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ट्रांसजेंडर और इंटरसेक्स व्यक्तियों के मौलिक अधिकारों को इस साल की शुरुआत में गंभीर झटका लगा जब ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन कानून, 2026 पारित हुआ. ये संशोधन जेंडर के स्व-निर्धारण और स्व-पहचान के अधिकार को प्रभावी रूप से निरस्त कर देते हैं और ट्रांस व्यक्तियों के उन मौलिक अधिकारों को गंभीर रूप से प्रभावित करते हैं, जिनकी गारंटी सुप्रीम कोर्ट के 2014 के ‘नालसा बनाम भारत संघ’ के फ़ैसले में दी गई थी.
नरेन्द्र मोदी सरकार ने 13 मार्च को संशोधन प्रस्तावित किए और तीन दिनों के भीतर संसद के दोनों सदनों से पारित करवा लिए. इन्हें 30 मार्च को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की मंजूरी भी मिल गई. पूरी प्रक्रिया के दौरान सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने ट्रांस और इंटरसेक्स व्यक्तियों से परामर्श की कोशिश भी नहीं की. साथ ही, इन समुदायों और अन्य जेंडर अल्पसंख्यकों द्वारा कानून के ख़िलाफ़ किए गए व्यापक विरोध को भी नज़रअंदाज़ कर दिया.
नए संशोधन ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की जेंडर ‘पुष्टि’ के लिए मेडिकल बोर्ड के परीक्षण को अनिवार्य बनाते हैं. इन संशोधनों के तहत सरकारी अधिकारी उनके निजी मेडिकल रिकॉर्ड को अनिवार्य रूप से देख सकते हैं. दूसरी ओर, कानून की अस्पष्ट भाषा उन व्यक्तियों और संगठनों को अपराधी ठहराने का ख़तरा पैदा करती है जो ट्रांस व्यक्तियों को भौतिक सहायता, लॉजिस्टिकल मदद, आश्रय या मेडिकल सहायता प्रदान करते हैं. अहम बात यह है कि संशोधित कानूनी परिभाषा में ट्रांसजेंडर व्यक्ति सिर्फ़ किन्नर, हिजड़ा, अरवानी और जोगटा को माना जाएगा या उनको जो ‘नए कानून द्वारा निर्दिष्ट इंटरसेक्स विविधताओं वाले व्यक्ति हैं’ या जो ‘जन्म के समय पैदाइशी भिन्नता वाले हैं.’
ट्रांसजेंडर पहचान को इंटरसेक्स जेनेटिक भिन्नताओं के साथ अवैज्ञानिक रूप से मिला देने के अलावा, उपरोक्त संकीर्ण परिभाषा उन लोगों को कानूनी दायरे से बाहर कर देती है जो ट्रांसमस्कुलिन, नॉन-बाइनरी और जेंडरक्वीर पहचान रखते हैं या व्यक्त करते हैं. इसके अलावा उनको भी बहार कर देती है जो सामाजिक-सांस्कृतिक रूप से मान्यता प्राप्त जेंडर अल्पसंख्यक हैं, जैसे नुपी-मानबी और मानबा, तिरुनंगई-तिरुनंबी, ख्वाजासिरा, कोठी और अन्य, जिन्हें 2019 के कानून में मान्यता दी गई थी.
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