आउट ऑफ कंट्रोल

कैसे चीन ने मोदी सरकार को पछाड़ कर एलएसी क्षेत्र में अपना दबदबा कायम किया  

31 अक्टूबर 2022
लद्दाख में भारत-चीन सीमा का एक नक्शा, जिसमें 1956 और 1960 में चीन के दावे वाली रेखाओं के साथ-साथ 1962 के चीन-भारत युद्ध से पहले और बाद की वास्तविक नियंत्रण रेखा को दर्शाया गया है.
विकी मीडिया कॉमन्स
लद्दाख में भारत-चीन सीमा का एक नक्शा, जिसमें 1956 और 1960 में चीन के दावे वाली रेखाओं के साथ-साथ 1962 के चीन-भारत युद्ध से पहले और बाद की वास्तविक नियंत्रण रेखा को दर्शाया गया है.
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15 जून 2020 को भारत और चीन द्वारा आधिकारिक रूप से वास्तविक नियंत्रण रेखा या एलएसी (दोनों देशों की विवादित सीमा, जो पश्चिम में काराकोरम दर्रे से लेकर पूर्व में म्यांमार तक फैली हुई है) पर भारतीय सैनिकों की मौत की घटना को दर्ज किया गया. विगत 45 वर्षों में यह इस प्रकार का पहला मामला था. यह मौतें लद्दाख की गलवान घाटी में हुई. 1962 के चीन-भारत युद्ध के बाद इस क्षेत्र में पहली बार किसी सैन्य टुकड़ी के हताहत होने की घटना सामने आई है. मामले से जुड़ी तमाम जानकारियां अभी तक स्पष्ट नहीं हैं, लेकिन इतना साफ है कि चीनी सैनिकों द्वारा गलवान घाटी में तंबू गाड़ दिए गए थे और फिर उन्हें वहां से बेदखल करने के लिए भारतीय सेना को बल का प्रयोग करना पड़ा. इस बात की कोई पुष्टि नहीं की गई है कि चीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) वहां से हटने के लिए सहमत थी. इस चलते दोनों देशों की सैन्य टुकड़ियों के बीच संघर्ष हुआ, जिसमें 20 भारतीय सैनिकों और कम से कम चार पीएलए सैनिकों को अपनी जान गंवानी पड़ी. सत्तर से अधिक भारतीय सैनिक घायल हुए, जबकि कुछ अधिकारियों सहित लगभग सौ से अधिक भारतीय सैनिकों को चीन की सेना द्वारा बंदी बनाया गया. चीन का कोई भी सैनिक भारतीय सेना की कैद में नहीं था. दिल्ली में सेना मुख्यालय के एक शीर्ष अधिकारी, जो लद्दाख संघर्ष का अहम हिस्सा थे, ने मुझे बताया, “हम ये देख कर दंग रह गए थे कि वे इस मुकाबले के लिए कितनी अच्छी तरह तैयार थे.”

एलएसी को न तो कभी नक्शे पर चिन्हित किया गया है और न ही दोनों देशों की ओर से जमीन पर इसका सीमांकन किया गया है. ऐसा करने का आखिरी प्रयास करीब दो दशक पहले विफल हो गया था. इस विषय पर दोनों पक्ष एक दूसरे के विपरीत दावा करते आए हैं. नई दिल्ली का कहना है कि दोनों देशों के बीच की सीमा 3,488 किलोमीटर लंबी है, जबकि चीन का कहना है कि इसकी लंबाई केवल 2,000 किलोमीटर के आसपास है. यह दुनिया की सबसे लंबी विवादित सीमा है. चूंकि कोई भी पक्ष इस बात पर सहमत नहीं हैं कि उनके द्वारा माना जाने वाला "वास्तविक नियंत्रण" कहां समाप्त होता है, इसलिए दोनों ही एक निर्जन हिमालयी बंजर भूमि के छोटे-छोटे टुकड़ों पर लगातार अपना आधिपत्य जमाने के प्रयास में लगे रहते हैं. किसी क्षेत्र पर अपना अधिकार जताने के लिए बहुत सी गतिविधियों को अंजाम दिया जाता है- जैसे कुछ खास बिंदुओं तक सैनिकों का गश्त लगाना, सीमाओं पर बुनियादी ढांचों का निर्माण करना और सीमावर्ती गांवों के स्थानीय लोगों के मवेशियों के चरागाहों को नियंत्रित करना. बेहद विषम परिस्थितियों और कठोर मौसम के बावजूद भारत और चीन ने 2020 की गर्मियों से लद्दाख में 832 किलोमीटर लंबी एलएसी पर अपनी-अपनी सेनाओं के पचास हजार अतिरिक्त सैनिकों को तैनात किया हुआ है.

गलवान का घातक संघर्ष पीपी14 नाम की गश्त चौकी  (पेट्रोलिंग पॉइंट) पर हुआ. यह एक ऐसा क्षेत्र है जो तब तक विवादित नहीं था, और जहां भारतीय सेना नियमित रूप से गश्त लगाती थी. संघर्ष के कुछ दिनों बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दिल्ली से घोषणा की कि चीनियों ने “हमारी सीमा में घुसपैठ नहीं की है, और न ही उनके द्वारा किसी भी पोस्ट पर कब्जा किया गया है.” यह भारतीय सरकार की अपनी साख बचाने की कोशिश थी, जिसे चीन ने इस बात के सबूत के रूप में खुशी-खुशी पेश किया कि उसने कभी भारतीय सीमा में अतिक्रमण किया ही नहीं.  लेकिन भारतीय सैनिकों की मौत और उन्हें चीन की कैद से छुड़ाए जाने के हो-हल्ले ने जल्द ही लद्दाख संकट पर भारतीय सरकार के दावों की कलई खोल दी. भारत में यह मामला करीब एक महीने पहले ही सार्वजानिक तौर पर सामने आ चुका था, जब लद्दाख में पैंगोंग झील के उत्तरी तट पर बड़े पैमाने पर दोनों देशों की सेना के बीच गंभीर झड़प हुई थी. तब दोनों ही पक्षों को गंभीर चोटें आई थी, लेकिन कोई मौत नहीं हुई थी. महीनों से पनप रहे तनाव के बाद 2020 की गर्मियों में इन प्रमुख घटनाओं के चलते सीमा का संकट खुल कर उजागर हुआ.

आज ढाई साल बाद दोनों पड़ोसी मुल्कों के बीच संबंधों की स्थिति को “न युद्ध, न शांति” के रूप में परिभाषित किया जा सकता है. करीब दो दशक पहले भारत और पाकिस्तान के बीच अशांत कश्मीर क्षेत्र में नियंत्रण रेखा/एलओसी की परिस्थितियों का वर्णन करने के लिए कई सैन्य अधिकारियों द्वारा इसी वाक्यांश का इस्तेमाल किया जाता था. भले ही दोनों स्थितियां भौतिक रूप से भिन्न हैं, लेकिन लद्दाख संकट के समाधान में सक्रिय रहे  एक वरिष्ठ भारतीय सैन्य कमांडर ने मुझे बताया कि यह वाक्यांश वर्तमान में भी उतना ही प्रासंगिक है. जब मैंने उनसे 2020 की गर्मियों में की गयी सैन्य कार्रवाई के पीछे की सोच के बारे में जानना चाहा, तो उन्होंने कहा, “एलएसी पर चीन के साथ वैसा बर्ताव न करें, जैसा एलओसी पर पाकिस्तान के साथ किया जाता है.” 

जहां भारत लगभग तीन दशकों से नियंत्रण रेखा पर अपने आक्रामक रवैये के साथ पाकिस्तान पर सैन्य रूप से हावी रहा है, वहीं उसे चीन के खिलाफ इस रवैये का उल्टा खामियाजा उठाना पड़ा है. अधिकांश मीडिया रिपोर्टों के अनुसार 2020 के बाद से पीएलए ने भारत को कम से कम एक हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर अधिकार जमाने से वंचित रखा है. मनोज जोशी अपनी नई किताब ‘अंडरस्टैंडिंग द इंडिया-चाइना बॉर्डर: द एंड्योरिंग थ्रेट ऑफ वॉर इन हाई हिमालय’ में अनुमान लगाते हैं कि यह क्षेत्र दो हजार वर्ग किलोमीटर तक फैला हो सकता है. नियंत्रण के बदले समीकरणों की एक बानगी ये भी है कि भारतीय सेना अब कई ऐसे क्षेत्रों में गश्त नहीं लगा पाती, जहां वो पहले नियमित रूप से पहुंचती थी. पीएलए ने विवादित क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचों का निर्माण किया है, जिसमें हवाई क्षेत्र, हेलीपोर्ट, आवास, सड़क और पुल शामिल हैं, जिन्हें समय-समय पर सैटलाइट इमेजरी द्वारा दर्ज किया गया है.

सुशांत सिंह येल यूनि​वर्सिटी में हेनरी हार्ट राइस लेक्चरर और सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च में सीनियर फेलो हैं.

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