पूर्वोत्तर भारत में आरएसएस की घुसपैठ

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ उत्तर-पूर्व भारत में एक हजार शाखाएं स्थापित कर चुका है.
सुब्राता विश्वास/हिंदुस्तान टाइम्स
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ उत्तर-पूर्व भारत में एक हजार शाखाएं स्थापित कर चुका है.
सुब्राता विश्वास/हिंदुस्तान टाइम्स

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उत्तरपूर्व भारत में राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ का इतिहास 1946 से आरंभ होता है. उसी साल अक्टूबर में दादाराव परमार्थ, वसंत राव ओक और कृष्ण प्रांजपे ने पहली बार असम प्रांत में कदम रखा. उस वक्त आज के पूर्वोत्तर का अधिकांश भाग असम प्रांत में शामिल था. संघ के इन तीनों प्रचारकों ने गुवाहाटी, डिब्रूगढ़ और शिलांग में पहली शाखाएं खोलीं जहां उनके द्वारा भर्ती किए लोग प्रतिदिन एकत्र होते थे.

आरएसएस के अनुयायी नाथूराम गोडसे द्वारा 30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी की हत्या किए जाने के बाद संगठन पर सम्पूर्ण भारत में प्रतिबंध लगा दिया गया था. अगले साल जब प्रतिबंध हटाया गया तो आरएसएस के दूसरे सरसंघचालक एमएस गोलवलकर ने ठाकुर राम सिंह को संगठन के काम के निरीक्षण के लिए असम भेजा. सिंह की भूमिका वहां 1971 तक रही.

1975 तक असम के प्रत्येक जनपद में शाखा कायम हो चुकी थी. असम आरएसएस के प्रचार प्रमुख शंकर दास के अनुसार आज उत्तर असम प्रान्त में 813 शाखाएं हैं. आरएसएस की प्रशासनिक इकाई की आंतरिक व्यवस्था के मुताबिक इस इकाई में ब्रह्मपुत्र घाटी, नागालैंड और मेघालय शामिल हैं. त्रिपुरा अलग प्रान्त है, इसमें 275 शाखाएं हैं. मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश भी अलग अलग प्रान्त हैं और हर एक में कई दर्जन शाखाएं हैं. बराक घाटी के अंतर्गत आने वाला उत्तर भारत का मिजोरम मात्र ऐसा प्रान्त है जहां एक भी शाखा नहीं है. दास ने मुझे बताया कि वहां शाखा स्थापित करने का काम चल रहा है.

उन्होंने मुझे बताया कि संघ परिवार की शाखाओं और आरएसएस में निष्ठा रखने वालों के माध्यम से “फिलहाल हम समाज सेवा में लगे हुए हैं”. इसमें आदिवासियों तक पहुंच बनाने की जिम्मेदार वनवासी कल्याण आश्रम और आरएसएस की महिला शाखा राष्ट्र सेविका समिति हैं.

मसोयो हुनफुन आवुनघसी कारवां की पूर्व संपादकीय इंटर्न हैं.

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