कदमताल

भारतीय सेना का खतरनाक हद तक राजनीतिकरण करती मोदी सरकार

21 जुलाई 2023
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ की मौजूदगी में पूर्व चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ बिपिन रावत गोरखनाथ मंदिर में पूजा करते हुए. जैसा कि सेना की उत्तरी कमान के पूर्व प्रमुख एचएस पनाग ने उस समय कहा था, रावत के कार्यों ने "सशस्त्र बलों की धर्मनिरपेक्ष और अराजनीतिक स्थिति" से समझौता किया है.
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ की मौजूदगी में पूर्व चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ बिपिन रावत गोरखनाथ मंदिर में पूजा करते हुए. जैसा कि सेना की उत्तरी कमान के पूर्व प्रमुख एचएस पनाग ने उस समय कहा था, रावत के कार्यों ने "सशस्त्र बलों की धर्मनिरपेक्ष और अराजनीतिक स्थिति" से समझौता किया है.

असामान्य नजारे थे, प्रतिक्रिया असाधारण थी. 24 जून को दोपहर लगभग 2 बजे, सेना की एक टुकड़ी ने मणिपुर के इंफाल पूर्वी जिले के एक गांव इथम में मैतेई अलगाववादी समूह, कांगलेई याओल कनबा लुप के 12 सदस्यों को गिरफ्तार कर लिया. इनमें मोइरांगथेम तांबा भी शामिल था, जो 2015 में घात लगाकर किए गए हमले का कथित मास्टरमाइंड है. इसमें 18 सैनिक मारे गए थे. जल्द ही सेना की टुकड़ी को एक हजार से ज्यादा औरतों के साथ-साथ भारतीय जनता पार्टी के एक विधायक ने भी घेर लिया, जिन्होंने कमांडर को पकड़े गए आतंकवादियों को छोड़ने और इलाका छोड़ने के लिए मजबूर किया.

सेना ने अपने पीछे हटने पर दयापूर्ण दिखावा करने की कोशिश की. उसने ट्वीट किया, ''औरतों के नेतृत्व वाली बड़ी क्रोधित भीड़ के खिलाफ गतिज बल के इस्तेमाल की संवेदनशीलता और इस तरह की कार्रवाई के कारण संभावित हताहतों को ध्यान में रखते हुए, सभी 12 कैडरों को स्थानीय नेता को सौंपने का एक विचारशील निर्णय लिया गया.'' स्थानीय नेता की पार्टी संबद्धता का कोई उल्लेख नहीं करते हुए, ट्वीट में दावा किया गया कि वापस लौटने का “परिपक्व निर्णय मणिपुर में चल रही अशांति के दौरान किसी भी अतिरिक्त क्षति से बचने के लिए भारतीय सेना का मानवीय चेहरा दिखाता है.”

यह बहाना बिल्कुल भी विश्वसनीय नहीं था, क्योंकि लगभग बारह घंटे पहले हुई एक अन्य घटना ने सेना का एक अलग चेहरा दिखाया था. उस दिन सुबह 2 बजे, 50 राष्ट्रीय राइफल्स के सैनिकों ने दक्षिण कश्मीर के पुलवामा जिले में दो मस्जिदों पर हमला किया और स्थानीय मुअज्जिन और नमाजियों को "जय श्री राम" का नारा लगाने के लिए मजबूर किया. दो पूर्व मुख्यमंत्रियों के ट्वीट कर अपना गुस्सा जाहिर करने के बावजूद, सेना ने आधिकारिक तौर पर घटना की पुष्टि या खंडन करने से इनकार कर दिया - यह स्वीकार करते हुए कि इसमें शामिल सैनिकों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करना जरूरी होगा, जिससे हिंदुत्व विचारक और उनके राजनीतिक संरक्षक नाराज हो गए होंगे. इसके बजाय, यूनिट के कमांडर ने ग्रामीणों से चुपचाप माफ़ी मांगी और दोषी अधिकारी को क्षेत्र से बाहर कर दिया. यह घृणित घटना तब से सार्वजनिक चेतना से गायब हो गई है, जो ऐसे समय में स्वाभाविक है जब मुसलमानों की हत्या भी शायद ही राष्ट्रीय सुर्खियां बन पाती हैं या सार्वजनिक रूप से बदनामी का कारण बनती हैं.

कश्मीर में इस तरह की दण्डमुक्ति और मणिपुर में इस तरह की गुंडागर्दी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. आख़िर ये नरेन्द्र मोदी के नए भारत की सेना है, जहां शीर्ष सैन्य नेतृत्व सत्तारूढ़ दल की राजनीतिक अनिवार्यताओं के अनुरूप है, और एक दुर्जेय संस्था के चरित्र को बहुसंख्यकवादी विचारधारा के परेशान करने वाले लक्षणों से नया रूप दिया जा रहा है. संगठित हिंसा के एक साधन के रूप में सेना की प्रकृति कायम है और एक पेशेवर बल का उसका बाहरी स्वरूप अपरिवर्तित है, लेकिन सामाजिक-राजनीतिक और ऐतिहासिक संदर्भों के कारण, इसका चरित्र तेजी से बदल रहा है. कश्मीर में, इसके कार्य अक्सर मानवीय लागत की परवाह किए बिना बीजेपी के एजेंडे का समर्थन करते हैं. मणिपुर में, जहां बीजेपी ने अपने मुख्यमंत्री बीरेन सिंह के साथ बने रहने का विकल्प चुना है, जिन्होंने खुद को बहुसंख्यक समुदाय के नेता में बदल लिया है, सेना कूकि समुदाय पर निशाना साधने वाले मैतेई समूहों से निपटने के लिए सख्त रुख अपनाने के बजाए नरम रुख अपना रही है.

हाल के वर्षों में सेना के बदलते चरित्र के पर्याप्त प्रमाण मिले हैं. मेजर लीतुल गोगोई का मामला लीजिए, जिन्होंने 2017 के लोकसभा उपचुनाव के दौरान श्रीनगर में एक निर्दोष कश्मीरी व्यक्ति को अपनी जीप के बोनट से बांध दिया था, यह दावा करते हुए कि यह पत्थरबाजों को उनके काफिले को निशाना बनाने से रोकने का एक प्रयास था. यह मानवाधिकारों और सेना की मानक संचालन प्रक्रियाओं का स्पष्ट उल्लंघन था और इसकी दुनिया भर में आलोचना हुई थी. लेकिन बीजेपी ने इसकी और उस समय के सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत की सराहना की ने इसे "अभिनव" कहा. कुछ सप्ताह बाद, रावत ने व्यक्तिगत रूप से गोगोई को आतंकवाद विरोधी अभियानों में उनके "निरंतर प्रयासों" के लिए प्रशस्ति पत्र से सम्मानित किया. एक स्थानीय लड़की के साथ एक होटल में चेकिंग के दौरान पुलिस द्वारा हिरासत में लिए जाने के बाद अंततः सेना को गोगोई के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने के लिए मजबूर होना पड़ा. हालांकि, सेना की छवि को नुकसान हुआ था और इसके नेतृत्व की प्राथमिकताएं स्पष्ट हो गईं. कश्मीरी लोगों के दिल और दिमाग को जीतने के बजाए, उसने अपने राजनीतिक आकाओं के दिल और दिमाग को जीतने के लिए आबादी को अलग-थलग करने का विकल्प चुना.

सुशांत सिंह येल यूनि​वर्सिटी में हेनरी हार्ट राइस लेक्चरर और सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च में सीनियर फेलो हैं.

Keywords: Indian Army Manipur Kashmir
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