शहरी बाबू

अरुण जेटली : पुरातनपंथी पार्टी का आधुनिक चेहरा

1999 के चुनावों से पहले जेटली को पार्टी प्रवक्ता बनाया गया और अक्टूबर में जब बीजेपी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार सत्ता में आई तो वे सूचना एवं प्रसारण मंत्री बन गए. अतुल लोक /आउटलुक
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12 February, 2019

(एक)

मोदी सरकार में अरुण जेटली के सबसे महत्वपूर्ण मंत्री बनने से दो साल पहले, 2012 में एक खबर ने तहलका मचा दिया कि यूनाइटेड प्रोग्रेसिव एलायंस (यूपीए) सरकार द्वारा कोयला खदानों के आवंटन से सरकार को हजारों करोड़ का घाटा हुआ और निजी क्षेत्र को फायदा पहुंचा. इसके बाद संसद का मानसून सत्र पूरी तरह से ठप कर दिया गया. भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के सांसदों ने सामूहिक इस्तीफा देने की धमकी दे डाली. राज्य सभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली ने खूब आक्रमकता के साथ इसका न सिर्फ विरोध किया बल्कि इसे “स्वतंत्र भारत में अब तक का सबसे बड़ा घोटाला” करार दिया.

अगस्त में, जब गतिरोधित संसद का सत्र पूरी तरह से ठप कर दिया गया तो जेटली और लोक सभा में उनकी प्रतिरूप, सुषमा स्वराज, ने एक संयुक्त वक्तव्य जारी किया. उन्होंने लिखा “हमने इस सत्र का उपयोग देश की जनता की आत्मा को झिंझोड़ने के लिए किया है, यह सिर्फ एक राजनीतिक लड़ाई नहीं, बल्कि सार्वजनिक भलाई के लिए देश के आर्थिक संसाधनों को बचाने की लड़ाई है.” प्रेस कांफ्रेंस के दौरान जेटली ने आवंटन प्रक्रिया को “मनमानी”, “विवेकहीन” और “भ्रष्ट” बताया. उन्होंने यहां तक कहा कि यह “क्रोनी” पूंजीवाद की सबसे खराब मिसाल है. द हिन्दू के एक लेख, “डिफेंडिंग दी इनडिफेंसिबल” में उन्होंने लिखा, “सरकार आवंटन की इस विवेकहीन प्रक्रिया को चालू रखने में इस कदर इच्छुक थी कि उसने “प्रतिस्पर्धात्मक नीलामी की प्रक्रिया” को ही प्रारंभ नहीं किया, जिससे एक बेहतर आवंटन प्रक्रिया को सुनिश्चित किया जा सकता था.

कुछ साल पहले बतौर वकील जेटली ने स्ट्रेटिजिक एनर्जी टेक्नोलोजी सिस्टम्स प्राइवेट लिमिटेड, टाटा संस और साउथ अफ्रीकन कंपनी के एक महत्वकांक्षी जॉइंट वेंचर की तरफदारी करते हुए बिल्कुल अलग किस्म का तर्क दिया था. 2008 में कोयला खदानों को लेकर सरकार को अर्जी देते वक्त इस जॉइंट वेंचर ने, जिसे सरकार की इस आवंटन प्रक्रिया से सबसे ज्यादा फायदा पहुंचा था, यह जानने के लिए कि क्या सरकार के साथ किसी भी प्रकार का मुनाफा बांटे बगैर करार किया जा सकता था? उन्होंने जेटली से संपर्क कर इस मसले पर उनकी राय जाननी चाही थी. कॉलेज के जमाने के अपने वकील दोस्त, रायन करांजवाला के दफ्तर के हवाले से जेटली ने अपनी एक 21-पृष्ठ लंबी कानूनी राय उन्हें दी थी, जिसमें उन्होंने साफ कहा था कि भारत सरकार को यह अधिकार है कि वह कोयला खदानों के आवंटन को लेकर मनचाही प्रक्रिया अपना सकती है, और कंपनी सरकार के साथ प्रस्तावित मुनाफा बांटने के लिए कानूनी रूप से बाध्य नहीं है. उक्त कंपनी के समर्थन में जेटली की राय से यह संकेत मिलता है कि मौजूदा कोयला खदान आवंटन की प्रक्रिया से, जिसे उन्होंने “विशालकाय घोटाले” की संज्ञा देकर खूब हो-हल्ला मचाया, वे पहले से ही भली-भांति अवगत थे.

कोयला घोटाले का खुलासा होने के कुछ ही समय बाद, चंद यूपीए मंत्रियों ने उक्त कानूनी सलाह प्रेस को उपलब्ध कराई. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के खिलाफ जब बीजेपी मोर्चा खोल ही रही थी, जिसमें बतौर कोयला मंत्री उन्हें उनकी नाक के नीचे विवादस्पद आवंटन के लिए निशाना बनाया जाता था, यह “कानूनी सलाह” लगातार चर्चा का विषय बनी रही. इस दस्तावेज को टाइम्स ऑफ इंडिया, द इकोनोमिक टाइम्स, हेडलाइन्स टुडे, एनडीटीवी और सीएनबीसी के अलावा कई और वरिष्ठ पत्रकारों के बीच बांटा गया. लेकिन हर बार जेटली की बौखलाहट इस पूरे मसले पर भारी पड़ती दिखाई पड़ी.

हेडलाइन्स टुडे में एक मध्यम स्तर के पत्रकार ने बताया कि उस वक्त गृहमंत्री पी. चिदंबरम के दफ्तर ने चैनल को यह ‘लीक’ एक “विशेष स्टोरी’ के रूप में मुहैया कराई थी. उन्होंने यह भी कहा कि इसे चैनल पर एक बार दिखाने के तुरंत बाद हटा लिया गया. उस पत्रकार को वरिष्ठ संपादक ने सफाई देते हुए कहा चूंकि उनकी जेटली से बात हो गई है और उनका यह कहना कि लीक किया गया दस्तावेज “एक निजी राय है” वाजिब जान पड़ता है. हालंकि उन्होंने स्वीकार किया कि स्टोरी के मेरिट को लेकर उन्हें कोई आपत्ति नहीं है. पत्रकार ने अपने चेहरे पर कुटिल मुस्कान लाते हुए बताया, “मेरा हमेशा से यह मानना रहा है कि संपादक हमेशा सही सोचता है. तो मैंने भी कहा, ठीक है.”

एक अन्य पत्रकार, जिसके पास भी ये दस्तावेज थे, ने मुझे बताया कि जेटली ने उप राष्ट्रपति (जो राज्य सभा के अध्यक्ष भी हैं) को शिकायत की थी कि “खुफिया एजेंसियां उनकी साख को मिटाने पर तुली हुई हैं.” पत्रकार ने बताया कि उप राष्ट्रपति के दफ्तर ने शिकायत की पुष्टि भी की थी. हमारे ब्यूरो चीफ जेटली की टिप्पणी चाहते थे लेकिन वे इस मुद्दे पर कुछ भी बोलने को तैयार नहीं थे, इसलिए यह खबर नहीं बन पाई.” वास्तव में केवल एक पत्रकार ने जेटली से इस संबंध में बात की, लेकिन उसके साथियों, जिन्हें इस साक्षात्कार (जो कभी नहीं छपा) की भनक थी, ने कहा कि वे जेटली के जवाबों से संतुष्ट नहीं थे. वह पत्रकार भी अपने साथियों को असुविधा से बचाने के लिए इस मुलाकात के बारे में ज्यादा कुछ नहीं बोलना चाहता था. “याद रखें, आखिर वे वित्त मंत्री हैं,” पत्रकार ने कहा, “मैं उन्हें नाराज नहीं करना चाहता.” एक साल बाद कानूनी सलाह वाली यह खबर आखिरकार उजागर हुई. लेकिन गैर मुख्यधारा की न्यूज वेबसाइट “ऑल्टगेज” पर. इसलिए इसने वो प्रभाव भी नहीं छोड़ा, जो यह पहले छोड़ सकती थी. मेरे साथ कई पत्रकारों ने खबर को दबाने के लिए तैयार की गई “जेटली प्रेस कोर” के नाम से जानी जाने वाली (जिसे ‘जॉइंट पार्लियामेंटरी कमिटी’ कहकर भी पुकारा जाता था) के मुत्तालिक मजाक भी किया.

जननायकों के लिए राजनीतिक जीवन का उद्देश्य लोगों की नजरों में जनता का प्रतिनिधित्व करने की क्षमता का आश्वासन बनाए रखने में होता है. अरुण जेटली जैसे नेता का जनाधार मीडिया, न्यायपालिका और कॉर्पोरेट दुनिया में उनके संपर्क से है, जिसके लिए एक अलग सार्वजनिक छवि की जरूरत होती है. उनकी यह छवि एक ऐसा नेता दिखने की है जो अपने आचरण में परिष्कृत हो, दिल्ली के शक्ति केंद्रों तक उसकी पहुंच हो और जो अपने से कम परिष्कृत साथियों को राजधानी की सत्ता के गलियारों में उठने वाले बवंडरों से सही सलामत निकाल लाने की काबिलियत रखता हो. अपने इर्द-गिर्द उठने वाले इन बवंडरों के बावजूद जेटली पिछले चार दशकों से मैदान में डटे हुए हैं. राजनीतिक हलकों में हवाओं के बदलते रुख के साथ उन्होंने बड़े कारगर तरीके से खुद को ढाला है. सत्ता के पायदान पर जेटली के नियमित उत्थान पर टिप्पणी करते हुए अखबार के एक वरिष्ठ पत्रकार ने कहा, “बीजेपी में होनहार लोगों की भारी कमी है.” एक साल पहले जब मोदी ने उन्हें वित्त, रक्षा और कॉर्पोरेट अफेयर्स के मंत्रालय सौंपे तो सभी को पार्टी के लिए उनका महत्व समझ में आया (पिछले नवंबर में उनसे रक्षा मंत्रालय छीन कर उन्हें सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय सौंप दिया गया).

मुंह पर ताले लगे होने के लिए बदनाम इस सरकार में, जेटली को ही सरकार का पक्ष रखने की जिम्मेवारी के साथ भी नवाजा गया है. दरबार लगाना उन्हें हमेशा अच्छा लगता है और पार्टी में अन्य सदस्यों के मुकाबले उनका दरवाजा भी कुछ ज्यादा ही खुला हुआ मिलता है. द टेलीग्राफ ने जेटली के साथ एक साक्षात्कार का जिक्र किया, जिसमें वे 2008 में कर्नाटक विधान सभा चुनावों में मिली सफलता के गुरूर में चमक रहे थे. जेटली ने प्रेस ब्रीफिंग के बाद पत्रकारों से गपशप करने के लिए अपने पैर ऊपर पसार लिए. तभी उनके अंदर का मिलनसार खिलंदड़ा कॉलेज का छात्र खुलकर सामने आ पाता है. उनकी पैनी राजनीतिक दृष्टि फिर चटपटे किस्से उगलने लगती है, जिन पर उनके श्रोताओं को तो उतनी हंसी नहीं आती, जितने ठहाके वे खुद लगा जाते हैं. कभी-कभी वे दूसरे नेताओं की नकल उतारते भी पाए जाते हैं.

एक न्यूज संपादक ने जेटली के बारे में कहा, वे एक “किस्सागोह” हैं, जो आपको दिलचस्प कहानियां सुनाते हैं और बीच-बीच में छुट-पुट जानकारियां भी दे देते हैं. यह ‘घनिष्ठता’ उनके खास क्लब का हिस्से होने का भ्रम देती है, जो किसी भी पत्रकार पर सर चढ़ जाने वाले नशे की तरह काम कर सकती है. आपको लगने लगता है कि आप किसी ऐतिहासिक पल का हिस्सा हैं.” एक जाने माने अखबार के राजनीतिक संपादक ने बताया, “वे दूसरों के मनोरंजन के लिए अपने दोस्तों की कुछ बेहद निजी किस्म की जानकारियां साझा करने से भी नहीं हिचकते.”

संपादक ने कहा कि “मैं कोई बीजेपी-समर्थक रिपोर्टर नहीं हूं. न ही मैंने अपने लेखन में कभी उनके प्रति नरमी बरती है,” लेकिन जेटली फिर भी “मेरे साथ दोस्ताना रवैया” रखना जारी रखे हुए हैं. जेटली के दरबार में घुसने की अपनी चुनौतियां भी हैं और कुछ पत्रकारों का तो मानना है कि इसमें शुद्ध लेन-देन भी शामिल होता है.

तीन दशकों से बीजेपी को कवर करने वाले वरिष्ठ पत्रकार ने बताया, “या तो आप पूरी तरह से उनके साथ हैं या आपने राजनाथ सिंह और सुषमा स्वराज पर खबरें “प्लांट” की हैं, नहीं तो उनके दरवाजे आपके लिए खुले तो भले रहेंगे लेकिन वे आपको कभी किसी धमाकेदार खबर से नहीं नवाजेंगे.” पूर्व बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ सिंह आज गृहमंत्री और सुषमा स्वराज विदेश मंत्री हैं. बीजेपी को अस्सी के दशक की शुरुआत से कवर करने वाले एक अन्य राजनीतिक संपादक ने बताया, जेटली के किस्से “भले ही फौरी तौर पर आपको ऐसा कुछ न दें, जिनके आधार पर आप तुरंत से कोई खबर बना सकें, लेकिन अगर आपने उस किस्से को अपने दिमाग के किसी कोने में संजो कर रख लिया तो एक दिन सभी तार एक साथ जुड़ जायेंगे और तस्वीर पूरी हो जायेगी.”

उस संपादक ने जेटली के बात करने के अंदाज में मामूली सी बेख्याली के लहजे को “क्लासिक पावर मूव” बताया. यह लोगों का ध्यान बंटाने के लिए होता है और उन्हें यह सोचने को मजबूर करने के लिए कि जो जानकारी उनको प्रेषित की गई है वह जरूरी है भी या नहीं. “आप उन्हें किसी भी विषय पर घेर नहीं सकते.” एक अखबार के वरिष्ठ पत्रकार ने बताया, “बहस की शर्तें वही तय करते हैं.” (कारवां से साक्षात्कार के लिए भेजी गई, कई दरख्वास्तों और सवालों की सूची का उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया).

एक पत्रकार ने अरुण शौरी से सुना एक मजाक दोहराया कि ‘जेटली एक जननायक हैं और उनका जनाधार कुल मिलाकर छह पत्रकार हैं.’ उनका प्रभाव इस वक्तव्य को झुठलाता जान पड़ता है. जेटली की इस कहानी को बयान करते हुए जिन 68 लोगों से मैंने बात की, जिनमें अधिकतर पत्रकार और राजनेता शामिल थे, उनमें से अधिकतर ने जेटली के बारे में ‘ऑन रिकॉर्ड’ बात करना स्वीकार किया. “आधी दिल्ली आपको जानने का दावा करती है,” जब एक टीवी पत्रकार ने जेटली से यह कहा, तो उनका जवाब था- “अब आधी दिल्ली तो झूठ नहीं बोलेगी.”

शुरुआती जनवरी में मैं दिल्ली के ताज पैलेस होटल के एग्जीक्यूटिव लाउंज में स्वंयभू मार्केटिंग गुरु सुहैल सेठ से मिला. यह ओपन मैगजीन में जेटली के कसीदे पढ़ते उनके द्वारा लिखे गए लेख, “माय फ्रेंड अरुण”, के छपने के दो महीने पहले की बात है. सेठ और जेटली की पहली मुलाकात 1999 आम चुनावों के दौरान हुई, जब सेठ को अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री प्रचार अभियान की डिजाइन सामग्री तैयार करने के लिए रखा गया गया. तब से वह जेटली के करीबी रहे हैं. वह जेटली को “अपने सर्कल की पार्टियों की जान” बताते हैं. सेठ ने मुझे उनके घर में उस कमरे के बारे में बताया जिसे ‘जेटली की मांद’ कहा जाता है, जहां वे अलग-अलग व्यवसायों और राजनीतिक हलकों से जुड़े “चंद गिने-चुने” लोगों से अक्सर बैठकें करते हैं. यहां अक्सर आने-जाने वाले प्रख्यात लोगों में वरिष्ठ वकील रायन करांजवाला और राजीव नैयर, पूर्व राज्य सभा सांसद और हिंदुस्तान टाइम्स’ ग्रुप की एडिटोरियल डायरेक्टर शोभना भरतिया और कांग्रेस सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया शामिल हैं.

सेठ ने कहा, “कई बार मैंने चाहा कि वो कमबख्त मांद बंद हो जाए, लेकिन वे उसे फिर से खोलकर बैठ जाते थे. “जेटली और रायन को बक-बक करना बहुत पसंद है,” और इन दोस्तों को अड्डेबाजी करने में मजा आता है, जहां इत्मीनान से बैठकर “जिन्दगी की हसीन बातों, कश्मीरी शालें, छुट्टियां और लजीज खाने” के बारे में गपशप हो सके. जेटली ने कई बार कहा है कि राजनेता होने का मतलब है, दौलत को अलविदा कहना. उन्हें एक फुलटाइम वकील बनने में ज्यादा फायदा दिखता है. लेकिन जब भी उनके आलोचकों ने उनकी महंगी शालों, घड़ियों और पेनों का मजाक उड़ाया, उनके दोस्त उनके बचाव में आए और कहा कि वह सब उन्होंने कानूनी तौर पर खरीदा है.

जेटली ने 2010 में आउटलुक पत्रिका में लिखा, “मैं जन्म और संस्कारों से पंजाबी हूं और जैसा कि हर पंजाबी कहेगा, ‘चंगा खाना ते चंगा पाना.” उस संपादक ने कहा, “उनको इस बात से बहुत फर्क पड़ता है कि आप किस लहजे में बात करते हैं, किस तरह के कपड़े पहनते हैं, आपका घर किस जगह पर है, आप किस वर्ग से आते हैं और आप किस किस्म की कार में चलते हैं. वे दिल्ली के अंदाज में बहुत नकचड़े इंसान हैं.” पूर्व बीजेपी महासचिव सहित कई लोगों ने बताया कि वे कभी पार्टी अध्यक्ष इसलिए नहीं बन पाए क्योंकि उनकी पहचान संभ्रांतता से की जाती है.

मुंह पर ताले लगे होने के लिए बदनाम इस सरकार में जेटली को ही सरकार का पक्ष रखने की जिम्मेवारी से नवाजा गया है. विपुन कुमार/हिंदुस्तान टाइम्स/गैटी इमेजिस

कालांतर में जेटली ने खुद के लिए एक आधुनिक विचार वाले, संयत और उदारवादी व्यक्ति की छवि बनाई. दिल्ली के पत्रकार, व्यावसायिक और बुद्धिजीवियों को ऐसी छवि बहुत भाती है. इस छवि ने बीजेपी के कट्टर समर्थकों और इसके वैचारिक गुरु, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, में उनके प्रति संशय का भाव भी पैदा किया. 2011 में द हिन्दू ने विकिलीक्स के हवाले से एक खबर का खुलासा किया, जिसमें जेटली ने माना था कि “बीजेपी के लिए हिंदुत्व एक अवसरवाद के अलावा कुछ नहीं है.” जेटली ने इसका खंडन किया लेकिन यह विचार कि बीजेपी से उनका लगाव व्यावहारिक ज्यादा है और वैचारिक कम, इस विवाद से पहले का है जो बाद तक भी बना रहा.

इसके बावजूद पार्टी के फैलाव के चलते उनकी यह उच्च-वर्गीय परिष्कृतता बीजेपी के लिए अनमोल है. पत्रकार स्वपन दासगुप्ता ने जेटली से अपनी दोस्ती के कारण साक्षात्कार लेना तो मंजूर नहीं किया, लेकिन 1999 में उन्होंने इंडिया टुडे में लिखा, “छवि की समस्या की मारी पार्टी को उन्होंने कुलीनों के बीच सम्मानजनक बनाया और इसके लिए उन्हें पुरस्कृत भी किया गया.” उन्होंने भविष्यवाणी की “जैसे-जैसे बीजेपी हाशिये से हटकर एक उदार दक्षिणपंथी पार्टी बनती जायेगी, संघ परिवार उन्हें अगली सदी के विजेता के रूप में देखना शुरू कर देगा.” जेटली के पत्रकार दोस्त और संघ के वफादार वीरेन्द्र कपूर ने मुझे बताया कि जेटली “गलत पार्टी में सही आदमी” के तमगे से नफरत करते हैं.

दिल्ली के एक प्रमुख लोबिस्ट ने कोयला घोटाले को लेकर जेटली के गुस्से के बारे में बताते हुए कहा, “उनका एक पक्ष सार्वजनिक है, जो उदारवादी और आधुनिक है.” और दूसरा पक्ष, “एक चालाक तिकड़मबाज का है, जिसे आप नहीं देख पाते.” पिछले कई दशकों से जेटली की सत्ता के केंद्र से नजदीकी के राज को समझाते हुए लोबिस्ट ने प्रधानमंत्री और उनके बीच का फर्क बताया- “मोदी डरा के राज करता है” और “जेटली एहसान करके.”

(दो)

अरुण जेटली का जन्म दिल्ली में, दिसंबर 1952 में लाहौर से आए परिवार में हुआ. उनके वकील पिता राजधानी में ही अपनी वकालत करते थे और जेटली सिविल लाइन्स स्थित मिशनरी स्कूल सेंट जेवियर में पढ़ते थे. उस वक्त के उनके दोस्त ने बताया, “वह औसत दर्जे के विद्यार्थी हुआ करते थे, जो बड़े होकर इंजीनियर बनना चाहते थे लेकिन जब बड़े हुए तो उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी का श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स चुना”. करांजवाला ने बताया, जेटली बी प्लस छात्र हुआ करते थे, लेकिन बहस-मुबाहिसों में वह अव्वल थे. वह डिबेटिंग टीम के कप्तान भी थे, जिसने कॉलेज के लिए कई स्वर्ण पदक जीते. उनकी छवि एक ऐसे पब्लिक स्कूल के बच्चे की थी, जिसने यूनिवर्सिटी स्तर पर जाकर खुद को परिष्कृत किया और अपने राजनीतिक जीवन को आकार दिया.

1974 में, जेटली (बाएं) दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष बने. उस समय के कई छात्र नेता राजनीति और पत्रकारिता में आए. उनके सहयोगियों में पूर्णिमा सेठी (बीच में) शामिल थीं, जो दिल्ली विधानसभा की सदस्य बनीं. एचटी फोटो

सत्तर के शुरुआती सालों में देश के कालेज कैंपस, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की दिनों-दिन बढ़ती तानाशाही के खिलाफ जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चल रहे आंदोलन का राजनीतिक गढ़ बन गए थे. इस दौरान कई छात्र लालू प्रसाद यादव, सुशील मोदी, नीतीश कुमार, वेंकैय्या नायडू और रविशंकर प्रसाद, छात्र नेता के रूप में उभरे. प्रचार और चुनावों की दुनिया से जेटली का परिचय भी इसी दौरान हुआ.

उनको जानने वालों के अनुसार, शुरुआत में जेटली ‘लेफ्टक्लब’ का हिस्सा हुआ करते थे. 1971 में वे संघ से जुड़ी दक्षिणपंथी, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् (एबीवीपी) के नेता श्रीराम खन्ना से मिले. जब मैं जनवरी में खन्ना से मिला तो उन्होंने बताया, “हम गुस्से से भरे नौजवान थे. उन दिनों देश भर के कैंपसों में कांग्रेस-विरोध की लहर थी. नौजवानों की एक पूरी जमात एबीवीपी के साथ जुड़ गई थी.” आगे चलकर उनमें से कई बीजेपी के शीर्ष नेता बने, जैसे नायडू और नितिन गडकरी. बाकि शक्तिशाली संपादक बन गए, जैसे प्रभु चावला और रजत शर्मा. अब श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत खन्ना ने कहा कि उन्होंने ही जेटली को राजनीति में “फिट” किया था, जब उन्होंने उनका नाम दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (डूसू) के सुप्रीम कौंसलर के लिए नामांकित किया. 1972 में खन्ना डूसू अध्यक्ष बने और जेटली ने कॉलेज यूनियन की अध्यक्षता संभाली.

अगले ही साल अपने पिता, चाचा और दो चचेरे भाइयों के नक्शेकदम पर चलते हुए, जेटली ने दिल्ली विश्वविद्यालय में कानून की डिग्री प्राप्त करने के लिए दाखिला ले लिया. उनसे 1973 में एबीवीपी की तरफ से डूसू अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ने की अपेक्षा की जा रही थी, लेकिन विद्यार्थी परिषद् ने उनकी जगह संघ के सदस्य आलोक कुमार को चुना. आगे चलकर दिल्ली से बीजेपी के विधायक बनने वाले कुमार ने बताया कि उन्हें भी लग रहा था कि अब की बार जेटली की बारी है “क्योंकि वे राजनीति में ज्यादा सक्रिय थे और मैं ज्यादातर शाखा का काम देखता था.” हालांकि परिषद् के पहले डूसू अध्यक्ष खन्ना के टूट कर कांग्रेस की नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (एनएसयूआई) में चले जाने से हडकंप मच गया था. इसलिए परिषद्, स्वयंसेवक को चुनना चाहती थी.

सभी पार्टियों से दोस्ताना रिश्ते रखने वाले और कहीं भी फिट हो जाने वाले जेटली के साथ यह पहली बार नहीं हुआ था कि फौरी तौर पर ही सही पर संघ और इसके घटकों की विचारधारा रखने वालों के पक्ष में उनकी अनदेखी की गई हो. कुमार ने बताया, “फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने की उनकी काबिलियत”, जो उन्हें कुछ हद तक ‘बाहरी’ बनाती थी और जो काबिलियत परिषद् परिवार में उन दिनों अधिकतर के पास नहीं थी, उनको उपयोगी भी बनाती थी. खन्ना ने बताया, उन्हें संघ को जेटली को कम से कम उपाध्यक्ष का टिकट देने के लिए मनाना पड़ा, “और हमें नामांकन भरने के लिए उनके साथ एक तरह से जबरदस्ती करनी पड़ी क्योंकि वे बहुत चिढ़े हुए थे.” शीर्ष पद के लिए नकारे जाने के बाद, जेटली ने इस दूसरे नंबर के पद का भरपूर फायदा उठाया.

वर्ष 1974 में, छात्र संघ के पहले सीधे चुनाव संपन्न हुए. अब तक, जेटली अध्यक्ष पद के प्रत्याशी के सबसे प्रबल दावेदार बन चुके थे. लेकिन अभी भी यह स्पष्ट नहीं था कि वह किस पार्टी से चुनाव लड़ेंगे. संडे गार्डियन अखबार के वरिष्ठ संपादक पंकज वोहरा, जो उस समय एनएसयूआई के सदस्य थे, ने बताया कि जेटली का “जीतना लगभग तय था चाहे वह किसी भी पार्टी से चुनाव लड़ें, कांग्रेस भी उन्हें अपनी तरफ खींचना चाहती थी.” उस वक्त के वरिष्ठ परिषद् नेता ने बताया कि परिषद् के दिल्ली प्रमुख प्रभु चावला और एक अन्य नेता राजकुमार भाटिया को, जेटली को टिकट देने के लिए संघ को मनाने में तीन दिन लगे.

वोहरा ने बताया “लॉ फैकल्टी में, कांग्रेस के बहादुर सिंह और कुलबीर सिंह को जेटली को मनाते देखा जा सकता था, जिसके बाद परिषद् ने “उन्हें फौरन ही टिकट थमा दिया.” व्यवसायी और परिषद् सदस्य रवि गुप्ता के मुताबिक, जेटली का समर्थन करने वाली एनएसयूआई इस घोषणा को सुनकर अचंभित रह गई. वोहरा के मुताबिक, “जेटली भले ही आज इस बात को नकार दें, लेकिन 1974 में वे कांग्रेस के प्रत्याशी भी हो सकते थे.” परिषद् में जाना जेटली के लिए फायदेमंद साबित हुआ और वे भारी मतों से विजयी हुए.

“कुमार, खन्ना और अन्यों ने कहा अपने प्रबंधन कौशल के चलते, जेटली एक प्रभावशाली अध्यक्ष थे. नियमों और अध्यादेशों समेत यूनिवर्सिटी का पूरा कैलेंडर उन्हें कंठस्थ याद था. वोहरा ने कहा, “यूनिवर्सिटी के अफसरों को उनसे पार पाना मुश्किल लगता था.” स्टूडेंट वेलफेयर और डूसू के स्टाफ एडवाइजर रहे ब्राह्मण ए.एस. कुकला का हाथ उनके सिर पर होने की वजह से, “वे आसानी से काम निकलवा लिया करते थे.”

जेटली, जेपी आंदोलन में भी पूरी तरह से कूद पड़े. वे जेपी की “कमिटी फॉर यूथ एंड स्टूडेंट्स आर्गेनाइजेशन” के संयोजक थे और सम्मेलनों में भाग लेने पटना और अहमदाबाद भी गए. आंदोलन की स्टीयरिंग कमिटी के सदस्य और पद्मश्री, राम बहादुर राय ने याद करते हुए बताया कि जेटली ने दिल्ली विश्वविद्यालय में जेपी के लिए एक पब्लिक मीटिंग और मार्च 1974 में दो-दिवसीय छात्र सम्मलेन का आयोजन कराया था. उस समय की एक महिला दोस्त, जिसके साथ जेटली का उस वक्त रोमांस चल रहा था के अनुसार, जेटली इस कदर राजनीति में डूबे थे कि वे अपनी खुद की सगाई पर जाना भूल गए. “वे दो-चार दिन बाद लौटे और उससे कहा कि उनके दोस्त उन्हें मीटिंग के लिए पटना ले गए थे.”

जब इंदिरा गांधी ने 26 जून 1975 के दिन इमरजेंसी की घोषणा की, जेटली कानूनी अधिकारों को हटाये जाने को लेकर विरोध प्रदर्शनों के केंद्र में थे. विरोध करने वाले कई छात्र नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया था. जेटली ने अपने अनुभवों को याद करते हुए पिछले जून एक फेसबुक पोस्ट लिखी- “25 जून 1975 की शाम रामलीला मैदान में एक बड़ी रैली का आयोजन किया गया था, जिसे जेपी और अन्य नेताओं ने संबोधित किया था. उस दिन रैली में शामिल होने के बाद मैं देर शाम घर लौटा था, रात को दो बजे के करीब किसी ने मेरे घर का दरवाजा खटखटाया. पुलिस मुझे गिरफ्तार करने आई थी. पेशे से वकील मेरे पिता उनसे घर के बाहर जिरह करने में लगे थे और मैं, मौका देख पीछे के दरवाजे से भाग निकला.”

अगली सुबह जेटली ने एक विरोध प्रदर्शन का आयोजन किया जो उनके अनुसार “आपातकाल के खिलाफ उस दिन होने वाला देश में एकमात्र विरोध प्रदर्शन था,” जहां पुलिस के आने से पहले करीब 200 लोग एकत्रित हुए थे. जेटली ने यह भी कहा कि उन्होंने उस दिन अपनी गिरफ्तारी दी, लेकिन कॉलेज के एक दोस्त के मुताबिक गिरफ्तार किए जाने से पहले उन्होंने उन्हें यूनिवर्सिटी के कॉफी हाउस से होकर, “मैं भाग रहा हूं” कहते हुए भागते देखा था. “वे जानते थे उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाएगा,” करांजवाला ने मुझे बताया. लेकिन यह गिरफ्तारी कितने दिन चलेगी किसी को नहीं पता था. अरुण ने शायद सोचा हो कि वे हफ्ते भर में बाहर आ जायेंगे.” जेटली को पहले अम्बाला जेल भेजा गया. फिर उन्हें दिल्ली के तिहाड़ जेल में शिफ्ट कर दिया गया. वे कुल 19 महीने जेल में रहे.

तिहाड़ में काटे अपने वक्त को जेटली बहुत गर्व के साथ याद करते हैं. उन्होंने 2010 में आउटलुक पत्रिका में लिखा, “मैं किचन का इंचार्ज था, “नाश्ते में परांठे बनाने के लिए मैंने कुछ कैदियों को ढूंढ लिया था और जेल वार्डन, जो एक भले इंसान थे, से हमने मीट बनाने की इजाजत ले ली थी जिसके फलस्वरूप रात के खाने में हमें रोगनजोश मिलता था, हम जेल से मोटे-ताजे होकर बाहर निकले.” एक अन्य लेख में जेटली ने लिखा, “हम नौजवानों के लिए जिनके ऊपर परिवार को संभालने की जिम्मेदारी नहीं थी, जेल असल में किसी कालेज या स्कूल का लंबा खिंचा कैंप बन गया था.”

जेल में जेटली की राजनीतिक दीक्षा जारी रही. पहले से परिचित संघ के कार्यकर्ताओं, परिषद् के सदस्यों और देश भर से आए समाजवादियों से उन्होंने घनिष्टता बढ़ाई. वे वीरेंद्र कपूर समेत 13 और लोगों वाले वार्ड में थे. कपूर आज भी उनके करीबी दोस्तों में गिने जाते हैं. इस दौरान वे प्रमुख विपक्षी नेताओं जैसे, अटल बिहारी वाजपेयी, एल.के. अडवाणी, के.आर. मलकानी और नानाजी देशमुख से भी मिले. “उनका राजनीतिक प्रवेश कैंपस में नहीं, जेल में हुआ था,” खन्ना ने बताया. यह उनकी “सबसे बड़ी परीक्षा थी. संघ के लिए वे अब बाहरी व्यक्ति नहीं रहे थे. जेल से बाहर आकर शायद उन्हें इस बात का ज्ञान हुआ कि अब राजनीति ही उनका भविष्य है.”

1989 में सैंतीस वर्षीय जेटली को अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल बना दिया गया. बीसीसीएल

जनवरी 1977 में जब जेटली तिहाड़ से बाहर आए तो वे विपक्षी राजनीति का सबसे प्रमुख छात्र चेहरा थे. बाहर निकलने के बाद उन्हें अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् का राष्ट्रीय सचिव बना दिया गया. मार्च में जब आपातकाल खत्म हुआ और आम चुनावों की घोषणा हुई तो उनका नाम भी नवगठित जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में शामिल था. राम बहादुर राय ने बताया कि समाजवादी जनता पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर ने जेटली के नाम की पेशकश की थी, जिसे नानाजी देशमुख ने समर्थन दिया था. उन्होंने इसके लिए जेटली या परिषद् से भी मशविरा नहीं किया. “परिषद् न तो जनसंघ का हिस्सा थी, न वह उसके तत्वाधान में काम करना चाहती थी.” राय ने समझाया, इसलिए उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया. जेटली ने अपने साक्षात्कारों में कहा है कि वाजपेयी चाहते थे कि वे 1977 का लोक सभा चुनाव लड़ें, लेकिन उस वक्त वे चुनाव लड़ने की 25 साल की न्यूनतम आयु से एक साल कम थे. इसकी बजाय उन्होंने अपनी कानून की डिग्री प्राप्त करने के बाद वकालत करने पर अपना ध्यान केंद्रित कर लिया. वे फौरी तौर पर राजनीति से भी जुड़े रहे.

“हमारा यह एक अहम पेशा है,” एक पेशे के रूप में वकालत चुनने पर जेटली ने 1997 में इंडिया टुडे से कहा था. “इसमें कोई दो राय नहीं कि इसमें बहुत रुतबा है.” पत्रिका को उन्होंने यह भी बताया कि “फायदा चाहने वाले उद्योगपतियों की बजाय, वकीलों को राजनेताओं की उतनी नहीं, जितनी राजनेताओं को वकीलों की दरकार रहती है.” जेटली ने कहा वे “कानून में धीरे-धीरे पारंगत हुए.” जबकि करांजवाला के मुताबिक “वे तीस हजारी में ही पैदा हुए लगते थे,” जहां उनके पिता महाराज किशन जेटली वकालत किया करते थे. सत्तर के दशक के आखिर तक जेटली खुद मुकदमे लड़ने लगे थे. उन्हें दिल्ली नगर निगम और दिल्ली विकास प्राधिकरण के मुकदमों में महारत हासिल हो गई थी.

जब उन्होंने 1979 में वरिष्ठ कांग्रेसी नेता गिरधारी लाल डोगरा की बेटी संगीता से शादी की तब तक राजनीतिक हलकों में उनका शीर्ष नेताओं के साथ अच्छा खासा नेटवर्क बन गया था. वाजपेयी और अडवाणी दोनों उनकी शादी में आए, यहां तक कि खुद इंदिरा गांधी भी इसमें शामिल होने वालों में से थीं. लेकिन अदालतों के अनुभव के कारण, जेटली अगले कुछ सालों में भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेताओं के करीबी बन गए, जिसमें वे 1980 में उसके गठन के साथ ही शामिल हो गए थे. इसके पहले अध्यक्ष वाजपेयी बने. उसी साल इंदिरा गांधी सत्ता में वापिस आ गईं. सरकार ने इंडियन एक्सप्रेस को आपातकाल के दौरान की गई उसकी कवरेज का सबक सिखाने के लिए, पिछली सरकार द्वारा उसके दफ्तर को दी गई बिल्डिंग का परमिट खारिज कर दिया. यह काम सरकार ने डीडीए के जरिए करवाया था. अखबार के मालिक रामनाथ गोयनका और कार्यकारी डायरेक्टर अरुण शौरी, करांजवाला के पास मदद मांगने गए. करांजवाला ने जेटली को अपने साथ लगा लिया. “क्योंकि केस के अनुसार जेटली की उसमें महारत थी.” कोर्ट ने अखबार को स्टे ओर्डर दे दिया. केस के चलते जेटली का गोयनका से मजबूत रिश्ता बन गया, जिनसे वे कभी बतौर छात्र मिले थे.

अस्सी के दशक में राजनेताओं, उद्योगपतियों और अखबारों के मालिकों के बीच छिड़े इस युद्ध में इंडियन एक्सप्रेस का मामला एक छुटपुट घटना थी. वफादारियां बॉम्बे डाईंग के मालिक नस्ली वाडिया और रिलायंस टेक्सटाइल इंडस्ट्रीज लिमिटेड के मालिक धीरुभाई अंबानी के बीच बंटी हुई थीं. या तो युद्ध अदालतों के कटघरों में लड़े जाते थे या अखबारी कागज के हर एक इंच पर. जेटली को कानूनी मैदान में लड़ने के कई मौके मिले, खासकर वरिष्ठ वकील और पूर्व बीजेपी नेता राम जेठमलानी के सहायक के रूप में. इन सब के चलते, जेटली को अपनी राजनीति चमकाने का मौका मिल गया. 1985 के आम चुनावों में बीजेपी की बुरी तरह से पराजय के बाद, वाजपेयी ने इंडिया टुडे से कहा, “चुनाव के नतीजों ने हमें पुनर्विचार का मौका दिया है. नए चेहरों को सामने लाने की आवश्यकता है. हमारे पास मुम्बई के प्रमोद महाजन और दिल्ली के अरुण जेटली जैसे प्रतिभाशाली नौजवान मौजूद हैं.”

वर्ष 1987 में जेटली, तत्कालीन वित्त मंत्री वी.पी. सिंह के अंतर्गत आने वाले एन्फोर्समेंट डायरेक्टोरेट और अमरीकी जासूसी कंपनी फेयरफैक्स के कानूनी पचड़ों में फंसे रहे, जिसे कथित तौर पर विदेशों में जमा गैरकानूनी काले धन की छानबीन के लिए बुलाया गया था. मार्च 1987 में, जेटली और जेठमलानी ने संघ के विचारक और गोयनका के आर्थिक सलाहकार एस. गुरुमूर्ति का सफलतापूर्वक बचाव किया था. इंडियन एक्सप्रेस में कांग्रेस और रिलायंस के खिलाफ लिखे लेखों की झड़ी के बाद, गुरुमूर्ति पर शक किया जाने लगा था कि उन्होंने फेयरफैक्स को गुप्त जानकारी मुहैया करवाई थी. तब तक रक्षामंत्री बन चुके, सिंह की छानबीन के लिए दो सुप्रीम कोर्ट जजों का एक आयोग गठित किया गया. वी.पी.सिंह प्रधानमंत्री राजीव गांधी द्वारा टैक्स चोरों के खिलाफ छेड़ी गई जंग के खिलाफ थे, जिसमें गांधी ने कांग्रेस-समर्थक रिलायंस को भी नहीं बख्शा था. सिंह ने अपना मंत्री पद और कांग्रेस पार्टी दोनों त्याग दिए और अपने बचाव के लिए करांजवाला का हाथ थामा. उन्होंने मुझे बताया, “अरुण भी उन्हें सलाह दिया करते थे.”

अगले महीने अप्रैल तक, लहर कांग्रेस के खिलाफ बहने लगी जब खुलासा हुआ कि स्वीडन की हथियार बनाने वाली कंपनी ने कथित तौर पर भारत सरकार के साथ 1.3 बिलियन डॉलर का करार करने के लिए कथित तौर पर राजीव गांधी को रिश्वत खिलाई थी. उसी गर्मियों में जब फेयरफैक्स की जांच अभी जारी थी और बोफोर्स घोटाला खबरों में छाया हुआ था, जेठमलानी इंडियन एक्सप्रेस के पहले पन्ने पर अपने लेखों के जरिए गांधी को निशाने पर लेकर सवालों की झड़ी लगाए हुए थे. नलिनी गेरा की 2009 की किताब ‘राम जेठमलानी: एन औथोराइजड बायोग्राफी ’ के मुताबिक, इसमें उनकी मदद गुरुमूर्ति, अरुण शौरी और बीजेपी के कई सदस्य खासकर, अरुण जेटली कर रहे थे.”

जेटली कोर्टरूम के बाहर भी अपनी भूमिका निभा रहे थे. दिसंबर 1989 में बोफोर्स घोटाले की लहर पर सवार होकर वी.पी. सिंह, जनता दल के नेतृत्व में बीजेपी-समर्थित नेशनल फ्रंट सरकार के प्रधानमंत्री बन गए. इंडिया टुडे ने बीजेपी की सीट तालिका में नाटकीय इजाफे का कुछ श्रेय जेटली को दिया. बीजेपी 1984 में दो सीटों से 1989 में 86 सीटों का आंकड़ा छू चुकी थी. “पूर्व छात्र नेता ने पैसों का इन्तेजाम किया और बीजेपी के प्रचार अभियान की कमान संभाली,” इंडिया टुडे ने लिखा, जेटली के कॉलेज के दोस्त प्रभु चावला तब तक पत्रिका में वरिष्ठ संपादक बन चुके थे.

सैंतीस वर्षीय जेटली को अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल बना दिया गया. करांजवाला ने कहा, जेटली, सिंह के “बहुत पसंदीदा थे. मेरी भी शायद इसमें छोटी-मोटी भूमिका थी.” जेटली के साथ दफ्तर साझा करने वाले वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे के अनुसार, इस नियुक्ति के चलते दिल्ली हाई कोर्ट ने उन्हें रातों रात वरिष्ठ वकील का दर्जा दे दिया, जिससे उनकी वकालत और भी चमक उठी. करांजवाला ने कहा, मौजूदा अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी जो “हमारे सबसे करीबी दोस्तों में थे, की भी इसमें भूमिका रही.”

जेटली जैसे वकीलों की सेवाओं के चलते प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह से अपेक्षा की जा रही थी कि वे बोफोर्स आरोपों की जांच को अंजाम तक पहुचाएंगे. जनवरी 1990 में, जेटली समेत पूर्व एन्फोर्समेंट डायरेक्टर भूरे लाल और सीबीआई के डिप्टी इंस्पेक्टर-जनरल एम.के. माधवन का एक जांच दल जांच के सिलसिले में स्विट्जरलैंड और स्वीडन गया. यह पहला मौका था जब जेटली की तस्वीर टीम के साथ राष्ट्रीय अखबारों में छपी.

लेकिन आठ महीने बाद वही ‘ढाक के तीन पात’ वाली बात हो गई. इंडिया टुडे के एक लेख में, एक आलोचक सांसद का बयान छपा. जिसमें उन्होंने कहा कि अगर जांच दल ने “विदेशों में इसी तरह अपनी जांच जारी रखी तो उसे जल्द ही प्रवासी भारतीयों का दर्जा मिल जाएगा.” इसके बावजूद आने वाले सालों में, जेटली अपनी दुकान चमकाने के लिए अक्सर जांच में अपनी भागीदारी को गाहे-बगाहे उठाते रहे. लेकिन 2012 में स्वीडिश पुलिस के पूर्व प्रमुख स्टेन लिंडस्ट्रोम, जिन्होंने पत्रकार चित्रा सुब्रमण्यम को बोफोर्स संबंधित अति संवेदनशील दस्तावेज लीक किए थे, ने टीम के खिलाफ बोलते हुए दावा किया कि इस जांच ने “पानी और गंदा कर दिया था.”

लिंडस्ट्रोम ने कहा कि सुब्रमण्यम के लेखों में पांच स्विस बैंक खातों का जिक्र था जिनमें बोफोर्स की रिश्वत जमा की गई थी. टीम ने राजीव गांधी के करीबी दोस्त, एक्टर अमिताभ बच्चन का नाम भी इसमें शामिल कर दिया, जिसकी खबर डेगेंस नाइटर नामक अखबार में छपी. बच्चन द्वारा यूके कोर्ट में दायर किया गया केस जीतने के बाद, अखबार ने अपना माफीनामा छापा. बच्चन ने दावा किया था कि “भारत सरकार की तरफ से बोफोर्स लेनदेन के मामले में सीधे-सीधे जुड़े लोगों की सूचना पर विश्वास करना” भ्रमित करने वाला है.

सुब्रमण्यम, जो अब द न्यूज मिनट ऑनलाइन पोर्टल की प्रधान संपादक हैं, ने मुझे इमेल इंटरव्यू में बताया, “वह साजिशों का दौर था! लगभग हर किसी के पास एक थ्योरी, एक लिस्ट, एक नाम था.” उन्होंने कहा- जेनेवा, बर्न और स्टॉकहोम से एक दशक से भी ऊपर से, “मैंने देखा कि कैसे सरकारों ने तथ्यों की कीमत पर अपने फायदे के लिए सूचनाओं का उपयोग और दुरूपयोग किया.” उनका यह भी दावा था कि सरकार की जांच में उनके ऊपर बच्चन और सहायक को फंसाने का जबरदस्त दबाव था.

उनके मना करने पर उनके खिलाफ घातक और महिला-विरोधी लेख लिखे गए. एक वरिष्ठ पत्रकार ने बताया कि मुंबई के एक अखबार, द डेली ने बच्चन और उनके बीच विवाहेत्तर संबंध होने का भी संकेत किया. इंडियन एक्सप्रेस ने उनकी विश्वसनीयता पर ही प्रश्न चिन्ह लगाते हुए उनके ऊपर अमिताभ बच्चन का प्रभाव होने का आरोप लगाया.” चावला और तरुण तेजपाल ने बच्चन द्वारा मानहानि का मुकदमा जीतने के बावजूद इंडिया टुडे में लिखा. इन लेखों से सुब्रमण्यम बहुत ज्यादा विचलित हुईं. उन्होंने बताया, “कुछ सालों बाद मैंने इस बारे में जेटली से बात की, उन्होंने मेरे विचारों को खुले दिल से सुना.” उन्होंने जेटली पर अफवाह फैलाने का आरोप नहीं लगाया लेकिन कहा, “वे वही कर रहे थे जो उनसे राजनीतिक रूप से अपेक्षित था.”

बच्चन उस समय इलाहबाद से सांसद थे और उनके खिलाफ प्रचार का कम से कम एक व्यापक राजनीतिक असर तो पड़ना ही था. वी.पी. सिंह की राज्य सभा सदस्यता खत्म हो रही थी और वे इलाहाबाद की बच्चन वाली सीट से चुनाव लड़ना चाहते थे. जब बच्चन ने 1987 में अपने पद से त्यागपात्र दिया तो इसने उपचुनाव की स्थिति पैदा कर दी. बच्चन दोबारा चुनाव मैदान में नहीं उतरना चाहते थे. सिंह ने अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए बोफोर्स आरोपों का भरपूर इस्तेमाल किया. “मैंने कहा, मैं बच्चन के खिलाफ चुनाव लडूंगा और उन्हें हराऊंगा क्योंकि वे इस सरकार के भ्रष्टाचार का प्रतिनिधित्व करते हैं.”

(तीन)

राजनीतिक रूप से 1989 चुनाव के बाद उथल-पुथल वाले वर्षों में जनता दल और बीजेपी में पहले से ही मुश्किल गठबंधन में दरारें पड़ गईं. नेशनल फ्रंट की सरकार में शामिल होने से कुछ समय पहले, बीजेपी औपचारिक तौर पर हिंदुत्व के सिद्धांत को पालमपुर की अपनी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में अपना चुकी थी. पालमपुर में बीजेपी ने विश्व हिन्दू परिषद् के रामजन्मभूमि आन्दोलन, जो अयोध्या में बाबरी मस्जिद के स्थान पर राम मंदिर बनाने का इरादा रखता था, को समर्थन देने का प्रण लिया था. जैसे-जैसे उनकी पार्टी अधिक सांप्रदायिक होती गई, जेटली सार्वजनिक रूप से तटस्थ रहने की कोशिश करते रहे.

संघ विचारक और बीजेपी के पूर्व महासचिव के अनुसार, सितंबर 1990 में अडवाणी ने जब अयोध्या की रथयात्रा शुरू की, “जेटली ने उनकी दैनिक प्रेस ब्रीफिंग के लिए प्रभावशाली नोट्स तैयार किए.” बाद में जब देश भर में साप्रदायिक दंगे भड़के तो जेटली ने वी.पी. सिंह पर विहिप की मांगें मान लेने के लिए दबाव बनाना शुरू किया. अडवाणी की आत्मकथा ‘माय कंट्री माय लाइफ’ के अनुसार, जेटली और गुरुमूर्ति, सरकार और विहिप के बीच की कड़ी थे. उनकी लंबी बातचीत सिंह के साथ होती थीं. रामजन्म भूमि आंदोलन को विवादित जमीन का टुकड़ा दिए जाने को लेकर वे अध्यादेश का प्रारूप बनाने में सरकार की मदद कर रहे थे. इस गतिरोध के दौरान अडवाणी ने लिखा, “गुरुमूर्ति और जेटली के बिना ढेर सारी बेकार जानकारियों से असली तत्व निकाल पाना आसान नहीं था.” हालांकि बाद में अध्यादेश वापस ले लिया गया. अडवाणी को उनकी कोशिशें इतनी तर्कसंगत और लाजवाब लगीं कि प्रधानमंत्री और उनके सहयोगियों के पास उनके खिलाफ कोई जवाब ही नहीं था.”

उस अक्टूबर को अडवाणी का रथ जब बिहार के समस्तीपुर पहुंचा तो उन्हें लालू प्रसाद यादव की नियंत्रित राज्य सरकार ने गिरफ्तार करा दिया. बीजेपी ने विरोध स्वरुप नेशनल फ्रंट से अपना समर्थन वापस ले लिया. 10 नवंबर को कांग्रेस के बाहरी समर्थन से समाजवादी जनता पार्टी के मुखिया चंद्रशेखर नए प्रधानमंत्री बने. लेकिन उनकी पार्टी द्वारा सरकार से हाथ खींच लिए जाने के बावजूद भी जेटली कुछ समय तक अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के पद पर बने रहे. 22 नवंबर को जब अर्थशास्त्री सुब्रमण्यम स्वामी कानून मंत्री बने तो जेटली ने इस्तीफा दे दिया. बीजेपी की दिल्ली इकाई के एक वरिष्ठ नेता ने मुझे बताया चूंकि जेटली का दावा था कि उन्हें यह पद बीजेपी की सिफारिश से मिला था, “उन्हें तभी इस्तीफा दे देना चाहिए, जब बीजेपी ने नेशनल फ्रंट से अपना समर्थन वापिस ले लिया था.” उसी वरिष्ठ नेता ने बताया, 6 दिसंबर को बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद जेटली ने खुद को बीजेपी से अलग कर लिया. इस दौरान वे निरंतर “आपकी पार्टी”, “इसके कारसेवक”, “गुंडे तत्व”, ढहाना और “तोड़फोड़” जैसी शब्दावली इस्तेमाल करते पाए गए.

हिंदुत्व के प्रति उनकी जो भी भावनाएं रहीं हों, जेटली को अडवाणी की स्वीकृति प्राप्त थी चाहे वे पार्टी के प्रिय प्रमोद महाजन के बाद दूसरे नंबर पर आते हों, जिन्हें 37 साल की उम्र में बीजेपी का महासचिव बना दिया गया था. जेटली 1991 के आम चुनावों में अडवाणी के प्रचार अभियान के प्रबंधकों में से एक थे. लेकिन नई दिल्ली चुनाव क्षेत्र से वे उनके लिए बड़ी मुश्किल से ही सीट निकाल पाए, जहां उनके विरोध में बॉलीवुड के नायक राजेश खन्ना खड़े थे. हालांकि अदालत में अडवाणी का बचाव करने में जेटली को अधिक सफलता प्राप्त हुई, जब अक्टूबर 1993 में बाबरी मस्जिद ढहाने के बाद सीबीआई द्वारा बीजेपी नेताओं के खिलाफ दायर केसों में वे उनके वकील बने. नब्बे के दशक के आखिरी सालों में जेटली ने, अडवाणी पर हवाला घोटाले के आरोपों में भी उनका बचाव किया. अडवाणी ने स्वीकार किया कि “यह उनके जीवन का सबसे चुनौती भरा काल था.” दिल्ली से बीजेपी के वरिष्ठ सदस्य और बीजेपी-समर्थक संपादक ने मुझे बताया कि अडवाणी ने 1994 में जेटली को राज्य सभा में पहुंचाने की कोशिश की, लेकिन वाजपेयी ने इस कोशिश में अड़ंगा लगा दिया, जो जेटली को लेकर अब उतने उत्साहित नहीं रहे थे, जितने वे एक दशक पहले हुआ करते थे. बीजेपी सांसद के मुताबिक, वाजपेयी ने पार्टी मीटिंग में कहा, “अरुण तो हो नहीं सकता, बाकि नाम सुझाइए.”

दिसंबर 1989 में, वीपी सिंह के प्रधान मंत्री पद की शपथ लेने के दो दिन बाद जेटली ने, राजीव गांधी के साथ एक रक्षा समारोह में भाग लिया, जिन्होंने बोफोर्स आरोपों के कारण इस्तीफा दे दिया था. शरद सक्सेना/इंडिया टुडे ग्रुप/गैटी इमेजिस

मदन लाल खुराना ने 1996 में जब अपने पद से त्यागपत्र दिया तो इस बीजेपी-समर्थक संपादक ने जेटली को दिल्ली का मुख्यमंत्री बनाने के लिए जोर लगाया था. उन्होंने बताया अडवाणी को उस वक्त लगा जेटली अभी इस जिम्मेदारी के लिए उम्र के लिहाज से छोटे हैं. “1994 में हमने उन्हें दिल्ली से राज्य सभा सीट दिलाने की कोशिश की, लेकिन वाजपेयी को वे पसंद नहीं थे और प्रमोद महाजन ने उनके नाम का विरोध कर दिया था.” आखिरकार 1999 के चुनावों से थोड़ा पहले अडवाणी ने उन्हें पार्टी प्रवक्ता का पद सौंप दिया, जिस कारण उसी साल अक्टूबर में जब बीजेपी के नेतृत्व वाला नेशनल डेमोक्रेटिक अलायन्स सत्ता में आया तो उन्हें सूचना एवं प्रसारण मंत्री बना दिया गया. करांजवाला ने बताया कि उन्हें लगता है, जेटली को मंत्री बनवाने में नस्लीवाडिया ने “बहुत सकारात्मक, मजबूत और सहायक भूमिका अदा की थी.” तब तक यह साफ हो चुका था कि पार्टी को एक ऐसे मंत्री की जरूरत है जो बोलने में माहिर हो और जिसके पत्रकारों से अच्छे संबंध हों,” पत्रकार ने बताया.

बीजेपी के प्रवक्ता और सूचना एवं प्रसारण मंत्री के रूप में जेटली बिल्कुल फिट बैठते थे. श्रीराम खन्ना ने बताया कि जेटली ने प्रेस में अपनी पैठ उन दिनों से ही बनानी शुरू कर दी थी. “हम प्रेस विज्ञप्तियां लेकर अखबारों के दफ्तरों में जाया करते थे,” उन्होंने कहा. “मीडिया के साथ संबंध बनाना हमने तभी से सीखा.” जब तक जेटली मंत्री बने, प्रेस के लोगों के साथ उनके अच्छे-खासे संबंध बन चुके थे. उन्होंने बतौर कानूनी सलहाकार, रामनाथ गोयनका के इंडियन एक्सप्रेस और टाइम्स ऑफ इंडिया के प्रकाशक बेनेट कोलेमेन एंड कंपनी लिमिटेड जैसे मीडिया घरानों के साथ भी संबंध गांठे. वे हिंदुस्तान टाइम्स बोर्ड के सदस्य भी थे.

टीवी न्यूज राजनीति के मानदंड बदल रही थी. जैसा कि 1999 में स्वपन दासगुप्ता ने कहा, “जैसे-जैसे टीवी की महत्ता बढ़ती गई, वैसे-वैसे जेटली का ग्राफ भी चढ़ता गया.” स्टूडियो में वे इतने लोकप्रिय मेहमान बन गए थे कि जब पत्रकार वीर सांघवी ने उनके मंत्री बनने के तुरंत बाद उनका स्टार टीवी पर इंटरव्यू किया तो उन्होंने मजाक किया, “इस कार्यक्रम में ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है कि मेरा मेहमान मुझसे ज्यादा बार टीवी पर आ चुका हो.”

बीजेपी नेताओं जिनमें के.एन. गोविन्दाचार्य, प्रमोद महाजन, नरेंद्र मोदी जैसे नेता शामिल थे, में जेटली प्रेस समुदाय से अपने संबंधों में सबसे अधिक सहज हैं. “क्या आप अहानिकारक फ्लर्ट हैं?” रेडिफडॉटकॉम के सितंबर 1999 के प्रोफाइल के लिए वर्षा भोंसले ने जेटली से पूछा. “मुझे लगता है, मैं नहीं हूं,” जेटली ने जवाब दिया. भोंसले ने लिखा, “यह उनका उच्च दर्जे का जेट्लीस्म था. एक ऐसा जेट्लीस्म जिससे हमारे घुटने कांपने लगते हैं. इसका मतलब कुछ भी निकाला जा सकता था कि वे फ्लर्ट नहीं हैं, वे एक बुरे किस्म के फ्लर्ट हैं या उन्हें लगता है कि वे बिल्कुल फ्लर्ट नहीं हैं.”

वर्ष 2000 में एशिया वीक पत्रिका ने भारत के सबसे उदयीमान और नौजवान राजनीतिज्ञों की सूची में जेटली का नाम शामिल किया. इसमें पत्रिका ने एक डिप्लोमेट को उद्दृत करते हुए कहा, “वे आधुनिक भारत का चेहरा हैं, साफ छवि वाला एक शानदार व्यक्तित्व.” यहां तक कि आलोचनात्मक लेखों में भी उनकी तारीफ की जाती. इंडिया टुडे के नवंबर 2003 के एक लेख, अंडर स्क्रूटिनी में कहा गया, “वे शिष्ट, शहरी और वाक्पटु हैं.” जेटली का “सार्वजनिक चेहरा सबसे ज्यादा टीवी स्टूडियो में देखने को मिलता है, जहां वे कई अलग-अलग किस्म के मुद्दों पर अपनी सरकार का बचाव करते नजर आते हैं, और जहां उनका कानूनी दिमाग बहुत काम आता है.”

उनका यह सार्वजनिक चेहरा लोगों के बारे में निजी जानकारियों का खजाना है. तीन दशकों से बीजेपी को कवर करने वाले एक पत्रकार ने बताया, “दिल्ली में दो लोगों के बीच कुछ चल रहा हो और जेटली को उसकी खबर न लगे, ऐसा हो ही नहीं सकता.” अपनी किताब एडिटर अनप्लग्ड में, विनोद मेहता ने लिखा, “हालांकि वे निरंतर राजनीतिक रूप से ऊपर उठने के नशे में रहते हैं, और संभवत: दिल्ली के सबसे बड़े किस्सेबाज हैं,” परंतु “जेटली को पढ़े-लिखे पत्रकारों की संगत बहुत पसंद है और वे खुद को हर जानकारी से लैस रखना पसंद करते हैं.” जब मेहता की आउटलुक ने 2009 में भारत के सबसे बेहतरीन किस्सों पर कवर स्टोरी की, जेटली का नाम उसमें सबसे ऊपर था. “इस वकील-राजनेता के लिए किस्से-कहानियां सिर्फ सामाजिक वैधता या मन बहलाने का जरिया नहीं है, बल्कि उनका जुनून है. जो खुश किस्मत पत्रकार उनके दरबार में जगह पाते हैं. उनका वे पत्रकारों और संपादकों समेत लगभग सभी की निजी जिंदगियों के किस्से सुनाकर मनोरंजन करते हैं.”

आउटलुक की यह सूची जेटली के दोस्तों के नाम से भरी पड़ी थी. इसमें पूर्व पत्रकार और कांग्रेस सांसद राजीव शुक्ला, समाजवादी पार्टी के अमर सिंह, सुहेल सेठ तथा वीरेंद्र और कूमी कपूर शामिल थे. इस लेख में कपूर दंपत्ति को “किस्सों का खजाना” माना गया. “वे एक ऐसी जोड़ी है कि सत्ता के गलियारों में जो कुछ भी घटित होता है वे उसके राजदार हो ही जाते हैं. अरुण जेटली एक निषिद्ध क्षेत्र हैं.” कईयों ने मुझे बताया, जेटली के प्रति संवेदना रखने वाले पत्रकार उनके उन विचारों के मुंहनाल बन जाते जिनको वे सार्वजनिक रूप से व्यक्त नहीं करते.

मंत्री बनने के शुरूआती सालों में, पहले बतौर सूचना एवं प्रसारण और फिर कानून और न्याय, ये विचार प्रधानमंत्री वाजपेयी के लगातार बढ़ते अलगाव का कारण बने क्योंकि बीजेपी के नौजवान नेता अडवाणी के करीब दिखना चाहते थे, जिनका प्रधानमंत्री बनना लगभग तय था. जून 2002 में, आगरा में भारत-पाक बातचीत के विफल हो जाने बाद, टाइम मैगजीन ने वाजपेयी पर एक कवर स्टोरी की, जिसका शीर्षक था, “पहियों पर सोने वाला?” प्रधानमंत्री के खानपान और उनकी बीमारी के बारे में चटकारेदार विवरण के बाद, इस लेख में लिखा था, “वे बोलते हुए गहरी चुप्पी साध लेते हैं, वे बड़बड़ाने लगते हैं और अक्सर बीच मीटिंगों में सो जाते हैं, अजीब लगता है ऐसे व्यक्ति के हाथों में परमाणु जखीरे की कमान है. एक पूर्व बीजेपी महासचिव ने इसमें साफतौर पर जेटली की छाप देखी. टाइम पत्रिका के उस लेख के छपने के बाद, “पहली बार में ही उनमें यह आदत साफतौर पर देखी जा सकती थी.” उन्होंने कहा, “वाजपेयी इससे बहुत नाराज हुए.” कई लोगों ने बताया, जेटली की इस “काबू से बाहर हो जाने” की आदत की वजह से ही, वाजपेयी उनको पसंद नहीं करते थे.

बीजेपी सांसद ने बताया कि वाजपेयी खासतौर पर उनके परिवार के बारे में बात किए जाने से जेटली से खफा थे. एक वरिष्ठ पत्रकार ने मुझे उस बातचीत के बारे में बताया, जो भोपाल में बीजेपी की स्थानीय कार्यकारिणी की बैठक दौरान हुई. जब दो और पत्रकारों के साथ “सब जहांनुमा पैलेस होटल में रात के खाने के बाद कॉफी ले रहे थे, जेटली हमारे पास आए और अचानक ही उन्होंने वाजपेयी तथा उनके दामाद रंजन भट्टाचार्य के बारे में बुरा-भला कहना शुरू कर दिया. जेटली ने कहा, “उनका एक दामाद है जो एक नाकामयाब व्यवसायी है और एक नाकामयाब व्यवसायी बहुत खतरनाक होता है क्योंकि उसे शक्ति से प्रेम होता है.” वाजपेयी के परिवार को इस बातचीत की भनक लग गई. बाद में भट्टाचार्य ने पत्रकार के साथ “जहांनुमा में लंबी बातचीत की.” दिल्ली से बीजेपी के वरिष्ठ नेता और पार्टी सांसद ने बताया, जेटली में अडवाणी की दिलचस्पी व्यावसायिक मसलों से भी आगे जाती है और यह कि वे जेटली की मदद अपने निजी मसलों को सुलझाने के लिए भी लेते हैं.

वाजपेयी सरकार के वित्त मंत्रालय में बतौर विशेष सलाहकार काम करने वाले मोहन गुरु स्वामी की जेटली से जान-पहचान अस्सी के दशक के आखिर से है. ये दोनों अडवाणी के साथ करीबी सबंध रखते थे और इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में अक्सर मिलते-जुलते रहते थे. उन्होंने जेटली को एक “दरबारी राजनेता” बताया, जो स्वीकृति के लिए “अपनी बात रखने के बाद” मुस्कुराते हुए चेहरे से सब की तरफ देखता है. यह उनकी खासियत में शुमार है.” उन्होंने कहा, जेटली की जुबान से तो अडवाणी भी नहीं बच सकते थे. “हम चार-पांच लोग अडवाणी के घर दोपहर का भोजन करके जैसे ही बाहर निकले, जेटली उनको गलियाने लगे. यही सब वे वाजपेयी और अन्यों के साथ भी करते थे. ऐसा हो ही नहीं सकता था कि आप उनसे पांच मिनट से ज्यादा बतियाएं और वे किसी को गाली न दें.”

बीजेपी में अंदरूनी तौर पर एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने से राजनीति के मसलों पर लिखने वाले पत्रकारों की चांदी हो जाती थी. बीजेपी में इस “परस्पर विनाशकारी युद्ध” का पोस्टमार्टम करते हुए आउटलुक 2002 के अंक में लिखते हुए, सबा नकवी ने लिखा, “अरुण जेटली, सुषमा स्वराज और प्रमोद महाजन जैसे बीजेपी के दूसरे पायदान के नेताओं के बीच पुरानी दुश्मनियां और चालबाजियां बहुत क्रूर स्तर पर काम करती हैं. जैसे जेटली का खेमा, सुषमा स्वराज के खिलाफ उनके द्वारा सन् 2000 में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय संभालने के बाद किसी ‘दोस्ताना अखबार’ में खबर ‘प्लांट’ करवा देता है, जिसकी एवज में सुषमा स्वराज, जेटली को दूरदर्शन के राष्ट्रीय नेटवर्क से ही बाहर कर देती हैं.” जेटली आलोचक लेकिन बीजेपी समर्थक संपादक के मुताबिक, “जब उनके हाथ से सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय चला गया तो “नस्ली वाडिया ने उन्हें जल्द ही कैबिनेट पोस्ट दिलवाने के भरोसे के साथ, जहाजरानी मंत्रालय दिलाने में मदद की.”

रेडिफडॉटकॉम के ‘कैपिटल बज’ कॉलम में, वीरेंद्र कपूर ने जेटली की हमेशा सकारात्मक छवि पेश की और उनके प्रतिद्वंद्वियों पर लगातार हमले किए. उन्होंने सुषमा स्वराज पर खासतौर से निशाना साधा. कपूर ने 1999 में लिखा, “जब भी वे मीडिया के निशाने पर आती हैं, वह किसी-न-किसी बीजेपी नेता को इसके लिए जिम्मेवार ठहराना शुरू कर देती हैं. वह कभी भी आरोपों को तथ्यों से नहीं नकारतीं (यह काम उनके बूते में नहीं है), बल्कि शिकायत लेकर पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की शरण में चली जातीं हैं कि ‘देखो, फलां आदमी ने उनके साथ क्या सलूक किया!’ कपूर ने कहा “जैसे जेटली मेरे लिए राजनेता नहीं हैं, वैसे ही मैं उनके लिए पत्रकार नहीं हूं.” जब किसी ने उन पर हाल ही में आरोप लगाया कि जेटली ने ही उनको मोदी के बारे में खबर दी है तो उन्होंने कहा, “जब कोई बेचारे जेटली पर बिना उनकी किसी गलती के इल्जाम लगाता है तो मुझे बुरा लगता है.”

जबटाइम में लेख छपा, उस वक्त जेटली को कानून और न्यायमंत्री बने दो साल बीत चुके थे. यह पद उन्हें राम जेठमलानी को अपदस्थ करके मिला था, जिसकी खुन्नस आज तक जेठमलानी में है. जून 2002 में, उसी महीने कैबिनेट में फेर बदल हुआ और जेटली को उनके पद से हटा दिया गया था. वाजपेयी के दत्तक परिवार को जानने वाले पत्रकार, अर्नब प्रतिम दत्ता ने आउटलुक में लिखा, “वाजपेयी के करीबी सूत्रों के अनुसार वे अपने कार्यकाल के अंत तक प्रभावी बने रहेंगे. प्रधानमंत्री कार्यालय के अनुसार, ‘यह एक अलग मामला है कि वाजपेयी चाहते हैं कि उनके बाद अडवाणी ही कमान संभालें. लेकिन जब तक वे अपने पद पर हैं, वे इस बात को साबित करके छोड़ेंगे कि वे उतने अप्रभावशाली नहीं हैं जितना उनको टाइम में दिखाया गया है.” बीजेपी को लंबे समय से कवर करने वाले संपादक ने याद करते हुए बताया कि जेटली का यह “अपने राजनीतिक जीवन में सबसे सबसे बुरा वक्त था.” हालांकि वाजपेयी के गुस्से के बावजूद, जेटली छह महीने बाद जनवरी 2003 में कानून मंत्री बनकर दोबारा वापस लौटे. सरकार को उस वक्त सबसे अच्छे कानूनी दिमाग की आवश्यकता थी.

जेटली की मित्रता, राजनीति और व्यवसाय से कहीं आगे नजर आती है. उनकी यह तस्वीर मार्केटिंग गुरु सुहेल सेठ ने एक पार्टी में खींची है, जिसमें वे कांग्रेस नेता शशि थरूर, पत्रकार करण थापर और तवलीन सिंह के साथ नजर आ रहे हैं. साभार: सुहेल सेठ

उसी अप्रैल जेटली द्वारा नियुक्त दिल्ली हाई कोर्ट के जज शमित मुखर्जी को आर्थिक फायदे के लिए अनुकूल फैसला देने के जुर्म में गिरफ्तार कर लिया गया. कुछ दिनों बाद टाइम्स ऑफ इंडिया में अक्षय मुकुल ने लिखा, इस गिरफ्तारी ने “कानून मंत्री अरुण जेटली को नियुक्तियों में पारदर्शिता लाने और जजों के अनुचित व्यवहार पर नजर रखने के लिए कानून बनने की प्रक्रिया को तेज करने पर मजबूर कर दिया.” मुकुल ने आगे लिखा, हालांकि उनके पास ऐसे दस्तावेज मौजूद हैं जिनसे यह इशारा मिलता है कि 2001 में “केंद्रीय कानून मंत्रालय ने खुद प्रत्याशियों की इमानदारी को लेकर खुफिया एजंसी द्वारा उठाये गए सवालों को नजरंदाज किया था.” लेख के अनुसार, कानून मंत्रालय ने वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट के जज और कभी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समर्थक वकीलों के विंग के महासचिव रहे, आदर्श के. गोयल का नाम पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के लिए नामांकित किया था. बावजूद इसके कि उनको लेकर खुफिया एजेंसी की रिपोर्ट अनुकूल नहीं थी. मुकुल के अनुसार, जब राष्ट्रपति के.आर. नारायणन ने गोयल की नियुक्ति पर अपनी मुहर लगाने से इंकार किया तो जेटली ने “गोपनीय पत्र” लिखकर “गोयल की इमानदारी के खिलाफ खुफिया एजेंसी की जांच को फिजूल में इलजाम लगाने का मामला करार दिया.” अंत में राष्ट्रपति ने भी उनकी नियुक्ति को अपनी स्वीकृति दे डाली.

जेटली ने टाइम्स ऑफ इंडिया को जवाब लिखा और खबर छपने के दो दिन बाद एक प्रेस कांफ्रेंस बुलवाई. उन्होंने कहा कि “सरकार केवल अपना मत जाहिर करती है, उसके बाद वह सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित कॉलेजियम की सलाह मानने के लिए बाध्य है. इस मामले में भी सरकार ने वही किया.” मुकुल ने जवाब दिया कि जेटली का गोपनीय पत्र, जिसमे उन्होंने लिखा था कि “कायदे से हाई कोर्ट की जज की नियुक्ति के समय किसी प्रत्याशी का राजनीतिक झुकाव उसकी नियुक्ति में बाधा नहीं बनना चाहिए,” सरकार द्वारा “मत जाहिर करने” से कहीं आगे जाता है.

इंडिया टुडे के ‘अंडर स्क्रूटिनी’ लेख ने बतौर कानून मंत्री और उन छह महीनों में जब वे कैबिनेट के सदस्य नहीं थे, जेटली पर शक्ति के दुरूपयोग के कई आरोप लगाए. कानून मंत्रालय ने जेटली के बचाव में खत लिखा, जिस पर पत्रिका ने जवाब में कहा कि उसके ऐसे कई ‘ऑन रिकॉर्ड’ बयान हैं जिनसे साबित होता है कि वे अपने अधिकार क्षेत्र के बाहर उन महत्वपूर्ण नियुक्तियों में भी अपरोक्ष तौर पर शामिल थे, जिनमें उन्हें कायदे से नहीं होना चाहिए था. इस किस्से से परिचित एक पूर्व संपादक ने बताया कि इन बयानों का श्रोत पीएमओ में बतौर संयुक्त सचिव काम करने वाले शक्तिशाली नौकरशाह अशोक सैकिया थे. उन्होंने यह भी बताया कि प्रभु चावला को भी “पीएमओ से ये कागजात मिले थे.” (किसी समय में चावला और जेटली में बहुत बनती थी, लेकिन अब दोनों में ठन चुकी थी.) कानून मंत्रालय को पत्रिका के इस जवाब के बाद जेटली ने चुप्पी साध ली.

एक साथ काम करते हुए भी, जेटली और सुषमा स्वराज जैसे बड़े भाजपा नेता भी अक्सर पार्टी के शीर्ष लोगों के साथ निकटता के लिए प्रतिस्पर्धा करते रहते हैं. नवीन जोरा/इंडिया टुडे ग्रुप/गैटी इमेजिस

टाइम्स ऑफ इंडिया लेख पर जेटली द्वारा प्रेस कांफ्रेंस किए जाने के एक दिन बाद कांग्रेस प्रवक्ता और सांसद सत्यव्रत चतुर्वेदी ने टीवी इंटरव्यू में कहा कि “मेरी जानकारी के अनुसार खुफिया विभाग ने मुखर्जी के नाम को भी क्लीन चिट नहीं दी थी.” उन्होंने दावा किया, “जेटली ने उसे खुद नजरअंदाज किया.” जब मैं हाल में चतुर्वेदी से मिला तो उन्होंने बताया, “अरुण जेटली ने मेरे उस दावे को कभी चुनौती नहीं दी, न ही कभी खंडन किया. चुप्पी ही उनका एकमात्र जवाब थी.” उन्होंने जोड़ा, “राजनीति में हर मुद्दे की एक मियाद होती है.”

1999 में, जेटली को बीजेपी के मुख्यालय के बगल में, 9 अशोक रोड पर सरकारी बंगला आवंटित किया गया. कभी मौका न चूकने वाले जेटली ने अपना सरकारी आवास “बीजेपी को दे दिया.” वीरेन्द्र कपूर ने लिखा, “ताकि पार्टी उसका इस्तेमाल राजधानी में उन नेताओं को ठहराने में कर सके जिनके सर पर छत नहीं है.” वीरेन्द्र सहवाग की शादी के अलावा इस घर ने कपूर, शेखर गुप्ता और पायनियर के संपादक चन्दन मित्रा जैसे पत्रकारों के बच्चों की शादियों की भी मेजबानी की है. दिल्ली के वरिष्ठ बीजेपी नेता ने बताया, जेटली ने नब्बे के दशक में बीजेपी अध्यक्ष रहे मुरली मनोहर जोशी को “जमनापार स्थित फ्लैट देने की भी पेशकश की थी.” यह जोशी की 1991 की राष्ट्रीय एकता यात्रा के बाद की बात है. जेटली ने इस यात्रा के आयोजक नरेंद्र मोदी का भी इसी दौरान नोटिस लिया था.

संघ सदस्य आलोक वर्मा ने कहा, जेटली में “लोगों को उनके महत्व के अनुसार परखने की क्षमता है.” जेटली ने अब तक अपने जितने रिश्तों को पोसा, उनमें नरेंद्र मोदी के साथ उनके रिश्तों के तार उन दिनों तक जाते हैं जब मोदी एक महत्वकांक्षी प्रचारक हुआ करते थे. उनसे, उनका यह रिश्ता, जो भले ही विश्वास से ज्यादा, परस्पर फायदे की बुनियाद पर टिका है, ने उन्हें सबसे ज्यादा लाभांश दिया है. वे कई मायनों में एक-दूसरे के पूरक हैं. एक प्रचलित नेता है, तो दूसरे की कुलीन वर्ग में पैठ है. एक के लिए देश की राजधानी दिल्ली परदेस है, तो दूसरे के लिए जाना-पहचाना घर. 1995 में जब गुजरात में बीजेपी सरकार सत्ता में आई तो मोदी को दिल्ली में काम करने के लिए भेजा गया. जेटली भी उन लोगों में शामिल थे जिनसे उन्होंने अपने ताल्लुकात मजबूत किए. खुद को मोदी का दोस्त कहने वाले एक संपादक ने बताया, “जेटली दिल्ली के सर्वोत्कृष्ट नेटवर्कर माने जाते हैं. उन्होंने मोदी का वैसे ही ख्याल रखा जैसे वे अन्य खास लोगों का रखते हैं. उस वक्त किसी और ने मोदी को उतनी घास नहीं डाली, न ही किसी ने उन्हें उतनी गंभीरता से लिया था.” कई पत्रकारों और बीजेपी नेताओं को आज भी याद है कि मोदी, जेटली के दक्षिण दिल्ली वाले घर में अक्सर देखे जाते थे. दुष्यंत दवे, जो जेटली के साथ 1992 और 1997 के बीच दफ्तर साझा करते थे, ने बताया कि मोदी का वहां भी आना-जाना रहता था.

1991 में राजीव शुक्ला के टीवी शो ‘रबरू’ में मोदी और जेटली ने एक-दूसरे की तारीफों के खूब पुल बांधे. मोदी ने जेटली से अपने संबंधों को जे.पी. आंदोलन के समय से जोड़ कर देखा और कहा “वे राजनीति में एक अनोखा मिश्रण हैं. वे एक कार्यकर्ता, एक बुद्धिजीवी, एक स्पष्ट वक्ता, बिल्कुल साफ छवि और बहुत दोस्ताना रवैया रखने वाले इंसान हैं.” हालांकि कुछ ने शुरू में उनकी काबलियत पर शक किया था लेकिन मोदी ने कहा, “अरुण जी की सबसे अच्छी बात, सौंपे गए किसी भी काम के प्रति उनका सम्पूर्ण समर्पण है. जिसके पास ऐसा समर्पण हो वो कम ही असफल होता है.” जब शुक्ला ने बाद में मोदी को लेकर, जेटली का साक्षात्कार किया तो उन्होंने भी उनकी तारीफ की. मोदी को उन्होंने “सख्ती से काम करने वाला” और “अनुशासन प्रिय” तथा “सृजनशील” राजनेता बताया.

अडवाणी ने अपनी आत्मकथा में मोदी और जेटली को प्रतिभाशाली बताया. हालांकि, उन्होंने सबसे ज्यादा तारीफ के लिए प्रमोद महाजन को चुना, जिनका प्रभुत्व बाकियों की प्रतिस्पर्धा को काटता था. पूर्व बीजेपी महासचिव ने बताया, “जेटली, मोदी और वेंकैया नायडू, महाजन के खिलाफ खेमे के रूप में उभरे. बाद में अनंत कुमार भी इसी खेमे में शामिल हो गए. ये सभी नस्ली वाडिया के करीब थे और महाजन, अम्बानियों के करीबी थे. पहले इस खेमे की अगुवाई नायडू ने की और मोदी, जेटली उन्हें पीछे से समर्थन देते रहे. फिर जेटली आगे आए और नायडू और मोदी, नेपथ्य में चले गए. 2005 से मोदी इस खेमे की कमान संभाले हुए हैं.” 2006 में महाजन की हत्या कर दी गई थी.

लेकिन मोदी और जेटली का शुरूआती राजनीतिक जीवन समानांतर रास्तों पर चला. मोदी बीजेपी के महासचिव 1998 में बने. एक साल बाद, जेटली भी पार्टी के प्रवक्ता बना दिए गए. दोनों में से किसी ने भी अब तक कोई चुनाव नहीं जीता था और दोनों ही तरक्की, ऊंचे ओहदों पर काबिज हुए थे. उसी साल जब जेटली सूचना एवं प्रसारण मंत्री बने, उन्हें गुजरात से राज्य सभा का सदस्य भी बना दिया गया. दो साल बाद मोदी उस राज्य के मुख्यमंत्री बने. फिर 2002 में, जब मोदी ने उसी साल मुसलमान-विरोधी दंगों के बाद बीजेपी लहर का फायदा उठाने की मंशा से, आठ महीने पहले ही विधान सभा भंग करने का ऐलान किया तो जेटली को उन्होंने पार्टी का इंचार्ज बना दिया.

मोदी, मुख्य चुनाव आयुक्त जे.एम. लिंगदोह पर उस वक्त बुरी तरह बरस पड़े जब उन्होंने दंगा पीड़ितों के पुनर्वास से पहले चुनाव कराने से इंकार कर दिया. जब मुख्यमंत्री सार्वजानिक रूप से लिंगदोह पर उनके ईसाई नाम को लेकर छींटाकशी कर रहे थे, वाजपेयी ने मोदी के भाषण की आलोचना की. लेकिन अडवाणी और जेटली उनके समर्थन में उतर आए और बीजेपी के अंदर पहले से मौजूद खाई और चौड़ी हो गई. जेटली ने जिरह की कि लिंगदोह “एक काऊबॉय ब्यूरोक्रेट” हैं, जिनको लगता है कि “आयोग कोई खुदा है.” जेटली के अनुसार, चुनाव आयोग संवैधानिक तौर पर छह महीने के अन्दर चुनाव करवाने के लिए बाध्य है. उन्होंने पार्टी को, लिंगदोह के फैसले को चुनौती देने के लिए भी मनवा लिया. सितंबर 2002 में, उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में बीजेपी के मत के समर्थन में बहस की.

वाजपेयी इससे नाखुश थे. उसी महीने आउटलुक की एक खबर की सुर्खी बनी- “नाखुश वाजपेयी इस्तीफा देने पर विचार कर रहे हैं.” खबर में एक बेनाम कैबिनेट मंत्री के हवाले से कहा गया, “प्रधानमंत्री ने हम कुछ लोगों को बताया कि ‘नरेंद्र मोदी इस्तीफा देकर बीच में ही विधान सभा भंग करने की नहीं सोचते, अगर जेटली ने उन्हें यह सलाह नहीं दी होती.’ प्रधानमंत्री को यह भी लगता था कि “हर बार जब भी गुजरात का मुद्दा शांत होने को होता है जेटली उसे पुनर्जीवित कर देते हैं. (विनोद मेहता ने अपनी किताब में लिखा जेटली इस स्टोरी से बहुत खफा हुए और “उन्होंने इसके श्रोत को जानने की भी कोशिश की.”)

जब सुप्रीम कोर्ट ने उसी अक्टूबर में लिंगदोह के फैसले पर अपनी मुहर लगाई तो जेटली को यह बिल्कुल रास नहीं आया. मामले की पैरवी करने वाले वकील राजीव धवन ने द हिन्दू को बताया कि कैसे इस मामले में “बीजेपी की पूरी कानूनी रणनीति” संविधान की गलत व्याख्या पर आधारित थी, जिसका “विपरीत असर” हुआ. लेकिन इस पूरे प्रकरण ने मोदी और जेटली के बीच के संबंध को और अधिक मजबूत बना दिया.

दंगों के बाद अप्रैल में गोवा में आयोजित पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक ने भी दोनों के बीच संबंधों को पुख्ता किया. वाजपेयी ने मोदी को बीजेपी से निकाल-बाहर करने की ठान ली थी. अडवाणी की सलाह पर जेटली ने पार्टी के कट्टरपंथियों की तरफ से इसे रोकने में बड़ी भूमिका निभाई. बैठक से एक दिन पहले वे अहमदाबाद गए और मोदी से बातचीत की, जिन्होंने अगले दिन अपने इस्तीफे की पेशकश कर दी थी. पार्टी ने उनका फैसला ठुकरा दिया और इस तरह वह एकजुट रहते हुए भी शर्मसार होने से बच गई. रेडिफडॉटकॉम ने लिखा, दिसंबर में जब तक गुजरात विधान सभा चुनाव संपन्न हुए, जेटली मोदी के “पक्के समर्थक” बन चुके थे.

(चार)

जुलाई 2005 की अल सुबह, जब जेटली दक्षिण दिल्ली स्थित कैलाश कॉलोनी में अपने घर के पास रणजीत कुमार के साथ टहल रहे थे, उन्हें अचानक खांसी आई और उन्होंने सांस लेने में दिक्कत की शिकायत की (कुमार एक वरिष्ठ वकील हैं, जो सुप्रीम कोर्ट में कई मामलों में ‘एमिकस क्यूरी’ रह चुके हैं. वे पिछले साल सोलिसिटर जनरल भी बनाए गए). दस मिनट के भीतर ही कुमार ने उन्हें एस्कॉर्ट्स हॉस्पिटल पहुंचाया और जाने-माने ह्रदय चिकित्सक नरेश त्रेहन को भी फोन कर दिया, जो नजदीक में ही रहते थे और वे “फौरन पहुंच सकते थे. ” कुमार ने बताया, खुशकिस्मती से सब कुछ ठीक हो गया. कुछ दिनों बाद जेटली की, जिनकी उम्र उस वक्त 52 वर्ष थी, तीन बाईपास सर्जरियां हुईं.

जेटली उस समय उम्र के उस पड़ाव पर थे, जब अधिकतर राजनेताओं के लिए अपने बोये बीजों के फलों को चखने का वक्त होता है. लेकिन 2005 में, बतौर वरिष्ठ वकील और बीजेपी के महासचिव के पद पर पहुंचने के बाद भी, उन्हें दी गई “भविष्य के प्रधानमंत्री” की पदवी उनसे बहुत दूर थी, जो उन्हें प्रभु चावला समेत उनके कुछ दोस्तों ने 1990 में दी थी. दिसंबर में जब अडवाणी ने बीजेपी अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया तो जेटली को जरूर लगा होगा कि अब उनकी बारी है. आखिरकार उनके समकालीन वेंकैया नायडू कुछ साल पहले ही बीजेपी अध्यक्ष चुने गए थे.

लेकिन 2004 के आम चुनाव में हार के बाद, संकट से गुजर रही पार्टी के अंदर प्रतिस्पर्धा तेज हो रही थी. 2005 में, शिवराज सिंह चौहान के मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के बाद, दैनिक जागरण के भोपाल संस्करण ने दावा किया कि एक साल पहले मुख्यमंत्री रह चुकीं उमा भारती ने इस फैसले के विरोध में आत्महत्या करने की धमकी दी है. भारती के करीबी पूर्व बीजेपी महासचिव के.एन. गोविन्दाचार्य ने इशारों-इशारों में कहा कि इस खबर को लगवाने के पीछे जेटली का हाथ था. रेडिफडॉटकॉम को उन्होंने बताया कि उन्होंने कुछ समय पहले जेटली को भारती से बात करने के लिए कहा था, “लेकिन कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें बाहर नहीं आना चाहिए. मैं अरुण जेटली को सलाह देना चाहूंगा कि वे राजनीति को व्यक्तिगत संबंधों से अलग रखें और ‘ऑफ द रिकॉर्ड ब्रीफिंग’ को सार्वजनिक करने से बचें. अगर उमा जी के साथ आज ऐसा होता है तो कौन सी भली महिला राजनीति में कदम रखना चाहेगी?” गोविन्दाचार्य ने तहलका पत्रिका को यह भी बताया कि “अरुण जेटली जैसे नेता जन नायकों की छवि ऐसे ही खराब करते रहेंगे.” अपनी बात में आगे जोड़ते हुए उन्होंने कहा, “राजनीतिक दलों में अंदरूनी प्रजातंत्र को समाप्त किया जा रहा है.”

जेटली को नजरंदाज करते हुए, संघ ने उत्तर प्रदेश में ठाकुरों के नेता राजनाथ सिंह को समझौता प्रत्याशी के रूप में बीजेपी अध्यक्ष पद के लिए समर्थन किया. सिंह के लिए यह पद कांटों की ताज साबित होने वाला था. जल्द ही उनका सामना, आपस में लड़ते-झगड़ते नेताओं से हुआ. वे अपने पद पर अभी ठीक से बैठ भी नहीं पाए थे कि मीडिया में उनकी नकारात्मक छवि पेश की जाने लगी. इकनोमिक टाइम्स ने अपने कई लेखों के माध्यम से सिंह को उकड़ू बैठकर देशी शौचालय इस्तेमाल करने वाला “गांव का गंवार” दिखाने की कोशिश की. अखबार में कार्यरत एक वरिष्ठ संपादक ने बताया कि सिंह ने 2006 के शुरू में उन्हें एक दिन बुलाया और जेटली पर ऊंगली उठाते हुए उन्होंने अखबार द्वारा उन पर किए जा रहे अत्याचार की शिकायत की. “मैंने राजनाथ सिंह का संदेश संपादक तक पहुंचा दिया, जिसके बाद भूल में सुधार करते हुए अखबार ने, जेटली की तस्वीरों और उनसे संबंधित खबरों में भारी गिरावट कर दी. जेटली की फिरकी गुपचुप नहीं थी.”

फरवरी 2007 में, वाजपेयी और अडवाणी को सूचित करने के बाद सिंह ने जेटली को पार्टी प्रवक्ता के पद से बेदखल कर दिया. उन्होंने पंजाब विधान सभा चुनवों में पार्टी की शानदार विजय के लिए जेटली को श्रेय देना भी जरूरी नहीं समझा, जो उस राज्य में चुनाव प्रभारी का काम देख रहे थे. उन दिनों “जेटली को पार्टी मुख्यालय में जश्न और मौजमस्ती के पलों में शामिल नहीं किया जाता था,” द टेलीग्राफ ने लिखा. “उन्होंने राजनाथ सिंह से हाथ भी नहीं मिलाया. जब से उन्हें बीजेपी प्रवक्ता के पद से अपदस्थ किया गया है. उन्होंने न पार्टी मुख्यालय और न ही मीडिया रूम में कदम रखा है, सिवाय उन बैठकों में शामिल होने के जहां उनकी मौजूदगी जरूरी थी.”

लेकिन पार्टी के अन्दर जेटली के सितारे लगातार चमकने की राह पर थे. खासकर, प्रमोद महाजन की अप्रत्याशित मौत के बाद. बावजूद इसके कि जेटली ने उसी दौरान कुछ राज्य विधान सभाओं के चुनावों में कमाल कर दिखाया था, 2004 के आम चुनावों की कमान महाजन को थमा दी गई थी. अप्रैल 2006 में महाजन की हत्या हो गई और 2008 में जेटली ने कर्नाटक में बीजेपी को ऐतिहासिक जीत दिला कर एक बार फिर यह साबित कर दिया कि उनके हाथों में जैसे कोई जादुई शक्ति या पारस का पत्थर हो. उसी जून, स्वपन दासगुप्ता ने तहलका में लिखा, “चुनाव प्रबंधन को लेकर इतने शानदार रिकॉर्ड के बाद यह स्वाभाविक है कि अगर उन्हें 2004 की शर्मनाक हार को नहीं दोहराना है तो बीजेपी में कई लोग उन्हें ही 2009 के राष्ट्रीय अभियान की कमान सौंपना चाहेंगे.” प्रधानमंत्री पद के दावेदार अडवाणी ने उसी साल उन्हें 2009 के आम चुनावों की कमान सौंप दी.

1989 से बीजेपी की संप्रेषण रणनीति बनाने वाले सुशील पंडित ने बताया कि जेटली को “मुश्किल प्रतिस्पर्धा में मजा आता है. अगर वे बतौर सेनापति उस प्रतिस्पर्धा के मध्य में हैं और अपने तरकश के तीरों का सही इस्तेमाल कर रहे हैं तो उन्हें यह नशे का मजा देती है.” बीजेपी के प्रवक्ता और चुनाव विशेषज्ञ जी.वी.एल नरसिम्हा राव, जो खुद को “जेटली की टीम का विस्तार” बताते हैं, ने बताया, “सर्वे के बाद राजनेता हमेशा आपसे पूछते हैं, ‘हम कितनी सीटें जीत रहे हैं?’ लेकिन मैं कभी ऐसे राजनेता से नहीं मिला जिसने मुझसे यह सवाल पूछा हो जो जेटली पूछते हैं- ‘तुम्हारा वोट शेयर क्या है? तुम्हारे वोट शेयर में हमारे राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी से कितने का अंतर है?” राव के मुताबिक जेटली एक सूक्ष्म-प्रबंधक हैं. “गुजरात में उन्होंने मीडिया और विज्ञापन कैंपेन तथा कानूनी मसलों को देखा. तभी शायद मोदीजी उन्हें बार-बार बुलाना चाहते हैं.”

जेटली को सीट बंटवारे की सौदेबाजी में भी सक्षम माना जाता है. 2009 के चुनावों से पहले, दासगुप्ता ने अपने ब्लॉग में लिखा कि जेटली “एनडीए की पार्टियों और नेताओं जैसे बिहार में नीतीश कुमार, उत्तर प्रदेश में अजित सिंह और पंजाब में दोनों बादलों के बीच पुल का काम करते हैं. वे बीजेपी में चंदा लाने का काम भी करते हैं – जो इन समयों में एक मुश्किल जिम्मेवारी है.” उन्होंने 2009 में आगे लिखा, “बात जब अरुण जेटली की आती है तो मैं वस्तुगतता के तमाम बहाने एक तरफ रख देता हूं.” इस बात से इत्तेफाक रखना मुश्किल है कि जेटली असल में एक कुशल अभियान रणनीतिज्ञ या एक मौका परस्त हैं, जो अपनी लड़ाईयां बहुत सोच-समझ कर चुनते हैं. बीजेपी-समर्थक एक संपादक जो हमेशा जेटली के समर्थक नहीं रहे ने बताया, “वे हमेशा ऐसा राज्य चुनते हैं जहां जीत निश्चित हो. मिसाल के तौर पर, मध्य प्रदेश में जहां दिग्विजय सिंह के दो कार्यकालों के बाद जीत थाली में परोसे जाने वाली थी. वे गुजरात का श्रेय अपने ऊपर कैसे ले सकते हैं? उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और हिमाचल प्रदेश में वे बुरी तरह से विफल रहे. उनकी असफलता की दर, सफलता से कहीं अधिक है.” एक राजनीतिक संपादक के मुताबिक, “चाहे बीजेपी के लिए जीत की संभावना अधिक हो या कम या यह उनकी चतुर चालों का परिणाम हो. वास्तविकता यह है कि 2009 के लोक सभा चुनाव बीजेपी बुरी तरह से हारी.”

एक पूर्व कांग्रेसी मंत्री ने जेटली की खूबियों को बयान करते हुए कहा, उनमें खुद को शीर्ष पर बनाए रखने की खासियत है. “वे पहले अतिरिक्त सोलिसिटर जनरल बने, फिर एक रात में ही वरिष्ठ वकील बन बैठे, वे पहले मंत्री बने और फिर राज्य सभा सांसद के रूप में मनोनीत कर लिए गए, फिर वे 2014 का चुनाव हारने के बावजूद भी वित्त मंत्री बना दिए गए.” बीजेपी के कई सदस्य उस वक्त सदमे में आ गए जब 2009 में पार्टी की पिछले दो दशकों में सबसे बड़ी हार के बाद उन्हें सजा देने की बजाय, राज्य सभा में विपक्ष का नेता चुन लिया गया. जिन तीन बीजेपी नेताओं से मैंने बात की उनके मुताबिक, यह पद पहले वैंकय्या नायडू को जाने वाला था लेकिन अंतिम क्षणों में अडवाणी ने उनका नाम हटाकर जेटली का नाम डाल दिया.

बीजेपी को 2009 के चुनावों में केवल 116 सीटें मिलीं थीं. यानि 2004 के मुकाबले 22 सीटें कम. जब जून में हार का विश्लेषण करने के लिए पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हुई तो उस वक्त जेटली लंदन में भारत-इंग्लैंड क्रिकेट श्रंखला का मजा लेते हुए छुट्टियां मना रहे थे. बैठक में मौजूद लगभग सभी ने जेटली की खूब आलोचना की. उत्तर प्रदेश से सांसद मेनका गांधी ने शिकायत की कि उनके पास पत्रकारों से तो घंटों बात करने का समय होता है, लेकिन वे प्रत्याशियों के फोन तक नहीं उठाते. बीजेपी सांसद अरुण शौरी ने एनडीटीवी पर कहा कि पार्टी को माओ के शब्दों में “अपने मुख्यालय को बम से उड़ा देना चाहिए. ऊपर से नीचे तक सफाई होनी चाहिए, तथा संघ को पार्टी का नेतृत्व अपने हाथ में ले लेना चाहिए.” इसके बाद जेटली ने खुले तौर पर शौरी के खिलाफ बोलना शुरू कर दिया.

उम्मीदवार के रूप में जेटली ने पहला लोकसभा चुनाव अमृतसर से 2014 में, नरेंद्र मोदी के प्रधान मंत्री अभियान के तहत लड़ा था. समीर सहगल/हिंदुस्तान टाइम्स/गैटी इमेजिस

दो वरिष्ठ नेताओं जसवंत सिंह और यशवंत सिन्हा ने प्रचार अभियान के लिए जिम्मेवार लोगों से विफलता की जिम्मेवारी भी अपने सर लेने की मांग की, जैसा कि 2004 में महाजन ने ली थी. सिन्हा ने लिखा, “अडवाणी जी ने जवाबदेही की मिसाल कायम करते हुए लोक सभा में विपक्ष के नेता का पद ठुकरा दिया था. ऐसा प्रतीत होता है मानो पार्टी में कुछ ऐसे लोग हैं जो जवाबदेही के सिद्धांत को मानना ही नहीं चाहते ताकि उनके बनाए बसेरे बर्बाद न हों.”

जेटली के आलोचकों ने इंगित किया कि उन्होंने चुनाव के दौरान पर्याप्त प्रतिबद्धता नहीं दिखाई, प्रचार के दौरान वे लगातार कोर्ट जाते रहे. संघ के करीबी एक बीजेपी नेता ने बताया कि जेटली “कोर्ट बंद होने के बाद आते थे. उनकी वजह से बैठकें शाम 4 बजे शुरू होती थीं. इस करारी हार के लिए मुख्य रूप से वे ही दोषी हैं.” चुनावों से पहले जेटली ने केंद्रीय चुनाव समिति की दो बैठकों में शामिल होने से इसलिए इंकार कर दिया क्योंकि उन्हें उत्तर-पूर्व के लिए राजनाथ सिंह द्वारा नियुक्त सुधांशु मित्तल (जो महाजन के गुर्गे माने जाते थे) से ऐतराज था. हालांकि बाद में जेटली ने सिंह के साथ अपने संबंध सुधार लिए, लेकिन कई वरिष्ठ नेताओं को लगा कि उनके इस कदम से जमीन पर कार्यकर्ता निरुत्साहित हुए. एक राजनीतिक संपादक के मुताबिक, जेटली “अनुशासनात्मक कार्यवाही” से शायद इसलिए बच गए क्योंकि मोदी का हाथ उनके सर पर था.

जेटली के पार्टी छोड़े जाने की अफवाहों के बावजूद उन्होंने चुनावी हार के लिए प्रचार की विभाजक प्रवृत्ति को दोषी बताया. उन्होंने लिखा, “शासन में शालीनता मददगार होती है, न कि बड़बोलपन, संयम और कम-बयानी खूबियों में शुमार हैं.” इस बयान ने उन्हें अजीबोगरीब मोड़ पर ला खड़ा किया. वीर संघवी ने हिंदुस्तान टाइम्स में लिखा, “अरुण जेटली द्वारा संयम और बड़बोलेपन की बात करना सही है लेकिन वे अब कई सालों से दिल्ली में नरेंद्र मोदी के राजदूत बने बैठे हैं, उन्होंने नियमित रूप से गुजरात दंगों को लेकर मोदी का बचाव किया है, हर उस व्यक्ति पर हमला बोला है जो मोदी के खिलाफ बोलता है और अभियान के दौरान उन्होंने कई मर्तबा उनकी तारीफ में कसीदे भी पढ़े हैं.”

दासगुप्ता समेत जेटली के अन्य करीबी पत्रकारों ने पार्टी को कई बार हिंदुत्व से दूरी बनाने का मशविरा दिया, तब भी जब वे मोदी को पार्टी में उम्मीद की नई किरण के रूप में देख रहे थे. नतीजों के तुरंत बाद, कॉलमकार अशोक मलिक ने गुजरात में मोदी की जीत को “लाज रखने वाला” बताया. “2009 का चुनाव अभियान अकेले अडवाणी के नाम पर चलाया गया क्योंकि बीजेपी के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था. इस विकल्प की अनुपस्थिति को पूरा किया ‘मोदी ही विकल्प है’ ने.”

प्रभु चावला को यह बताते हुए बहुत लुत्फ आता है कि “जेटली ने अपने जीवन में जो एकमात्र चुनाव जीता, वो मेरे स्कूटर के पीछे बैठकर जीता.” यह उन दिनों की बात है जब वे दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ते थे. 2012 में, मानसून सत्र के दौरान संसद प्रांगण में एक बेनाम पर्चा बांटा गया जिसमे जेटली के चुनाव रिकॉर्ड को उनकी कमजोरी के रूप में दिखाया गया था. इसमें उनका मजाक उड़ाते हुए लिखा गया, “जेटली आखिरी बार 1975 में 4000 मतदाताओं वाले चुनाव में जीते थे.” पूर्व बीजेपी विधायक आलोक कुमार ने बताया 2008 में उनके द्वारा चुनाव हार जाने पर जेटली ने उन्हें यह कहकर सांत्वना दी कि “हम दोनों ही चुनावी राजनीति के लिए नहीं बने हैं.”

लेकिन मोदी ने जब 2014 में प्रधानमंत्री पद के लिए अपनी दावेदारी पेश की तो जेटली को भी अपने दानवों से आमना-सामना करना पड़ा और उन्होंने अमृतसर से लोक सभा चुनाव लड़ा. दिल्ली वाले ने बहुत ही अटपटे ढंग से खुद को सौ फीसदी माझी विरासत वाले के रूप में पेश किया. अर्थात खुद को पंजाब के माझा इलाके का बताया. जेटली ने ओपन, और जो भी रिपोर्टर उनको सुनने को तैयार था, को बताया, “मैं हर संभावित दिशा में इस इलाके से संबंध रखता हूं, शायद, ”उन्होंने कहा, “चुनाव जीतने की मेरी काबिलियत पहले उतनी प्रखर नहीं थी जितनी प्रखरता मुझमें चुनाव मैनेज करने की थी. मेरी पार्टी ने अब मेरा राजनीतिक भविष्य तय कर लिया है. लेकिन मुझे खुशी है कि आखिरकार मैं चुनाव मैदान में हूं.”

लेकिन जेटली ने अपना चुनाव क्षेत्र चुनने में गलती कर दी. उन्होंने सत्तारूढ़ अकाली दल से हाथ मिला लिया था, जिसके खिलाफ राज्य में पहले ही व्यापक रूप से असंतोष व्याप्त था, ऊपर से कांग्रेस ने उनके खिलाफ पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह जैसा धाकड़ प्रतिद्वंदी मैदान में खड़ा कर दिया. उनके कैंपेन मेनेजर बिक्रम सिंह मजीठिया की छवि भी भ्रष्ट व्यक्ति की थी. हिंदुस्तान टाइम्स में एक डेस्क पत्रकार ने जेटली की इन सभी परेशानियों को लेकर एक फब्ती भरा लेख लिख डाला. पूर्व संपादक के अनुसार, उस पत्रकार को जल्द ही नौकरी से बाहर कर दिया गया. उन्होंने बताया, निकाले जाने का आदेश “सीधा ऊपर से” आया था. पत्रकार को हटाये जाने की कथित वजह अयोग्यता बताया गया. लेकिन इस संपादक को लगता था कि पत्रकार “योग्य था और उसे ऐसे नहीं निकाला जाना चाहिए था.” जेटली के अपने समर्थक भी थे, जिनमे वकील मुकुल रोहतगी, रंजित कुमार, मनिंदर सिंह और राजीव नैयर, शोभना भरतिया, बुजुर्ग वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैय्यर, एक्टर अनुपम और किरण खेर, क्रिकेटर गौतम गंभीर, और यहां तक कि कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बी.एस येदुरप्पा, भी शामिल थे. लेकिन फिर भी वे एक लाख वोटों से भी ज्यादा के अंतर से चुनाव हार गए.

कुमार ने जेटली की हार का कारण, “सड़क पर खड़े मामूली इंसान” से संपर्क न साध पाने की उनकी नाकाबिलियत को बताया. एक संपादक जो खुद को बीजेपी विचारक और जेटली-आलोचक के रूप में देखते हैं ने बताया, “वे देश के अन्दर हर किस्म की लॉबी बनाने में सफल रहे हैं, सिवाय, “देश के मतदाता” के. एक प्रचलित लतीफे के अनुसार, जिसे आम आदमी पार्टी के सांसद भगवंत मान से जोड़ कर देखा जाता है, “एकमात्र जेटली ही अमृतसर से हार कर मोदी लहर को रोक सकते हैं.”

बावजूद इसके मोदी ने अमृतसर में अपने चुनाव अभियान के दौरान जेटली को एक बड़ी भूमिका देने की तरफ इशारा किया. प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने जेटली को उनकी चुनावी हार के बाद भी वित्त, रक्षा और कॉर्पोरेट अफेयर मंत्रालय का कार्यभार सौंप दिया. इन जिम्मेवारियों को उन्हें सौंपने के बाद महीनों तक दोनों के बीच के रिश्तों पर कयास लगाए जाते रहे.

2014 चुनावों से पहले जब मोदी की प्रधानमंत्री पद की दावेदारी पुख्ता नहीं हुई थी उस वक्त उनके कट्टर समर्थकों को लगा कि जेटली उनके रास्ते में रोड़े अटका रहे हैं.

सन्डे गार्डियन के संपादकीय डायरेक्टर एम.डी. नलपत ने सितंबर 2013 में लिखा कि अरुण जेटली पर मोदी के कथित भरोसे को लेकर चुप्पी का माहौल बनाया गया है, “जिसने सुषमा स्वराज और मुरली मनोहर जोशी को अडवाणी के साथ मिलकर अपना पासा फेंकने का मौका दे दिया है.” उन्होंने बेनाम बीजेपी नेता के हवाले से लिखा कि जेटली, मोदी का समर्थन इस उम्मीद में कर रहे हैं कि “चुनावों के बाद उन्हें सरकार बनाने के लिए वांछित समर्थन नहीं मिल पाएगा.” जिस सूरत में नरेंद्र मोदी के सबसे करीबी होने के नाते वे प्रधानमंत्री पद के लिए एक “धर्मनिरपेक्ष पसंद के रूप में उभर कर सामने आएंगे.” जैसा कि वाजपेयी के मामले में हुआ था. उस बीजेपी सांसद के मुताबिक इस लेख से मोदी और जेटली दोनों ही आहत हुए. मोदी ने तो कई महीनों तक नलपत से बात भी नहीं की.

शिक्षाविद और मोदी-समर्थक किताब मोदी, मुस्लिम्स एंड मीडिया की लेखिका मधु किश्वर ने इन प्रस्थापनाओं का विस्तार किया. मार्च 2014 में उन्होंने ट्वीट किया, “बीजेपी के भेदी जेटली जैसे 160 वाले क्लब के लोग हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि अगरबीजेपी को 180 सीटों से कम मिलती हैं तो उनके प्रधानमंत्री बनने के आसार बनते हैं. इसलिए सेंध लगाओ.”

“उन दिनों बीजेपी भेदियों ने मुझे बताया कि अरुण जेटली, नीतीश कुमार को उकसा रहे हैं.” किश्वर ने कहा, क्योंकि वे नहीं चाहते कि मोदी कभी दाग-मुक्त हों,” किश्वर ने मोदी के साथ साक्षात्कार में यह बात उठाई, “मैंने उन्हें कहा, ‘आपको अरुण जेटली पर कड़ी नजर रखनी होगी.’ उन्होंने कहा, ‘नहीं मधुजी, वे मेरे बड़े अच्छे मित्र हैं.’ मैंने कहा, ‘वे आपके अच्छे मित्र हो सकते हैं, लेकिन मैं निष्पक्ष पर्यवेक्षक के नाते कह रही हूं कि यह दोस्ती एक दिन आपके गले की फांस बन जाएगी.’”

जेठमलानी ने इकोनोमिक टाइम्स से एक साक्षात्कार के दौरान जेटली और सुषमा स्वराज, जिन्होंने उनकी दावेदारी का विरोध किया था लेकिन फिर भी उन्हें वित्त और विदेश मंत्रालय सौंपे गए, की तरफ इशारा करते हुए कहा कि मोदी “अपने दुश्मनों को अपने आसपास ही रखते हैं.” विनोद मेहता ने अपनी किताब में लिखा कि जेटली, मोदी के “एकमात्र मित्र हैं... आप उन्हें मित्र कहकर बुला सकते हैं.” जेटली ने भले ही उनकी कानूनी मामलों में मदद की है, लेकिन वे सही मायनों में उनके करीबी नहीं हैं. मोदी को वर्तमान समय में कुछ खास कामों के लिए उनकी जरूरत है. हालांकि “वे भली-भांति जानते हैं कि कोई भी उनके वर्तमान पद पर जेटली से ज्यादा ललचाई नजरें गड़ाकर नहीं बैठा है.” हालांकि, दोनों ही संपादकों ने इस बात से सहमति जताई की कि जेटली ने मोदी के मातहत काम करना बहुत पहले ही स्वीकार कर लिया था.

(पांच)

पिछले नवंबर ओपन ने अपनी कवर स्टोरी, “एक्सिस ऑफ पॉवर 2014” में मोदी, बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह और जेटली ऐसे तीन लोग बताए, जो “भारत पर राज करते हैं.” एक हफ्ते बाद इंडिया टुडे ने इस तिकड़ी का विश्लेषण करते हुए एक कवर स्टोरी, “द इंडस्पेंसिब्ल मिस्टर जेटली” नाम से चलाई. “मान लिया जाए कि क्रॉस-पौराणिक कथाएं आज के युग के हिंदुत्व में इस्तेमाल में लाई जा सकती हैं तो, इसने लिखा, “अगर मोदी राम हैं तो शाह और जेटली उनके लक्ष्मण और अर्जुन हैं. दो ऐसे सहयोगी, जो उन्हें पूर्ण बनाते हैं जिनके बिना उनका काम नहीं चल सकता.” लेख में यह भी लिखा गया था, जेटली का “राजनीतिक, कानूनी और सामाजिक दायरा इतना अपार है कि वह उन्हें प्रधानमंत्री के किसी भी तरफ बैठने की अनुमति देता है.” इसमें यह भी कहा गया कि चुनावों के शानदार परिणामों को मोदी द्वारा राजधानी के तमाम शक्ति केंद्रों जैसे, मीडिया, कॉर्पोरेट और कूटनीतिक हलकों में भी भुनाना था. सच्चाई यह है कि अहमदाबाद, दिल्ली नहीं है और निश्चित रूप से, न ही गुजरात, भारत है.”

ऊपर से देखने पर लगता था कि बीजेपी की चुनावी जीत के छह मास के अवसर पर छपे इन लेखों ने मोदी और जेटली के बीच खासी घनिष्ठता दिखाई थी. लेकिन ओपन और इंडिया टुडे की इन कवर स्टोरीज के छपने के एक महीने बाद ही, प्रधानमंत्री ने प्रेस के कई सदस्यों को बातचीत का सिलसिला शुरू करने की मंशा से बुलावा भेजा. ऐसी ही एक बैठक में शामिल होने वाले राष्ट्रीय अखबार के एक वरिष्ठ पत्रकार ने इंडिया टुडे स्टोरी को इसकी संभावित वजह बताया, जो उनके मुताबिक प्रेस के साथ सीधा संपर्क साधने की प्रधानमंत्री की तरफ से अपनी कोशिश थी. दक्षिण भारतीय अखबार के एक संपादक ने मुझे बताया कि उनसे भी ऐसी ही एक बैठक में शामिल होने के लिए अनौपचारिक तौर पर संपर्क किया गया था, जो कभी संपन्न नहीं हो पाई क्योंकि जिस आदमी ने उन्हें आमंत्रित किया था ने बताया कि मोदी को लगा “वो लोग जेटली को पसंद करते हैं.” संपादक के अनुसार “यह एक अप्रकट लेकिन निहित अर्थों से सराबोर टिप्पणी थी.”

वित्त मंत्री से लगातार संपर्क में रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार के मुताबिक “प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी की दोस्तियों का दायरा इतना बढ़ा है कि उन्हें अब एक सीमा के बाद जेटली की जरूरत नहीं रह गई है.” अभी भी “अमित शाह और जेटली में काफी दूरियां हैं,” उन्होंने कहा और यह कहना कि मोदी, जेटली से उतना ही सलाह-मशविरा करते हैं, जितना वे शाह से करते हैं एक “अतिरेक प्रोपेगेंडा” है.

सरकार के भीतर जेटली के कई समर्थक हैं, निर्मला सीतारमण, धर्मेन्द्र प्रधान और पीयूष गोयल उनके अपने गुर्गे हैं. उनके कई दोस्त महत्वपूर्ण सरकारी पदों पर आसीन हैं. अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी, सोलिसिटर जनरल रंजीत कुमार अतिरिक्त सोलिसिटर जनरल पिंकी आनंद, मनिंदर सिंह, पी.एस. नरसिम्हा और नीरज किशन कौल (जिनके चैम्बर में जेटली के बेटे रोहन ने बतौर जूनियर काम किया).

फरवरी में पद्मा भूषण पुरुस्कार से सम्मानित किए जाने के तुरंत बाद स्वपन दासगुप्ता को वित्त मंत्रालय के 8.18 प्रतिशत शेयर वाली बहुराष्ट्रीय इन्फ्रास्ट्रक्चर कंपनी, लार्सन एंड टुब्रो का स्वतंत्र डायरेक्टर नियुक्त कर दिया गया. जेटली के करीबी एक अन्य पत्रकार शेखर अय्यर को जनवरी में जेटली के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले फिल्म सर्टिफिकेट अपिलेट ट्रिब्यूनल का सदस्य बना दिया गया.

जब बात वित्त मंत्रालय की आती है, ऐसा लगता है मोदी ने उन्हें बहुत ज्यादा लंबी रस्सी नहीं थमाई है. वह उन पर नजर रखने के लिए मंत्रालय में अपने वफादार लोगों को तैनत करते रहते हैं. गुजरात में उनके मुख्य सचिव पद पर काम कर चुके हसमुख अधिया को पिछले नवंबर में वित्तीय सेवा विभाग का सचिव बना दिया गया. गुजरात के नौकरशाह जी.सी. मुर्मू, जिन्होंने मुख्यमंत्री पद के दौरान मोदी के लिए दंगे-संबंधी मामले देखे थे, और एक अन्य गुजरात कैडर के अफसर राज कुमार को क्रमश: वित्त व्यय विभाग तथा वित्त मामलों के विभाग में संयुक्त सचिव के पदों पर बिठा दिया गया. गुजरात के एक अन्य वरिष्ठ पत्रकार ने बताया ये लोग मोदी के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं और “बहुत मुमकिन है कि मुर्मू को अतिरिक्त सचिव बनाए जाने के बाद एनफोर्समेंट डायरेक्टरेट का डायरेक्टर बना दिया जाए.” उन्होने इंगित करते हुए कहा, “मोदी ने इस पद को बहुत समय से खाली छोड़ा हुआ है.”

सापेक्षिक रूप से बंद दरवाजों वाली इस सरकार में, जेटली अभी तक आलोचना के शिकार बने हुए हैं. उनके सबसे बड़े आलोचक राम जेठमलानी हैं. जब मैं 92 वर्षीय वकील से मिला तो उन्होंने इसी जनवरी में जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के दौरान कही अपनी बात दोहराई. वहां उन्होंने जेटली को वित्त मंत्री चुने जाने पर सवाल खड़े किए थे. मोदी को लिखे पत्र में, जेठमलानी ने इशारा किया था कि जेटली की नियुक्ति कांग्रेस को फायदा पहुंचाएगी और जेटली को भी उन्होंने एक खुले पत्र में लिखा, “मैं देश को बताना चाहता हूं कि आप प्रधानमंत्री मोदी के उस अहद को कभी पूरा नहीं होने देंगे, जिसमें उन्होंने टैक्स बचाने की मंशा से विदेशों में भेजे गए पैसे के संदर्भ में “देश की बदकिस्मत जनता से काले धन को वापस लाने का वादा किया था.” उन्होंने आगे लिखा, आप “मिस्टर फाइनेंस मिनिस्टर इसमें सबसे बड़ा रोड़ा हैं.”

जेठमलानी ने कहा, “मैं तो ईश्वर के प्रस्थान कक्ष में बैठा हूं और एक वही व्यक्ति हैं जिन्हें मैं बिल्कुल पसंद नहीं करता”. मोदी समर्थकों के खेमे में से वे एक हैं, उनमें पहले कुछ जो जेटली के करीबी हुआ करते थे अब उनके खिलाफ मोर्चाबंदी कर रहे हैं. मधु किश्वर, संघ विचारक एस गुरुमूर्ति और कभी-कभी सुब्रमण्यम स्वामी भी उनमें शामिल हैं. इस ग्रुप का मानना है कि जेटली ने पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम की मदद की, जिनके खिलाफ टैक्स चोरी और मनी लांड्रिंग के आरोप हैं. खासकर, एनडीटीवी से संबंधित शेल कंपनियों के जरिए.

करांजवाला ने बताया, चिदंबरम और जेटली “अच्छे-खासे दोस्त” हुआ करते थे, जो एक दूसरे को नब्बे के दशक से जानते हैं जब दोनों इंडियन एक्सप्रेस के उत्तराधिकार के मामले में वकील हुआ करते थे. जेटली-विरोधी खेमे का मानना है कि दोनों की यारी और भी गहरी है. वे इस तथ्य को साबित करने के लिए स्वामी द्वारा 1997 में दायर चिंदबरम के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले में, जेटली का उनके बचाव में उतरने का उदाहरण देते हैं. पिछले साल किश्वर ने अपने ट्रस्ट मानुषी की वेबसाइट पर चिदंबरम और एनडीटीवी के खिलाफ कुछ आरोप लगाए. एनडीटीवी ने उन पर मानहानि का दावा ठोक दिया. गुरुमूर्ति ने उस केस में पैरवी की और जेठमलानी ने कोर्ट में किश्वर का पक्ष रखा. पंजाब पुलिस के पूर्व डायरेक्टर जनरल और 2002 के बाद मोदी के सुरक्षा सलाहकार रहे के.पी.एस. गिल ने भी इस ग्रुप को अपना समर्थन दिया. जेटली को लिखे पत्र में उन्होंने कहा कि वित्त मंत्री को चिदंबरम और एनडीटीवी के मामले में विशेष छानबीन के आदेश देकर खुद को इस मामले से अलग कर लेना चाहिए, बावजूद इसके कि वे पहले कभी दोनों पक्षों के कानूनी पैरोकार रह चुके हैं. गिल ने यह भी कहा कि अन्य मामलों में भी जेटली ने खुद को ऐसी स्थितियों से अलग किया है, जहां बतौर वकील उनके फैसले बतौर राजनेता उनके आड़े आ सकते थे.

2006 में, बीजेपी की तरफ से बिहार में विपक्ष के नेता रहे सुशील मोदी के मानहानि मामले में कोर्ट में बहस करते हुए जेटली ने कहा था, “अपने कर्तव्यों और दायित्व का निर्वाहन करते हुए विपक्ष के नेता को न केवल अपने वर्तमान, बल्कि भविष्य के पद का भी ध्यान रखना होता है.” तीन साल बाद जब वे स्वयं राज्य सभा में विपक्ष के नेता नियुक्त हुए तो उनको जाहिर तौर पर ऐसा कोई मलाल नहीं था. टेलिकॉमलाइव पत्रिका ने 2012 की अपनी कवर स्टोरी में बतौर विपक्ष के नेता, टेलिकॉम कंपनी वोडाफोन के मामले में, जेटली के दृष्टिकोण की पड़ताल की. जब मुरली मनोहर जोशी, वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा और लोक सभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने आयकर कानून में संशोधन का समर्थन किया, जिसके चलते वोडाफोन को पिछले टैक्स लगाकर 20000 करोड़ रुपए भरने थे, जेटली और पीयूष गोयल ने उच्च सदन में इसका पुरजोर विरोध किया. इस तथ्य की तरफ इंगित करते हुए कि 2008 और 2009 में दिल्ली हाई कोर्ट में वोडाफोन के वकील के रूप में जेटली पांच बार प्रस्तुत हुए थे, टेलिकॉमलाइव ने दावा किया कि “वोडाफोन एस्सार लिमिटेड के वर्तमान चेयरमैन अनलजीत सिंह के जेटली से गहरे संबंध हैं. पिछले कुछ समय से वे जेटली का समर्थन पाने के लिए उनके साथ लॉबिंग कर रहे हैं.”

वर्षों तक, बीजेपी सांसद और पूर्व क्रिकेटर कीर्ति आजाद (बाएं से दूसरे) ने दिल्ली जिला क्रिकेट संघ में फैले भ्रष्टाचार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया, जिसमें जेटली एक दशक से अधिक समय तक अध्यक्ष रहे थे. कमर सिबतेन/इंडिया टुडे ग्रुप/गैटी इमेजिस

2014 में, जब जेटली वित्त मंत्री बने यह मामला तब भी कोर्ट में लंबित था और मंत्री पद का निष्पक्ष रूप से निर्वाह करने की मंशा से उन्होंने खुद को इससे अलग रखने का फैसला किया. उन्होंने अपनी फेसबुक पोस्ट में लिखा, “मैंने 2 जून 2009 से वकालत छोड़ दी है, उससे पहले कंपनी ने टैक्सेशन मामले में मुझसे कई बार सलाह मांगी थी. इसलिए बतौर मंत्री मुझे इस मामले से जुड़े रहना उचित नहीं लगता.”

कई राजनेताओं की तरह जेटली को अपने व्यावसायिक कदमों और अपनी वैधानिक और कार्यकारी भूमिका में कोई खास अंतर्विरोध नजर नहीं आता. याद रहे कि जेटली देश की कुछ सबसे शक्तिशाली निजी कंपनियों और व्यक्तियों के कानूनी सलहाकार रह चुके हैं. 2005 में, जब जेटली गुजरात से सांसद थे उन्होंने माधवपुरा मर्केंटाइल कोआपरेटिव बैंक को 840 करोड़ रुपए का चूना लगाने वाले केतन पारेख का बचाव किया था. जेटली ने पारेख को जमानत पर बाहर निकलवाया (बाद में उन्हें सजा हुई). गुस्साए जमाकर्ताओं ने जेटली के इस्तीफे की मांग की और कुछ वरिष्ठ नेताओं ने इसकी शिकायत उसी राज्य से सांसद रहे अडवाणी से भी की. जेटली ने मीडिया से कहा, कानूनी शिष्टाचार के कारण वे इस मामले में कोई टिप्पणी नहीं करना चाहते. बिजनेस पत्रकार सुचेता दलाल ने इसकी कड़े शब्दों में भर्त्सन करते हुए लिखा, “कायदे से जेटली को इस मामले में एमएमसीबी के जमाकर्ताओं को अपनी सेवाएं मुफ्त में देनी चाहिए थीं और यही उनके लिए राजनीतिक और नैतिक रूप से सही कदम होता.” जेटली का कदम वैसे तो कानूनी रूप से पुख्ता था, लेकिन यह बतौर जन प्रतिनिधि, सार्वजनिक भलाई को लेकर उनकी प्रतिबद्धता पर सवाल खड़े करता था.

जनवरी में पूर्व क्रिकेटर बिशन सिंह बेदी और अन्य कई लोगों ने नरेंद्र मोदी को वित्त मंत्री के खिलाफ शिकायत पत्र लिखा. जेटली ने “बतौर विपक्ष के नेता डीडीसीए के खिलाफ कार्यवाही रोकने के लिए अपनी शक्तियों का दुरूपयोग किया,” उन्होंने दिल्ली एंड डिस्ट्रिक्ट क्रिकेट एसोसिएशन मामले की तरफ इशारा करते हुए लिखा. “मिस्टर जेटली अब दो महत्वपूर्ण मंत्रालय (वित्त एवं कॉर्पोरेट अफेयर्स) संभाल रहे हैं, जिन्हें डीडीसीए के खिलाफ उसके द्वारा कंपनीज एक्ट के कई कानूनों के उल्लंघन के संबंध में कार्यवाही करनी है, जिनका ताल्लुक असल में आपराधिक कानून से भी है.”

पत्रकार जेम्स एस्टिल ने 2013 में प्रकाशित अपनी किताब, “द ग्रेट तमाशा: क्रिकेट, करप्शन एंड द टर्बुलेंट राइज ऑफ मॉडर्न इंडिया” में लिखा, “भारत में कोई भी क्रिकेट प्रशासन भाई-भतीजावाद और कुशासन के लिए इतना बदनाम नहीं है” जितना दिल्ली को चलाने वाला प्रशासन. “जिसे दिल्ली डैडीज क्रिकेट एसोसिएशन या दिल्ली डिस्ट्रिक्ट क्रुक्स एसोसिएशन कहकर भी पुकारा जाता है.” जेटली, डीडीसीए के सदस्य बनने के दो साल बाद और मंत्री बनने के चंद महीनों के अंदर ही दिसंबर 1999 में इसके प्रेसिडेंट बने. वे इस पद पर 13 साल रहे.

क्रिकेट पर कॉलम लिखने वाले और जेटली के मित्र अशोक मलिक ने बताया, जेटली एसोसिएशन की तरफ, “क्रिकेट के प्रति अपने जूनून” और इससे मिलने वाली “सामाजिक प्रतिष्ठा” के चलते आकर्षित हुए. जैसा कि एस्टिल ने लिखा, “लाखों भारतीयों द्वारा देखे जाने का, टीवी पर प्रसारित क्रिकेट मैच से बेहतर कोई दूसरा मंच हो ही नहीं सकता.” उन्होंने आगे लिखा, “जेटली जैसे राजनेताओं के लिए, जो संसद में सीधे चुनकर नहीं आ पाते, इस तरह से देखे जाना काफी उपयोगी साबित होता है. ऐसे मामलों में भारतीय क्रिकेट के महत्वपूर्ण पदों पर आसीन होना चुनावी ताकत को लगभग हासिल करने का विकल्प है.”

डीडीसीए एक ऐसी कंपनी है जिसकी एक अपारदर्शी चुनाव प्रणाली है. इसमें मतदान के लिए सदस्य को खुद मौजूद रहने की आवश्यकता नहीं होती और वह ‘प्रॉक्सी’ वोटिंग करवा सकता है. इसके कई सदस्य छुटभैय्ये व्यापारी हैं, जो कभी मौजूद नहीं रहते. फरवरी 2000 में आउटलुक ने रिपोर्ट किया कि इसके मतदान में आसानी से हेरफेर किया जा सकता है. अपने दावे को पुख्ता करने के लिए पत्रिका ने प्रेसिडेंट पद के लिए जेटली के चुनाव के दौरान “दो प्रॉक्सी फॉर्म पर एक ही सदस्य के दस्तखत हासिल किए, जिसे कोर्ट ने भी सत्यापित कर दिया.” हालांकि एसोसिएशन में दो विरोधी गुट हैं. एक गुट के नेता सी.के.खन्ना हैं जिन्हें ‘प्रॉक्सी किंग’ भी कहा जाता है और दूसरे गुट के नेता एस.पी. बंसल हैं. जेटली को सालों साल दोनों गुटों का समर्थन प्राप्त होता रहा है.

डीडीसीए के अंदर सड़ांध की पहली दुर्गन्ध, अगस्त 2009 में देखने को मिली जब उस वक्त भारतीय टीम के सितारे वीरेंद्र सहवाग, गौतम गंभीर, आशीष नेहरा और इशांत शर्मा जैसे क्रिकेटरों ने भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार के चलते दिल्ली टीम छोड़ने की धमकी दे डाली. उसी साल दिसंबर के महीने में फिरोजशाह कोटला मैदान में भारत और श्रीलंका के बीच चल रहे फाइनल मैच के दौरान यह स्थिति और बड़ी शर्म का सबब बन गई, मैच को तब बीच में ही रोक देना पड़ा, जब मेहमान टीम ने पिच के खतरनक होने की शिकायत दर्ज करवाई और खिलाड़ियों को चोट लगने का अंदेशा जताया. गुस्साए दर्शकों से डीडीसीए को माफी मांगनी पड़ी और टिकट के पैसे वापस लौटाने का आश्वासन देना पड़ा. इंटरनेशनल क्रिकेट कौंसिल ने इस मैदान पर एक साल के लिए प्रतिबंध लगा दिया. मीडिया को जेटली ने इस मसले पर टालमटोल का रवैया अपनाते हुए कहा, “हमें शांत माहौल में इसका अवलोकन करना पड़ेगा.”

हालांकि 2000 और 2007 के बीच कोटला मैदान में बड़े पैमाने पर बदलाव लाये गए लेकिन डीडीसीए के हालात बद से बदतर ही होते गए. दिल्ली के पूर्व कप्तान सुरिंदर खन्ना ने इस मरम्मत के बाद निकले ‘मलवे’ के बारे में बताया, जिसे जेटली की विरासत कहा जाता है, “उन्होंने मैदान तो बनाया, जो कोई और नहीं बनवा सकता था,” खन्ना ने कहा, “लेकिन हमें उनके द्वारा पैदा किए गए ‘मैले’ की भारी कीमत चुकानी पड़ी.” उन्होंने कहा कि वार्षिक आम बैठक, जिसमें एसोसिएशन के हिसाब-किताब पर वोटिंग की जाती है, प्रॉक्सी वोटिंग की वजह से ढकोसला बन कर रह गई. शुरुआत में इस प्रोजेक्ट का बजट 24 करोड़ रुपए रखा गया था जबकि इसका अंतिम कुल खर्च 130 करोड़ रुपए के करीब आकर रुका.

बिहार से बीजेपी सांसद और पूर्व क्रिकेटर कीर्ति आजाद, डीडीसीए में घपले को लेकर जेटली के खिलाफ लंबे समय तक अकेले विरोध का परचम उठाये रहे. (पहले जेटली ने आजाद को 2009 लोक सभा चुनावों में उनके निर्वाचन क्षेत्र से पार्टी टिकट न मिल पाने के लिए कोशिश की), लेकिन 2011 तक विरोध करने वालों में कई पूर्व क्रिकेटर जुड़ चुके थे, जिनमें बिशन सिंह बेदी, मनिंदर सिंह, मदन लाल और सुरिंदर खन्ना भी शामिल थे. कई डीडीसीए सदस्यों ने जेटली को पत्र लिखे, लेकिन किसी का जवाब नहीं आया. एक सदस्य दिनेश कुमार शर्मा ने 2011 में लिखा, “जब से आपने कमान संभाली है...मुझे खेद है कि डीडीसीए की साख लगातार नीचे गिरी है, यह इसलिए मुमकिन हुआ, क्योंकि आपके अधीन आने वाली कार्यकारिणी समिति ने सभी वित्तीय तथा प्रशासनिक शक्तियां हड़प लीं, जिससे एसोसिएशन को बहुत वित्तीय घाटा उठाना पड़ा.”

क्रिकेट पत्रकार चंदर शेखर लूथरा ने मुझे बताया, “एक बार मैंने जेटली से पूछा कि ‘धर्मशाला के स्टेडियम को बनाने में महज 20 करोड़ रुपए का खर्चा आया और वह बहुत सुन्दर बनकर तैयार हुआ है. फिर ऐसा क्यों हुआ कि दिल्ली के स्टेडियम को बनवाने में इतना पैसा लगाने के बाद भी यह अब तक पहले जैसा ही है?’ इस सवाल का उन्होंने सिर्फ एक पंक्ति में जवाब दिया, ‘कुछ लोग मारूती चलाते हैं और कुछ लोग मर्सिडीज.’ मैं आज तक इसका मतलब नहीं समझ पाया,” लूथरा ने कहा. अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, “लेकिन मैंने डीडीसीए के लोगों को उस वक्त से देखा है जब वे स्कूटर पर आते थे और आज वे मर्सिडीज में चलते हैं.”

मई 2012 में, डीडीसीए में चल रही हिसाब-किताब में गड़बड़ी को लेकर आजाद ने तत्कालीन कॉर्पोरेट अफेयर्स के राज्यमंत्री आर.पी.एन सिंह को एक शिकायत पत्र लिखा. “खातों में बेहिसाब गड़बड़ियां की जा रही रही हैं और फर्जी बिल जमा कर हर साल 30 करोड़ रुपए का खर्च दिखाया जा रहा है”. उन्होंने वित्तीय घोटाले, सदस्यों को गलत तरीके से भुगतान और बिन टेंडर के गैरकानूनी खरीद-फरोख्त का दावा किया. उसी जुलाई में उन्होंने जेटली को भी एक खत लिखा, “मैं आपसे गुजारिश करता हूं कि मेरे या मेरी पत्नी के बारे में किसी धूर्तता भरे ‘लीक’ के जरिए कोई बेजा टिप्पणी करने से बचें.”

जब जेटली यूपीए सरकार के खिलाफ बहुत जोर-शोर से कोयला खदानों के आवंटन को लेकर भ्रष्टाचार का मुद्दा उठा रहे थे, आजाद ने इस मामले को संसद के मानसून सत्र में उठाया. कॉर्पोरेट अफेयर्स मंत्रालय ने आजाद के दावों की जांच के लिए सीरियस फ्रॉड इन्वेस्टिगेटिंग ऑफिस (एसएफआईओ) की एक तीन-सदस्यीय समिति का गठन किया. आजाद ने बताया, उन्हें “अपरोक्ष रूप से कई लोगों द्वारा संपर्क किया गया” और पीछे हटने के लिए “कई तरह के प्रलोभन” दिए गए.

मार्च 2014 में,जब तक इस समिति की जांच पूरी हुई तब तक जेटली डीडीसीए के प्रेसिडेंट नहीं रहे थे. उन्होंने 2013 का चुनाव नहीं लड़ा. हालांकि उनकी नजर बीसीसीआई (बोर्ड ऑफ कण्ट्रोल फॉर क्रिकेट इन इंडिया) के शीर्षतम पद पर गड़े होने की अफवाहें भी चल रही थीं. समिति की रिपोर्ट ने आजाद के आरोपों में सच्चाई पाई और इशारा किया कि डीडीसीए ने बुनियादी हिसाब-किताब रखने के मानदंडों का पालन नहीं किया है, जैसे कि 20000 रुपए से ज्यादा की रकम के भुगतान के लिए चेक का इस्तेमाल नहीं किया गया. समिति ने इंटरनल ऑडिट पर जोर डाला, जिसमें और भी वित्तीय कुप्रबंधन के मामले उजागर हुए. रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज ने डीडीसीए और इसके तीन पदाधिकारियों – सुनील देव, एस पी बंसल और नरेंद्र बत्रा पर 4 लाख रुपए का जुर्माना ठोक दिया. इसके साथ-साथ देव और बंसल पर अतिरिक्त जुर्माना भी ठोका गया. हालांकि, अपनी नाक के नीचे होने वाले इस भ्रष्टाचार के लिए जेटली पर कोई आंच नहीं आई और वे साफ-साफ बच निकले.

डीडीसीए के सदस्य समीर बहादुर ने बताया, “बतौर प्रेसिडेंट वे यह नहीं कह सकते थे कि मुझे इसके बारे में कुछ नहीं पता.” एसोसिएशन की 2012 की वार्षिक आम बैठक के दौरान, जिसका विडियो भी मौजूद है, आजाद ने जेटली को चुनौती दी थी. “आपने यहां नकली प्रॉक्सी भेजे.” जेटली ने जवाब में कहा “आप मुझ पर मानहानि का दावा कीजिए. मैं कई चीजों को नजरंदाज करता आ रहा हूं और इसे भी करूंगा.” उन्होंने आजाद और अन्य को “शिकायतें करने वाली एजेंसी” को रंग में भंग डालने वाला कहा.

बहादुर का मानना है कि जेटली ने 2013 का चुनाव कंपनीज एक्ट में संशोधन की वजह से नहीं लड़ा, क्योंकि अब इसमें धांधली के लिए थोड़े से जुर्माने का नहीं बल्कि जेल जाने का प्रावधान जोड़ दिया गया था. एसएफआईओ और आजाद जब भ्रष्टाचार के सबूत ढूंढने में लगे थे उसी वक्त जेटली प्रेसिडेंट की बजाय डीडीसीए के पैट्रन-इन-चीफ बन बैठे, जो भले ही एक अवैतनिक पद था लेकिन उसमें रुतबा बहुत था. अगस्त 2014 में जब जेटली ने वित्त मंत्रालय के साथ कॉर्पोरेट अफेयर्स मंत्रालय का कार्यभार संभाला, तो आजाद ने डीडीसीए में भ्रष्टाचार का मुद्दा एक बार फिर संसद में उठाया. इसी साल जनवरी में, डीडीसीए ने प्रेसिडेंट एस.पी. बंसल और महासचिव अनिल खन्ना के खिलाफ कई कंपनियों के खाते में गैर कानूनी रूप से 1.55 करोड़ रुपए जमा कराने के जुर्म में, पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई. दोनों को डीडीसीए की कार्यकारिणी समिति ने बाहर का रास्ता दिखा दिया. बहादुर ने बताया कानून में परिवर्तन की वजह से, “सी.के. खन्ना गुट ने, प्रेसिडेंट और महासचिव के खिलाफ कार्यवाही की. इससे पहले ये ‘चोर-चोर मौसेरे भाई’ जैसे थे और हर हिसाब के खाते पर आंख मूंदकर दस्तखत कर देते और जेटली दूसरी तरफ आंख फेर लिया करते थे.

आजाद ने बताया, “जैसा कि बिहार में कहते हैं, सैंय्या भये कोतवाल तो डर काहे का? हर साल 30 करोड़ रुपए का घपला हुआ है. लेकिन कोई इसके बारे में बात नहीं करता. वे बात करेंगे शारदा और अन्य घोटालों की लेकिन इसकी नहीं.” जेटली पर डीडीसीए में सीधे-सीधे भ्रष्टाचार के आरोप नहीं लगे, लेकिन बहादुर जैसे लोगों ने उन पर अपनी नाक के नीचे भ्रष्टाचार को नजरंदाज करने के आरोप लगाए. “जेटली 30 करोड़ रुपए सालाना बजट के साथ खुद की कंपनी तो नहीं चलाते. वे देश के वित्त मंत्री होने के नाते क्या कर सकते थे?”

मई में जैसे ही नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली, मीडिया में रिपोर्टें आईं कि वे अपने मंत्रियों पर सख्ती से नकेल कस रहे हैं. हालांकि पार्टी के भीतर इसको लेकर खासी हलचल मची, मीडिया में कुछ एक अपवादों को छोड़कर इसका विस्तृत विवरण कभी-कभार ही देखने को मिलता था. जैसा कि न्यूयॉर्कर के संपादक डेविड रेम्निक ने चेकोस्लोवाकिया के पूर्व राष्ट्रपति वकलाव हावेल के बारे में कहा, “राजनीतिक पत्रकारिता की तो क्या कहें, राजनीतिक अफवाहों को भी ठहराव से नफरत होती है.” पिछले अगस्त द इकनोमिक टाइम्स ने खबर छापी कि राजनाथ सिंह ने बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह और संघ को खत लिखकर शिकायत की कि पार्टी का एक प्रभावशाली नेता “दुर्भावनपूर्ण और झूठी खबरें” फैला रहा है. जनवरी में मोदी सरकार में मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी ने उसी अखबार को बताया कि उनको लेकर लगातार आलोचना जानबूझकर गढ़ी और मीडिया को अच्छे से परोसी गई कहानियां हैं. लेकिन पूछने पर भी उन्होंने यह नहीं बताया कि क्या ये कहानियां उनकी अपनी पार्टी के लोग गढ़ रहे हैं.

मीडिया में जेटली की छवि लगातार लगभग बेदाग बनी हुई है. “अगर आप गूगल करें तो एक राजनेता ऐसा है जिसके बारे में आपको कुछ भी नकारात्मक नहीं मिलेगा,” किश्वर ने कहा. “चार दशकों के सार्वजनिक जीवन के बाद भी उनका अपना रिकॉर्ड मीडिया में बिल्कुल साफ है.” हालांकि, पिछले साल मीडिया ने वित्त मंत्री और रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन के बीच ब्याज दरों में असहमति के मसले पर चली तनातनी के बारे में खूब लिखा. इस साल जनवरी महीने में ओपन पत्रिका ने लिखा कि जेटली और राजन दोनों “कुछ अफसरों द्वारा उनको नीचा दिखाने के प्रयासों से बहुत खफा हैं.” जो “कानफूसी के अभियान के जरिए” दोनों के बीच “दरारें” पैदा कर रहे हैं. सालाना बजट पेश करने के दौरान दोनों के साथ-साथ आने और बार-बार अपने बीच किसी किस्म के मतभेदों को नकारे जाने के बावजूद भी इस तरह की रिपोर्टें मीडिया में सुर्खियां बनीं रहीं. 2 अप्रैल को आरबीआई के जलसे में मोदी और जेटली दोनों ने, राजन की तारीफ की. मोदी ने कहा, “आरबीआई और सरकार की सोच में बहुत समानताएं हैं. सरकार का प्रतिनिधि होने के नाते मैं अपनी संतुष्टि जाहिर करता हूं. आरबीआई अपनी भूमिका निभा रही है और इसके लिए मैं रघुरामजी और उनकी टीम को बधाई देता हूं.” कुछ हफ्तों बाद 14 अप्रैल को एनडीटीवी के एक इंटरव्यू में जेटली से पूछा गया कि क्या वे राजन से नाखुश हैं? उनका जवाब था, “आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन से मेरे कोई निजी मतभेद नहीं हैं, सिर्फ कुछ मुद्दों पर हमारा नजरिया अलग है. प्रधानमंत्री ने भी गवर्नर के बारे में अच्छी बातें कही हैं.”

1990 के दशक के मध्य में जेटली और मोदी करीब आए और फिर अक्सर एक-दूसरे की प्रशंसा करते. एक संपादक जो खुद को जेटली का दोस्त मानते हैं ने कहा कि मोदी की निगरानी में जेटली "जिम्मेदार हो गए हैं. अनिंदतो मुखर्जी/रॉयटर्स

उसी साक्षात्कार में पत्रकारों के सन्दर्भ में ट्विटर पर विदेश राज्यमंत्री वी.के. सिंह द्वारा इस्तेमाल किए गए “प्रेस्सीट्युड” शब्द पर भी उन्होंने अपनी बात रखी. उन्होंने कहा, “मैं निजी तौर पर उनके द्वारा ऐसी शब्दावली से सहमति नहीं रखता, मेरा मानना है कि कभी- कभी मीडिया के लोग ज्यादती करते हैं, लेकिन उसे नजरंदाज कर देना चाहिए.” पांच दिन बाद मोदी ने, बीजेपी सांसदों की बैठक में सिंह की भरपूर तारीफ की और उनके द्वारा यमन से भारतीयों को सुरक्षित निकाले जाने के उनके “अच्छे काम” को “अन्य वजहों के चलते” नजरंदाज करने के लिए मीडिया को लताड़ा. इसका सन्दर्भ, सिंह की “प्रेस्सीट्युड” वाली टिप्पणी थी.

इसी फरवरी अपने बजट भाषण से पहले, जेटली बीजेपी के दिल्ली चुनाव अभियान के प्रबंधन में व्यस्त थे और अपनी पार्टी के पक्ष में बहुत आत्मविश्वास से भरे दिख रहे थे. जनवरी के आखिर में जेटली ने हेडलाइंस टुडे से कहा, “मेरा विश्लेषण कहता है कि हम बहुत आगे हैं.” बीजेपी सांसद, जो जेटली को मोदी के माफिया का सलाहकार बताते हैं, ने कहा कि मतदान से एक दिन पहले, “जेटली ने 25 सीटों की बढ़त की भविष्यवाणी की थी.” उन्होंने बताया, नतीजों के एक दिन बाद जब पार्टी को सत्तर सीटों वाली दिल्ली विधान सभा में केवल तीन सीटें ही प्राप्त हो पाईं और उसे शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा, “मोदी ने बैठक के लिए राजनाथ सिंह, गडकरी, वेंकैया और जेटली को बुलाया.” बैठक में मौजूद नेताओं से उस सांसद को पता चला कि मोदी ने जेटली से कहा, “क्या आपका कोई राजनीतिक आकलन है?”

जेटली के पिछले 27 सालों से मित्र, एक वरिष्ठ संपादक ने कहा वित्त मंत्री बनने के बाद मोदी की सलाह के अनुसार जेटली ने अपने काम करने का तरीका बदल लिया है. उन्होंने अपनी सीमाएं पहचान ली हैं.” संपादक ने बताया, “मोदी ने उनसे कहा, ‘आपके पेट में कुछ पचता नहीं है, पत्रकार को बोल देते हैं. अब आपको अपने मुंह पर प्रणब मुखर्जी की तरह सेलोटेप लगानी होगी. उन्होने आगे जोड़ा, “वाजपेयी के अरुण जेटली, नरेंद्र मोदी के अरुण जेटली से भिन्न हैं. वे अब जिम्मेवार बन चुके हैं.”

(द कैरवैन के मई 2015 अंक में प्रकाशित इस रिपोर्ट का अनुवाद राजेन्द्र सिंह नेगी ने किया है. अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)