“हड़प्पा बाद के व्यापक आव्रजन से दक्षिण एशियाइयों में चरवाहों का डीएनए”, आनुवंशिकी विज्ञानी वाघेश नरसिम्हन

03 दिसंबर 2019
वाघेश नरसिम्हन
वाघेश नरसिम्हन

हरतोष सिंह बल : क्या आप हमें मानव पलायन और प्राचीन डीएनए पर रीच लैब में चल रहे काम के बारे में बता सकते हैं?

वाघेश नरसिम्हन : हम लगभग पिछले पांच सालों से प्राचीन डीएनए पर काम कर रहे हैं, उससे पहले हम आधुनिक डेटा पर काम कर रहे थे. प्राचीन नमूनों को अनुक्रमित करने की क्षमता वाली क्रांतिकारी नई तकनीक लगभग दस साल पहले 2010 में पहली निएंडरथल जीनोम के अनुक्रमण के साथ सामने आई थी. तब से हमने इस तकनीक का उपयोग न केवल प्राचीन इतिहास का बहुत गहराई से अध्ययन करने के लिए किया है, बल्कि हालिया घटनाओं के अध्ययन के लिए भी किया है. 2009 में हमारी प्रयोगशाला ने पहली बार भारतीय आनुवंशिक इतिहास की जांच शुरू की. हमने आधुनिक भारत से बड़ी संख्या में नमूने अनुक्रमित कर इनसे जनसंख्या इतिहास के पुनर्निर्माण का प्रयास किया. आज हम जानते हैं कि यह एक बहुत ही चुनौतीपूर्ण काम है और यह काम अतीत की घटनाओं के बारे में बहुत अस्पष्ट है. सीधे प्राचीन डीएनए अनुक्रम होने से- यानी ऐसे व्यक्तियों के जीनोम जिन्हें दसियों हजार नहीं तो हजारों सालों पहले जमीन में दफनाया गया था- हम यह जांच कर सकते हैं कि मनुष्य दिक और काल (स्पेस और टाइम) कैसे आगे बढ़ा. रेडियोकार्बन डेटा से, जो नमूनों की बहुत ही सटीक समय सापेक्ष जानकारी देता है, हम वास्तव में जांच कर सकते हैं कि मानव पलायन कैसे हुआ. इस प्रकार, यह इस विषय का इतिहास है और इसका भी कि हमने भारत को कैसे देखना शुरू किया.

हरतोष सिंह बल : प्राचीन डीएनए का नमूना लेना, विशेष रूप से उपमहाद्वीप में, असली चुनौती होती है. ऐसा क्यों है?

वाघेश नरसिम्हन : दो कारणों से. पहला कारण तकनीकी है: प्राचीन डीएनए का क्षरण होता है. आपके पास डीएनए हैं वे मिट्टी या कंकाल में निहित हैं और प्राकृतिक कारणों से इनका क्षरण होता है मतलब यह कम होता जाता है. डीएनए फ्रेगमेंट की लंबाई कम होती जाती है और यह इतनी कम हो जाती है कि उनका उपयोग विश्लेषण में नहीं किया जा सकता. गर्म और आर्द्र जलवायु भी चुनौतियां हैं क्योंकि इन परिस्थितियों में क्षरण दर बढ़ जाती है. दूसरा मुद्दा यह है कि हमारे पास अभी तक ऐसी सामग्री उपलब्ध नहीं है जैसी यूरोप, मध्य एशिया  या यहां तक कि अमेरिका में उपलब्ध है. लेकिन हमें इनमें से कई परियोजनाओं में मिली सफलता के आधार पर हम मानवशास्त्रीय (भारतीय सर्वेक्षण विभाग) और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण अधिकारियों के सामने प्रस्ताव रखने की उम्मीद करते हैं. हमें पाकिस्तान से भी सैकड़ों नमूने इकट्ठा करने की इजाजत मिल रही है, इसलिए यह बहुत अच्छा होगा कि हम भारत से भी नमूने ले पाएं.

हरतोष सिंह बल : प्राचीन डीएनए काम लायक टुकड़े को निकाल लेने के बाद अगले चरण में क्या होते हैं?

हरतोष सिंह बल द कैरवैन के राजनीतिक संपादक और वॉटर्स क्लोज ओवर अस : ए जर्नी अलॉन्ग द नर्मदा के लेखक हैं.

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