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क़रीब एक दशक पहले, जब मैं झारखंड के संताल परगना के एक ज़िले, पाकुड़, में काम करता था, तब पश्चिम बंगाल के हावड़ा से अक्सर ट्रेन पकड़ा करता था. ऐसी ही एक यात्रा में मेरी बगल की सीट पर बैठे एक यात्री से बातचीत शुरू हुई. पहली नज़र में ही समझ आ गया था कि वह संताल नहीं थे, हालांकि उन्हें संताली आती थी. हम अब तक अंग्रेज़ी में ही बात कर रहे थे, लेकिन जैसे ही उन्हें पता चला कि मैं संताल हूं, उन्होंने अचानक संताली में पूछा, 'होड़ कनाम?' (क्या तुम होड़ हो?)
'होड़' संताली शब्द है, जिसका अर्थ है ‘लोग’. लेकिन जब हम कहते हैं, 'हम होड़ हैं,' तो उसका अर्थ महज़ इतना नहीं होता कि हम लोग हैं. उसमें एक गहरी पहचान छिपी है : हमारा मतलब होता है कि ‘हम संताल हैं’. जो संताल नहीं हैं, उनके सामने हम आम तौर पर अपना परिचय संताल के रूप में देते हैं, लेकिन अपने लोगों के बीच, दूसरे संतालों के बीच, हमें किसी और परिचय की ज़रूरत नहीं पड़ती. वहां हम सिर्फ़ होड़ हैं. बचपन में मैंने संताली बोलने वाले लोगों को अपनी भाषा के लिए 'होड़ रोड़' या 'होड़ अडांग' कहते अक्सर सुना था, ये एक होड़ की भाषा है.
समय के साथ मेरे लिए यह बात और स्पष्ट होती गई कि संताल ख़ुद को लोग मानते हैं. अपने लिए, अपने समुदाय के लिए हम जिस शब्द का इस्तेमाल करते हैं, उसका अर्थ ही 'लोग' है. यह बताता है कि हम इस धरती को अपना मानते हैं और ख़ुद को इसका एकमात्र मानवीय निवासी. एक तरह से, शायद अनजाने में ही, हम यह दावा करते हैं कि इस धरती पर सबसे पहले हम ही आए थे.
संताल भारत का तीसरा सबसे बड़ा आदिवासी समुदाय हैं. देश के दूसरे आदिवासी समुदायों के बारे में जब मैंने और जाना, तो मुझे पता चला कि आधिकारिक तौर पर गोंड कहलाने वाला समुदाय,जो भारत का दूसरा सबसे बड़ा आदिवासी समुदाय है, ख़ुद को कोइतुर कहलाना पसंद करता है. इस पत्रिका के लिए लिखे एक लेख में आकाश पोयाम ने बताया था कि 'गोंड' शब्द 'बाहर से थोपा गया नाम' है. गोंडी में कोइतुर शब्द का अर्थ भी 'लोग' ही है. देश के दो सबसे बड़े आदिवासी समुदायों की भाषाओं में यह समानता देख कर मैं हैरान था. और इस बात पर भी कि सदियों से हम दोनों के बीच यह विश्वास बना रहा है कि इस धरती पर सबसे पहले हम ही आए थे.
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