंगुवेजिज की यूनिवर्सिटी ने भी दलित-आदिवासी-बहुजन अल्पसंख्यक एसोशिएसन एवं तेलंगाना स्टूडेंट एसोशिएसन द्वारा आंबेडकर का जन्म दिवस मनाने के लिए बीफ उत्सव का आयोजन किया था. इस उत्सव पर भी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् ने हमला किया था. 2012 में, हैदराबाद में ही स्थित ओस्मानिया यूनिवर्सिटी भी आंबेडकर जन्मदिवस के अवसर पर बीफ उत्सव के दौरान हुई हिंसा की साक्षी रह चुकी थी. इस अवसर पर भी दलित, शूद्र, आदिवासी और मुसलमान छात्र मौजूद थे और यहां भी परिषद् के सदस्यों ने आयोजन स्थल पर हमला किया.

हैदराबाद यूनिवर्सिटी के पूर्व छात्र, सांबैया गुंडीमेदा ने कैंपस में बीफ स्टाल का इतिहास दिया:

. . . 2006 में सुकून उत्सव से कुछ महीने पहले दलित स्टूडेंट यूनियन ने दलील दी कि खाने के स्टालों में यूनिवर्सिटी समुदाय, जिसमें छात्र, प्रोफेसर और बाकी सदस्य शामिल हैं, की सांस्कृतिक विविधता का प्रतिनिधित्व नहीं होता है. दूसरे शब्दों में यह उत्सव उच्च जातियों और उनकी संस्कृति की ही नुमाईंदगी करता है. इसने आगे यह भी दलील दी कि एक सार्वजनिक संस्थान के रूप में यूनिवर्सिटी द्वारा अपनी जगह पर एक संस्कृति-विशेष को तरजीह नहीं दी जानी चाहिए. बल्कि इसे समान रूप से यूनिवर्सिटी समुदाय की सभी संस्कृतियों के साथ अपनी जगह को साझा करना चाहिए. संक्षेप में, यूनिवर्सिटी के सांस्कृतिक उत्सव में, भारतीय समाज की सभी संस्कृतियों का प्रतिनिधित्व होना चाहिए. प्रतिनिधित्व में समानता लाने के लिए दलित स्टूडेंट यूनियन ने मांग की कि उसे भी सुकून उत्सव में बीफ स्टाल लगाने की इजाजत दी जाए. इसके पक्ष में यह भी दलील दी गई कि बीफ, दलितों के मुख्य आहारों में से एक और दलित संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है. इसके अलावा, खानपान की यह संस्कृति,मुसलमानों और हिंदू पृष्ठभूमि की अन्य जातियों की संस्कृति से भी मेल खाती है. दलित स्टूडेंट यूनियन के एक नुमाइंदे के अनुसार, यूनिवर्सिटी प्रशासन की कार्यकारिणी के सदस्य इस मांग से चिढ़ गए और उन्होंने तत्काल ही यूनिवर्सिटी कैंपस में गोमांस परोसे जाने की इस मांग को यह कहकर खारिज कर दिया कि इससे कैंपस में सांप्रदायिक और जातिगत तनाव पैदा हो सकता है.

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली स्थित जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय ने भी पीछे न रहने की ठानी. द न्यू मटेरियालिस्ट नामक छात्र समूह ने कैंपस में “बीफ और पोर्क फेस्टिवल” आयोजित करने का फैसला किया. इसने दलील दी:

कांचा इलैया शेपर्ड समाजशास्त्री, प्रध्यापक और लेखक इलैया, मैं हिंदू क्यों नहीं हूं और पोस्ट—हिंदू इंडिया के लेखक हैं.

Keywords: beef caste atrocities caste Dalit BR Ambedkar cow protection Rohith Vemula food Vedas vegetarianism
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