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संसद के हंगामे और प्रधानमंत्री की अनुपस्थिति के बीच, विपक्ष के हाथों में कारवां की वह रिपोर्ट थी जिसने राष्ट्रीय सुरक्षा के दावों की कलई खोल दी. लेकिन यह कहानी सिर्फ़ एक जुमले, 'जो उचित समझो वह करो', तक सीमित नहीं है. यह कहानी अगस्त 2020 की उस सर्द रात की है, जब लद्दाख की बर्फीली चोटियों पर चीनी टैंकों की गड़गड़ाहट और दिल्ली में बैठे राजनीतिक नेतृत्व की खामोशी के बीच भारत का भविष्य दांव पर लगा था. जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की अप्रकाशित आत्मकथा के पन्ने उस सच को उजागर करते हैं, जिसे 'राष्ट्रहित' के नाम पर अब तक दबाया गया.
{एक}
31 अगस्त, 2020 की रात 8.15 बजे, भारतीय सेना की उत्तरी कमान के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल योगेश जोशी को एक फ़ोन कॉल प्राप्त हुआ. सूचना मिली कि चार टैंकों के साथ चीनी सैनिक पूर्वी लद्दाख के रेचिन ला दर्रे की ओर बढ़ रहे हैं. जोशी ने तत्काल इस गतिविधि की जानकारी सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे को दी. नरवणे स्थिति की गंभीरता को तुरंत समझ गए, क्योंकि ये टैंक कैलाश रेंज पर स्थित भारतीय चौकियों से मात्र कुछ सौ मीटर की दूरी पर थे.
रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण इस क्षेत्र को भारतीय सेना ने कुछ ही घंटों पूर्व चीनी पीपल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के साथ एक भीषण संघर्ष के बाद अपने नियंत्रण में लिया था. वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के इस विवादित क्षेत्र में ऊंचाई का हर मीटर रणनीतिक प्रभुत्व का परिचायक होता है. भारतीय सैनिकों ने चेतावनी के तौर पर आसमान में 'इल्यूमिनेशन गोले' (जो केवल प्रकाश करते हैं) दागे, परंतु इसका चीनी सेना पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा और वे निरंतर आगे बढ़ते रहे. इसके बाद नरवणे ने भारत के राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व को त्वरित फ़ोन करना शुरू किया. उन्होंने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल, चीफ़ ऑफ़ डिफेंस स्टाफ़ जनरल बिपिन रावत और विदेश मंत्री एस. जयशंकर से संपर्क साधा.
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