भिंडरांवाले

कहानी गांधी परिवार की सबसे घातक भूल और पंजाब की

नरिंदर नानू / एफपी / गैटी इमेजिस
नरिंदर नानू / एफपी / गैटी इमेजिस

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मेरे जीवन के शुरुआती पंद्रह वर्षों तक हर गर्मियों में हमारा परिवार खानकोट स्थित अपने गांव जरूर लौटता था. अमृतसर के बाहरी हिस्से में नाशपाती के पेड़ों से घिरे हमारे गांव पर धीरे-धीरे शहर उग आया है. वहां से स्वर्ण मंदिर, जिसे श्रद्धालु अक्सर दरबार साहिब कहते हैं, बमुश्किल दस किलोमीटर दूर है. कभी घर पहुंचते ही हमारा वहां जाना तय होता था. स्मृति में दर्ज वे यादें अभी भी एक दुर्लभ सुकून का एहसास दिलाती हैं. हवा में उठता गुरबानी का स्वर धीरे-धीरे मंदिर के चारों ओर सरोवर पर पसर जाता था. यही वह जगह है जो अमृतसर को उसका नाम देती है- अमृत का सरोवर. हर सुबह जब सूरज की रोशनी पानी पर झिलमिलाने लगती है, तो श्रद्धालुओं के समूह परिक्रमा करते हुए तालाब के मुख्य मार्ग से मंदिर के बीचोंबीच बने सोने से अलंकृत हरमिंदर साहिब तक का सफर तय करते हैं. दरबार साहिब सिख धर्म का केंद्र है. सुबह और शाम की प्रार्थना के अंत के अलावा हर धार्मिक और सामाजिक अवसर और जन्म, विवाह और मृत्यु जैसे मौकौं पर पढ़ी जाने वाली सिख अरदास (ईश्वर से विनती) में शामिल कुछ पंक्तियां हैं : 

सिक्खा नू सिक्खी दान 
केश दान
रेहित दान 
बिबेक दान 
पुरोसा दान 
नाम दान 
श्री अमृतसर साहिब दे स्नान 

(सिखों को सिख धर्म, लंबे केश, अच्छे आचरण, ज्ञान, अटूट विश्वास, आस्था, पावन नाम और अमृतसर के पावन कुंड में स्नान का वरदान दे.) 

पंजाब में 1980 की शुरुआत से 1990 के मध्य तक चले उग्रवाद के उपरांत दरबार साहिब में आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ. यहां आने वालों की लंबी कतारें अब सामने के सेतुमार्ग को लांघ कर आगे बढ़ जाती हैं, लेकिन इससे यहां के शांत वातावरण पर कोई फर्क नहीं पड़ा है. यह शांति हालांकि यहां के इतिहास के बरअक्स खड़ी नजर आती है. भारत में किसी भी अन्य प्रमुख धर्म की आस्था के स्थल को शायद कभी ऐसी हिंसा से नहीं गुजरना पड़ा है, जैसे हरमिंदर साहिब को. 

सरोवर का निर्माण 1581 में चौथे सिख गुरु राम दास ने करवाया था. टंकी बनाने और मंदिर को पूरा करने का कार्य पांचवें गुरु अर्जन देव ने 1601 में पूरा किया था. उस समय तक सिख समूह की तादाद इतनी बढ़ चुकी थी कि मुगल सम्राट जहांगीर गुरु अर्जन को अपनी संप्रभुता के लिए खतरा मानने लगा था. उन्हें 1606 में गिरफ्तार कर लिया गया. जब उन्होंने इस्लाम को अपना धर्म कुबूलने से इनकार किया तो उन्हें यातनाएं दी गई, जिससे उनकी मृत्यु हो गई. उनके अनुयायियों के लिए उनकी शहादत ने दिल्ली के शासन और सिख धर्म के बीच संबंधों की परिभाषा स्थापित की. नेतृत्व में बदलाव का प्रतिनिधित्व करते हुए छठे गुरु हरगोबिंद अपने साथ दो तलवारें रखते थे. इसका अर्थ था कि वह न केवल अपने शिष्यों के लिए एक आध्यात्मिक मार्गदर्शक (पीरी) बनेंगे, बल्कि उनके लौकिक जीवन में एक उपदेशक की भूमिका (मीरी) भी निभाएंगे. यही शस्त्र सिख धर्म के केंद्रीय प्रतीक 'खंडा' (तलवारों की एक जोड़ी) का आधार भी हैं. गुरु ने यह सुनिश्चित किया कि दरबार साहिब की वास्तुकला में भी इस प्रतीक की झलक मिले. सेतुमार्ग के उस पार केंद्रीय मंदिर के सामने उन्होंने आध्यात्मिक शक्ति के प्रतीक के रूप में अकाल तख्त के प्रसिद्ध भवन का निर्माण किया, जहां से वह इंसाफ के फैसले सुनाया करते थे.

1708 में गुरु गोबिंद सिंह के साथ गुरुओं की पीढ़ी समाप्त होने पर यह अधिकार अकाल तख्त के जत्थेदार या संरक्षक को सौंप दिया गया. 18वीं शताब्दी के मध्य में पंजाब में केंद्रीकृत सत्ता के टूटने के साथ सिखों की ताकत में वृद्धि होती गई. विभिन्न नेतृत्व में बिखरे हुए सिख योद्धाओं के समूह समय-समय पर अकाल तख्त में इकट्ठा होकर अपनी कार्रवाई की योजना बनाते थे. इस कड़ी में उनके विरोधी अक्सर हरमंदिर साहिब और अकाल तख्त को निशाना बनाते. इतिहास का हर वह नाम जिसने इन धर्मस्थलों का अनादर किया है, आज भी सिख समुदाय के सामूहिक जनमानस में कौंधता है. हर सिख जुबान मस्सा रंगड़ की कहानी बयान कर सकती है, जिसे 1740 में अमृतसर का कोतवाल या शासक नियुक्त किया गया था. रंगड़ ने पवित्र ग्रंथ गुरु ग्रंथ साहिब को उसके स्थान से हटा दिया था और और वह हरमंदिर साहिब में विलासिता की मजलिसें लगाया करता था. एक दिन मेहताब और सुक्खा सिंह नामक दो सिख वहां राजस्व अधिकारी के भेस में बड़ी रकम जमा करने के बहने अंदर दाखिल हुए और उसका सिर धड़ से अलग कर दिया.

धर्म के रक्षक बाबा दीप सिंह की कहानी इससे भी ज्यादा प्रचलित है. 1757 में अफगान सम्राट अहमद शाह अब्दाली ने चौथी बार दिल्ली पर कब्जा कर लिया था, लेकिन कुरुक्षेत्र के पास एक सिख दल ने उनका रास्ता रोक दिया. गुस्से में तमतमाए अब्दाली ने अपने बेटे तैमूर शाह को लाहौर के गवर्नर के रूप में इस स्थिति से निपटने के लिए स्वतंत्र छोड़ दिया. तैमूर ने हरमंदिर साहिब को ध्वस्त कर दिया, लेकिन 75 वर्षीय दीप सिंह ने परिसर को वापस कब्जाने के लिए पांच सौ सिखों की टुकड़ी का नेतृत्व किया. जब तक वे अमृतसर के पास पहुंचे, उनकी संख्या बढ़ कर पांच हजार हो चुकी थी. अपनी सेना से कहीं बड़ी अफगान सेना से लोहा लेते हुए दीप सिंह गर्दन पर चोट लगने से घायल हो गए लेकिन दरबार साहिब के लिए अपनी लड़ाई जारी रखी और अंततः सरोवर के पास घायल हो कर दम तोड़ दिया. मान्यता के अनुसार परिक्रमा में जिस स्थान पर वह गिरे थे, वहां उनका एक चित्र लगाया गया है, जिसमें उनके एक हाथ में उनका कटा हुआ सिर है, लेकिन दूसरा हाथ कस कर तलवार को थामे हुए है. बाबा दीप सिंह की शहादत आज भी सिख इतिहास में गूंजती है.

दो शताब्दियों बाद, जून 1984 में, जब भारतीय सेना प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के आदेश पर दरबार साहिब में घुसी, तो उनका उद्देश्य था जरनैल सिंह भिंडरांवाले को निरस्त्र कर वहां से हटाना. भिंडरांवाले परंपरागत रूप से सिखों के एक धार्मिक संगठन दमदमी टकसाल के चौदहवें प्रमुख थे. कहा जाता है कि कभी दीप सिंह इस संगठन का नेतृत्व करते थे. सिख धर्म की लोक कथाओं में मस्सा रंगड़ और दीप सिंह की कहानियां तल्ख और विरोधाभासी भावनाओं का स्त्रोत रही हैं. उसी तर्ज पर भिंडरांवाले और गांधी को भी उनकी उसी भूमिका के संदर्भ में याद किया जाता है, जो उन्होंने खुद ग्रहण की थी : एक रक्षक और दूसरा हमलावर. इन दोनों ही जिंदगियों के रास्ते पहली मर्तबा 1977 में एक-दूसरे से टकराए थे और दोनों को ही आज से तीन दशक पहले हिंसा ने लील लिया था. तब भिंडरांवाले ने दमदमी टकसाल की कमान संभाली ही थी और गांधी आपातकाल के बाद सत्ता खो चुकी थीं. संविधान को निलंबित करने के गांधी के फैसले का कहीं भी पंजाब जितना कड़ा विरोध नहीं हुआ था, और न ही अन्य किसी पार्टी ने अकाली दल (राज्य में सिख हितों के प्रतिनिधित्व की पार्टी) की उग्रता के साथ इसकी मुखालफत की थी. अगले सात सालों तक गांधी, भिंडरांवाले और अकाली दल एक लंबी लड़ाई के तीन ऐसे मोर्चे बन कर उभरे, जिन्होंने समय-समय पर आगे-पीछे चलते हुए अंत तक एक-दूसरे के खिलाफ कई साजिशें रचीं.

जब अकाली दल सरकार ने 1977 में जनता पार्टी और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के साथ गठबंधन में पंजाब की गद्दी संभाली, तो गांधी ने तय कर लिया था कि वह अकालियों को शक्तिहीन कर देंगी. उनकी इस इच्छा का कार्यभार उनके बेटे संजय गांधी और उनके वफादार चतुर सिख राजनीतिज्ञ ज्ञानी जैल सिंह पर छोड़ दिया गया, जिन्होंने भिंडरांवाले को अपने हथियार के रूप में चुना. भिंडरांवाले को गांधी से मिलने वाले सहयोग से कोई परहेज नहीं था. वह इसे अपने सिख रूढ़िवादी नजरिए के समर्थन के तौर पर देख रहे थे. 1980 में जब राज्य में कांग्रेस की सत्ता में वापसी हुई, तब तक भिंडरांवाले एक लोकप्रिय चेहरा बन कर उभर चुके थे. उनकी ताकत की बानगी यह थी कि अकाली (जिन्हें कमजोर बनाना उनका काम था) अब मदद के लिए उनकी शरण ले रहे थे. वह पंजाब की प्रमुख राजनीतिक शक्ति बन चुके थे. 1983 आते-आते वह दरबार साहिब परिसर के भीतर से अपना एक समानांतर राज्य चलाने लगे, जहां वह अपने अनुयायियों के सामने दोषियों को कठोर न्याय से लेकर मौत की सजा तक का फरमान सुनाते थे. यहां तक कि पंजाब में जिन पुलिसकर्मियों को उन्हें गिरफ्तार करने का काम सौंपा गया था, वे खुद उनसे अपनी हिफाजत की मांग करते थे.

1983 आते-आते भिंडरांवाले दरबार साहिब परिसर के भीतर से अपना एक समानांतर राज्य चलाने लगे, जहां वह अपने अनुयायियों के सामने दोषियों को कठोर न्याय से लेकर मौत की सजा तक का फरमान सुनाते थे. एपी फोटो

भिंडरांवाले को दरबार साहिब से हटाने के सैन्य अभियान ब्लू स्टार ने आखिरकार उनके शासन को खत्म कर दिया. लेकिन इस अभियान की सफलता को सैकड़ों लोगों की जान के साथ-साथ भारतीय सेना (जिन्हें स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार उग्रवादियों से निपटना पड़ा) की विश्वसनीयता की कीमत भी चुकानी पड़ी. बीते कई वर्षों में इस सैन्य कार्रवाई की बारीकी से जांच की गई है, लेकिन फिर भी इसमें योजना और खुफिया जानकारी की कमी, और इससे जुड़ी अफरा-तफरी की कभी कोई ठोस वजह नहीं बताई गई है. इस साल फरवरी में ब्रिटेन में कुछ खुफिया दस्तावेजों के सार्वजनिक होने पर दरबार साहिब के अंदर एक ऐसे कमांडो ऑपरेशन के बारे में जानकारी सामने आई, जो सिर्फ एक योजना तक सिमट कर रह गया था. 

इस साक्ष्य को देखते हुए मैंने ऐसे कई लोगों से दोबारा मुलाकात की जो ऑपरेशन ब्लू स्टार से पहले की घटनाओं के साक्षी थे. इन साक्षात्कारों की मदद से गांधी परिवार के उन राजनीतिक समीकरणों को पहले से कहीं अधिक स्पष्ट तरह से समझना मुमकिन है जो सीधे तौर पर इस सैन्य अभियान से जुड़े हुए थे. ब्लू स्टार की भयानक पटकथा की शुरुआत भले ही संजय गांधी ने की थी, लेकिन अब ऐसा प्रतीत होता है कि इसे विनाशकारी अंजाम तक पहुंचाना उनके छोटे भाई राजीव का काम था, जो अपनी मां की हत्या के बाद भारतीय इतिहास में सबसे बड़े जनादेश के साथ सत्ता में आए थे. ऑपरेशन ब्लू स्टार महज इंदिरा गांधी की आखिरी लड़ाई नहीं थी. यह राजीव की पहली और शायद सबसे विनाशकारी भूल थी.

जब तक दरबार साहिब के ऊपर से धुंआ छंटता, तब तक सैकड़ों निर्दोष तमाशबीनों की लाशें बिछ चुकी थी. भिंडरांवाले की हत्या कर दी गई थी और दिल्ली के खिलाफ उनके विद्रोह का आखिरी केंद्र अकाल तख्त पूरी तरह बिखर चुका था. इस ऑपरेशन के कुछ समय बाद इंदिरा गांधी की उनके सिख अंगरक्षकों द्वारा हत्या कर दी गई. जल्द ही हिंदुओं की एक बड़ी भीड़, जिसकी कमान मुख्य रूप से कांग्रेसी नेताओं के हाथ में थी, हजारों सिखों के नरसंहार पर उतर आई. पंजाब में भारत सरकार के खिलाफ पनप रहा उग्रवाद ब्लू स्टार से पहले के वर्षों की तुलना में कहीं ज्यादा तीव्र हो उठा और इस तनाव को कम होने में एक दशक का समय लगा. 

पिछले तीस वर्षों में ब्लू स्टार के विषय पर होने वाली हर बहस दो चरम दृष्टिकोणों के बीच बंटी नजर आती है : पंजाब और विदेशों में बसे चरमपंथी, जो पूरे प्रकरण में भिंडरांवाले की मिलीभगत को नजरअंदाज करते हुए सिर्फ कांग्रेस की भूमिका पर बात करते हैं, और शेष भारत के लोग, जो इस त्रासदी में कांग्रेस की भूमिका को नजरअंदाज करते हुए सिर्फ भिंडरांवाले को दोष देते हैं. जहां कई भारतीयों को लगता है कि उस जून की घटनाएं अब इतिहास की किताबों तक सीमित हैं, वहीं पंजाब में उनकी यादें आज भी जिंदा हैं. इस पूरे ऑपरेशन और भिंडरांवाले की छवि को लेकर बहुत से सिखों का मत देश के बाकी हिस्सों से स्पष्ट रूप से अलग है. इन अलग-अलग नजरियों के अस्तित्व की पड़ताल किए बिना ब्लू स्टार के इतिहास को समझना मुमकिन नहीं है.

1984 की तरह 2014 भी चुनावी साल है. अमृतसर में भारतीय जनता पार्टी के अरुण जेटली शिरोमणि अकाली दल के समर्थन के साथ कांग्रेस के कैप्टन अमरिंदर सिंह के खिलाफ खड़े हैं. तीस साल पहले जेटली की पार्टी ने स्वर्ण मंदिर में सेना की कार्रवाई का पुरजोर समर्थन किया था, जबकि तत्कालीन सांसद अमरिंदर सिंह ने विरोध में संसद और कांग्रेस, दोनों को छोड़ दिया था. चुनावी अभियान के दौरान इस निर्वाचन क्षेत्र में इतिहास की यह जानकारी खूब सुनी-सुनाई गई, जहां 65 प्रतिशत मतदाता सिख हैं. अमरिंदर, जिनकी व्यक्तिगत छवि इस मामले में साफ है, ने इस बात पर जोर दिया कि कांग्रेस पहले ही अपने किए के लिए माफी मांग चुकी है और अकालियों ने कभी भी ऑपरेशन में अपने मौन सहयोग पर सफाई नहीं दी है. (इन्हीं आरोपों से बचने के लिए अकालियों ने पंजाब में सभी गुरुद्वारों को नियंत्रित करने वाले निकाय शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी—या एसजीपीसी— जिसका वे नेतृत्व करते हैं, से दरबार साहिब परिसर में एक स्मारक बनवाया. ऑपरेशन ब्लू स्टार में मारे गए लोगों के लिए बनाया गया यह स्मारक असल में भिंडरांवाले को श्रद्धांजलि है.) 

सेना की कार्रवाई के बचाव में एक भी उम्मीदवार ने मुंह नहीं खोला- जेटली तक ने भी नहीं, जो बहुत हद तक स्थानीय अकाली कैडर के समर्थन पर निर्भर हैं. दिल्ली में पत्रकार सतीश जैकब, जिन्होंने बीबीसी के लिए ऑपरेशन ब्लू स्टार और इससे पहले की घटनाओं को कवर किया था, ने मुझे एक कहानी सुनाई जो इस असाधारण राजनीतिक एहतियात की एक वजह पर प्रकाश डालती है. जैकब पिछले महीने लुधियाना के एक बड़े क्लब में हुई शादी में थे. जब वह अपनी कार पार्क कर रहे थे, तो उन्होंने बगल में खड़े एक वाहन पर एक स्टीकर लगा देखा. जैकब ने बताया, “वह भिंडरांवाले की एक तस्वीर थी, जिसमें गुरुमुखी में लिखा था, ‘लगदा है मैंनु वापस आना पैगा.’ मैंने कहा कि यह तो बड़ा मजेदार है. लेकिन मेरे दोस्त ने कहा, ‘नहीं, ऐसा नहीं है. आजकल पंजाब की हर दूसरी कार पर ऐसा स्टीकर लगा होता है. वह एक कल्ट बन गया है. पंजाब में युवाओं के लिए वह एक बड़ा हीरो है.’” बात सिर्फ स्टिकर तक सीमित नहीं है. राज्य के बाजारों में भिंडरांवाले की तस्वीर वाली टी-शर्ट और अन्य सामान धड़ल्ले से बिकते हैं. गाड़ियों के स्टीरियो अक्सर हिप-हॉप स्टार जैजी बी का एक गाना (भारत सरकार द्वारा प्रतिबंधित) बजाते सुने जा सकते हैं :

“गुरु दशमेश बागी, नलवा वीर बागी
सदा बागी ए आ पंथ परिवार लोको...
ते साड्डा बागी सराभा करतार लोको
भिंडरावाला बागी, राजोआना बागी
भिंडरावाला बागी, हवारा जगतार बागी”

(दसवें गुरु एक विद्रोही, नलवा [रणजीत सिंह के सेनापति] एक विद्रोही

पंथ [सिख समुदाय के लिए एक शब्द], बागियों का एक परिवार ...
करतार सराभा भी एक बागी
भिंडरांवाले एक बागी, 
हवारा जगतार [बेअंत सिंह का हत्यारा] एक बागी”) 

इस प्रभाव को समझाने की कोशिश करते हुए जैकब ने भिंडरांवाले के आखिरी दिनों को याद किया. 2 जून 1984 को या उसके आसपास, यानी भारतीय सेना द्वारा दरबार साहिब को घेरने से लगभग एक दिन पहले, और सैनिकों के परिसर में प्रवेश करने से तीन दिन पहले एसजीपीसी के तत्कालीन अध्यक्ष गुरचरण सिंह टोहरा भिंडरांवाले को यह बताने के लिए गए कि स्थिति अब ऐसे चरण पर है, जब सेना की ताकत का सामना करना मुश्किल होगा, और उन्हें समय रहते आत्मसमर्पण कर देना चाहिए. जैकब ने बताया, “भिंडरांवाले टोहरा से बहुत नाराज हुआ. उन्होंने उनसे कहा, ‘तुम असली सिख नहीं हो. यहां से चले जाओ. मैं आत्मसमर्पण नहीं करने वाला.’” उस दोपहर जैकब अन्य पत्रकारों के साथ भिंडरांवाले से मिले. एक पत्रकार ने उनसे पूछा कि जब सेना आएगी तो वह क्या करेंगे? जैकब ने कहा कि भिंडरांवाले ने जवाब दिया, “आण दयो (उन्हें आने दो). वे क्या कर सकते हैं? वे मुझे मार डालेंगे, लेकिन हम उन्हें करारा जवाब देंगे.”

जैकब, जिन्होंने ब्लू स्टार पर मार्क टुली के साथ ‘अमृतसर: मिसेज गांधीज लास्ट बैटल’ नामक किताब लिखी है, ने मुझे बताया कि अगर उन्हें मौका मिलता तो वह फिर से भिंडरांवाले की कहानी उठाते. “भिंडरांवाले देहाती था, लेकिन वह जानता था कि अगर उसने आत्मसमर्पण कर दिया, तो वह जीवित तो रहेगा, लेकिन उसे भुला दिया जाएगा. फिर वे कहेंगे, ‘बंदा नकली है.’ यदि वह इतने सारे सिख शहीदों की तरह अपने प्राणों की आहुति देगा, तो अमर हो जाएगा. मैं यही राह लूंगा. उसका नाम अभी भी जिंदा है. जिंदा ही नहीं, बल्कि लौट कर आ रहा है.”

{2}

दरबार साहिब से कुछ ही दूरी पर एक संकरी सीढ़ी शिरोमणि अकाली दल के महासचिव बाबा राम सिंह के आवास तक जाती है. ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद भिंडरांवाले के करीबी सहयोगी राम सिंह को भारत सरकार ने कैद कर लिया था. पिछले महीने जब मैं उनसे मिला, तो उन्होंने वह पूरा दिन जेटली के प्रचार में बिताया था. उन्होंने तत्काल ही चुनावी अभियान में ब्लू स्टार के बारे में दिए जा रहे तर्कों को खारिज कर दिया. उन्होंने कहा, “हर कोई आज यह मानता है कि वह एक गलती थी.” उन्होंने कहा कि इसके बजाय वह भिंडरांवाले के बारे में सही बात करना पसंद करेंगे. वह इस बात से परेशान नहीं थे कि देश भर में भिंडरांवाले को बस एक हिंसक कट्टरपंथी की तरह देखा जाता है. उन्हें जो बात परेशान करती है, वह यह है कि सिख ही उसके जीवन की कहानी से बेखबर दिखते हैं. 

वह कहते हैं, “क्या किया जा सकता है? यह एक सच्चाई है कि उसका नाम बिकता है.” राम सिंह ने 1967 में स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद दमदमी टकसाल में प्रवेश किया था. उन्होंने बताया कि उस समय जरनैल सिंह, जो बाद में भिंडरांवाले बने, पहले से ही वहां पढ़ रहे थे. वह बचपन में ही टकसाल में आए थे और सात भाइयों के परिवार में सबसे छोटे थे. संगत के प्रमुख गुरबचन सिंह खुद “उसके पिता से पूछकर उसे टकसाल ले आए थे.” 1947 में पैदा हुए जरनैल सिंह फरीदकोट जिले के रोडे गांव के बराड़ जाट थे और उनका परिवार लंबे समय से संगत से जुड़ा हुआ था. राम सिंह भी इसी तरह की पृष्ठभूमि से थे. यह कोई संयोग नहीं था. हरित क्रांति से ग्रामीण पंजाब में समृद्धि आई थी, लेकिन इसने पंजाब राज्य में प्रमुख जमींदार समुदाय जाट सिखों के बीच असमानताओं को भी बढ़ा दिया था, क्योंकि जमीन के अंतर से अब सीधा संपन्नता और हैसियत में भी अंतर आने लगा था. भिंडरांवाले और राम सिंह, दोनों के परिवारों अपनी आजीविका कमाने के लिए संघर्ष करते थे. (भिंडरांवाले की मौत के बाद पंजाब में भारतीय राज्य के खिलाफ हथियार उठाने वाले कई नौजवानों की भी यही पृष्ठभूमि थी.) 

परंपरागत रूप से दमदमी टकसाल की शुरुआत दसवें गुरु, गुरु गोबिंद सिंह से होती है, जिन्होंने दमदमा साहिब गुरुद्वारे में रहते हुए गुरु ग्रंथ साहिब को कंठस्थ किया और फिर सिखों के एक समूह को इस पवित्र ग्रंथ को सही से पढ़ना और समझना सिखाया. समय बीतने के साथ टकसाल को सिख धर्म के रूढ़िवादी प्रचार के लिए जाना जाने लगा. एसजीपीसी द्वारा हाल के वर्षों में कई मिशनरी कॉलेजों की स्थापना से पहले तक इसे प्रमुख गुरुद्वारों में जत्थेदारों और रागियों (गायकों) का स्रोत माना जाता था. इसमें भर्ती होने वाले बहुत से युवकों के परिवार की माली हालत ऐसी होती थी कि वे एक इंसान का भरण-पोषण करने की जिम्मेदारी से मुक्त होने से ही निश्चिंत हो जाते थे. 

टकसाल में युवकों का प्रशिक्षण काफी कठोर होता था. राम सिंह अपनी व्यापक शिक्षा को याद करते हुए बताते हैं, “हमने गुरु ग्रंथ साहिब का उचित पाठ सीखने से शुरुआत की. हम पहले पाठ में प्रत्येक शब्द का अर्थ सीखते, फिर प्रत्येक छंद का मतलब समझते और फिर वेदांत का अध्ययन करते. इस पूरी प्रक्रिया में सात से दस साल लग जाते थे.” जब तक राम सिंह मदरसा पहुंचे, तब तक जरनैल सिंह वहां पूरी तरह से नहीं रहते थे. ऐसा इसलिए था क्योंकि गुरबचन सिंह की इच्छा थी कि वे शादी के लिए घर लौटकर एक गृहस्थ का जीवन जियें. जरनैल सिंह ने भारी मन से टकसाल से विदा लेकर 1966 में विवाह किया और फिर परिवार की जमीन के अपने हिस्से से अपना गुजारा करने लगे. 

द ट्रिब्यून अखबार के लिए काम करने वाले पत्रकार दलबीर सिंह 1980 के दशक में भिंडरांवाले के आंतरिक घेरे का हिस्सा बन गए थे. अपनी किताब नेदियों दित्थे संत भिंडरांवाले (संत भिंडरांवाले को करीब से देखा) में वह एक किस्सा बताते हैं, जब भिंडरांवाले ने एक बार उन्हें अपनी जमीन और जीवन के बारे में बताया था. उन्होंने दलबीर को बताया कि परिवार के बीच बंटवारा होने पर उन्हें जमीन और मवेशियों का सबसे खराब हिस्सा दिया गया था. एक बार सर्दी में उनके पास मवेशियों के लिए चारा खत्म हो गया. भिंडरांवाले ने दलबीर को बताया, “मैं अपने भाई जगजीत सिंह के गन्ने के खेत में गया, सूखे पत्तों का एक ढेर उठाया और अपने मवेशियों के सामने रख दिया. थोड़ी देर बाद मेरा भाई आया और पूछा, ‘ओए जरनैल, तूने गन्ने के सूखे पत्ते उठाने से पहले किससे पूछा था?’ मैंने जवाब दिया, ‘भाई, मैंने किसी से नहीं पूछा.’ फिर मेरे भाई ने मुझसे कहा कि मैं उन पत्तों को उठाकर वापस उसी खेत में रख दूं, जहां से मैंने उन्हें उठाया था. मैंने उनका सम्मान करते हुए पत्तों को वापस उनके खेत में डाल दिया.” 

दलबीर बताते हैं कि कई वर्षों बाद एक दिन जब भिंडरांवाले दरबार साहिब परिसर में अपने कुछ अनुयायियों के साथ बैठे हुए थे, तो उनके कमरे का दरवाजा खुला और जगजीत सिंह ने अंदर प्रवेश किया. “संत ने उनसे पूछा, ‘ओए, तुम यहां क्यों आए हो?’ जगजीत ने कहा, ‘तुम्हारे दर्शन के लिए.’ संत ने कहा, ‘निकल जाओ. दर्शन खत्म हुआ.’” जरनैल सिंह किसी अपमान को भूलने वालों में से नहीं थे. दिल्ली में जिन लोगों ने उन्हें मोहरा बनाने की कोशिश की, वे यह बात कभी नहीं समझ पाए. जिस जाट समाज में उनका जन्म हुआ था, उसमें जरा सी तौहीन तक से खून-खराबे का पीढ़ियों तक चलने वाला सिलसिला शुरू हो सकता था. इस संस्कृति में इज्जत सर्वोपरि थी. अपनी बात पर अडिग न रहने वालों और उसे मनवाने के लिए हिंसा पर न उतरने वालों की यहां कोई पूछ नहीं थी. 

जिन पत्रकारों ने भिंडरांवाले में केवल एक सरल देहाती देखा, उन्होंने इस तथ्य की अनदेखी की कि उनकी तेजतर्रार वाणी और दबंग तौर-तरीकों ने जाट सिख किसानों पर बहुत प्रभाव डाला था. इसमें स्वाभाविक रूप से उनके धार्मिक प्रशिक्षण की अहम भूमिका थी. राम सिंह याद करते हैं कि जब भी जरनैल सिंह संगत में आते थे, तो वे अधिकतर समय किसी से घुलते-मिलते नहीं थे और बहुत कम बोलते, खाते और सोते थे. “उन्हें गुरबानी और रोज की प्रार्थना पढ़ने में महारत हासिल थी.” अगस्त 1977 में जरनैल सिंह को टकसाल में वापस बुलाया गया. गुरबचन सिंह के उत्तराधिकारी संत करतार सिंह की एक सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी. एक आंशिक भागीदार के रूप में भी करतार के पसंदीदा शिष्य जरनैल सिंह की अपील इतनी मजबूत थी, कि टकसाल का नेतृत्व करने के लिए उन्हें करतार के बेटे भाई अमरीक सिंह के ऊपर तरजीह दी गई. आगे चलकर अमरीक सिंह उनके सबसे करीबी सहयोगियों में से एक बने. टकसाल कभी संगरूर जिले के भिंडरां गांव में स्थित था. गरीब किसान जरनैल सिंह, जो कभी अपने मवेशियों के लिए चारे का मोहताज था, ने अपने कई पूर्वजों की लीक पर चलते हुए इस गांव का नाम अपनाया और सिख धर्म की सबसे बड़ी संगतों में से एक के प्रमुख संत जरनैल सिंह भिंडरांवाले बन गए.

नई कुर्सी पर नियुक्ति के एक साल से भी कम समय में भिंडरांवाले ने एक ऐसी धार्मिक लड़ाई को अंजाम दिया, जिसने पंजाब और दिल्ली दोनों का ध्यान खींचा. इसने एक किस्म से आने वाले समय में उनके द्वारा की जाने वाली गतिविधियों की नींव रखी, जिनकी रूपरेखा समान होती थी. मसलन पहले उनकी बयानबाजी से हिंसा भड़कती, फिर वह दरबार साहिब परिसर में शरण लेते और अंततः शासन द्वारा बरी कर दिए जाते. 1978 के वसंत में बैसाखी के दिन संत निरंकारी नाम के एक विधर्मी सिख संप्रदाय ने अमृतसर की सड़कों से एक जुलूस निकाला. बैसाखी का सिखों के लिए विशेष महत्व है. मान्यताओं के अनुसार इस दिन गुरु गोबिंद सिंह ने खालसा की स्थापना की थी. इस शब्द का इस्तेमाल वे उन सिखों के लिए करते थे, जो सिख धर्म के सभी प्रतीकों का अनुपालन करते हैं. 

संत निरंकारी एक जीवित गुरु में विश्वास करते थे, जो रूढ़िवादी सिखों के लिए ईश-निंदा के बराबर था. इस चलते बैसाखी पर उनका जुलूस उन्माद भड़का सकता था. सत्तारूढ़ अकाली दल ने यह जानते हुए भी मार्च की अनुमति दी थी कि इससे रूढ़िवादी नाराज हो सकते हैं. जैसी उम्मीद थी, भिंडरांवाले और उनके समर्थकों ने दरबार साहिब के पास एक सभा बुलाई, जिसमें भिंडरांवाले ने संत निरंकारी के खिलाफ एक उग्र भाषण दिया. तनाव पैदा होने में देर नहीं लगी. इसके बाद वह अपने कृपाण निकाल कर जुलूस की ओर बढ़ने लगे. लेकिन संत निरंकारी हथियारों से लैस थे और उन्होंने भिंडरांवाले के 13 साथियों को मार गिराया. इसके बाद संत निरंकारी प्रमुख गुरबचन सिंह को उनके कई अनुयायियों के साथ गिरफ्तार कर लिया गया, लेकिन उनका मुकदमा राज्य के बाहर हरियाणा में स्थानांतरित कर दिया गया. 

इन हत्याओं पर जैसे ही सिखों का गुस्सा फूटा, भिंडरांवाले उनके आक्रोश की शमशीर बन गए. उन्होंने न तो अकाली दल और न ही उसके नेता, पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल को इस घटना को भूलने दिया. अपने पचास साल के इतिहास में पहली बार अकालियों को सिख रूढ़िवादियों की ओर से बोलने वाले किसी व्यक्ति ने पछाड़ दिया था. जल्द ही दिल्ली में बैठी कांग्रेस पार्टी का ध्यान भिंडरांवाले पर गया. खुशवंत सिंह के साथ सह-लिखित अपनी पुस्तक ट्रेजडी ऑफ पंजाब में वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर इस घटनाक्रम को समझाते हैं. चूंकि इंदिरा गांधी के बेटे संजय “यह जानते थे कि संविधान के दायरे से निकल कर काम कैसे किया जाता है,” इसलिए उन्होंने अकाली दल सरकार को चुनौती देने के लिए उनके खिलाफ एक “संत” को खड़ा करने का सुझाव दिया. इस काम के लिए दो सिख ग्रंथियों/पुजारियों को चुना गया और अंतिम चयन संजय पर छोड़ दिया. उनमें से एक “साहसी” नहीं दिखता था. दूसरे थे भिंडरावाले. संजय के मित्र रहे सांसद कमलनाथ ने नैयर को बताया, “भिंडरांवाले सुनने और दिखने में मजबूत था और इसलिए हमने उनका चुनाव किया. हम कभी-कभी उसे पैसे देते थे, लेकिन हमने कभी नहीं सोचा था कि वह आतंकवादी बन जाएगा.”

बैसाखी की घटना के कुछ महीने बाद दल खालसा नामक एक नए राजनीतिक संगठन ने चंडीगढ़ में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की. जल्द ही यह स्पष्ट हो गया कि इस समूह का उद्देश्य भिंडरांवाले की मांगों का समर्थन करना था. यह समूह खुले तौर पर वह राजनीतिक बातें करता था, जो भिंडरांवाले व्यक्तिगत स्तर पर नहीं कर पाते थे. दल खालसा ने भिंडरांवाले के बारे में इस काल्पनिक धारणा को बरकरार रखा कि वह एक धार्मिक व्यक्ति थे, जिनका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं था. इसके पीछे मकसद था दिल्ली के मीडिया का ध्यान खींचना. रूढ़िवादी सिख समुदाय के लिए इन बातों का कोई खास मतलब नहीं था. अपनी पुस्तक अमृतसर: मिसेज़ गांधीज़ लास्ट बैटल में मार्क टुली और सतीश जैकब दावा करते हैं कि दल खालसा की प्रेस कॉन्फ्रेंस का 600 रुपए का खर्चा जैल सिंह द्वारा उठाया गया था, जो जल्द ही इंदिरा गांधी के गृहमंत्री बने. 

पंजाब की राजनीति के दिग्गज जैल सिंह का भिंडरांवाले को संरक्षण देना उनके अपने राजनीतिक दृष्टिकोण से मेल खाता था. उन्होंने स्वयं एक प्रचारक के रूप में प्रशिक्षण लिया था. 1972 और 1977 के बीच पंजाब के मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने खुले तौर पर सिख धार्मिक प्रतीकवाद के इस्तेमाल से अपनी शर्तों पर अकालियों का सामना किया था. जैकब ने मुझे बताया कि कई वर्षों बाद भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति जैल सिंह ने उनसे इस दावे का स्पष्टीकरण मांगा, कि उन्होंने दल खालसा के कार्यक्रम का खर्चा उठाया था. जैकब बताते हैं, “मैंने जवाब दिया, ‘ज्ञानीजी, मेरे पास अभी भी बिल की एक प्रति मौजूद है.’ उन्होंने उसके बाद कुछ नहीं कहा.” 

पंजाब के बाहर भिंडरांवाले और कांग्रेस के बीच गठबंधन को अक्सर ऐसे देखा जाता है कि पार्टी अपने हित साधने के लिए एक छोटे-मोटे प्रचारक का उपयोग कर रही थी, और इस दौरान उन्होंने अंजाने में उसे बेहद ताकतवर बना दिया. लेकिन टकसाल प्रमुख के रूप में भिंडरांवाले की पहले से ही रूढ़िवादी सिखों के बीच एक शक्तिशाली हैसियत थी. कांग्रेस का साथ रहा हो या न रहा हो, भिंडरांवाले कभी भी छोटी शख़्सियत नहीं थे. वास्तव में दोनों के बीच का संबंध आपसी सुविधा पर टिका था, जो केवल तब तक चला जब तक भिंडरांवाले को इसका फायदा मिलना बंद नहीं हुआ.

जनवरी 1980 में सत्ता में इंदिरा गांधी की वापसी तक भिंडरांवाले का कद और प्रभाव, दोनों बढ़ चुके थे. चुनाव के दौरान उन्होंने पंजाब में कांग्रेस के कुछ उम्मीदवारों के लिए प्रचार किया, और एक बार गांधी के साथ एक मंच भी साझा किया. लेकिन बैसाखी की घटना से यह स्पष्ट हो गया कि उन्हें काबू में रखना मुश्किल था. चुनाव परिणाम घोषित होने के कुछ ही दिन बाद गुरबचन सिंह और उनके अनुयायियों को बरी कर दिया गया. संत निरंकारी के खिलाफ भिंडरांवाले की बयानबाजी तुरंत तेज हो गई और अप्रैल में गुरबचन सिंह की दिल्ली में उनके आवास पर हत्या कर दी गई. नैयर लिखते हैं कि केंद्रीय जांच ब्यूरो ने हत्या की जांच में पाया कि “निरंकारी प्रमुख को मारने की योजना ‘बनाने और उसे अंजाम देने’ में भिंडरांवाले के करीबी अनुयायी या जत्थे के “सात” सदस्य और तीन व्यक्ति प्रत्यक्ष रूप से शामिल थे.” हत्या के हथियार का लाइसेंस भिंडरांवाले के एक भाई  के नाम पर था, जिसने दावा किया कि उसने हथियार अपने अंगरक्षक के लिए लिया था. 

जब भिंडरांवाले का नाम पुलिस रिपोर्ट में आया, तो उसने पहली बार दरबार साहिब परिसर के भीतर गुरु नानक निवास में शरण ली. 1980 के दशक तक भारतीय पुलिस ने केवल एक बार इस परिसर में प्रवेश करने का प्रयास किया था, और इसके परिणाम विनाशकारी रहे थे. 1955 में जब एक अलग पंजाबी भाषी राज्य की मांग ने जोर पकड़ा था, तो दरबार साहिब में रहने वाले अकाली दल के स्वयंसेवक गिरफ्तार होने के उद्देश्य से बाहर आने लगे. घबराई हुई राज्य सरकार ने 4 जुलाई को पुलिस को मंदिर परिसर में प्रवेश करने और वहां जमा स्वयंसेवकों को तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस के इस्तेमाल की अनुमति दे दी. तुरंत ही सरकार के इस कदम की आलोचना होने लगी. इसके प्रभाव इतने गंभीर थे कि तत्कालीन मुख्यमंत्री भीम सेन सच्चर को खुद अकाल तख्त के सामने पेश होकर अपने किए के लिए माफी मांगनी पड़ी थी.

भिंडरांवाले तब तक दरबार साहिब में रहे, जब तक कि जैल सिंह ने उन्हें मामले से बरी नहीं करवाया. गृहमंत्री ने संसद में यह घोषणा की कि निरंकारी प्रमुख की हत्या में भिंडरांवाले का कोई हाथ नहीं था और इस प्रकार मुकदमे की संभावना समाप्त हो गई. दरबार साहिब भिंडरांवाले के लिए एक सुरक्षित ठिकाना साबित हुआ था. वर्तमान में इसे बारीकी से देखें तो यह असंभव लगता है कि पुलिस को यह अनुमान नहीं रहा होगा कि वह फिर से वहीं का रूख करेंगे. प्रधानमंत्री के पद पर वापस आते ही गांधी ने पंजाब सहित उनके विरोधियों द्वारा शासित कई राज्य सरकारों को भंग कर दिया था. यह उनकी कई बड़ी गलतियों में से एक थी. यहीं से ऑपरेशन ब्लू स्टार का भी जन्म हुआ, क्योंकि अब राज्य की राजनीति के समीकरण बदल चुके थे. 

भिंडरांवाले जल्द ही कांग्रेस के नए मुख्यमंत्री दरबारा सिंह के लिए सिरदर्द बन गए. वहीं जैल सिंह, जो राज्य पर अपनी पकड़ नहीं छोड़ना चाहते थे, ने अपने मतलब के लिए भिंडरांवाले को कठपुतली बनाने का प्रयास किया. सत्ता से बेदखल अकाली अपने सबसे बड़े विरोधी से मदद मांगने आए. उस समय अकाली दल को अलग-अलग राजनीतिक तरीकों वाली एक त्रिमूर्ति चलाती थी. इन तीनों में से भिंडरांवाले को प्रकाश सिंह बादल से नफरत थी. वहीं अहिंसक प्रवृत्ति के हरचंद सिंह लौंगोवाल और भिंडरांवाले में जमीन-आसमान की दूरी थी. लेकिन एसजीपीसी के प्रमुख और अकाली नेताओं के तीसरे और सबसे कट्टर नेता गुरुचरण सिंह टोहरा ने अपनी पार्टी और भिंडरांवाले के बीच गठबंधन स्थापित करने में बड़ी भूमिका निभायी. अगले कुछ वर्षों में दोनों पक्षों के संबंधों में काफी सुधार आया. भिंडरांवाले और अकालियों के बीच अब धार्मिक मुद्दों पर भिड़ंत की जगह राजनीतिक उठा-पठक शुरू हो गई, जिसमें निशाना भारतीय राज्य पर था.

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आजाद भारत में पंजाब के गठन के दिनों से ही हिंदुओं और सिखों के बीच मतभेद रहे हैं. चूंकि सिख पंजाबी जुबान में अपनी धार्मिक मांगें अभिव्यक्त कर रहे थे, इसलिए पंजाबी हिंदू खुद को अपनी इस मातृभाषा से दूर करने लगे. सिखों ने उनके इस कदम को अपनी साझा पहचान के संदर्भ में विश्वासघात के रूप में देखा. क्षेत्रीय मीडिया भी इस सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से अछूता नहीं रहा और नतीजन इसके भयानक परिणाम हुए. गुरबचन सिंह की हत्या को अभी एक साल भी नहीं गुजरा था कि एक और हत्या ने पंजाब के संकट को गहरा कर दिया. इस घटना से न सिर्फ कांग्रेस द्वारा भिंडरांवाले को मिलने वाला राजनीतिक संरक्षण उजागर हुआ, बल्कि यह तथ्य भी सामने आ गया कि किस तरह वह इस बलबूते राज्य मशीनरी पर पूरी तरह हमलावर हो चुके थे. 

9 सितंबर 1981 को पंजाब केसरी समूह के अखबारों के मालिक सेठ लाला जगत नारायण की मोटरसाइकिल पर सवार तीन लोगों ने लुधियाना के पास गोली मारकर हत्या कर दी. पंजाब केसरी राज्य का सबसे प्रभावशाली हिंदी अखबार था. धर्म और भाषा के बीच के सांप्रदायिक खेल में अखबारों को भी इस कसौटी पर परखा जाने लगा. माना जाता था कि हिंदी अखबार हिंदू हितों को उठाते थे, ठीक वैसे ही जैसे कई पंजाबी अखबार सिख हितों को सामने रखते थे. नारायण के हत्यारों में से एक नछत्तर को मौके पर ही गिरफ्तार कर लिया गया था. भाग जाने वाले दो लोगों में से एक भिंडरांवाले का भतीजा स्वर्ण सिंह भी था. 

नारायण द्वारा प्रकाशित अखबारों में एक पंजाबी अखबार जगबानी भी था, जो पुरजोर तरीके से भिंडरांवाले का विरोध करता था. दलबीर सिंह ने अपनी पुस्तक में लिखा है, “संत भिंडरांवाले को अपने समर्थकों के माध्यम से कई अखबारों में छपने वाले विभिन्न समाचारों के बारे में पता चलता था, लेकिन वह जगबानी को हमेशा स्वयं पढ़ते थे.” एक सुबह एक संपादकीय पढ़ने के बाद, जिसमें जगत नारायण ने अकाल तख्त के जत्थेदार और एसजीपीसी प्रमुख को गद्दार/ देशद्रोही कहा था, “संत ने अपने अनुयायियों से पूछा, ‘क्या तुम में से किसी ने इसे पढ़ा है?’ उनमें से कोई भी इसके बारे में कुछ नहीं जानता था. भिंडरांवाले ने उनमें से एक को जोर से वह संपादकीय पढ़ने के लिए कहा. अपने धार्मिक नेताओं को गद्दार/ देशद्रोही कहे जाने की बात सुन कर सभी को बुरा लगा. उनमें से एक ने पूछा, ‘हमारे लिए क्या आदेश है?’ संत ने जवाब दिया, ‘जब कोई तुम्हारे पिता की की पगड़ी उछाले और पूरे समुदाय के गौरव को धूल में मिला दे, तो क्या तुम्हें आदेश की जरूरत है?’ कुछ ही दिनों बाद सारे अखबार लाला जगत नारायण की मौत की खबर से पटे हुए थे.”

12 सितंबर को पुलिस नारायण की हत्या के आरोप में भिंडरांवाले को गिरफ्तार करने के लिए हरियाणा के चंदूकलां पहुंची. लेकिन भिंडरांवाले को पहले ही इसकी खबर मिल चुकी थी. नैयर कहते हैं कि यह शायद खुद जैल सिंह का काम था. इत्तिला मिलते ही वह गिरफ्तारी से बचते हुए अमृतसर के पास चौक मेहता स्थित दमदमी टकसाल के मुख्यालय में चले गए. पंजाब पुलिस कभी उनसे पार नहीं पा पाई. बीरबल नाथ, जिन्होंने 1980 और 1982 के बीच पंजाब पुलिस का नेतृत्व किया, ने अपनी किताब द अनडिस्क्लोज्ड पंजाब: इंडिया बीसिज्ड बाई टेरर में लिखा है कि अक्सर जैल सिंह और दरबारा सिंह भिंडरांवाले और उनके आदमियों की सहायता करने में एक दूसरे को पीछे छोड़ देते थे. नाथ लिखते हैं, “13 सितंबर 1981 को मुझे भारत के गृहमंत्री ज्ञानी जैल सिंह का फोन आया कि संत जी की गिरफ्तारी के सवाल पर पुनर्विचार किया जाए. मैंने उनसे कहा कि पुलिस अदालत के आदेशों से बंधी हुई है.”

भिंडरांवाले अब लगातार दिल्ली की अवहेलना कर रहे थे और कोई उनका कुछ नहीं कर पा रहा था. इससे सिखों के बीच उनकी बढ़ती लोकप्रियता में भी इजाफा हुआ. अंततः जब चौक मेहता से गिरफ्तारी होना तय हो गया, तो भिंडरांवाले ने अपने आत्मसमर्पण की तिथि और शर्तें निर्धारित कीं और मांग रखी कि एक अमृतधारी सिख ही उन्हें हिरासत में ले. जब उन्हें 20 सितंबर को गिरफ्तार किया गया, तो पुलिस और मौके पर मौजूद उनके अनुयायियों के बीच खूनी संघर्ष में सात लोगों की मौत हो गई. गिरफ्तारी के एक महीने से भी कम समय में, 14 अक्टूबर को, जैल सिंह ने एक बार फिर संसद के सामने घोषणा की कि जगत नारायण की हत्या में भिंडरांवाले की संलिप्तता का कोई सबूत नहीं है. भिंडरांवाले को हिरासत से रिहा कर दिया गया. यह दूसरा मौका था जब उन्हें तय प्रक्रिया के बिना ही निर्दोष घोषित कर दिया गया था.

पंजाब में भिंडरांवाले ने जितनी हिंसा फैलाई थी, उसके चलते ब्लू स्टार से लगभग दो साल पहले भी उनके खिलाफ सैन्य कार्रवाई की संभावना जताई गई थी. लेकिन जिस घटना से ऑपरेशन की राह पर जाने की शुरुआत हुई, वह इससे भी कहीं पहले हुई थी. वह अकाली दल द्वारा किया गया एक विरोध प्रदर्शन था, जिससे भिंडरांवाले का कोई ताल्लुक नहीं था. अप्रैल 1982 में अकालियों ने सतलुज-यमुना लिंक नहर (जो हरियाणा को पंजाब की नदियों से पानी प्राप्त करने की अनुमति देती है) के निर्माण के खिलाफ “नहर रोको” आंदोलन शुरू किया. इंदिरा गांधी ने एक बार फिर अल्पकालिक चुनावी लाभ को तरजीह देते हुए इस मामले में अकालियों की सुप्रीम कोर्ट में जाने की मांग को अनदेखा कर दिया. इसके उलट उन्होंने पंजाब और हरियाणा के कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों के बीच एक समझौता करवाया. हरियाणा में 1982 में चुनाव होने थे और यह समझौता साफ तौर पर उनके पक्ष में था. 

“नहर रोको” आंदोलन के दौरान पंजाब में हिंदू-सिख हिंसा भड़काने के उद्देश्य से कई घटनाएं होने लगीं. कहा जाता है कि इनके पीछे भिंडरांवाले के राजनीतिक मोर्चे दल खालसा का हाथ था. केंद्र सरकार ने जल्द ही एक बैठक में संगठन पर प्रतिबंध लगाने का फैसला किया. इस बैठक में पंजाब पुलिस प्रमुख बीरबल नाथ तो मौजूद थे, लेकिन जल्द ही भारत के राष्ट्रपति बनने जा रहे जैल सिंह वहां नहीं थे. नाथ ने लिखा है, “अगर गृहमंत्री वहां होते, तो वह निश्चित रूप से इसे वीटो कर देते. सब उनकी प्रवृत्ति से परिचित थे.” इस बैठक में भिंडरांवाले को बंबई में गिरफ्तार करने का निर्णय लिया गया, जहां वह जल्द ही अपने सशस्त्र जत्थे के साथ यात्रा करने वाले थे. लेकिन यह प्रयास भी महज एक तमाशा बन कर रह गया. गिरफ्तारी की सूचना मिलते ही उनके शिष्यों ने गुरबचन सिंह मनोचल (जो ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद उग्रवादी शिविर का एक मुख्य नाम थे) को भिंडरांवाले के भेस में पेश किया. इस दौरान भिंडरांवाले अपने अनुयायियों द्वारा तैयार किए गए फिएट गाड़ियों के एक बेड़े में शहर से भागने में सफल रहे.

बंबई की रणनीति महत्वपूर्ण थी क्योंकि पंजाब में भिंडरांवाले को गिरफ्तार करना लगभग असंभव था. नाथ कहते हैं कि पुलिस भिंडरांवाले के नेतृत्व वाले कट्टर दल से भिड़ने के लिए तैयार नहीं थी, जो आत्मसमर्पण के बजाय मौत चुनना पसंद करते. इस समस्या के निपटारे के लिए नाथ ने एक कमांडो कंपनी बनाई और गिरफ्तारी के लिए चार बख्तरबंद वाहनों का उपयोग करने का फैसला किया. जब तक उनकी बात सरकार के शीर्ष स्तर तक पहुंची, तब तक यह मांग बख्तरबंद वाहनों से बदलकर टैंकों के अनुरोध में तब्दील हो चुकी थी. मैंने इंदिरा गांधी के पूर्व सचिव आर के धवन से पूछा कि यह कैसे हुआ? 

उन्होंने मुझे बताया, “दरबारा सिंह ने टैंकों के इस्तेमाल की अनुमति मांगी.” जब गांधी के पास अनुरोध आया, तो उन्होंने इस पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया और गृहमंत्री को अपनी दो टूक बात सुना दी. “उन्होंने पूछा कि टैंकों या सेना के इस्तेमाल की क्या जरूरत है?” सैन्य कार्रवाई के प्रति गांधी की अनिच्छा के बावजूद जुलाई 1982 तक यह स्पष्ट हो चुका था कि स्थानीय राजनीतिक ताकतों की मदद से हर मोड़ पर प्रशासन को चकमा देने वाले भिंडरांवाले पर शिकंजा कसना अब पुलिस के बूते की बात नहीं रह गई थी. 

नाथ लिखते हैं कि उसी महीने भिंडरांवाले के करीबी सहयोगी अमरीक सिंह को गिरफ्तार करने का प्रयास भी विफल हो गया था क्योंकि मुख्यमंत्री दरबारा सिंह ने अमरीक सिंह को पहले ही इसकी सूचना दे दी थी. कुछ दिनों बाद एक दूसरा प्रयास सफल हुआ. नाथ ने बताया कि ऐसा इसलिए संभव हुआ क्योंकि तब दरबारा सिंह शिमला में थे और गिरफ्तारी होने के बाद ही उन्हें सूचित किया गया था. उस महीने के अंत में भिंडरावाले, जो अमरीक सिंह की गिरफ्तारी से भड़के हुए थे, ने एक बार फिर दरबार साहिब परिसर को अपना मुख्यालय बना लिया. इस बार यह बदलाव स्थायी था. दरबार साहिब में भिंडरांवाले की वापसी पर अकाली दल ने भी उसी रास्ते पर चलने का फैसला किया. उन्होंने भिंडरांवाले के समूह के साथ मिल कर गांधी के खिलाफ चल रहे “नहर रोको” आंदोलन को धर्म युद्ध मोर्चा की शक्ल दे दी. इसका अर्थ था दिल्ली में सरकार के खिलाफ एक संयुक्त मोर्चा. गुरबचन सिंह और लाला जगत नारायण की हत्याओं की तरह इस समय से लेकर ऑपरेशन ब्लू स्टार के बीच पंजाब में जितनी भी हिंसा हुई, उसमें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से दरबार साहिब परिसर के अंदर रह रहे पुरुषों के इसी समूह की मुख्य भूमिका थी.

आम तौर पर इस संयुक्त मोर्चे का नेतृत्व अकाली नेता लौंगोवाल करते थे, लेकिन भीड़ भिंडरांवाले के लिए ही जुटती थी. प्रत्येक सभा में अकाली उन्हें सबसे अंत में बोलने के लिए बुलाते थे क्योंकि उनके मंच से हटते ही भीड़ छंट जाती थी. पूरे गठबंधन के दौरान लौंगोवाल और अन्य अकाली नेता केंद्र सरकार से ऐसी रियायतों की उम्मीद करते रहे, जिससे लौंगोवाल के लिए आंदोलन को खत्म करने और 1985 के विधानसभा चुनावों में एक प्रतीकात्मक जीत दर्ज करने की राह खुल जाती. लेकिन गांधी एक ऐसे निपटारे की उम्मीद में थी जिससे 1984 के उत्तरार्ध में होने वाले संसदीय चुनावों के समय पूरा देश उनकी मंशा और दृढ़ता से अवगत हो जाता. यह भारत की अब तक की सबसे घातक चुनावी पैंतरेबाजी थी. एक साल से भी कम समय में इस कहानी के तीनों मुख्य किरदारों- भिंडरांवाले, गांधी और लौंगोवाल- का हिंसक अंत हो चुका था. 

टिम ग्राहम / गैटी इमेजिस

1982 के अंत में गांधी ने बातचीत का एक आखिरी मौका गंवा दिया था. 19 नवंबर से शुरू होने वाले एशियाई खेलों की पूर्व संध्या पर उन्होंने एक ऐसे समझौते की शर्तों को नकार दिया, जिस तक पहुंचने के लिए भारत सरकार और अकालियों ने कड़ी मेहनत की थी. उस समझौते की शर्तों में राज्यों की राजधानी चंडीगढ़ को पंजाब में स्थानांतरित करना और पंजाब के दो जिलों के हरियाणा में हस्तांतरण के विषय में विस्तार से होने वाली बातचीत का प्रस्ताव शामिल था. लेकिन हरियाणा के मुख्यमंत्री भजन लाल के दबाव में गांधी ने यह समझौता रद्द कर दिया.

प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव रहे पीसी अलेक्जेंडर मानते हैं कि यह एक गलत निर्णय था. उन्होंने अपने संस्मरण थ्रू द कॉरिडोर ऑफ पावर में लिखा है, “उनका जो भी तर्क रहा हो लेकिन मैं उन लोगों में से हूं जो यह मानते हैं कि सरकार ने वास्तव में शांति स्थापित करने का एक अच्छा अवसर गंवा दिया था.” यह तथ्य है कि पंजाब और दिल्ली के बीच इससे पहले कभी एक आपसी समझौते में इतनी सहमति नहीं बनी थी. एक बार फिर गांधी द्वारा अल्पकालिक राजनीतिक लाभ को तरजीह देने के कारण अकालियों ने अपना रुख सख्त कर लिया. इसके बदले में उन्होंने भिंडरांवाले को एक ऐसी ताकत के रूप में देखना शुरू कर दिया, जिससे वह सरकार के खिलाफ खड़े हो सकते थे. 

इस दौरान किसी भी पक्ष के अधीन न होने के कारण भिंडरांवाले की ताकत बढ़ती रही. वह दरबार साहिब परिसर में बैठ कर सरकारी पोस्टिंग और नियुक्तियों पर फरमान जारी करने लगे. जिन पुलिसकर्मियों ने पूर्व में उन से टकराने की हिम्मत की थी, वह उनके भविष्य का फैसला करने लगे थे. उन्होंने दो सौ से अधिक हथियारबंद लोगों को भी इकट्ठा किया, जिनमें कुछ टकसाल से थे तो कुछ कानून से भागे हुए मुजरिम थे. वह जानते थे कि पुलिस उन्हें गिरफ्तार करने के लिए परिसर में प्रवेश नहीं कर सकती थी. पूर्वी पाकिस्तान में 1971 के युद्ध के नायक मेजर जनरल शाहबेग सिंह जैसे अन्य लोग भी उनके साथ थे. भ्रष्टाचार के आरोपों में सेना से निकाले जाने के बाद शाहबेग रूढ़िवादी हो गए थे. उन्होंने दावा किया कि उनके साथ सिख होने के कारण भेदभाव किया गया था. अपने प्रशिक्षण के चलते वह विशेष रूप से सैन्य नजरिए से दरबार साहिब के परिसर की ताकतों और कमजोरियों का आकलन करने में सक्षम थे. 1971 के युद्ध के दौरान उन्होंने मुक्ति बाहिनी गुरिल्लाओं के साथ मिलकर लड़ाई लड़ी थी.

भिंडरांवाले के खेमे में पैसे या हथियारों की कोई कमी नहीं थी. कभी उनके संगठन का हिस्सा रहे पत्रकार दलबीर सिंह ने लिखा है कि एक बार भिंडरांवाले ने उन्हें एक अखबार शुरू करने के लिए 1 करोड़ रुपए की पेशकश की थी. जब दलबीर ने इस काम के बारे में संदेह व्यक्त किया, तो भिंडरांवाले ने उनसे कहा कि वह यह विचार छोड़ देंगे. “आठ हजार रुपए में एक स्टेन गन खरीदी जा सकती है. हम एक करोड़ में कितनी खरीद सकते हैं. यदि हर दिन एक कारतूस [ऐसी बंदूक की] खाली होती है, तो दुनिया के सभी रेडियो और टेलीविजन स्टेशन इसकी चर्चा करते हैं. कोई भी अखबार उसका मुकाबला नहीं कर सकता.”

पंजाब पुलिस, जिसने वर्षों तक राजनीतिक हस्तक्षेप के बावजूद भिंडरांवाले को रोकने की कोशिश की थी, को व्यवस्थित रूप से हाशिए पर रखा गया था. इसका कारण सिर्फ इस बात तक सीमित नहीं था कि वे भिंडरांवाले के आदमियों के खिलाफ कार्रवाई करने में असमर्थ थे. इसके साथ ही वे भिंडरांवाले के प्रतिशोध की भयानक हिंसा की संभावना से भी ठिठक जाते थे. 2004 में अपनी किताब ड्रीम्स आफ्टर डार्कनेस में मनराज ग्रेवाल ने पुलिस उपाधीक्षक (डिप्टी सुपरिटेंडेंट) ज्ञानी बचन सिंह के बारे में विस्तार से लिखा है. 

1982 में भिंडरांवाले के एक शिष्य मंजीत सिंह ने उदयपुर से दिल्ली जाने वाले एक विमान को हाईजैक कर लिया था. विमान को पाकिस्तान की ओर मोड़ने का प्रयास विफल रहा और अंत में यह अमृतसर में उतरा, जहां डीएसपी ज्ञानी बचन सिंह ने मंजीत सिंह को गोली मार दी. इसके बाद बचन सिंह पर दो हमले हुए, जिसमें से एक हमले में उनके बेटे की मौत हो गई थी. परिस्थिति से हार कर डीएसपी ने समझौता करने का प्रयास किया. जवाब में भिंडरांवाले ने उनसे अकाल तख्त के लिए एक माफीनामा मांगा, जिसमें उन्हें कथित तौर पर अपने “फर्जी एनकाउंटर्स” के लिए माफी मांगने का आदेश दिया गया.

ग्रेवाल लिखते हैं कि यह भिंडरांवाले “की ओर से राज्य के सभी कर्मचारियों के लिए एक चेतावनी थी कि असली ताकत हमारे पास है और उनकी सरकार उन्हें बचा नहीं सकती.” इस माफीनामे के बदले में भिंडरांवाले ने डीएसपी को सिर्फ इतना आश्वासन दिया कि उनके परिवार को बख्श दिया जाएगा. जब उग्रवादियों ने उनकी हत्या की, तो उस घटना में उनकी बेटी भी घायल हो गई थी. ग्रेवाल लिखते हैं, “उनकी हत्या करने गए पुरुषों ने उनकी बेटी से आग्रह किया कि वह बीच में न आए क्योंकि उन्हें उसके पिता को मारने के लिए भेजा गया था, उसे नहीं. लेकिन वह बार-बार बीच में आती रही.”

23 अप्रैल 1983 को एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ए एस अटवाल दरबार साहिब में मत्था टेकने आए. अटवाल ने भिंडरांवाले के शिविर के भीतर अपने एक खबरी को घुसाया था और एक अभियान का नेतृत्व किया था, जिसमें भिंडरांवाले का एक करीबी सहयोगी मारा गया था. लेकिन शायद खबरी की असलियत का खुलासा हो गया था, जिसके बाद उसी खबरी के माध्यम से अटवाल को परिसर में बुला कर उन्हें गोली मार दी गई. उन्हें गोली मारने के बाद हत्यारे वहां से भाग गए, लेकिन बाहर खड़े उनके अंगरक्षकों ने कुछ नहीं किया. बमुश्किल सौ गज की दूरी पर तैनात सहायक पुलिस ने भी मौके पर कोई मदद नहीं की. 

पुलिस का मनोबल पूरी तरह टूट चुका था. अटवाल की हत्या जैसे गंभीर उकसावे का जवाब देने में पुलिस विफल क्यों रही, यह सवाल पिछले कई सालों से बार-बार उठाया जाता रहा है. गांधी के पूर्व सलाहकार आर. के. धवन ने मुझे इसका स्पष्टीकरण दिया. उन्होंने कहा, “पुलिस के पास अंदर जाने के लिए बुलेट-प्रूफ जैकेट ही नहीं थे. आखिरकार लंदन में तत्कालीन उच्चायुक्त के माध्यम से उनका इंतजाम किया गया. लेकिन जब तक वे यहां पहुंचे, तब तक बहुत देर हो चुकी थी.”

सैन्य कार्रवाई के बाद ट्रकों में भरकर शवों को लेजाया गया. मरने वालों में 350 से अधिक सिवीलियन थे. सतपाल दानिश

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पंजाब में तेजी से फैल रही अराजकता के बीच अक्टूबर 1983 में राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया और भिंडरांवाले के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की संभावना पुख्ता होने लगी. दरबार साहिब में एक अन्य सशस्त्र समूह के साथ झगड़े को वजह बताते हुए भिंडरांवाले ने परिसर के दक्षिणी छोर पर स्थित गुरु नानक निवास को खाली कर दिया और अकाल तख्त में चले गए. सरकार के भीतर इस गतिरोध के समाधान की तलाश अब तेज हो चुकी थी. 2014 की शुरुआत में यूके सरकार द्वारा सार्वजनिक किए गए दस्तावेजों से पता चला कि भारतीय खुफिया एजेंसियों ने 1984 में ब्रिटने में अपने समकक्षों से संपर्क किया था, और उनसे दरबार साहिब परिसर में एक कमांडो ऑपरेशन को अंजाम देने के बारे में सलाह मांगी थी. 

उस वर्ष 8 और 17 फरवरी के बीच ब्रिटेन के एक सैन्य सलाहकार ने भारतीय खुफिया अधिकारियों के साथ मंदिर परिसर का कम से कम एक जमीनी स्तर का सर्वेक्षण किया था. ब्रिटेन के कैबिनेट सचिव जेरेमी हेवुड, जिन्होंने सार्वजनिक किए गए दस्तावेजों और आकलन को देखा है, ने बयान दिया: “यह स्पष्ट है कि इस यात्रा का उद्देश्य भारतीय काउंटर टेररिस्ट टीम के कमांडरों को उनके उस ऑपरेशन के संचालन पर सलाह देना था, जिसमें वे मंदिर परिसर के अंदर कार्रवाई के लिए रणनीति और तकनीक आदि पर पहले से ही काम कर रहे थे.” दस्तावेजों में स्पष्ट रूप से रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) के एक अर्धसैन्य बल स्पेशल फ्रंटियर फोर्स, या “स्टैबलिश्मेंट 22”, की बात की गई है, जिनकी गतिविधियां गोपनीय थी. ब्रिटेन से मांगी गई सहायता के अनुरोध के बारे में पहले भी खबरें छपी हैं. लेकिन सार्वजनिक खुलासे से अब यह माना जा सकता है कि पुलिस प्रमुख बीरबल नाथ का ब्योरा लगभग पूरी तरह से ब्रिटेन के दस्तावेजों में प्रकट घटनाओं की तस्दीक करता है.

नाथ ने अपनी पुस्तक में लिखा है, “संत जरनैल सिंह और उनका जत्था छात्रावास परिसर से बाहर चले गए और 15 दिसंबर, 1983 को अकाल तख्त पर कब्जा कर लिया. यह देखते हुए एक अर्धसैन्य बल, जो अपने गुप्त अभियानों के लिए जाना जाता था (और अंततः सरकार की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा), ने स्वर्ण मंदिर में छात्रावास क्षेत्र और लंगर पर कब्जा करने की योजना बनाई.” नाथ को उनके प्रस्ताव से दो आपत्तियां थी. “इसका उद्देश्य क्या था? संत तो जा चुके थे. उनका मुकाबला करने के लिए एक कंपनी अपर्याप्त थी और जल्द ही अकाल तख्त और आस-पास की इमारतों से होने वाली गोलीबारी में मारी जाती. आखिरकार फरवरी 1984 के मध्य में मैं इस योजना को रद्द करवाने में सफल रहा और इस तरह मैंने अर्धसैन्य बल को एक अपरिपक्व कदम उठाने और उनके सैनिकों की हत्या के आरोप से बचा लिया.” 

मई 1984 में नाथ ने सेना की कार्रवाई टालने के लिए संभवत: अंतिम प्रयास किया. उनके अनुसार, 13 मई, रविवार की दोपहर को उन्हें अंतिम परामर्श के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय में बुलाया गया था. उन्होंने गांधी से कहा कि उन्हें स्वर्ण मंदिर में प्रवेश करने की आवश्यकता नहीं है. “हम संत भिंडरांवाले से बाहर से निपट सकते थे, क्योंकि मैं उस जगह को करीब से जानता था.” लेकिन वह बैठक में उपस्थित अन्य अधिकारियों को अपनी बात समझाने में असमर्थ रहे और सेना को स्वर्ण मंदिर में भेजने का निर्णय लिया गया. 

नाथ लिखते हैं, “इसके तुरंत बाद मुझे पता चला कि उनका उद्देश्य चार घंटे के भीतर स्वर्ण मंदिर के भीतर छिपे सशस्त्र विद्रोहियों को वहां से हटाना था. इस ऑपरेशन को ब्लू स्टार नाम दिया गया था.” पीसी अलेक्जेंडर के संस्मरण के अनुसार, गांधी ने 25 मई को सेना के प्रमुख जनरल ए एस वैद्य के आश्वासन पर भरोसा करते हुए सैन्य कारवाई  का मन बना लिया था. वैद्य ने कहा कि वह पंजाब में विभिन्न स्थानों पर एक साथ सैनिकों की कई टुकड़ियां भेजेंगे और चरमपंथियों के कब्जे वाले गुरुद्वारों की घेराबंदी कर उनकी रसद की आपूर्ति और आवाजाही को बंद कर देंगे. स्वर्ण मंदिर के चारों ओर भी बड़ी संख्या में सैनिकों के साथ इसी तरह की घेराबंदी की जाएगी. अलेक्जेंडर लिखते हैं कि गांधी ने “बार-बार जनरल से कहा कि किसी भी कारवाई में मंदिर की इमारतों और विशेष रूप से हरमंदिर साहिब को कोई नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए.” वैद्य ने उन्हें आश्वासन दिया कि “बल का अधिकतम प्रदर्शन जरूर होगा, लेकिन उपयोग कम-से-कम किया जाएगा.”

वैद्य ने 29 मई को फिर से गांधी से मुलाकात की और योजना में कुछ बदलावों का सुझाव दिया. उन्होंने कहा वे यह सुनिश्चित करेंगे कि मंदिर क्षतिग्रस्त नहीं होगा, लेकिन उन्हें इसके अंदर प्रवेश करने की आवश्यकता होगी. यह प्रस्ताव वैद्य और लेफ्टिनेंट जनरल के सुंदरजी की बैठक का परिणाम था. ऑपरेशन के संचालन की सीधी कमान सुंदरजी के हाथों में थी. अलेक्जेंडर लिखते हैं कि वैद्य ने गांधी को आश्वस्त किया कि उन्होंने अपने वरिष्ठ सहयोगियों के साथ योजना के नफे-नुकसान को परखा था. वे सभी इस बात पर सहमत थे कि घेराबंदी करने से ऑपरेशन लंबा खिंचेगा और आसपास के ग्रामीण इलाकों को अस्थिर कर देगा.

एक औचक प्रवेश और अचानक हमला ही बाग़ियों से निपटने का सबसे अच्छा तरीका था. अलेक्जेंडर लिखते हैं, “वैद्य ने इतने आत्मविश्वास और धैर्य से अपनी बात रखी कि ऐसा लगा वह जिस नई योजना का प्रस्ताव दे रहे थे, सेना के पास अब वही एकमात्र विकल्प शेष था. मैं निश्चित रूप से उस समय इंदिरा गांधी की सोच के स्पष्ट ज्ञान के आधार पर कह सकता हूं कि उन्होंने आखिरी वक्त पर योजना में संशोधन के लिए सिर्फ इस आश्वासन पर अपनी सहमति दी थी, कि पूरा ऑपरेशन तेजी से और स्वर्ण मंदिर को बिना नुकसान पहुंचाए पूरा किया जाएगा.”

एक हफ्ते बाद, यानि 5 जून की रात को दरबार साहिब परिसर पर सैनिकों के पहले जत्थे ने धावा बोला, जिसका संचालन लेफ्टिनेंट कर्नल इसरार रहीम खान कर रहे थे. खान सीधे मेजर जनरल कुलदीप सिंह “बुलबुल” बराड़ को रिपोर्ट कर रहे थे, जो ऑपरेशन की समग्र कमान संभाले थे और सुंदरजी के संपर्क में थे. (भिंडरांवाले की तरह मेजर जनरल भी एक बराड़ जाट थे और दोनों के गांव आस-पास ही थे. लेकिन उनमें बस इतनी ही समानता थी. बराड़ एक प्रतिष्ठित सैन्य परिवार से थे. दोनों के बीच वर्ग और शिक्षा की गहरी खाई थी और बराड़ के निजी जीवन में भिंडरांवाले के रूढ़िवादी विचारों की कोई जगह नहीं थी.) 

जब मैं पिछले महीने खान (जो एक ब्रिगेडियर के रूप में सेवानिवृत्त हुए) से उनके घर पर मिला, तो उन्होंने पहले कहा कि उनके पास ऑपरेशन के बारे में कहने के लिए कुछ नया नहीं है और बराड़ पहले ही 1993 में आई अपनी किताब ऑपरेशन ब्लूस्टार—द ट्रू स्टोरी में सब कुछ लिख चुके हैं. मैंने उनसे कहा कि मैं उस सैनिक से कहानी सुनना चाहता हूं, जो वहां मौजूद था और वास्तव में ऑपरेशन का हिस्सा था. खान की ढलती उम्र के बावजूद उनमें उस जोशीले सैनिक को देखना मुश्किल नहीं था, जिसे कभी जनरल बराड़ ने मंदिर परिसर की कमान सौंपी था. जब उन्होंने बोलना शुरू किया, तो यह स्पष्ट हो गया कि उन्हें पूरी कार्रवाई ऐसे याद थी मानो वह कल की ही बात हो. 

“हमें अपने वाहनों से जलियांवाला बाग (जो दरबार साहिब से थोड़ी दूरी पर है) के पास उतरने के बाद मुख्य प्रवेश द्वार दर्शन देवरी जाना था. हम खुले में थे और वे (भिंडरांवाले के आदमी) सभी सुरक्षित जगहों पर अपने हथियारों के साथ तैनात थे. दर्शन देवरी के बाहर गली का एक इंच हिस्सा भी ऐसा नहीं था, जो फायरिंग से अछूता रहा हो.” शाहबेग सिंह द्वारा दरबार साहिब के लिए तैयार की गई रक्षा योजना इतनी प्रभावी थी, कि तीन दशक बाद भी खान उसकी प्रशंसा करते दिखते हैं. परिसर की हिफाजत के लिए उसकी ऊंची इमारतों- एक तरफ होटल टेंपल व्यू और दूसरी तरफ गुंबदों- पर चौकियों का एक बाहरी सुरक्षा घेरा बनाया गया था और मंदिर के ही भीतर परिक्रमा पर एक अंदरूनी घेरा बनाया गया था. खान बताते हैं कि दर्शन देवरी में वह और उनके सैनिक परिसर में सीढ़ियों से नीचे उतरने लगे. उन्हें इस बात का अंदाजा नहीं था कि वहां की दीवारों के बीच की जगहों को “हथियारबंद गड्ढों” में बदला जा चुका था. 

उन्होंने कहा, “मेरे लड़के अंधेरे में सीढ़ियों से उतर रहे थे क्योंकि बिजली कटी हुई थी. वहां पूरी तरह से अंधेरा था और हम सोच रहे थे कि यह फायरिंग कहां से हो रही है. सोचने में थोड़ा समय तो लगता है. असल में वे सीढ़ियों के नीचे से आ रही थी.” गोलियां खान के सैनिकों के घुटने के नीचे लगी. वह याद करते हैं, “लड़के लड़खड़ाकर नीचे गिरने लगे.” यह याद करते-करते खान ख़ामोश हो गए. उन्होंने फिर पूछा, “कौन से युद्ध में हमें अपने इतने लोगों को खोना पड़ा है? पहले घंटे में, यानि रात 10.30 से 11.30 बजे तक हम अपनी बटालियन से 19 जानें गंवा चुके थे. हरतोष मैं आपको बता रहा हूं कि 1971 के युद्ध में शकरगढ़ सेक्टर में पूरे दस से पंद्रह दिनों में मेरी बटालियन 10 गार्ड्स में केवल चार लोग शहीद हुए थे. स्वर्ण मंदिर की लड़ाई बहुत भयानक थी.” 

परिसर के बने-बनाए ढांचों में सेना लोगों के बीच चप्पे-चप्पे पर आगे बढ़ने के लिए विवश थी. खान कहते हैं कि यही वजह थी कि कॉलैटरल डैमेज से बचा नहीं जा सकता था. “मैंने कहीं पढ़ा था कि श्रीमती गांधी को बताया गया था कि इस अभियान में कोई हताहत नहीं होगा. कोई भी समझदार व्यक्ति पीएम को कभी इस तरह का आश्वासन नहीं देता.” अगर किसी को भी यह उम्मीद थी कि सुरक्षा बलों को किसी प्रतिरोध का सामना नहीं करना पड़ेगा, तो वे पूरी तरह से गलत साबित हुए. 

खान कहते हैं, “उन्हें सब पता था. नहीं तो कोई रातों-रात ईंट और मोर्टार की चौकियों का निर्माण कैसे कर सकता है? उन्होंने बेहद कुशलता से अपनी योजना बनाई थी. आप बिना गोली खाए मंदिर के पास से गुजर भी नहीं सकते थे. कमांडो मेरे साथ थे. एसएफएफ (रॉ यूनिट स्पेशल फ्रंटियर फोर्स) और 1 पैरा कमांडो की प्रत्येक कंपनी के साथ 10 गार्ड थे. हमें उनके लिए परिक्रमा से लेकर अकाल तख्त की परिधि तक का रास्ता सुरक्षित बनाना था, ताकि वे अकाल तख्त से भिंडरांवाले को पकड़ पाते. इसलिए मैंने उन्हें एक साथ रखा और मेरी प्रमुख कंपनी आगे बढ़ी. पहले हमने प्रवेश किया और फिर उनके अंदर आने के लिए जगह बनाई. हमने उन्हें परिक्रमा के माध्यम से अंत तक आगे बढ़ने के लिए एक सुरक्षित गलियारा दिया. एक पंक्ति में बारह कमरे थे. हम बारी-बारी से हर कमरे को साफ करते गए.” सभी कमरों में उग्रवादी मौजूद थे.

खान कहते हैं कि 1 बजे तक उनकी कंपनी ने परिक्रमा के उत्तरी भाग पर कब्जा कर इसे विशेष बलों के लिए खोल दिया था, लेकिन फिर भी वे आगे नहीं बढ़ पा रहे थे. “जैसे ही वे अकाल तख्त के नजदीक पहुंचते, तो भारी गोलीबारी की चपेट में आ जाते. उन्हें बहुत बुरी तरह कुचला जा रहा था. इसलिए वे परिक्रमा पर वापस लौटते और बुलबुल से संपर्क कर उन्हें बताते कि उन्होंने अपने काफी आदमियों को गंवा दिया है. एक पेशेवर के तौर पर मैं उन्हें दोष नहीं दूंगा. उनके आदमी मर रहे थे और वे गोलीबारी से जूझ रहे थे. लेकिन मैं यह नहीं समझ पाता कि उन्होंने कोई दूसरा रास्ता क्यों नहीं अपनाया.” 

रात दो बजे बराड़ का फोन आया. “बुलबुल ने मुझे सेट पर कहा: ‘इसरार, अकाल तख्त के गुंबद पर एक कार्ल गुस्ताव (एंटी-टैंक मिसाइल) दागो और देखो कि इसका क्या असर होता है.’ मैंने कार्ल गुस्ताव को खुद तैयार किया. मैं किसी और की रिपोर्ट पर निर्भर नहीं रह सकता था. फिर मैंने पहली मंजिल से, जिस पर हमने कब्जा कर लिया था, एक कार्ल गुस्ताव दागी. हरतोष आप मानेंगे नहीं, वह इमारत इतनी भव्य और उसका गुंबद इतना मजबूत था कि उस पर इसका असर कुछ ऐसा था, जैसे दीवार में एक .303 की गोली दागी गई हो. यहां तक कि उस से भी एक इंच का गड्ढा हो जाता है. लेकिन उस गुंबद पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा.” 

खान ने बराड़ को रेडियो पर संदेश भेजा कि मिसाइल का कोई प्रभाव नहीं पड़ा है. “फिर मुझे नहीं पता कि विशेष बलों और बुलबुल के बीच ऐसा क्या हुआ कि उन्हें कोई दूसरा रास्ता नहीं मिला. उन्हें डर था कि सूर्योदय के बाद सारा पंजाब स्वर्ण मंदिर को घेर लेगा. इसलिए अब जो कुछ भी करना था, सुबह होने से पहले ही करना था. उन्होंने तीन टैंकों को अंदर लाने का फैसला किया और अंततः टैंक की मुख्य बंदूक का इस्तेमाल किया. वह गुंबद को भेदते हुए निकली और वहां बहुत से छेद नमूदार हो गए. वह एक भयानक नजारा था. मेरा खुद का आकलन है कि अगर उस दिन टैंक की मुख्य बंदूक का इस्तेमाल नहीं किया गया होता, तो शायद सिख जनमानस को इतना गहरा आघात नहीं पहुंचता.”

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वैद्य द्वारा प्रधानमंत्री से किए गए लगभग सभी वादे धराशाई हो गए थे. ऑपरेशन में तकरीबन पूरी रात का समय लगा था, इसके परिणामस्वरूप अकाल तख्त क्षतिग्रस्त हो चुका था और हताहतों की कुल संख्या गांधी को बताए गए किसी भी अनुमान से कहीं अधिक थी. आज तक इस बात का कोई विश्वसनीय स्पष्टीकरण नहीं है कि इस सैन्य अभियान के दौरान सेना के पास कोई खुफिया जानकारी उपलब्ध क्यों नहीं थी. न ही इस बात का कोई जवाब है कि सेना ने अपनी योजना बनाने के लिए सरकार से और समय क्यों नहीं मांगा, खासकर तब जब फरवरी से ही दरबार साहिब में अभियान विचाराधीन था. 

1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार शुरू होने से दो दिन पहले 3 जून को गुरु अर्जन का शहादत दिवस था. इस हिसाब से सेना द्वारा 5 जून को कारवाई की शुरूआत करना एक बेहद संगीन निर्णय था, क्योंकि हमले से कुछ दिन पहले ही परिसर के आस-पास कर्फ्यू लगा दिया गया था. इससे बड़ी संख्या में वे श्रद्धालु अंदर ही फंस गए थे, जिनका मंदिर के अंदर छिपे उग्रवादियों से कोई लेना-देना नहीं था.

बीते कई वर्षों से सुरक्षा बलों द्वारा ब्लू स्टार के दौरान परिसर के भीतर किए गए अपराधों के सबूत सामने आते रहे हैं. ब्रिगेडियर ओंकार गोराया की 2013 में प्रकाशित किताब ऑपरेशन ब्लूस्टार एंड आफ्टर- एन आईविटनेस अकाउंट से पहली बार अभियान के दौरान परिसर के अंदर मौजूद श्रद्धालुओं की संख्या का एक स्पष्ट अनुमान मिलता है. पंजाब में तैनात 15वीं इन्फैंट्री डिवीजन की प्रशासनिक शाखा के प्रमुख गोराया को “मृत नागरिकों को उठाने, उनके शवों के निपटारे, घायलों को अस्पतालों पहुंचाने, उग्रवादियों को पकड़ने, छावनी की अस्थाई जेलों में उनकी रखवाली करने और उनके रसद की व्यवस्था करने” का काम सौंपा गया था. 

उनका अनुमान है कि शवों की संख्या के आधार पर लगभग 700 लोग हताहत हुए थे. उनका कहना है कि इसके अलावा 2200 व्यक्तियों को नजरबंद किया गया था. आंकड़ों को बढ़ा-चढ़ाकर भी देखा जाए, तो भिंडरांवाले के आदमियों की संख्या 250 से अधिक नहीं थी. अगर उन सभी के साथ-साथ अन्य उग्रवादी संगठनों के सौ और विद्रोहियों को भी मृतकों में गिना जाए, तो भी यह समझ में आता है कि इस पूरे अभियान में 350 से अधिक ऐसे लोगों की जान गई थी, जिनका भिंडरांवाले से कोई लेना-देना नहीं था. अगर इस बात को ध्यान में रखा जाए कि बहुत से लोग परिसर के भीतर दरवाज़ों से निकलकर आसपास की गलियों में भाग गए थे, तो कहा जा सकता है कि अंदर मौजूद लोगों की संख्या तीन हजार से कहीं अधिक रही होगी.

सेना ने हमेशा से यही बयान दिया है कि श्रद्धालुओं को परिसर से बाहर निकलने का पर्याप्त अवसर दिया गया था. लेकिन गोराया स्पष्ट कहते हैं कि अधिकांश लोगों ने सेना के आत्मसमर्पण करने और बाहर आने के अनुरोध को सुना ही नहीं था. ऑपरेशन शुरू होने से एक दिन पहले उन्होंने परिसर के बाहर जिला प्रशासन की एक वैन देखी, जो पंजाबी में घोषणा कर रही थी : “जो लोग दरबार साहिब परिसर के अंदर फंसे हुए हैं, उनसे अनुरोध किया जाता है कि वे अपने हाथों को अपने सिर के ऊपर उठाकर बाहर आ जाएं. उन पर गोली नहीं चलाई जाएगी.” वैन मुख्य द्वार से अस्सी गज की दूरी पर खड़ी थी. 

गोराया लिखते हैं, “जिन अनुयायियों और श्रद्धालुओं के लिए घोषणाएं की जा रही थीं, वे इसकी पहुंच से बहुत दूर थे.” ऑपरेशन के बाद परिसर के भीतर का नजारा वीभत्स था. गोराया लिखते हैं कि जून की गर्मी के कारण शव सड़ रहे थे और हर तरफ उनकी बदबू फैली हुई थी. उन्हें वहां से उठा कर ले जाने का काम इतना कठिन था कि अंततः उन्हें हटाने वाले नगरपालिका कर्मचारी इसके लिए सिर्फ़ इसलिए राजी हुए, क्योंकि उन्हें शवों का सामान रखने की अनुमति दे दी गई थी. ऑपरेशन शुरू होने के लगभग दो दिन बाद भिंडरांवाले और शाहबेग सिंह के शव 7 जून की सुबह अकाल तख्त के तहखाने से बरामद किए गए. भिंडरांवाले के शरीर की पहचान उनके भाई ने की. तुरंत ही कुछ अधिकारियों और जवानों की मौजूदगी में उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया.

गोराया की किताब लंबे समय से चले आ रहे एक आरोप की पुष्टि करती है: सुरक्षा बलों के हाथों कुछ लोगों की निर्मम हत्या की गई थी. ऐसी एक हत्या से जुड़े साक्ष्य पहले ही प्रकाशित हो चुके हैं. हरमिंदर कौर की 2006 में प्रकाशित पुस्तक में एक युवक की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट शामिल है, जो बताती है कि उसे जब सीने में गोली मारी गई तब उसके हाथ  पीठ के पीछे बंधे हुए थे. गोराया का वृतांत इस दावे को मजबूत करता है कि इस तरह की और भी हत्याएं हुई थी. 

वह लिखते हैं, “7 जून की दोपहर के आसपास मैंने लगभग 90 बंदियों को परिक्रमा के दक्षिणी खंड के गर्म संगमरमर के फर्श पर बैठे देखा. उनके शरीर पर सिर्फ लंबे कच्छे थे और उनके हाथ उनकी पीठ के पीछे बंधे हुए थे. उनमें से ज्यादातर उग्रवादी दिख रहे थे. गिरफ़्तार होने के बावजूद उनके बागी तेवर कायम थे. नीचे देखने के बजाय उनमें से कुछ सीधे अपने दुश्मन की आंखों में आंखें डालकर उसे घूर रहे थे. यूनिट का एक सेकंड लेफ्टिनेंट, जिसने पिछली रात इन उग्रवादियों से लड़ाई में अपने कुछ साथियों को खो दिया था, उनकी इस हरकत से तमतमा उठा. जब उसने उन्हें नीचे देखने को कहा, तो उनमें से एक ने उस पर थूक दिया. अधिकारी अपना आपा खो बैठा और उसने सीधे उसके माथे में गोली मार दी.” 

23 जून को जब इंदिरा गांधी ने ऑपरेशन के बाद पहली बार दरबार साहिब का दौरा किया, तो गोराया उस समूह के आख़िरी छोर पर मौजूद थे जो परिक्रमा स्थल पर गांधी के साथ था. गोराया कहते हैं कि जब गांधी ने अकाल तख्त को देखा,  तो उन्होंने अपने बगल में खड़े जनरल सुंदरजी से कहा: “मैंने आपसे यह सब करने के लिए नहीं कहा था.”

गांधी ने स्पष्ट रूप से बड़ी अनिच्छा के साथ ब्लू स्टार को मंजूरी दी थी. जब उन्होंने पहली बार मंदिर को हुए नुकसान की तस्वीरें देखी, तब आर के धवन वहां मौजूद थे. वह कहते हैं कि गांधी को तुरंत ही अपने किए पर पछतावा होने लगा. उन्होंने बताया कि राजीव के सलाहकार अरुण सिंह, “स्वर्ण मंदिर गए थे और फुटेज लेकर आए थे. इसे देखकर वह दहशत में थी. अरुण सिंह, राजीव गांधी और अरुण नेहरू (गांधी के भतीजे) भी वहां मौजूद थे. प्रधानमंत्री ने कहा कि उनके भरोसे को तोड़ा गया था. इंदिरा गांधी अंतिम समय तक सेना की कार्रवाई के खिलाफ थी. उनका फैसला बदलने में सेना प्रमुख और इस तिकड़ी की अहम भूमिका थी.”

धवन के पास “इस तिकड़ी” को नापसंद करने का एक निजी कारण भी है. प्रधानमंत्री के इन युवा रिश्तेदारों और राजनीतिक सलाहकारों ने उम्रदराज धवन को दरकिनार करने की कोशिश की थी. लेकिन बहुत से तथ्य धवन के इस दावे का समर्थन करते हैं कि ब्लूस्टार के पीछे कई फैसलों में राजीव, नेहरू और सिंह ने अहम भूमिका निभाई थी. 1980 में संजय गांधी की मृत्यु हो गई थी. 1982 में एशियाई खेलों के समय तक पंजाब के मामलों की जिम्मेदारी राजीव के पास आ चुकी थी. अकालियों के साथ हुए अधिकांश संवाद उनकी (नेहरू और सिंह के साथ मिलकर ) देखरेख में किए गए थे.

राजीव ने पार्टी लाइन का पालन किया और लंबे समय तक सार्वजनिक रूप से भिंडरांवाले का बचाव करते रहे. 29 अप्रैल 1984 को उन्होंने चंडीगढ़ में संवाददाताओं से कहा कि भिंडरांवाले “एक धार्मिक नेता हैं और उन्होंने अब तक कोई राजनीतिक संबद्धता नहीं दिखाई है.” इस समय तक पूरे राज्य में हिंसा अपने चरम पर थी. 1984 के शुरुआती 6 महीनों में ऑपरेशन ब्लू स्टार से पहले लगभग तीन सौ लोग मारे जा चुके थे. राजीव की टीम की “कॉर्पोरेट प्रबंधकीय प्रतिभा” भारतीय राजनीति के लिए नई चीज थी और जैसा कि खुफिया अधिकारी एम के धर कहते हैं,  उनकी अपरिपक्वता साफ दिखती थी. अपनी किताब ओपन सीक्रेट्स में धर लिखते हैं कि एशियाई खेलों की सुरक्षा की एक बैठक में, “राजीव ने ‘आतंकवादियों को नष्ट करने के लिए आतंकित करने वाले तौर-तरीकों’ का उपयोग करने के पक्ष में भी बात की.” धर कहते हैं कि निर्णय लेने के मामले में वह काफी अधीर और असहिष्णु नजर आते थे. इस तरह की अनुभवहीन टीम के लिए पहले से ही कई तरह की आशंकाओं के दबाव में हड़बड़ा जाना बड़ी बात नहीं थी. 

एक वरिष्ठ पत्रकार, जो अमृतसर में टुली की टीम का हिस्सा थे, ने मुझे एक पुरानी बातचीत के बारे में बताया, जो अब असाधारण रूप से संवेदनशील लगती है. उन्होंने कहा, “मैं नियमित रूप से भिंडरांवाले से मिलता था और वह ऐसा करने के लिए तैयार हो जाते थे, क्योंकि मैं बीबीसी से था.” मई 1984 में पत्रकार ने भिंडरांवाले से पूछा कि अगर सेना आती है, तो वह क्या करेंगे? “मुझे उनका जवाब याद है: ‘हम नौसिखिए नहीं हैं.’ खेतों की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा, ‘खेतों से पैदल चलने पर एक घंटे की दूरी पर खालरा का बॉर्डर है. शाहबेग ने पहले भी एक गुरिल्ला आंदोलन किया है और पाकिस्तान ने हमें सीमा पार से लड़ने का प्रस्ताव दिया है.’” पत्रकार आगे कहते हैं, “फिर मुझसे एक गलती हुई. अरुण सिंह मेरा कॉलेज का जूनियर था. जब मैं दिल्ली वापस गया, तो मैं उससे और राजीव से मिला और भिंडरांवाले ने जो कहा था, उन्हें बता दिया. मुझे नहीं पता कि इसका उन पर क्या प्रभाव पड़ा.”

संभव है कि आनन-फानन में ऑपरेशन शुरू करने की एक वजह इस आशंका से उपजा डर हो. इस हड़बड़ी का असली कारण जो भी हो, लेकिन नैयर धवन के उन दावों की पुष्टि करते हैं कि इसे उकसाने में किसका हाथ था. उन्होंने मुझे बताया, “जब मैं 1990 में लंदन में भारतीय उच्चायुक्त था, तब अरुण नेहरू मेरे साथ रहने आए.” नैयर ने उनसे पूछा कि ब्लू स्टार का अंतिम निर्णय किसने लिया था? “उन्होंने कहा, ‘फूफी (इंदिरा गांधी) इसके बहुत खिलाफ थी.’ राजीव गांधी और अरुण सिंह काफी हद तक इसके पक्ष में थे. उन्होंने अपना नाम नहीं लिया, लेकिन जाहिर है कि तब वह भी गांधी और सिंह के साथ थे.” 

जब मैंने धवन को यह सब बताया, तो उन्होंने और खुलकर अपनी बात रखी. उन्होंने कहा, “इसमें कोई शक नहीं कि अरुण सिंह इसमें शामिल थे, लेकिन वह राजीव गांधी के जरिए अपना काम कर रहे थे. मुख्य बात यह थी कि वह जनरल सुंदरजी के संपर्क में थे. सुंदरजी ने खुद को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया था और वह अरुण सिंह के जरिए काम कर रहे थे. जब तक श्रीमती गांधी मौजूद थी, तब तक अरुण सिंह राजीव गांधी और अरुण नेहरू के बीच होने वाली हर बात जानते थे और खुद उसमें शामिल रहते थे. मेरी जानकारी के अनुसार उस समय वह तीनों एक साथ काम कर रहे थे. ब्लू स्टार से दो-तीन महीने पहले से ही अरुण सिंह सेना की कार्रवाई पर जोर दे रहे थे. उस समय अरुण नेहरू, अरुण सिंह और राजीव गांधी एक समान थे. वे आपस में सभी बातें साझा करते थे.” 

धवन ने बताया कि उन तीनों को लगा कि भिंडरांवाले के खिलाफ एक सफल सैन्य अभियान के परिणामस्वरूप, “वे चुनाव जीतने में सक्षम होंगे. उनके दिमाग में यह सब चल रहा था क्योंकि जल्द ही चुनाव होने वाले थे.” मैंने उनसे पूछा कि क्या उन तीनों ने इंदिरा गांधी से इस बारे में बात की थी? उन्होंने सीधे जवाब दिया, “निश्चित रूप से.” मैंने पूछा कि क्या वह मानते हैं कि ब्लू स्टार इस मंडली की पहली बड़ी भूल थी? धवन ने कहा, “बेशक. यह एक बड़ी भूल थी, जिसके लिए श्रीमती गांधी को बहुत भारी कीमत चुकानी पड़ी.”

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जब इसरार खान को पता चला कि मैं खानकोट से आया हूं, तो वह हंस पड़े. उन्होंने मुझसे कहा, “हमने शायद हमले से पहले वाली रात आपके ही खेतों में डेरा डाला होगा.” भिंडरांवाले के जीवन और मृत्यु की घटनाओं से मेरा परिचय सिर्फ इसलिए नहीं है क्योंकि हम समान जगह से ताल्लुक रखते हैं. इसके पीछे रिश्तेदारियों के उस ताने-बाने का भी हाथ है, जो पंजाब में अधिकांश जाट सिखों को एक-दूसरे से जोड़ता है. मेरे गांव से कुछ ही दूरी पर भाई मोखम सिंह का घर है. जब मैं उनसे मिला, तो उन्होंने झट से एक रिश्तेदारी के माध्यम से मुझे पहचान लिया: मेरे रिश्ते के एक भाई की ससुराल को वह अच्छी तरह से जानते हैं. इस जान-पहचान के बाद हमारी बातचीत अपने आप सहज हो गई. 

मोखम सिंह भिंडरांवाले के सत्ता में आने से पहले और ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद एक दशक से अधिक समय तक टकसाल के प्रवक्ता थे. ऑपरेशन के बाद कई सालों तक जब पंजाब में सिख कट्टरपंथियों का बोलबाला रहा, तो सिंह एक चर्चित नाम रहे. राज्य के बहुत से लोगों की तरह मोखम सिंह भी वर्तमान में चल रहे चुनाव अभियान को अतीत से जुड़ा बताते हैं. उन्होंने प्रकाश सिंह बादल, जिनके साथ भिंडरांवाले का रिश्ता हमेशा असहज रहा, को “सबसे खराब” कहा. दूसरी ओर उन्होंने बताया कि एसजीपीसी के पूर्व प्रमुख टोहरा वैसे तो “अकाली दल के साथ बने रहना चाहते थे, लेकिन जब वे भिंडरांवाले के साथ होते तो उनकी सिख भावना जाग जाती थी.” मोखम सिंह ने भिंडरांवाले के साथ टोहरा की अंतिम मुलाकात की उस कहानी को दोहराया, जिसे मैं एक बार जैकब से सुन चुका था. 

“2 जून को वह संत भिंडरांवालेसे मिलने आए. मैं वहां मौजूद था.” यह एक वरिष्ठ नेता के साथ संत की आखिरी मुलाकात साबित हुई. “टोहरा ने उनसे कहा, ‘महापुरुख, पंथ को आपकी जरूरत है. आपके पास भविष्य में पंथ को देने के लिए बहुत कुछ है. आपके कारण ही सिख अपनी पगड़ी पहनते हैं, उनकी दाढ़ी लहराती है और वह अपनी कृपाण धारण करते हैं. हमारे लड़के कॉलेज जाकर अपनी दाढ़ी सफाचट करने लगे थे, सिगरेट पीते थे और वामपंथियों से प्रभावित हो गए थे. आज आपकी वजह से सिख धर्म का पुनरुत्थान हुआ है. आपने सिखों को उनका गौरव लौटाया है. और फिर आपने सिखों को सरकार के खिलाफ खड़े होने के लिए यह आंदोलन दिया है. हम सभी जानते हैं कि भीड़ सिर्फ आपकी वजह से जुटी है. पंथ को आपकी जरूरत है. इसलिए हम आपको बचाना चाहते हैं और ऐसा करने के लिए हमें आंदोलन वापस लेना होगा. अब आपको बचाने का कोई और तरीका नहीं है.’ इसके जवाब में संत भिंडरांवाले ने उनसे कहा, 'टोहरा साहब, मैं इस सुझाव के लिए आपको धन्यवाद देता हूं. मैं गुरु गोबिंद सिंह का सिख हूं. मैं अपना सिर नहीं झुका सकता. मैं समुदाय को शर्मसार नहीं होने दे सकता. ऐसे कई जरनैल सिंह अकाल तख्त से छीने जा सकते हैं, लेकिन पंथ की शान पर धब्बा नहीं लगाया जा सकता. हम जो करने के लिए प्रतिबद्ध हैं, उस पर मैं अडिग रहूंगा. अगर आप मेरे साथ खड़े होंगे, तो मैं आपका आभारी रहूंगा. समुदाय ने आप पर विश्वास जताया है. लेकिन अगर आप ऐसा नहीं करते हैं, तो भी कोई बात नहीं.'”

जब जैकब ने मुझे इस मुलाकात के बारे में बताया था, तो उनका लहजा एक पत्रकार के सीधे-सपाट ब्योरे तक सीमित था. इसके बरअक्स जब मोखम सिंह जैसा कोई शख्स यह कहानी बयान करता है, तो यह किसी मिथक की लोकगाथा सी सुनाई पड़ती है. यह बात भिंडरांवाले के पूरे जीवन पर लागू होती है. धर्म के दायरे में उनसे पहले और बाद में कोई भी नाम उनके विचारों के विकल्प या संशोधन से लोगों को लुभा नहीं पाया है. जैसा कि मोखम सिंह की कहानियों से संकेत मिलता है, अकाली ऐसा करने की स्थिति में नहीं हैं. भिंडरांवाले के मिथक ने काफी हद तक पंजाब के खूनी दशकों की वास्तविकता को ढक दिया है.

1980 से 1995 के बीच का समय यहां ठहराव का दौर था. उग्रवादियों या पुलिस बल में शामिल होने से इतर राज्य के युवाओं के पास बहुत कम अवसर थे. कुछ ने विदेश की राह चुनी और वहां अच्छे पैसे कमाए, लेकिन स्थिर नहीं हो पाए. ऐसे लोगों का राष्ट्र से मोहभंग हो चुका था, लेकिन अपने धर्म से नहीं. उनके लिए भिंडरांवाले एक नायक थे. उनकी मिथकों भरी कहानियों में भिंडरांवाले ने अपने धर्म के लिए भारतीय राष्ट्र के खिलाफ जंग लड़ी थी. जो लोग अपना घर छोड़कर नहीं गए, उन्हें पैसों की तंगी की जगह अवसरों की कमी से जूझना पड़ा. उदारीकरण के दौर में भी पंजाब के पास वे मौके नहीं आए, जो देश के अन्य युवाओं को मिले. इसका मुख्य कारण था राज्य में व्याप्त हिंसा और पाकिस्तान के साथ साझा एक लंबी सीमा. किसी भी पल लड़ाई छिड़ने की आशंकाओं के चलते बड़े उद्योगों ने पंजाब से मुंह फेर लिया था. 

अमृतसर में जेटली और अमरिंदर के हालिया चुनाव अभियान की बात करें, तो यह बेवजह नहीं है कि दोनों पक्ष एक-दूसरे पर राज्य में मादक पदार्थों के व्यापार के आरोप-प्रत्यारोप लगाते रहे हैं. पंजाब में बीते कुछ वर्षों में ड्रग्स का चलन तेजी से बढ़ा है. उग्रवाद के हाथों अपनी एक नस्ल को गंवा चुके इस राज्य में यह समस्या इतनी विकट है, कि यहां की युवा पीढ़ी इसकी जद में आने से एक बार फिर बर्बादी की कगार पर खड़ी है. जेटली ने दावा किया कि इस समस्या की असली जड़ सीमा पार से होने वाली तस्करी है, जिसके लिए केंद्र की यूपीए सरकार जिम्मेदार है. दूसरी ओर अमरिंदर ने दावा किया कि यह समस्या राज्य के भीतर ही सिंथेटिक दवाओं के निर्माण के चलते पैदा हुई थी, और इसके लिए राज्य की अकाली-भाजपा सरकार जिम्मेदार है.

जब आप यहां से गुजरते हैं, तो जगह-जगह नशामुक्ति केंद्र नजर आते हैं. हाल ही में मैंने अपने गांव से दस किलोमीटर दूर हर्मिटेज नशामुक्ति केंद्र के एक “साझाकरण” सत्र में भाग लिया. इस सभा में अधिकांश पुरुष मौजूद थे, जो हर दिन नशे की लत छोड़ने की कठिनाइयों के बारे में बात करने के लिए वहां एकत्रित होते हैं. यहां ड्रग्स और शराब से लेकर जुए तक की लत से पीड़ित लोग मौजूद थे. उस दिन का काउंसलर भी केंद्र में रहने वाला एक शख्स था, जो हेरोइन की लत से उबर रहा था. इन सत्रों में परिवार के सदस्यों को भी शिरकत करने की अनुमति होती है. उस दिन वहां मौजूद एकमात्र महिला अपने छोटे बेटे के बारे में बात करने आई थी, जो कभी राज्य स्तर का वॉलीबॉल खिलाड़ी था. उन्होंने कहा, “हम हमेशा से बस यह चाहते थे कि उसे कभी कोई कमी महसूस न हो. अब जब वह हमसे सौ-दो सौ रुपए के लिए भीख मांगता है, तो मुझे पता होता है कि वह पैसे क्यों मांग रहा है और मुझे उसे न कहना पड़ता है.” उनके छह फीट से अधिक लंबे कद का बेटा, जो कभी एक बलशाली युवक रहा होगा, वहां भुतहा सा गुमसम बैठा अपनी मां की बात सुन रहा था. 

ऐसे माहौल में भिंडरांवाले की किंवदंतियां युवाओं को रिझा रही हैं. भाई मोखम सिंह ने हथियारों से दूरी कर ली है और वह खालिस्तान के विचार में कोई खास रुचि नहीं रखते हैं. 1984 के बाद उग्रवादियों के लिए एक पवित्र ग्रंथ साबित हुई खालिस्तान की परिकल्पना एक अलग सिख राज्य की मांग पर आधारित है, जिसे  भिंडरांवाले तक ने अपने जीवनकाल में ज्यादा महत्व नहीं दिया. लेकिन मोखम सिंह आज भी भिंडरांवाले के मिथक का पूरा समर्थन करते हैं. जेटली के लिए प्रचार करने वाले पूर्व टकसाल सदस्य राम सिंह के ठीक उलट मोखम सिंह ने कभी अकाली दल से नजदीकियां नहीं बढ़ाई. वह यूनाइटेड सिख मूवमेंट नामक एक समूह का हिस्सा हैं, जिसमें उनके कुछ पुराने साथी शामिल है. वर्तमान में यह समूह काफी हद तक तक आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन में आगामी चुनावों में उतर रहा है.

उन्होंने मुझसे कहा, “हम कांग्रेस के बारे में सोच भी नहीं सकते. और अकाली कभी भी एक वास्तविक विकल्प नहीं रहा. वे दरबार साहिब पर हमले में गुप्त रूप से शामिल थे. उन्हें पता था कि अगर संत भिंडरांवाले जिंदा बच गए, तो उन्हें खत्म कर दिया जाएगा और अगर वे नहीं बचे, तब भी वे सरकार बना ही लेंगे. और आखिरकार वही हुआ.” जनवरी में चंडीगढ़ में यूएसएम और आप की संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में योगेंद्र यादव ने स्पष्ट कर दिया कि भिंडरांवाले उनके नायक नहीं हैं. मोखम सिंह ने अपनी बात रखते हुए कहा, “संत भिंडरांवाले हमारे नायक हैं, इनके नहीं. जहां तक राजनीतिक समर्थन की बात है, तो यह जरूरी नहीं है कि आप सभी बिंदुओं पर सहमत हों.” भारत की राजनीति में ऐसे उदाहरण दुर्लभ कहे जा सकते हैं. 

कुछ युवा, जो शायद एक जमाने में अब तक बंदूक उठा चुके होते, आज एक उम्मीदवार के संयुक्त प्रचार के प्रति आशांवित दिखते हैं. संभव है कि यह उनके लिए लंबे अंतराल में राज्य से मिले अवसरों की तुलना में एक बेहतर विकल्प साबित हो.

(कारवां अंग्रेजी के मई 2014 अंक की इस कवर स्टोरी का हिंदी में अनुवाद कुमार उन्नयन ने किया है. मूल अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)