अफजल से मुलाकात

तिहाड़ जेल में कैद अफजल गुरु से 2006 में हुई बातचीत

08 फ़रवरी 2019
भवन सिंह/द इंडिया टुडे ग्रुप/गेटी इमेजिस
भवन सिंह/द इंडिया टुडे ग्रुप/गेटी इमेजिस

जंग खाई मेज के उस पार, हाथ में एक चम्मच पकड़े वर्दी वाले आदमी का मौजूद होना मुलाकातियों के लिए शायद कोई नई बात नहीं थी. लोग खाना लेकर आते और आदतन खोल कर उस आदमी को दिखाते. वह कभी खाने को सूंघता और कभी चम्मच से चख कर देखता. उस सुरक्षाकर्मी का चम्मच मलाई कोफ्ते, शाही पनीर और मिक्सड वेज के बर्तनों में गोता लगाने लगा. एक बूढ़ी औरत के खाने में डूबने के बाद वह चम्मच बगल में रखे स्टील के बर्तन में भरे पानी में नहा कर एक प्लास्टिक के टिफन में जा कर धंस गया. बर्तन का पानी रंगबिरंगा हो चुका था. सर्द दोपहर की रोशनी पानी में तैरते तेल को इंद्रधनुष बना रही थी.

मेरा नंबर साढे-चार बजे आया. चम्मच वाले आदमी ने तीन बार ऊपर से नीचे तक मेरी तलाशी ली. मेटल डिटेक्टर से आ रही आवाज को बंद करने के लिए मुझे अपना बेल्ट, स्टील की घड़ी और चाबियां हटानी पड़ीं. तमिलनाडु स्पेशल पुलिस का बैज लगाए आदमी ने संतुष्ट होने के बाद मुझे भीतर जाने को कहा. तिहाड़ केंद्रीय कारावास के तीन नंबर हाई रिस्क वार्ड में चौथी बार मेरी तलाशी ली गई. मैं यहां मोहम्मद अफजल गुरु से मिलने आया था.

मुलाकाती कमरे में मिलने आए लोगों और कैदियों के बीच कांच की एक मोटी दीवार थी. वहां माइक्रोफोन लगे थे जो दिवार पर लगे स्पीकर से जुड़े थे. फिर भी बहुत कम सुनाई पड़ता था और लोगों को दीवार पर कान लगाकर बात सुननी पड़ती थी. अफजल मेरे सामने आकर बैठ गए. 30 साल से कुछ अधिक के अफजल कद छोटा था और उन्होंने सफेद कुर्ता पैजामा पहन रखा था. कुर्ते की जेब में रिनॉल्ड का पेन था. सम्मान के साथ साफ आवाज में उन्होंने मेरा स्वागत किया.

“आप कैसे हैं, जिनाब?” अफजल ने पूछा.

मैंने कहा कि मैं ठीक हूं. फिर सोचने लगा कि क्या मैं भी एक ऐसे आदमी जो कि मौत के बेहद करीब है उससे यही सवाल पूछ सकता हूं? फिर मैंने भी पूछ ही लिया.

विनोद के जोस द कैरवैन के कार्यकारी संपादक हैं.

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