ओआरएफ : रिलायंस की फंडिंग पर स्वतंत्रता का दावा

02 अप्रैल 2019
रायसीना डायलॉग तेजी से भारत के सबसे अहम भूराजनैतिक मंच के तौर पर उभरा है. इसने देश के भीतर और वैश्विक शक्ति वाले अभिजात वर्ग के बीच ओआरएफ के सम्मान को बनाए रखा है.
पीआईबी
रायसीना डायलॉग तेजी से भारत के सबसे अहम भूराजनैतिक मंच के तौर पर उभरा है. इसने देश के भीतर और वैश्विक शक्ति वाले अभिजात वर्ग के बीच ओआरएफ के सम्मान को बनाए रखा है.
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1980 के अंत में धीरूभाई अंबानी चाहते थे कि उनका एक अखबार हो. 1986 में इंडिया एक्सप्रेस ने लेखों की एक श्रृंख्ला छापी थी. कई सारे आरोपों के बीच कहा गया था कि रिलायंस इंडस्ट्रीज ने अपने शेयरों की कीमत बढ़ा कर पेश की है, टैक्स चोरी की है और पॉलिएस्टर फीडस्टॉक के उत्पादन में इसे मिले लाइसेंस की शर्तों का उल्लंघन किया. दौरान या तो सरकारी अधिकारियों ने अपने आंखें मूंद लीं या ऐसे फैसले लिए जो कंपनी की जरूरत को फायदा पहुंचाने वाले थे. प्रतिक्रिया में सरकार ने जांच की और ऐसे कदम उठाए जिसने रिलायंस को झटका लगा और धीरूभाई को घाटे को सीमित करने के लिए संघर्ष करना पड़ा. राजनीतिक धारा में बदलाव और चालाकी से भरी तिकड़मबाजी उन्हें प्रधानमंत्री राजीव गांधी के करीब ले आई और सरकार उलटा इंडियन एक्सप्रेस को अपना जोर दिखाने लगी. लेकिन तब तक अन्य मीडिया संस्थान भी रिलायंस के बारे में ऐसे तथ्य छापने लगे थे जिससे कंपनी असहज हो उठी.

धीरूभाई अंबानी की जीवनी द पॉलिएस्टर प्रिंस के नाम से छपी है. इसमें पत्रकार हामिश मैक्डॉनल्ड लिखते हैं कि रिलायंस के मुखिया “प्रिंट में इंडियन एक्सप्रेस को चुनौती देना चाहते थे” और “और कुछ सालों तक उन्होंने मीडिया के धंधे में आने पर चर्चा की थी.” धीरूभाई ने “बाजार में आने वाले कई अखबारों पर नजर डाली” और शुरुआत में द पेट्रीयॉट में नियंत्रक हिस्सेदारी सुरक्षित की थी, “इसमें नुस्ली वाडिया पर तीखे हमले किए गए थे. ये हमले एक्सप्रेस द्वारा चलाए जा रहे अभियान के खिलाफ थे.” व्यापार में वाडिया, धीरूभाई के अहम प्रतिद्वंदी थे और इंडियन एक्सप्रेस के मालिक के करीबी थे. 1998 में धीरूभाई के दामाद ने कॉमर्स को खरीद लिया. बॉम्बे से चलने वाला ये साप्ताहिक आर्थिक तंगी से गुजर रहा था “लेकिन इसके पास एक व्यापार और आर्थिक रिसर्च से जुड़ा एक उपयोगी ब्यूरो था.” इसे इस उम्मीद से खरीदा गया कि इसे मुख्यधारा के दैनिक में बदला जाएगा.

कॉमर्स की कमना हाई-प्रोफाइल एडिटर प्रेम शंकर झा के हाथों में सौंपी गई और इसका नाम बदलकर ऑब्जर्वर ऑफ बिजनेस एंड पॉलिटिक्स कर दिया गया. दिसंबर 1989 में ये छपना शुरू हुआ. इसी समय राजीव गांधी की सरकार की जगह एक गठबंधन सरकार आई थी. सरकार के मुखिया वीपी सिंह रिलायंस विरोधी थे. धीरूभाई के लिए यह एक समस्या थी. कुछ साल पहले इंडिया टुडे के साथ एक साक्षात्कार में उनसे पूछा गया था, “आपकी सफलता का एक कारण बाहरी माहौल को व्यवस्थित करने की आपकी क्षमता है. आप ऐसा कैसे करते हैं?” धीरूभाई ने जवाब दिया, “सबसे अहम बाहरी माहौल भारत सरकार है. आपको अपने विचार सरकार को बेचने होते हैं. यही सबसे अहम चीज है.”

धीरूभाई की जरूरतों को झा पूरा नहीं कर सके. उनकी पहुंच दूर तक थी लेकिन धीरूभाई को उनकी निष्ठा में विश्वास नहीं था. झा ने कुछ ही महीनों में अखबार छोड़ दिया और वीपी सिंह से जुड़ गए. वह पीएम के मीडिया सलाहकार बन गए. झा की जगह धरूभाई ऐसे व्यक्ति को लेकर आए जिस पर वे भरोसा कर सकते थे. ये व्यक्ति द पेट्रीयॉट के एडिटर-इन-चीफ आर. के. मिश्रा थे.

वीसी सिंह की सरकार असफल रही और एक साल के भीतर इसे भंग कर दिया गया. ऑवजर्वर भी असफल रहा लेकिन इसकी असफलता में समय लगा. न तो इसे पढ़ने वाले मिले और ना ही लोगों का भरोसा. 10 साल बाद इसे औपचारिक तौर पर बंद कर दिया गया. धीरूभाई ने अखबार के सहारे “बाहरी माहौल” और रिलायंस के बारे में विचारों को बेचने की जो उम्मीद लगाई थी वह अधूरी रह गई. लेकिन उनके प्रयासों से ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन का जन्म हुआ. आज के समय में यह संभवत: देश का सबसे बड़ा थिंक टैंक है.

उर्वशी सरकार उर्वशी सरकार दिल्ली और मुंबई स्थित स्वतंत्र पत्रकार हैं.

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