भारतीय क्रिकेट पर बीजेपी का कब्जा

जय शाह भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के सचिव हैं. वह आज भारत के दूसरे सबसे शक्तिशाली व्यक्ति, केंद्रीय गृह मंत्री, अमित शाह के बेटे भी हैं. अमित दवे/रॉयटर्स
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27 October, 2023

{एक}

9 मार्च को बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी के लिए भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच चौथे क्रिकेट टेस्ट मैच से कुछ घंटे पहले, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने ऑस्ट्रेलियाई समकक्ष एंथनी अल्बनीज के साथ अहमदाबाद के नरेन्द्र मोदी स्टेडियम पहुंचे. स्टेडियम में “मोदी, मोदी” के नारे गूंज उठे. दोनों ने एक सुनहरे रथ के आकार की गोल्फ कार्ट में मैदान के चारों ओर हाथ हिलाते हुए एक चक्कर लगाया. वे एक मंच पर बैठे और नृत्य का प्रदर्शन देखा. उन्होंने अपने-अपने कप्तानों को टोपियां भेंट कीं और खिलाड़ियों से हाथ मिलाया, लेकिन केवल अपनी टीमों के.

यह आयोजन सामान्य क्रिकेट मैच के बजाए एक राजनीतिक रैली जैसा था. सिडनी मॉर्निंग हेराल्ड में एक टिप्पणीकार ने कहा, "जैसा कि स्टेडियम के चारों ओर लगे बेशुमार बैनर साफ करते हैं कि इस वक्त राजनीतिक नेता उनके मनोरंजन के लिए जुटे मामूली क्रिकेटरों की तुलना में बहुत बड़ी बात हैं. शायद ऐसा पहली बार हुआ हो कि मोदी और अल्बनीज के लिए मैदान खाली रखने के वास्ते टीमों को वार्म-अप के लिए नेट पर ठूंस दिया गया हो." गुजराती अखबार दिव्य भास्कर ने बताया कि उस दिन के लिए सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने लगभग अस्सी हजार टिकट खरीदे थे.

इस मौके पर क्रिकेट जगत की सबसे अमीर और सबसे शक्तिशाली संस्था, भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड, के सचिव जय शाह मौजूद थे. इस शीर्ष पद पर शाह क्रिकेट को लेकर बेहद जरूरी तजुर्बे या हुनर के चलते नहीं बल्कि भारत के दूसरे सबसे शक्तिशाली व्यक्ति, केंद्रीय गृहमंत्री, अमित शाह के बेटा होने के कारण पहुंचे हैं. आज बीसीसीआई में युवा शाह मोदी, बीजेपी और भारत सरकार के लिए बैटिंग कर रहे हैं. कुछ समय पहले तक वह अपने पिता की छाया में छिपे रहते थे. लेकिन, इस साल वह समारोहों में सबसे आगे और केंद्र में रहे, उन्होंने मोदी को मोदी की तस्वीर भेंट की.

नरेन्द्र मोदी स्टेडियम को पुराने मोटेरा स्टेडियम की जगह पर बनाया गया है, जिसे 2015 में ध्वस्त कर दिया गया था. यह बहुत बड़ा और शानदार है, इसके उत्तरी हिस्से में एक नदी बहती है. यह दुनिया का सबसे बड़ा क्रिकेट स्टेडियम है. हालांकि इसकी क्षमता को लेकर कोई साफ जानकारी नहीं है. स्टेडियम के एक छोर पर लगी गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन के बोर्ड पर इसकी बैठने की क्षमता 110000 लोगों की बताई गई है, जबकि दूसरे बोर्ड पर इसकी बैठने की क्षमता 130000 बताई गई है. लेकिन यह महज एक खेल स्टेडियम नहीं है. यह एक व्यापक राजनीतिक परियोजना का मंच भी है जिसमें सब कुछ तबाह कर मोदी की छवि में फिर से उसका निर्माण किया जाता है.

 

9 मार्च को भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच टेस्ट मैच से कुछ घंटे पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनके ऑस्ट्रेलियाई समकक्ष एंथनी अल्बेनीज़ ने सुनहरे रथ में बैठकर मैदान का चक्कर लगाया. अमित डेव/रॉयटर्स

जब मोदी को गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन (जीसीए) का अध्यक्ष चुना गया, तब अमित शाह उपाध्यक्ष बने. उसी साल, जय शाह को जीसीए से संबद्ध केंद्रीय क्रिकेट बोर्ड अहमदाबाद के कार्यकारी बोर्ड सदस्य के रूप में नियुक्त किया गया था. मोदी उस समय मुख्यमंत्री के रूप में अपना तीसरा कार्यकाल पूरा कर रहे थे. उनके पहले कार्यकाल में 2002 की सांप्रदायिक हिंसा हुई थी जिसमें दो हजार से ज्यादा लोग मारे गए थे. मरने वालों में ज्यादातर मुसलमान थे. अमित शाह तब भी उनके सिपहसालार थे.

बीसीसीआई के एक सीनियर अधिकारी ने मुझे बताया कि जब मोदी जीसीए अध्यक्ष थे तो उन्होंने मोटेरा स्टेडियम पर खर्च किए गए पैसे के बारे में पूछा था. जब उन्हें पता चला कि मैदान का उपयोग लगभग बीस दिनों के क्रिकेट के लिए किया गया था, तो अधिकारी ने याद करते हुए कहा कि इस पर मोदी बोले, "इसका उपयोग अन्य उद्देश्यों और अन्य खेलों के लिए किया जाना चाहिए." मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद 2014 में अमित शाह ने जीसीए का अध्यक्ष पद संभाला. इस समय तक, जय शाह निकाय के संयुक्त सचिव नियुक्त हो गए थे. फरवरी 2020 तक 800 करोड़ रुपए की अनुमानित लागत से स्टेडियम का पुनर्निर्माण किया गया.

नए स्टेडियम में आयोजित पहला कार्यक्रम खेल से संबंधित नहीं था. इसने 24 फरवरी 2020 को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के सम्मान में आयोजित नमस्ते ट्रम्प रैली की मेजबानी की. भारत में कोविड-19 के बढ़ते मामलों के बीच भी रैली में खचाखच भीड़ थी. अगले साल स्टेडियम का नाम मोदी के नाम पर रखा गया. जीसीए के एक पूर्व अधिकारी ने मुझसे कहा, "बुनियादी बात पेशेवर रूप से क्रिकेट करना है. लेकिन अब आप इस तरह के काम कर रहे हैं.” वह मैच से पहले मोदी-अल्बनीज के इस ध्यान भटकाने वाले आयोजन से नाराज थे. उन्होंने कहा, "बीसीसीआई को अब इवेंट आयोजित करने की कोशिश करनी चाहिए , इवेंट मैनेजमेंट कंपनी बनना चाहिए. फिर खिलाड़ी आएंगे और वे मंच पर नाच करेंगे और अंपायर इस पर फैसला करेंगे."

नरेन्द्र मोदी स्टेडियम ने पिछले तीन सालों में भारतीय क्रिकेट में सबसे महत्वपूर्ण मैचों की मेजबानी की है, जिसमें फरवरी और मार्च 2021 में इंग्लैंड के खिलाफ दो टेस्ट और पांच टी 20 शामिल हैं. यह कोविड-19 महामारी शुरू होने के बाद भारत में पहला क्रिकेट दौरा था. इस साल इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के फाइनल की मेजबानी इसी ने की. आईसीसी पुरुष विश्व कप शुरू हो रहा है, जय शाह के नेतृत्व में बीसीसीआई ने यह तय किया है कि सबसे बड़े मैच इसी स्टेडियम में हों. चाहे वह 5 अक्टूबर को उद्घाटन मैच हो या 19 नवंबर को फाइनल मैच. यहां होने वाले मैचों के टिकट भी बहुत महंगे होने वाले हैं, जैसे 14 अक्टूबर को भारत बनाम पाकिस्तान का मैच. विश्व कप के बाद स्टेडियम- जिसे अब सरदार वल्लभभाई पटेल स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स कहा जाता है- के पड़ोसी शहरों अहमदाबाद और गांधीनगर ने 2036 के ग्रीष्मकालीन ओलंपिक के लिए दावेदार होने की उम्मीद जताई है. मोटेरा और नरेन्द्र मोदी स्टेडियम गांधीनगर लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं, जिसका प्रतिनिधित्व वर्तमान में अमित शाह करते हैं.

यह स्टेडियम मोदी-शाह की बहुत बड़ी उपलब्धी है. यह आज भारतीय क्रिकेट के प्रशासन के लिए एक उपयुक्त मिसाल है. ज्यादातर टिप्पणीकारों ने इसकी भव्यता, इसके नीले, नारंगी और पीले रंग, इसके विशाल आउटफील्ड, इसके चार विशाल ड्रेसिंग रूम, हरे रंग की इमारत के रूप में इसकी रेटिंग और आधे घंटे में इसके खाली हो जाने के तरीके पर अचंभा जताया है. जब तक आप गेट नंबर 2 नहीं पा जाते तब तक सब कुछ चमकदार और शानदार है.

गेट नंबर 2 से मेरे दोस्त को स्टेडिम में आन-जाना था. उसके पास इस साल के किसी आईपीएल मैच का 2000 रुपए का टिकट था. गेट से होकर आश्रम रोड से स्टेडियम तक का रास्ता लगभग डेढ़ किलोमीटर लंबा था और बहुत ही संकरा था. लोगों को विशेष जीसीए क्लब हाउस में घूमने से रोकने के लिए इसे एक तरफ हाउसिंग कॉलोनी के नाले और दूसरी तरफ दीवारों और बैरिकेड्स के बीच घेरा गया है. मैच खत्म होने के बाद दोस्त अपने बच्चों को गेट नंबर 2 की ओर ले गए, उन्हें बहुत धीरे-धीरे आगे बढ़ना पड़ा, क्योंकि हर तरफ लोग भरे हुए थे. क्लौस्ट्रफोबिया ने उनके भीतर सिहरन भर दी. "कुछ भी हो सकता था," उन्होंने मुझसे कहा. वह संभावित भगदड़ जैसी स्थिति को लेकर चिंतित थे, खासकर "विश्व कप में, भीड़ के बीच."

इस बीच गेट नं. 1 महंगे स्टैंडों और इसके 76 फैंसी कॉरपोरेट बॉक्सों के लिए स्टेडियम के पवेलियन छोर की ओर एक बड़े रैंप पर एक छोटी, पैदल दूरी पर है. जीसीए का कहना है कि दो रैंप कुछ ही समय में एक लाख से ज्यादा लोगों को स्टेडियम से बाहर निकाल सकते हैं. मेरे दोस्त को उस रात स्टेडियम परिसर से निकलने में लगभग दो घंटे लग गए. उन्होंने कहा, "मैंने फैसला किया कि मैं वहां दोबारा कभी नहीं जाऊंगा."

गेट नं. 1 वह भारतीय क्रिकेट है जिसे आगामी विश्व कप के दौरान टीवी पर दुनिया को दिखाया जाएगा. गेट नं. 2 भारतीय क्रिकेट चकाचौंध मंच के जाल के नीचे की दुनिया है. भ्रष्टाचार में डूबा, अपनी दो सबसे ज्यादा प्रचारित, संरक्षित संपत्तियों- भारतीय पुरुष टीम और आईपीएल- के अलावा बीसीसीआई के पैसे का उचित हिसाब नहीं है. हालांकि सत्ता के शीर्ष से इसका सबसे गहरा संबंध है लेकिन उम्र और लिंग के आधार पर घरेलू खिलाड़ियों के साथ दुर्व्यवहार और शोषण के चलते भीतर से यह खोखला हो गया है. इसका प्रशंसक आधार और विशाल टेलीविजन दर्शक इसे पैैसा और प्रभाव देते हैं लेकिन बीसीसीआई ने औसत प्रशंसक को विश्व क्रिकेट का सबसे खराब दर्शक अनुभव देना जारी रखा है. डेढ़ दशक में अर्जित की गई अपनी संपत्ति के नशे में बीजेपी शासन के साथ अपनी निकटता की नई ताकत के साथ, बीसीसीआई अपनी जड़ों में पड़े तेजाब पर कोई ध्यान नहीं देता है. 

{दो}

अठारहवीं शताब्दी में उपनिवेशवाद के साथ क्रिकेट भारतीय तटों पर पहुंचा. इसके बाद यह एक शहरी, मध्यम वर्ग का खेल बन गया और आज यह बड़े पैमाने पर खेल उद्योग में विकसित हो चुका है. यह खेल व्यापक क्षेत्रीय और वर्ग भेद वाले खिलाड़ियों और दर्शकों को आकर्षित करता है, जो इसे आधुनिक भारत की सबसे गतिशील घटनाओं में से एक बनाता है. ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल के अनुसार, 2018 में लगभग 71.5 करोड़ दर्शकों ने टेलीविजन पर क्रिकेट देखा. वे देश के 76.6 करोड़ खेल-दर्शकों का नब्बे-तीन प्रतिशत थे. क्रिकेट के लिए यह टेलीविजन दर्शक जो अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट परिषद के अन्य सभी पूर्ण सदस्यों की कुल आबादी से ज्यादा और संयुक्त राज्य अमेरिका की जनसंख्या से दोगुना है, बीसीसीआई की वित्तीय ताकत के पीछे प्रेरक शक्ति है.

शिलांग में एक क्रिकेट मैदान पर मैच देखते दर्शक. अठारहवीं शताब्दी में उपनिवेशवाद के साथ भारतीय तटों पर क्रिकेट का आगमन हुआ. पॉपरफोटो / गेटी इमेजिस

1983 विश्व कप में भारत की चमत्कारिक जीत के बाद, क्रिकेट की विकास कहानी उदारीकरण के समानांतर चली. इसने साल भर के लॉन्च और री-लॉन्च वाहन के रूप में सैटेलाइट टेलीविजन का उपयोग करते हुए आकांक्षा, सपने और कोला बेचा. 1990 के दशक के दौरान लाइव टेलीविजन ने इस खेल को भारत के विशाल भीतरी इलाकों में पहुंचा दिया, इसके प्रमुख क्रिकेटर छोटे कस्बों और शहरों से उभर कर सामने आए, जिनका नेतृत्व उस युग के चमत्कारिक खिलाड़ी, मुंबई के सचिन तेंदुलकर ने किया.

तेंदुलकर उन दो आधुनिक भारतीय एथलीटों में से पहले थे जिन्होंने अपने हेलमेट पर तिरंगा पहनकर अपनी भारतीयता का खुल कर प्रदर्शन किया. टेनिस स्टार लिएंडर पेस दूसरे थे. खेल के महानतम बल्लेबाजों में से एक के रूप में सचिन की स्थिति ने भारतीय क्रिकेट और उसके प्रशंसकों के आसपास एक नई तरह की शब्दावली को जन्म दिया. यह एक प्रफुल्लित, उत्साहित राष्ट्रवाद था, न कि अत्यधिक आक्रामक या टकरावपूर्ण, जैसा कि हम आज जानते हैं. यह किसी राष्ट्रीय टीम की मैदानी सफलता की परवाह किए बिना उनका समर्थन कर सकता है. तेजी से वैश्वीकृत हो रही दुनिया में, बॉलीवुड की तरह क्रिकेट को भी भारत की राष्ट्रीय पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया.

आईपीएल की शुरूआत ने भारतीय क्रिकेट की वित्तीय स्थिति को सबसे जोरदार चर्चा का केंद्र बना दिया. पिछले पंद्रह सालों में, भारतीय क्रिकेट प्रशंसकों की निष्ठा और उत्साह को टेलीविज़न विज्ञापन, मार्केटिंग और कमेंटरी में साफ तौर पर अंधराष्ट्रवाद की एक मजबूत खुराक से पोषित किया गया है. इन सबको बोर्डरूम में मोटे बटुए का समर्थन हासिल है. 2021-22 तक बीसीसीआई की कुल संपत्ति 23159 करोड़ रुपए थी.

हालांकि संख्याओं की जांच से बहुत कुछ पता नहीं चलता है. जनता का बहुत ज्यादा ध्यान करोड़ों डॉलर के अधिकारों और प्रायोजन सौदों, या स्टार खिलाड़ियों को वेतन के रूप में दिए जाने वाले करोड़ों रुपए पर दिया जाता है. बीसीसीआई के 1041 पंजीकृत घरेलू खिलाड़ियों में से लगभग नब्बे प्रतिशत आईपीएल में नहीं खेलते हैं. उनमें से अधिकांश तदर्थ वेतन पर हैं, जिनका प्रदर्शन या बीसीसीआई के राजस्व में हिस्सेदारी से कोई लेना-देना नहीं है. 38 राज्य संघ बीसीसीआई की कमाई का सत्तर प्रतिशत हिस्सा हड़प लेते हैं और इसे कैसे और कब वितरित किया जाना है, इस पर उनके पास अनियंत्रित शक्तियां हैं.

महिला, जिला और जूनियर क्रिकेट में, नकद या यौन संबंधों के बदले में चयन एक जानी-मानी बात है. किसी नाबालिग द्वारा किसी क्रिकेट अधिकारी के खिलाफ यौन उत्पीड़न के मामले पर उपदेशों के अलावा शीर्ष स्तर पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता है. यह स्पष्ट रूप से व्यापार प्रतिबंध का उल्लंघन है, गैर-अनुबंधित पुरुष खिलाड़ियों को अन्य विदेशी फ्रेंचाइजी लीगों में प्रतिस्पर्धा करने की अनुमति नहीं है. अब, बीसीसीआई इस बात पर भी विचार कर रहा है कि उसके पुरुष खिलाड़ी सेवानिवृत्ति के बाद कुछ सालों के लिए "शांत हो जाएं" और फिर उन्हें किसी अन्य फ्रेंचाइजी लीग में खेलने के लिए अनापत्ति प्रमाण पत्र दिया जाए, जिनकी संख्या हर साल बढ़ रही है. अपने संचालन को पेशेवर बनाने की दिशा में आगे बढ़ने के बजाए, बीसीसीआई निरंकुशता और बंदरबांट कर रहा है.

हालांकि बीसीसीआई को अपनी संपत्ति पर बहुत गुमान है, इसे अंतर-पार्टी राजनीतिक संबंधों से भी लाभ हुआ है. संगठन में आम तौर पर पक्ष-विपक्ष दोनों के राजनेता शामिल होते हैं. हालांकि, अब जो चल रहा है वह कुछ अलग है. जो पहले से ही एकाधिकारवादी था, एक कुलीन वर्ग ने उस कार्टेल पर कब्जा कर लिया है. हम पहली बार बीसीसीआई में राजनेताओं की नहीं बल्कि एक ही राजनीतिक दल की नरम शक्ति को धीरे-धीरे मजबूत होते देख रहे हैं.

भारतीय खिलाड़ी 1983 विश्व कप में लॉर्ड्स में वेस्टइंडीज के खिलाफ अपनी चमत्कारिक जीत का जश्न मनाते हुए. एड्रियन मुरेल / ऑलस्पोर्ट यूके / गैटी इमेजिस

अतीत में, बीसीसीआई सरकारी पहुंच या हस्तक्षेप को दूर रखने की कोशिश पर गर्व करता था. क्रिकेट प्रशासक अमृत माथुर ने अपनी हाल ही में रिलीज हुई किताब “पिचसाइड” में भारत-पाकिस्तान क्रिकेट की एक दिलचस्प कहानी बताई है. 2004 के ऐतिहासिक दौरे पर भारतीय टीम के पाकिस्तान रवाना होने से एक दिन पहले, माथुर ने तत्कालीन बीसीसीआई अध्यक्ष जगमोहन डालमिया को केंद्र सरकार के एक "बहुत वरिष्ठ" मंत्री के साथ एक संक्षिप्त बातचीत को सुना. माथुर लिखते हैं, ''मंत्री चाहते थे कि बीसीसीआई सुरक्षा चिंताओं का हवाला देते हुए दौरा रद्द कर दे.'' माथुर ने डालमिया का "साफ, मजबूत" जवाब सुना. डालमिया ने कहा , ''मैं बीसीसीआई का अध्यक्ष हूं और बीसीसीआई चाहता है कि क्रिकेट आगे बढ़े. आप सरकार हैं. अगर आप दौरा नहीं चाहते हैं, तो कृपया आगे बढ़ें और इसे रद्द करने का आदेश दें.'' यह भारतीय क्रिकेट को राज्य से अलग करने का एक उदाहरण था.

एक अनुभवी क्रिकेट प्रशासक ने मुझे बताया, "राजनेता चाहे कोई भी हो, खेल के सीधे प्रशासन में उनकी कोई भागीदारी नहीं थी. उन्होंने कभी भी माहौल का राजनीतिकरण नहीं किया, वे कभी भी किसी राजनीतिक संगठन को प्रशासन में नहीं लाए- यह सभी पक्षों, सभी पार्टियों के बीच है. उन्होंने कभी भी किसी संस्था के कामकाज में अपनी राजनीतिक पृष्ठभूमि सामने नहीं रखी.”

इस सहस्राब्दी में बीसीसीआई की वित्तीय शक्ति और सांस्कृतिक पहुंच का मतलब केवल यह है कि बीजेपी, पिछले चार दशकों के सबसे बड़े चुनावी जनादेश और लगभग हर संस्था पर अपने सरकारी नियंत्रण के साथ, इस पर दावा करना चाहेगी. भारतीय फुटबॉल, बैडमिंटन, कुश्ती और टेनिस के प्रभारी और भारतीय ओलंपिक संघ के शीर्ष पर बीजेपी के दिग्गज हैं, लेकिन यह क्रिकेट ही है जो इसे अपना बड़ा, बॉलीवुड से भी बड़ा, अखिल भारतीय पॉप-सांस्कृतिक मंच देता है.

बीसीसीआई एक अत्यधिक केंद्रीकृत, चुनौती रहित प्रशासनिक ढांचे के तहत काम करता है, जिसकी शक्ति शीर्ष पर निहित है. यह अपने आप में असामान्य नहीं है. यह अतीत के शक्तिशाली बीसीसीआई अधिकारियों के लिए भी एक सतत विशेषता रही है. लेकिन आज इसमें दो प्रमुख अंतर हैं. ज्यादातर मामलों में, बीसीसीआई के पिछले नेताओं के पास संपत्ति तक उस तरह की निर्विवाद पहुंच नहीं थी जैसी आज बोर्ड के पास है. और, आईपीएल युग में, जो लोग ऐसा करते थे वे सरकार के नियंत्रण में नहीं थे. जय शाह इन दोनों में फिट आने वाले एकमात्र व्यक्ति हैं.

शाह के पास भारतीय खेल की एकमात्र सोने का अंडा देने वाली मुर्गी का पूरा प्रभार है- वित्तीय रूप से स्वतंत्र और जाहिरा तौर पर स्टेडियम बनाने के लिए विदेश यात्रा और सस्ती जमीन के लिए सरकार की मंजूरी के अलावा कुछ भी नहीं चाहिए. इसका मतलब है कि बीसीसीआई खुद को नियामक जांच और यहां तक कि खेल कानून से भी बाहर रखता है और उसे "राष्ट्रीय खेल महासंघों" की सूची में नहीं गिना जाता है, जिन्हें खेल मंत्रालय द्वारा वार्षिक सरकारी मान्यता की आवश्यकता होती है. यह वित्तीय सहायता और क्रिकेट का जनाधार ही है जो बीसीसीआई को खुद को सर्वश्रेष्ठ संचालित भारतीय खेल संगठन के रूप में बनाए रखने की अनुमति देता है - जो मूल रूप से एक शून्य-प्रतिस्पर्धा दौड़ है, जिसमें देश में इसके प्रशासन मानकों को मापने के लिए कुछ भी नहीं है.

बीसीसीआई की स्थापना 1929 में हुई थी- यह स्वतंत्र भारत से भी पुराना है. यह संगठन महाराजाओं, व्यापारियों, राजनेताओं और नौकरशाहों द्वारा चलाया जाता रहा. सभी क्रिकेट के मैदान के बाहर प्रतिस्पर्धा करते और फिर भी बोर्ड के हितों की रक्षा के लिए, एक सामान्य उद्देश्य के लिए एकजुट हुए. बोर्ड भारत में क्रिकेट से जुड़ी सभी चीजों को नियंत्रित करता है, अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मंच पर देश का प्रतिनिधित्व करने वाली चार टीमों की देखरेख करता है: सीनियर और अंडर-19 पुरुष और महिला राष्ट्रीय टीमें. एक संचालक प्रणाली बतौर इसकी ताकत ही है कि पिछले तीन दशकों में देश भर में फैले पचास से अधिक स्थानों पर आयु समूहों में हर साल पंद्रह सौ से अधिक मैचों का आयोजन करने में अपनी क्षमताओं और संसाधनों का विस्तार करने की क्षमता है.

जब 1990 के दशक और शुरुआती दौर में बीसीसीआई के प्रमुख अधिकारियों-कोलकाता के व्यवसायी जगमोहन डालमिया और चंडीगढ़ के नौकरशाह इंद्रजीत सिंह बिंद्रा ने प्रमुख प्रस्तावकों के रूप में भारतीय क्रिकेट प्रशंसकों को टेलीविजन अधिकार मूल्य में भुनाने का रास्ता खोजा, तो सब कुछ बदल गया. बीसीसीआइ सुप्तावस्था से उठकर आपस में जोड़ने वाली एक क्षेत्रीय ताकत और अब, पिछले दशक में, एक वैश्विक हेकड़ीबाज ताकत बन गई है.

 

सचिन तेंदुलकर पहले आधुनिक एथलीटों में से एक थे, जिन्होंने अपने हेलमेट पर तिरंगा पहन कर अपनी भारतीयता प्रदर्शित की थी. दिब्यांगशु सरकार /एएफपी/गैटी इमेजिस

1990 के दशक के मध्य से 2008 तक बीसीसीआई ने अपना अधिकांश राजस्व टेलीविजन, मल्टीमीडिया और हाल ही में पुरुष टीम के लिए डिजिटल अधिकारों की बिक्री के माध्यम से अर्जित किया. 2006 में, निंबस ने भारतीय टीम के मैचों के स्थलीय, ब्रॉडबैंड और इंटरनेट अधिकारों के लिए 61.2 करोड़ डॉलर का भुगतान किया, जिसमें चार वर्षों में 22 टेस्ट और 55 एक दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय मैच शामिल थे.

2008 में आईपीएल के आगमन ने बीसीसीआई के लिए मीडिया-अधिकार वार्ता के परिदृश्य को मौलिक रूप से बदल दिया. आईपीएल को आज इक्कीसवीं सदी में क्रिकेट की सबसे बड़ी विघटनकारी घटना के रूप में स्वीकार किया जाता है, जिसने न केवल भारतीय क्रिकेट बल्कि वैश्विक क्रिकेट अर्थव्यवस्था और खेल की प्रकृति को बदल दिया है. 2005 से 2010 तक बीसीसीआई के उपाध्यक्ष रहे ललित मोदी, यूएस सिटी फ्रेंचाइजी लीग से प्रेरित होकर इस लीग के पीछे प्रेरक शक्ति थे.

पहली बार, बीसीसीआई ने घरेलू टी20 क्लब प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए आठ शहरी फ्रेंचाइजी टीमों को बिक्री के लिए पेश किया - जो कि बीसीसीआई की प्रतियोगिता संरचनाओं और इसकी घरेलू टीमों से स्वतंत्र थीं. प्रत्येक फ्रैंचाइज़ी को मीडिया-अधिकार शुल्क का एक हिस्सा प्राप्त होना था और इसका उपयोग भारतीय और अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेटरों और सहायक कर्मचारियों के मिश्रण के साथ अपनी टीमों को चुनने और चलाने के लिए किया जाना था. लीग को अप्रैल में भारतीय घरेलू सत्र के अंत में घरेलू और बाहरी आधार पर छह सप्ताह तक आयोजित किया जाना था.

आठ फ्रेंचाइजी को बॉलीवुड सितारों, भारतीय व्यापारिक घरानों और पहले कम ज्ञात कंसोर्टियम के मिश्रण से 11.16 करोड़ डॉलर (रिलायंस इंडस्ट्रीज के स्वामित्व वाली मुंबई इंडियंस) और 7.6 करोड़ डॉलर (राजस्थान रॉयल्स, इमर्जिंग मीडिया के नेतृत्व वाले कंसोर्टियम द्वारा) के बीच खरीदा गया था. लीग के कार्यकारी प्रमुख के रूप में ललित मोदी ने अमेरिकी प्रथा को ध्यान में रखते हुए खुद को आईपीएल आयुक्त नियुक्त किया.

प्रत्येक टीम की वेतन सीमा 5 मिलियन डॉलर (उस समय 20 करोड़ रुपए) थी, जिससे उन्हें क्रिकेटरों की अपनी तरह की पहली नीलामी के माध्यम से अपनी टीम चुननी थी. एमएस धोनी 1.5 मिलियन डॉलर की बोली के साथ नीलामी के जरिए पहले आईपीएल करोड़पति बन गए. 2010 में, आईपीएल नीलामी में शामिल 11 पाकिस्तानी क्रिकेटरों के लिए बोली नहीं लगाई गई थी और तब से वे आईपीएल या बीसीसीआई की ओर से कोई स्पष्टीकरण दिए बिना, आईपीएल नीलामी से गायब हो गए हैं.

नीलामी की सीमा 2010 में बढ़ा कर 7 मिलियन डॉलर प्रति टीम कर दी गई, जो 2014 में 60 करोड़ रुपए हो गई. दिसंबर 2022 में आखिरी नीलामी में यह प्रति टीम 95 करोड़ रुपए थी. पिछले 15 सत्र में, क्रिकेट के ये छह सप्ताह दुनिया में किसी भी खिलाड़ी के लिए सबसे आकर्षक कार्यक्रम बन गए हैं. इंग्लैंड के सैम कुरेन एक सीजन में 2.25 मिलियन डॉलर (18.5 करोड़ रुपए) कमाते हैं, जबकि सबसे ज्यादा कमाई करने वाले भारतीय खिलाड़ी केएल राहुल हैं, जो 2.2 मिलियन डॉलर (17 करोड़ रुपए) कमाते हैं. भारत में अब हर युवा पुरुष क्रिकेटर की प्राथमिकता अपनी राज्य टीम या यहां तक कि भारतीय टीम के लिए नहीं बल्कि आईपीएल अनुबंध के लिए काम करना है. दिसंबर 2022 की नीलामी में सबसे ज्यादा भुगतान पाने वाले "अनकैप्ड" भारतीय खिलाड़ी - एक ऐसा खिलाड़ी जिसने अभी तक अपने देश का प्रतिनिधित्व नहीं किया है - उत्तर प्रदेश के तेज गेंदबाज शिवम मावी थे जिन्होंने 6 करोड़ रुपए कमाए. 

चेन्नई सुपर किंग्स ने मई 2023 में इंडियन प्रीमियर लीग का फाइनल जीता. आईपीएल को आज इक्कीसवीं सदी में क्रिकेट की सबसे बड़ी विघटनकारी घटना के रूप में व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है, जिसने न केवल भारतीय क्रिकेट बल्कि वैश्विक क्रिकेट अर्थव्यवस्था और खेल की प्रकृति को बदल दिया. जुमा प्रेस/अलामी फोटो

दो नई आईपीएल फ्रेंचाइजी, अहमदाबाद और लखनऊ 2022 में प्रतियोगिता में शामिल हुईं. कुल $1.6 बिलियन (12,200 करोड़ रुपए) में यह बेची गईं थी. दोनों टीमों के लिए तीसरी सबसे बड़ी बोली अदानी समूह की ओर से 5,100 करोड़ रुपए की आई. अहमदाबाद की बोली निजी इक्विटी फर्म सीवीसी कैपिटल पार्टनर्स के पास गई. बीसीसीआई ने तुरंत अपना आशय पत्र लखनऊ फ्रेंचाइजी के विजेता, संजीव  गोयनका के नेतृत्व वाले आरजीएसपी ग्रुप को सौंप दिया, लेकिन सट्टेबाजी कंपनियों के साथ उसके संबंधों की जांच के बाद सीवीसी को मंजूरी मिलने में चार महीने लग गए.

अमेरिकी फ्रेंचाइजी लीग और आईपीएल के बीच महत्वपूर्ण अंतर यह है कि, संयुक्त राज्य अमेरिका में, यह फ्रेंचाइजी है, न कि खेल की राष्ट्रीय शासी निकाय, जो लीग का मालिक है, जबकि आईपीएल में, बीसीसीआई ने किसी भी प्रकार से लीग का नियंत्रण फ्रेंचाइजी मालिकों के पूर्ण वित्तीय या प्रबंधन में नहीं छोड़ा है. अपने कोलकाता कार्यालय में कुछ सीज़न में एक अनौपचारिक बातचीत में, डालमिया ने मुझे बताया कि वह आईपीएल का विरोध कर रहे थे क्योंकि यह बीसीसीआई के "कॉर्पोरेट अधिग्रहण" को चिह्नित करना था. ऐसा होना अभी बाकी है.

आईपीएल के निर्माण और क्रियान्वयन के अलावा - जिसके लिए ललित मोदी श्रेय लेते हैं और इसके हकदार भी हैं - भारतीय क्रिकेट में पैसा लाने के लिए बहुत कम मार्केटिंग प्रतिभा की जरूरत है. 2017 में, स्टार इंडिया ने पांच साल की अवधि के लिए आईपीएल के टेलीविजन और डिजिटल अधिकारों के लिए 2.55 बिलियन डॉलर का भुगतान किया. 2022 में, बीसीसीआई ने आईपीएल के टेलीविजन और डिजिटल मीडिया अधिकारों को 2023 से 2027 तक Viacom18 और डिज्नी स्टार को बेचकर 6.2 बिलियन डॉलर जुटाए. इस साल, Viacom18 ने 2028 तक प्रति खेल 67.8 करोड़ रुपए पर सभी बीसीसीआई मैचों के लिए टेलीविजन और डिजिटल दोनों अधिकार हासिल कर लिए.

बीसीसीआई ने इस तरह के नंबरों को एक हथियार और एक ढाल के रूप में इस्तेमाल किया है- वैश्विक खेल के माध्यम से अपना रास्ता बनाने के लिए एक हथियार और घर पर खेल कैसे चलाया जा रहा है, इस बारे में पूछे जाने वाले किसी भी सवाल को टालने के लिए एक ढाल. लेकिन आईपीएल की कमाई को भारतीय क्रिकेट की ज्यादातर आय के वित्तीय स्वास्थ्य के साथ जोड़ना गलत और अज्ञानतापूर्ण है, क्योंकि बीसीसीआई की संपत्ति का विशाल प्रतिशत उसके राज्य संघों के हाथों में होने के बाद भी अप्राप्य है, इसका अधिकांश हिस्सा बिना ऑडिट के है. संगठन ने तर्क दिया है कि, क्योंकि यह एक निजी सोसायटी है और सरकारी धन का उपयोग नहीं करती है, इसलिए इसे अकेला छोड़ दिया जाना चाहिए और सूचना के अधिकार अधिनियम से छूट दी जानी चाहिए.

मैंने दिल्ली के पूर्व पुलिस आयुक्त नीरज कुमार, जो कभी बीसीसीआई की भ्रष्टाचार-निरोधी इकाई का नेतृत्व करते थे, से पूछा कि कानून-प्रवर्तन के दृष्टिकोण से बीसीसीआई के आसपास की स्थिति उनके लिए कैसी दिखती है. कुमार ने कहा, "यह संगठित सफेदपोश अपराध है. पैसा किस तरह वितरित किया जाता है, चुप्पी की साजिश, पारदर्शिता की कमी है." कुमार का संस्मरण ए कॉप इन क्रिकेट इस बात का तीखा आरोप है कि अवैध सट्टेबाजी और स्पॉट फिक्सिंग के अलावा क्रिकेट में भ्रष्टाचार का क्या मतलब है. उनके अनुसार स्थिति यह है, "सब मौज करो, कोई बोलो मत.” जब हम खुले तौर पर कहते हैं कि हमने आईपीएल से मीडिया अधिकारों के रूप में 4000 करोड़ रुपए कमाए हैं, तो जनता को यह जानने का अधिकार है कि पैसा कहां और कैसे खर्च किया जा रहा है.

2013 में बीसीसीआई एक बड़े भ्रष्टाचार घोटाले की चपेट में आ गया था, जब दिल्ली पुलिस ने एक आईपीएल मैच में खेल को पहले से निर्धारित करने के लिए सट्टेबाजों के साथ मिलीभगत करने के आरोप में तीन क्रिकेटरों को गिरफ्तार किया था. मामले में बीसीसीआई की प्रारंभिक अनुशासनात्मक समिति के निष्कर्षों को बॉम्बे हाई कोर्ट द्वारा "अवैध" माना गया था और बीसीसीआई - जिसके उस समय अध्यक्ष, एन श्रीनिवासन, सफल आईपीएल टीम चेन्नई सुपर किंग्स के भी मालिक थे- ने बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ लड़ने का विकल्प चुना था. लंबी कानूनी लड़ाई के चलते सुप्रीम कोर्ट को दो समितियां गठित करनी पड़ीं. पहला, पूर्व उच्च न्यायालय न्यायाधीश मुकुल मुद्गल के नेतृत्व में विशिष्ट आईपीएल भ्रष्टाचार घोटाले को देखने और उपाय सुझाने के लिए कहा गया था. दूसरे, भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश आरएम लोढ़ा के अधीन, बीसीसीआई के कामकाज की जांच करने और इसके प्रशासन में सुधार उपायों की सिफारिश करने का काम सौंपा गया था.

2013 में, बीसीसीआई एक बड़े भ्रष्टाचार घोटाले की चपेट में आ गया था, जब दिल्ली पुलिस ने एक आईपीएल मैच को पहले से निर्धारित करने के लिए सट्टेबाजों के साथ कथित तौर पर मिलीभगत करने के आरोप में तीन क्रिकेटरों को गिरफ्तार किया था. एसटीआर / एएफपी / गैटी इमेजिस

लोढ़ा समिति की सिफारिशों ने बीसीसीआई के संविधान को बदल दिया. इसमें बोर्ड के निर्वाचक मंडल को बदलने, हितों के टकराव के मुद्दों को संबोधित करने, दिन-प्रतिदिन के प्रबंधन को पेशेवर बनाने और इसे मानद पदाधिकारियों से अलग करने, उन पर उम्र और कार्यकाल प्रतिबंध लगाने की मांग की गई. इससे दो महीने पहले बीजेपी सांसद अनुराग ठाकुर को शशांक मनोहर की जगह लेते हुए बीसीसीआई अध्यक्ष चुना गया था. इसके बाद के महीनों में बीसीसीआई और सुप्रीम कोर्ट के बीच खींचतान तेज हो गई. बीसीसीआई ने अपनी आपत्तियों को आयु प्रतिबंधों पर केंद्रित किया, जिसका मतलब था कि कई राज्य अधिकारी अपने पद खो देने वाले थे, साथ ही तीन कार्यकाल तक के कार्यकाल की सीमा भी लागू होनी थी. सितंबर 2016 की अपनी वार्षिक आम बैठक में, बीसीसीआई ने लोढ़ा सिफारिशों की अवहेलना की और विभिन्न टीमों में खिलाड़ियों के चयन के लिए तीन के बजाय पांच सदस्यीय पैनल को चुना. अक्टूबर तक, बीसीसीआई "व्यावहारिक कठिनाइयों" का हवाला देते हुए सुधारों को लागू करने की समय सीमा से चूक गया था. सुप्रीम कोर्ट ने आदेशों को लागू करने तक बीसीसीआई को फंड बांटने से रोक दिया.

आखिरकार जनवरी 2017 में, अदालत ने सुधारों को लागू करने से इनकार करने के लिए ठाकुर और बीसीसीआई सचिव, अजय शिर्के को बर्खास्त कर दिया और उनके स्थान पर उस भूमिका को निभाने के लिए प्रशासकों की चार सदस्यीय समिति का गठन किया. लोढ़ा की सिफारिशों को लागू करने के उद्देश्य से सीओए ने 33 महीनों तक बीसीसीआई की कमान संभाली. ठाकुर वर्तमान में केंद्रीय खेल और युवा मामले, साथ ही सूचना और प्रसारण मंत्री हैं.

लोढ़ा सुधारों के खिलाफ हर तरफ से विरोध जारी रहा, ठाकुर ने अपने पुराने प्रतिद्वंद्वी श्रीनिवासन से हाथ मिला लिया और बीजेपी ने अदालतों से बोर्ड का नियंत्रण वापस हासिल करने के लिए पार्टी की ताकत और कानूनी ताकत का इस्तेमाल किया. इस हाथापाई से भारत के पूर्व कप्तान सौरव गांगुली और जय शाह जैसे युवा चेहरे उभर कर सामने आए. गांगुली एक बेहद लोकप्रिय क्रिकेट हस्ती थे और बंगाल क्रिकेट एसोसिएशन के सचिव थे, जबकि शाह जीसीए के सचिव थे.

बीसीसीआई की 2019 की वार्षिक आम बैठक में बीजेपी ने असम के भावी मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के साथ, बोर्ड के सचिव के पद पर शाह की पदोन्नति का समर्थन किया. सरमा असम क्रिकेट एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष रह चुके थे. सरमा ने मुंबई के ट्राइडेंट होटल में डेरा डाला और अपनी टीम जुटाई. श्रीनिवासन ने पूर्व भारतीय क्रिकेटर और कर्नाटक राज्य क्रिकेट एसोसिएशन में लंबे समय तक प्रमुख रहे ब्रिजेश पटेल को अध्यक्ष पद के उम्मीदवार के रूप में प्रस्तावित किया, जबकि गांगुली को उपाध्यक्ष और आईपीएल गवर्निंग काउंसिल के प्रमुख के पद की पेशकश की. गांगुली ने इनकार कर दिया और अपने कमरे में चले गए. वह जानते थे कि उनके रास्ते में कई रोडे आएंगें. पश्चिम बंगाल में 2021 के विधानसभा चुनाव से पहले गांगुली को अपने पाले में लाने की कोशिश कर रहे बीजेपी के वफादारों के दबाव ने समझौते पर मुहर लगा दी.

 

कार्यकाल के बारे में लोढ़ा समिति की सिफारिश के अनुसार, शाह और गांगुली, जो पहले ही अपने राज्य संघों में दो कार्यकाल पूरा कर चुके थे, बीसीसीआई में पद संभालने के लिए अयोग्य थे. फ्रांसिस मैस्करेनहास /रॉयटर्स

कार्यकाल के बारे में लोढ़ा समिति की सिफारिश के अनुसार, शाह और गांगुली, जो पहले ही अपने राज्य संघों में दो कार्यकाल पूरा कर चुके थे, पद संभालने के लिए अयोग्य थे. लेकिन नए नियमों की खुलेआम अनदेखी की गई और पुराना आदेश कायम रहा. बीसीसीआई ने अप्रैल 2020 में एक याचिका दायर की, जिसमें सुप्रीम कोर्ट से बोर्ड के संविधान में संशोधन की अनुमति देने का अनुरोध किया गया और उस सुनवाई में बार-बार देरी से उन्हें कार्यालय में बने रहने का समय मिल गया. सितंबर 2022 में जब सुप्रीम कोर्ट ने बोर्ड अधिकारियों के कार्यकाल बढ़ाने के अपने आदेश को दोबारा लिखा, तब तक गांगुली जा चुके थे और सभी कार्यकारी पद हटा दिए गए थे, साथ ही शाह बीसीसीआई के एकमात्र बॉस बन गए थे. हेमांग अमीन, जिन्होंने आईपीएल के मुख्य परिचालन अधिकारी के रूप में अपना बीसीसीआई कार्यकाल शुरू किया था, पिछले तीन सालों से बीसीसीआई में चेहराहीन, आवाजहीन कार्यकारी सीईओ रहे हैं.

बीसीसीआई के नए संविधान में कहा गया है कि बोर्ड की शीर्ष परिषद "मुख्य रूप से बीसीसीआई के मामलों के संचालन के लिए जिम्मेदार है" और "उसके पास सामान्य निकाय की सभी शक्तियां हैं." शीर्ष परिषद पांच पदाधिकारियों से बनी होती है, पदाधिकारियों द्वारा चुना गया एक अतिरिक्त पार्षद, क्रिकेटर संघ द्वारा चुने गए दो खिलाड़ी प्रतिनिधि (एक पुरुष, एक महिला) और नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक के कार्यालय से एक प्रतिनिधि. बीसीसीआई ने लोढ़ा के सुधारों में से कुछ को चुनने का फैसला किया है और सभी शक्तियां शीर्ष परिषद को दे दी हैं, जिसके पदाधिकारी-या, कहें सबसे शक्तिशाली पदाधिकारी- सर्वेसर्वा होगा. बीसीसीआई के दैनिक प्रबंधन को इसके प्रशासन से- पेशेवरों को पदाधिकारियों से- अलग करने की लोढ़ा सुधार की मंशा को बड़े जतन से किनारे कर दिया गया है.

गांगुली की जगह पूर्व विश्व कप विजेता रोजर बिन्नी अध्यक्ष बने. गांगुली की तुलना में कहीं अधिक मिलनसार व्यक्तित्व वाले बिन्नी परिदृश्य से गायब हो गए, जिससे शाह को ज्यादा तवज्जो मिली. अन्य तीन पदाधिकारियों में से दो बीजेपी के वफादार हैं. कोषाध्यक्ष, आशीष शेलार मुंबई से बीजेपी विधायक हैं, जबकि संयुक्त सचिव असम के महाधिवक्ता और असम क्रिकेट एसोसिएशन के पूर्व सचिव, देवजीत सैकिया को हिमंत बिस्वा सरमा का करीबी माना जाता है.

इसमें सबसे अजीब व्यक्ति कांग्रेस के राज्यसभा सांसद राजीव शुक्ला हैं, जो बीसीसीआई के उपाध्यक्ष हैं. बिन्नी की विश्व कप विजेता टीम के साथी और पूर्व चयनकर्ता कीर्ति आज़ाद, जो एक सांसद और अब तृणमूल कांग्रेस के राजनेता भी हैं, ने इस सौहार्द के लिए सफाई दी है. आज़ाद ने मुझसे कहा, "ठीक है, मुझे लगता है कि वे भ्रष्टाचार में एकजुट हैं." उनके लिए शुक्ला पुराने बीसीसीआई का प्रतिबिंब हैं, जहां राजनीतिक मतभेद कोई मायने नहीं रखते थे. उन्होंने कहा, ''वे अब भी साथ हैं. राजीव शुक्ला को देखो. वह टमाटर है, सब्जी में भी है सलाद में भी है.” आजाद ने कहा, "मैं उस आदमी की टमाटर होने के लिए सराहना करता हूं. वहां कोई भी सरकार हो, कोई भी अध्यक्ष हो, वह हमेशा वहां रहते हैं."

अगर इस बात का कोई सबूत चाहिए था कि बीजेपी और सत्ताधारी सरकार ने भारतीय क्रिकेट पर मजबूत पकड़ बना रखी है तो वह बिन्नी से मिलना चाहिए था. जब उनके विश्व कप विजेता साथियों ने यौन उत्पीड़न के मामले में भारतीय कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष और सांसद बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे पहलवानों के समर्थन में एक बयान जारी किया, तो बिन्नी ने खुद को दूर कर लिया. उन्होंने पीटीआई-भाषा से कहा कि उन्होंने बयान पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं क्योंकि ''मेरा मानना है कि सक्षम अधिकारी इस मुद्दे को सुलझाने के लिए काम कर रहे हैं. एक पूर्व क्रिकेटर के तौर पर मेरा मानना है कि खेल को राजनीति के साथ नहीं जोड़ा जाना चाहिए.'' 

{तीन}

विश्व टेस्ट चैंपियनशिप फाइनल में, जय शाह को आईसीसी आतिथ्य क्षेत्र के प्रवेश द्वार पर रोक दिया गया था. उनके पास कोई पहचान-पत्र नहीं था और प्रायोजकों की परिचारिकाओं ने उसे नहीं पहचाना. इससे पहले कि स्थिति "क्या आप जानते हैं मैं कौन हूं" तक पहुंचती, आईसीसी के एक कर्मचारी ने शाह को देखा और तुरंत उन्हें उनकी सीट तक पहुंचा दिया. घटनास्थल पर मौजूद लोगों ने भारतीय क्रिकेट के अच्छे और महान खिलाड़ियों को आपस में भिड़ते और हाथापाई करते देखा - उनमें पूर्व क्रिकेटर, प्रायोजक, मीडिया के लोग और अन्य क्रिकेट अधिकारी शामिल थे.

अक्टूबर 2022 में शुरू होने वाले बीसीसीआई सचिव के रूप में शाह के दूसरे कार्यकाल में मीडिया-अधिकार सौदों, वेतन वृद्धि और भारतीय महिला क्रिकेट को बढ़ावा देने के बारे में कई भव्य घोषणाएं की गईं. बहुत सी गलतियां भी हुई हैं, लेकिन इनमें से ज्यादातर को जतन से नजरअंदाज कर दिया गया है. हालांकि, क्रिकेट विश्व कप के उद्घाटन मैच से ठीक सौ दिन पहले तक मैच कार्यक्रम जारी नहीं होने से उनकी प्रशासनिक क्षमताएं वैश्विक सुर्खियों में आ गईं. विश्व कप का कार्यक्रम आमतौर पर एक साल पहले तय किया जाता है. घोषणा करने के एक महीने बाद, पुनर्निर्धारण करने के लिए बीसीसीआई प्रशासन ने इसका तीखा विरोध किया.

मीडिया में आई बातों ने जनता को बताया किया कि भारत-पाकिस्तान मैच की तारीखों को बदलना पड़ा. ये मैच पहले 15 अक्टूबर को निर्धारित था. इसके चलते बाकी आयोजन पर व्यापक असर हुआ. रिपोर्टों के अनुसार मैच को टालना इसलिए पड़ा क्योंकि मैच का दिन नवरात्रि से टकरा रहा था. बाद में शाह को इसे खारिज करना पड़ा. इसके बजाय, उन्होंने दावा किया कि दो या तीन सदस्य देश तारीखों से सहमत नहीं थे. किसी भी पत्रकार ने शाह से यह नहीं पूछा कि जो सदस्य अब आपत्ति जता रहे हैं, क्या उन्होंने पहले उन पर हस्ताक्षर किए थे, उनकी आपत्तियां क्या थीं या वे कौन थे.

डब्ल्यूटीसी फाइनल में बीसीसीआई के एक प्रतिनिधि को कार्यक्रम की रूपरेखा में देरी के बारे में सवालों का सामना करना पड़ा, प्रेस बॉक्स में मौजूद एक रिपोर्टर ने मुझे बताया. असहज सवाल पूछे जाने पर उनका जवाब सरकार की प्रतिक्रिया से अलग था. उन्होंने पलटवार करते हुए पूछा कि 2022 टी20 विश्व कप के कोविड-19 के कारण प्रभावित होने के बाद क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया से टिकटों के पैसे वापस करने के बारे में क्यों नहीं पूछा जा रहा है.

दो महीने से भी कम समय शेष रहते हुए, आईसीसी ने आखिरकार अगस्त में नए कार्यक्रम और टिकटिंग प्रक्रियाओं के बारे में जानकारी जारी की, जिस पर पहली बार "सीईओ हेमांग अमीन" ने हस्ताक्षर किए. देरी के बारे में मेरे सवाल का जवाब देते हुए बीसीसीआई ने कहा, "सभी हितधारकों के एक मंच पर आने और आवश्यक मंजूरी मिलने के बाद विश्व कप कार्यक्रम की घोषणा की गई. हितधारकों में मेजबान पार्टियां, सदस्य बोर्ड और संबंधित सरकारी एजेंसियां शामिल हैं."

वर्ष 2005 में वानखेड़े स्टेडियम में मुंबई बनाम तमिलनाडु रणजी ट्रॉफी मैच. बीसीसीआई के 1,041 पंजीकृत घरेलू खिलाड़ियों में से लगभग नब्बे प्रतिशत आईपीएल में नहीं खेलते हैं. उनमें से अधिकांश तदर्थ वेतन पर हैं, जिनका प्रदर्शन या बीसीसीआई के राजस्व में हिस्सेदारी से कोई लेना-देना नहीं है. विजयानंद गुप्ता / हिंदुस्तान टाइम्स

शाह के पिछले ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए, विश्व कप में देरी पूरी तरह से आश्चर्यजनक नहीं थी. गांगुली -शाह के नेतृत्व के दौरान, 2021 में कोविड-19 ने आईपीएल के बायो-बबल को तोड़ दिया, नतीजतन टूर्नामेंट को निलंबित कर दिया गया. आईपीएल का बाकी हिस्सा और 2021 टी20 विश्व कप दोनों को संयुक्त अरब अमीरात में स्थानांतरित कर दिया गया था. रद्द किए गए 2020-21 घरेलू सीज़न के बाद घरेलू खिलाड़ियों के लिए मुआवजे की घोषणा सितंबर 2021 में की गई और जनवरी 2022 में मुआवजा वितरित किया गया. इस बीच, भारतीय महिला टीम इस साल आठ महीने से ज्यादा समय से बिना मुख्य कोच के है. भारतीय पहलवानों के विरोध प्रदर्शन के दौरान आश्वासन के बावजूद, बीसीसीआई ने अभी तक यौन उत्पीड़न से निपटने के लिए एक समिति नियुक्त नहीं की है. पिछले दो सालों के भीतर आधिकारिक किट प्रायोजकों में तीन बदलाव हुए हैं और पांच वर्षों में तीन अलग-अलग जर्सी प्रायोजकों में बदलाव हुए हैं. बीसीसीआई ने दो सौदों, भारतीय टीम की आधिकारिक जर्सी और घरेलू शीर्षक प्रायोजन, में अपना आधार मूल्य भी कम कर दिया है.

शाह के कार्यकाल के एक हिस्से में पाकिस्तान क्रिकेट के प्रति निरंतर शत्रुता देखी गई है, यहां तक कि जनवरी 2021 से वह एशियाई क्रिकेट परिषद के अध्यक्ष पद पर हैं. अक्टूबर 2022 में, बीसीसीआई सचिव के रूप में फिर से नियुक्त होने के बाद, शाह की पहली घोषणाओं में से एक यह थी कि 2023 में पाकिस्तान में खेला जाने वाला एशिया कप किसी तटस्थ स्थान पर आयोजित किया जाएगा. उन्होंने स्पष्ट किया, ''मैं एसीसी अध्यक्ष के तौर पर यह कह रहा हूं. हम वहां नहीं जा सकते, वे यहां नहीं आ सकते. पहले भी एशिया कप तटस्थ स्थान पर खेला गया है.'' 22 महीनों से अधिक समय में एसीसी अध्यक्ष के रूप में यह उनका पहला बड़ा बयान था. पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड ने विरोध दर्ज कराया लेकिन अंततः एक हाइब्रिड कार्यक्रम की मेजबानी के लिए सहमत हो गया. 13 में से केवल चार मैच पाकिस्तान में होना तया हुआ, बाकी श्रीलंका में, मेजबान टीम को केवल दो मैच घरेलू मैदान पर खेलने को मिले.

एशिया कप की कार्यवाही शुरू करने के लिए शाह लाहौर में होने वाले औपचारिक पीसीबी रात्रिभोज में शामिल नहीं हुए, जिसमें बिन्नी और शुक्ला ने बीसीसीआई का प्रतिनिधित्व किया. दुबई में पाकिस्तान और श्रीलंका के बीच 2022 एशिया कप के फाइनल के दौरान, शाह को टेलीविजन पर अन्य गणमान्य व्यक्तियों के साथ मैच देखते हुए दिखाया गया था, लेकिन एसीसी अध्यक्ष ट्रॉफी समारोह में नहीं दिखे.

शाह शायद ही कभी बीसीसीआई के मुंबई कार्यालय से बाहर काम करते हैं, इसके बजाय वह अहमदाबाद स्थित अपने बेस से काम करते हैं. शीर्ष परिषद की बैठकों में, ऑनलाइन या व्यक्तिगत रूप से, यह कहा जाता है कि वह सभी के विचार लेते हैं और सभी पक्षों का सम्मान करते हैं. "लेकिन, आख़िरकार," बीसीसीआई के एक कर्मचारी ने कहा, "वह वही करेंगे जो वह चाहते हैं." जानकारी को गुप्त रखा जाता है और पूरे बोर्ड में लगातार शिकायत और नाराजगी बनी रहती है. अपनी कई घोषणाओं और प्रेस विज्ञप्तियों में, बीसीसीआई कहता है कि "हम पदाधिकारियों को निर्णय लेने के लिए अधिकृत करते हैं." लेकिन, एक अन्य बोर्ड अधिकारी, जिनसे मैंने बात की, के अनुसार, "वे निर्णय कभी नहीं आते हैं, या हमें उनके बारे में बताया नहीं जाता है." उन्होंने कहा, ज्यादातर अधिकारी "उनके सामने 'वाह, अद्भुत, जयभाई!' कहने की होड़ में रहते हैं." लेकिन, जब उत्साही लोग कमरे से चले जाते हैं, तो राय उलट होती है, "और मैं बीजेपी के लोगों की बात कर रहा हूं."

जब गांगुली अध्यक्ष थे, तब बीसीसीआई के एक कर्मचारी ने शाह को दूसरों को गांगुली का फोन न उठाने का निर्देश देते हुए सुना था. अगर गांगुली ने बिना सोचे-समझे कहा कि कोई विशेष मैच या कार्यक्रम किसी विशेष दिन पर होगा, तो उसे एक दिन पहले या बाद में आयोजित करना होगा. कर्मचारी ने कहा कि अधिकांश कर्मचारी शाह की उपस्थिति में घबरा जाते हैं और नजरें छिपा कर केवल व्हाट्सएप के जरिए एक-दूसरे से बात करते हैं. शाह नहीं चाहते कि उनकी मीडिया ब्रीफिंग वीडियो पर रिकॉर्ड की जाए.

आज बीसीसीआई में शाह की मंजूरी के बिना कुछ भी नहीं चलता. एक अन्य कर्मचारी ने मुझसे कहा, "आप चीजें साफ होने के लिए महीनों इंतजार कर रहे हैं." यह अंपायर के हैट-बैंड प्रायोजकों को मंजूरी देने संबंधी चालान हो या 2023 विश्व कप कार्यक्रम. बीसीसीआई कर्मचारी ने कहा, "कल्पना कीजिए कि आपके दफ्तर में ऐसा हो रहा है. कोई आपका स्टेपलर उधार लेना चाहता है. आपको अपने बॉस को एक ईमेल लिखकर पूछना होगा कि क्या आप स्टेपलर उधार दे सकते हैं. फिर आपको महीनों तक अपने बॉस के पीछे यह कहते हुए दौड़ना पड़ता है, 'सर, उस स्टेपलर की मंजूरी का क्या हुआ?'"

बीसीसीआई के एक तीसरे कर्मचारी ने कहा, "कोई भी उनके पिता की वजह से उनका खंडन करने के लिए कुछ नहीं कहता है और वे सभी जानते हैं कि अगले पांच सालों तक चीजें नहीं बदलने वाली हैं." डरबन में आईसीसी के वार्षिक सम्मेलन में, सदस्यों ने अंगरक्षकों के साथ बीसीसीआई प्रतिनिधि के असामान्य नजारे देखे. इस अवसर पर शाह के पास दो सहायक थे. एक क्रिकेट अधिकारी ने कहा, ''कोई उनके लिए ईमेल लिख रहा है, कोई उनके फोन का जवाब दे रहा है. वह खुद में एक साम्राज्य की तरह हैं."

इस बीच, शाह की पहचान उनके पिता के असर से स्वतंत्र रूप में स्थापित करने के प्रयास चल रहे हैं. उन्हें एक दूरदर्शी क्रिकेट प्रशासक, खेल के प्रति वास्तविक जुनून के साथ महिला क्रिकेट की चैंपियन के रूप में चित्रित किया गया है. बीसीसीआई की जनसंपर्क एजेंसी, एडफैक्टर्स के पास शाह की मीडिया छवि को संभालने के लिए एक समर्पित कर्मचारी है. शाह ने उन्हें भेजे गए सवालों के जवाब नहीं दिए.

क्रिकेट अधिकारी ने कहा, ''आईसीसी की बैठकों में शाह लोगों को रोकते हैं और कहते हैं, 'नहीं, नहीं, ऐसा नहीं किया जाता है. वह हर समिति में रहना चाहते हैं. वह सभी के साथ ऐसे व्यवहार कर रहे हैं जैसे वह आईसीसी के गृह मंत्री हैं.'' आईसीसी के एक पूर्व अधिकारी ने मुझे बताया कि पहले "बोर्डरूम टेबल के चारों ओर बहुत बेहतर संतुलन हुआ करता था और यह उस समय के लोगों की क्षमता का प्रतिबिंब था." एक से ज्यादा सदस्यों ने वर्तमान आईसीसी को "इवेंट मैनेजमेंट कंपनी" के रूप में वर्णित किया है. पूर्व आईसीसी अधिकारी के शब्दों में, क्रिकेट की वैश्विक शासकी निकाय "खेल के लिए, प्रशंसकों के लिए, अपने सभी सदस्यों के लिए क्या सही है इसके बजाय जो भी उसे जो बताता है कि क्या करना है, उसके द्वारा निर्देशित होती है."

विश्व कप के आयोजन में हो रही देरी इस बात का सबूत है कि आईसीसी अपने ही आयोजन से पीछे हट रही है. एक सदस्य ने मुझसे कहा, "यह चौंकाने वाला है कि विश्व कप फिक्स्चर हाल ही में कुछ हफ़्ते पहले ही सामने आया था. यह हास्यास्पद है. आप एक ऐसे प्रशंसक से कैसे उम्मीद कर सकते हैं जो दुनिया में कहीं और से बुकिंग करना और यात्रा करना चाहता है, वह किस तरह आ पाएगा?”

अतीत में, आईसीसी के कार्यकारी कार्यालय के प्रमुख अपने आयोजनों की समयसीमा, कार्यक्रम और मैदान की स्थिति की गुणवत्ता को लेकर बीसीसीआई अधिकारियों के साथ भिड़ गए थे. पूर्व आईसीसी कार्यकारी ने मुझसे कहा, "निश्चित रूप से हमें बीसीसीआई के खिलाफ खड़े होने की जरूरत थी - इसलिए सीईओ और अध्यक्ष या चेयरमेन के बीच, चर्चा में मौजूद कुछ लोगों के साथ मिलकर उन्होंने वही किया जो उन्हें करना था. उन्होंने बीसीसीआई को चुनौती दी और संभवतः यह बेहतर संतुलन था.''

जिस चीज ने संतुलन बिगाड़ दिया है वह है बीसीसीआई द्वारा आईसीसी के राजस्व का बड़ा हिस्सा हड़प लेना. इसे शाह के महान वैश्विक तख्तापलट के रूप में उद्धृत किया जा रहा है, जबकि यह 2013 में श्रीनिवासन द्वारा शुरू की गई बीसीसीआई की रणनीति का एक सिलसिला है यानी, इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया, दो अन्य सबसे लाभदायक क्रिकेट बोर्डों के साथ गठबंधन करना, आईसीसी के राजस्व हिस्सेदारी फॉर्मूले की पुनर्संरचना पर जोर देना और बोर्ड टेबल पर अपने वोट के बदले में छोटे देशों को खैरात की पेशकश करना. "बिग थ्री प्रस्ताव" कुछ सालों के लिए रुका हुआ था, लेकिन अंततः इसे आगे बढ़ा दिया गया, भले ही कुछ देशों ने इसका विरोध किया.

{चार}

पिछले अठारह महीनों में, हर वित्तीय सौदे की घोषणा बड़े धूमधाम से हुई है. भारतीय क्रिकेट की समृद्धि से पहले से ही सम्मोहित दर्शकों को संख्याएं अचंभित और विचलित करती हैं. इस बारे में कोई सवाल नहीं पूछा जाता है कि बीसीसीआई की दो सबसे चमकदार संपत्तियों, आईपीएल और भारतीय राष्ट्रीय टीम को चमकाने के बाद वह पैसा वास्तव में कहां खत्म होता है.

जून 2022 में, बीसीसीआई ने आईपीएल के लिए पांच साल के लिए 48,390.5 करोड़ रुपए (6.2 बिलियन डॉलर) के मीडिया अधिकार सौदे की घोषणा की. फिर, जुलाई 2023 में, आईसीसी ने सदस्य देशों के बीच अपने राजस्व-वितरण मॉडल को संशोधित किया, जिसमें बीसीसीआई को और भी बड़ा हिस्सा मिला. आईसीसी ने वास्तविक संख्या के बारे में कोई औपचारिक घोषणा नहीं की, लेकिन मई 2023 में, मीडिया ने बताया कि बीसीसीआई अगले चार सालों के लिए आईसीसी की वार्षिक कमाई का 38.4 प्रतिशत - लगभग 230 मिलियन डॉलर या 1,863 करोड़ रुपए कमाएगा. अन्य पूर्ण सदस्य देशों को एक-अंकीय हिस्सा प्राप्त होगा. आईसीसी के पूर्व अध्यक्ष एहसान मनी ने फोर्ब्स को बताया कि नया मॉडल "उस देश को सबसे अधिक पैसा देगा, जिसे इसकी सबसे कम जरूरत है."

और यहां, जिस देश को इसकी सबसे कम जरूरत है, वहां हर साल पंद्रह सौ से अधिक मैचों वाले विशाल घरेलू क्रिकेट नेटवर्क को चलाने की लागत का हिसाब लगाने के बाद भी, जब बढ़ते राजस्व में उनके हिस्से की बात आती है तो भारत के क्रिकेटर खुद को सबसे पीछे पाते हैं. यहां तक कि भारत के अमीर दोहरी आय वाले अंतरराष्ट्रीय सितारों का, जो कथित तौर पर आईपीएल राजस्व का अठारह प्रतिशत कमाते हैं, उन बड़ी अंतरराष्ट्रीय खेल लीगों के सितारों के लिए कोई मुकाबला नहीं है, जिनसे आईपीएल प्रति मैच अधिकार मूल्य और समग्र मूल्यांकन के मामले में खुद की तुलना करता है. डेली टेलीग्राफ ने नोट किया कि बेसबॉल, बास्केटबॉल और अमेरिकी फुटबॉल के लिए तीन बड़ी अमेरिकी लीगों में एथलीटों ने लीग के राजस्व का 48 प्रतिशत अर्जित किया और इंग्लिश प्रीमियर लीग में फुटबॉल क्लबों के वेतन राजस्व का 71 प्रतिशत हिस्सा है.

आईपीएल के एक क्रिकेट अधिकारी के अनुसार, पिछली आईपीएल नीलामी में लगभग डेढ़ सौ भारतीयों में से 18 ने प्रति सीजन 10 करोड़ रुपए से अधिक की कमाई की, जबकि 76 अन्य ने 1 करोड़ रुपए से अधिक की कमाई की. हालांकि, आईपीएल में भारतीय क्रिकेटर पूरे भारतीय पुरुष क्रिकेट समुदाय के आठ प्रतिशत से भी कम हैं. भारत के अधिकांश घरेलू क्रिकेटरों के पास यह कमाई नहीं है. फेडरेशन ऑफ इंटरनेशनल क्रिकेटर्स एसोसिएशन की 2022 पुरुषों की वैश्विक पेशेवर रोजगार रिपोर्ट के अनुसार, 1,041 पंजीकृत भारतीय पुरुष पेशेवर क्रिकेटर हैं. (भारत एफआईसीए को मान्यता नहीं देता है  और इसका एकमात्र मान्यता प्राप्त खिलाड़ी समूह, भारतीय क्रिकेटर्स एसोसिएशन, पूरी तरह से सेवानिवृत्त क्रिकेटरों पर ध्यान केंद्रित करता है.) "आम जनता सोचती है कि रणजी ट्रॉफी क्रिकेटर बहुत पैसा कमाते हैं, लेकिन किसी को यह एहसास नहीं है कि यह सच नहीं है, “बीसीसीआई के एक पूर्व प्रशासक ने मुझे बताया. “आज घरेलू क्रिकेटरों के लिए कोई सुरक्षा नहीं है. अगर उससे सत्र छूट गया, तो उसकी कमाई शून्य है.

2017 महिला विश्व कप में भारत की अंतिम उपस्थिति के बाद, महिलाओं का खेल व्यापक सार्वजनिक चेतना में फैल गया है और शाह बीसीसीआई में उनके पथप्रदर्शक के रूप में देखा जाना चाहते हैं.  स्टीवन पास्टन/अलामी फोटो

बीसीसीआई के आंकड़ों को ट्रैक करना भी आसान नहीं है. लोढ़ा सिफारिशों के उल्लंघन में बोर्ड ने 2017 में अपनी बैलेंस शीट को अपनी वेबसाइट पर अपलोड करना बंद कर दिया. एक राज्य संघ के प्रमुख ने मुझे बताया कि 2021-22 के लिए नवीनतम वार्षिक रिपोर्ट, 18 अक्टूबर 2022 को बीसीसीआई की वार्षिक आम बैठक से एक रात पहले राज्य संघ के सदस्यों को वितरित की गई थी. उन्होंने कहा, यह "क्रिसमस की तरह" था. विनियामक आवश्यकता के रूप में रिपोर्ट आईसीसी को भी भेजी गई थी. बीसीसीआई ने जुलाई में मेरे द्वारा भेजे गए प्रश्नों की सूची में नवीनतम वार्षिक रिपोर्ट के मेरे अनुरोध को दरकिनार कर दिया. जब मैं आईसीसी प्रतिनिधि के पास पहुंची, तो उन्होंने जवाब दिया कि रिपोर्ट को "हम साझा नहीं कर सकते." मैंने परिणामों के लिए समय-समय पर वेबसाइट की जांच की. 16 अगस्त के बाद किसी समय, बीसीसीआई की वेबसाइट ने वार्षिक रिपोर्ट नहीं बल्कि पिछले पांच वित्तीय वर्षों के ऑडिटेड विवरण जारी किए. आईपीएल की कमाई और ऑडिट किए गए खातों से अन्य विवरणों के बारे में अखबारों में 18 अगस्त से रिपोर्टें आनी शुरू हुईं. दस्तावेज में विस्तृत 2021-22 बीसीसीआई बैलेंस शीट के अनुसार, बोर्ड की कुल संपत्ति 23159 करोड़ रुपए थी, इसकी वार्षिक आय 4360.56 करोड़ रुपए थी और इसका कुल व्यय 1668.96 करोड़ रुपए था.

इसके खर्च का सबसे बड़ा हिस्सा 840.23 करोड़ रुपए था, जो 38 राज्य संघों के बीच वितरित किया गया. दूसरी सबसे बड़ी व्यय मद 629.11 करोड़ रुपए थी, "अन्य क्रिकेट गतिविधियों" के लिए, जिसे पुरुषों के सीनियर और जूनियर घरेलू टूर्नामेंट, राष्ट्रीय क्रिकेट अकादमी, अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों के लिए रिटेनरशिप फीस, बोर्ड की आय से सकल घरेलू राजस्व हिस्सेदारी, क्रिकेट गेंदों, खिलाड़ियों और अंपायरों के चिकित्सा उपचार, और डोपिंग रोधी क्यूरेटर, सहित अन्य खपत के रूप में समझाया गया है. कोचिंग पर अतिरिक्त 30.25 करोड़  रुपए खर्च किए गए बताए गए हैं.

अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी रिटेनर्स और जीआरएस के लिए आवंटित राशि 124.11 करोड़ रुपए है. सेवानिवृत्त खिलाड़ियों की पेंशन में अतिरिक्त 120.23 करोड़ रुपए का योगदान है. इस प्रकार, खेल समुदाय के वर्तमान और पूर्व दोनों सदस्यों को वितरित की गई राशि 244.34 करोड़ रुपए है. पुरुषों के अंतरराष्ट्रीय दौरों और टूर्नामेंटों के लिए खिलाड़ियों की फीस और दैनिक भत्ता 59.13 करोड़ रुपए है. अगर हम केवल इन आंकड़ों को लें, तो वितरण बीसीसीआई की कुल आय 4,630.56 करोड़ रुपए का 6.5 प्रतिशत है.

राजस्व वितरण की भूलभुलैया दो कहानियां बताती है: उन राज्यों की ओर से जवाबदेही की कमी जहां पैसा नियमित रूप से डाला जा रहा है और अपने अधिकांश खिलाड़ियों के लिए अजीब तरह से स्थिर बीसीसीआई खिलाड़ी आय. बीसीसीआई के राजस्व के सबसे महत्वपूर्ण स्रोतों और इंजनों में से एक के रूप में, अंतरराष्ट्रीय सितारों और आईपीएल के बड़े प्रदर्शन करने वालों के अलावा क्रिकेटर को बोर्ड की संपत्ति का न्यूनतम हिस्सा मिलता है.

एक स्थापित रणजी ट्रॉफी टीम के एक घरेलू क्रिकेटर, जिन्होंने आईपीएल युग में नियमित प्रथम श्रेणी क्रिकेट खेला है, ने मुझे अपने करियर के दौरान अपनी मैच फीस की कमाई की एक एक्सेल शीट भेजी, जो एक दशक से अधिक समय तक चली है. उन्होंने एक सीजन में औसतन 7.5 लाख रुपए कमाए. एक वर्ष में मैच फीस से उनकी अधिकतम कमाई 14 लाख रुपए से कम थी, जबकि रद्द किए गए 2020-21 सीज़न के लिए सबसे कम एक लाख रुपए थी, जिसमें घरेलू क्रिकेटरों को मुआवजे के रूप में उनकी मैच फीस का पचास प्रतिशत दिया गया था. अपने पहले सीज़न में, उन्होंने अपने नवीनतम सीज़न की तुलना में पचास हजार रुपए अधिक कमाए. उनकी पहचान सुरक्षित रखने के लिए, यहां दिए गए आंकड़े थोड़ा बदले हैं. क्या सटीक रकम का उल्लेख किया जाना चाहिए - रहस्यमय रूप से, क्रिकेटर—क्रिकेटर में फर्क हैं - क्रिकेटर का मानना है कि उसकी पहचान की जा सकती है.

क्रिकेटर ने कहा, भले ही किसी ने हर एक घरेलू मैच खेला हो और एक ही सीज़न में सभी प्रारूपों के हर टूर्नामेंट के फाइनल में जगह बनाई हो, उन्होंने उससे 5 लाख रुपए से अधिक नहीं कमाया होगा - वह भी, सितंबर 2021 में घोषणा की गई संशोधित वेतनमान के तहत। मैच फीस में बढ़ोतरी धीमी और छिटपुट रही है. जब 2004-05 सीज़न में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटरों के लिए रिटेनरशिप अनुबंध पेश किए गए, तो रणजी ट्रॉफी में भाग लेने वाले घरेलू क्रिकेटरों के लिए मैच फीस 10,000 रुपए प्रति दिन से बढ़कर 16,000 रुपए हो गई. जब 2007 में ज़ी ने अपनी अलग इंडियन क्रिकेट लीग की घोषणा की, तो कई घरेलू क्रिकेटरों के साथ, मैच के दिन की फीस 35,000 रुपए तक बढ़ गई और दैनिक भत्ता 500 रुपए से बढ़कर 1,500 रुपए हो गया. आईपीएल के आगमन से 2021 तक वेतन संरचना में कोई बदलाव नहीं आया. चौदह वर्षों के बाद कुछ हद तक भ्रामक वेतन वृद्धि की घोषणा की गई, एक ऐसी अवधि जिसके दौरान तीन अलग-अलग ग्रेड के तहत रहने की लागत लगभग दोगुनी हो गई: चालीस से अधिक मैच खेलने वालों के लिए 60,000 रुपए प्रति दिन, बीस से चालीस मैच खेलने वालों के लिए 50,000 रुपए, या चालीस से कम मैच खेलने वालों के लिए 40,000 रुपए.

घरेलू क्रिकेटर ने मुझसे कहा, "यहां तक कि एक साधारण नौकरी में भी, आप हर दो साल में कम से कम एक बार पांच से दस प्रतिशत की बढ़ोतरी मांगेंगे. शुरुआत में, आप खुश होते हैं, यह पैसा खर्च कर रहा है. आप अपने दोस्त से पहले कार खरीद सकते हैं. लेकिन, जब आप पत्नी और बच्चे के साथ एक वयस्क जीवन में आते हैं, तो इतनी कमाना पर्याप्त नहीं है. भारत के एक पूर्व क्रिकेटर ने कहा कि घरेलू खिलाड़ियों के लिए मैच फीस में "कम से कम मुद्रास्फीति - हर कुछ वर्षों में दस प्रतिशत" शामिल होनी चाहिए.

अगर मैच फीस चौदह वर्षों तक समान रहती, तो बीसीसीआई का सकल राजस्व हिस्सा - बोर्ड की कमाई का एक हिस्सा घरेलू क्रिकेटरों के बीच वितरित किया जाना होता है - यह आश्चर्यजनक लेखांकन का एक हिस्सा था. उदाहरण के लिए, अगर कोई क्रिकेटर 2016-17 में खेला है, तो एक यादृच्छिक संख्या के साथ जीआरएस चालान के लिए अनुरोध मार्च 2019 में आ सकता है.  घरेलू क्रिकेटर ने मुझे बताया कि यह राशि 75,000 रुपए से 1.5 लाख रुपए प्रति खेल के बीच हो सकती है. उनका अनुमान है कि जीआरएस सीज़न के लिए किसी की कमाई में लगभग 12 लाख रुपए जोड़ सकता है. उन्होंने कहा, ''हमें नहीं पता था कि यह राशि कैसे तय की गई. यह अभी आया." हालांकि, एक सीज़न में, उन्हें लगभग सात हजार रुपए का जीआरएस चालान बनाने के लिए कहा गया था. “मुझे लगा कि वे जीरो भूल गए हैं. मैंने एक और दोस्त को फोन किया, जो एक अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटर था और उसने कहा, 'हां, हां, मेरा तुमसे दो सौ रुपए कम है.''

2004 के बाद से, जीआरएस बीसीसीआई की सबसे कठिन लेखांकन चाल रही है, जो बीसीसीआई की अचानक बढ़ती कमाई का परिणाम है. इसकी उत्पत्ति इस बात में निहित है कि पहला बीसीसीआई खिलाड़ी अनुबंध कैसे हुआ. 1997 के श्रीलंका दौरे पर, अनिल कुंबले और टूर मैनेजर रत्नाकर शेट्टी के नेतृत्व में भारतीय खिलाड़ी ने लंकाई क्रिकेटरों की श्रेणीबद्ध भुगतान प्रणाली की बारीकियों का पता लगाया. उन्होंने भारतीय खिलाड़ियों को अनुबंध पर लाने के लिए बीसीसीआई से संपर्क किया, खासकर तब जब टेलीविजन अधिकारों से बोर्ड का राजस्व तेजी से बढ़ रहा था. 2005 में लागू किए गए पहले अनुबंध ढांचे में 25 प्रमुख भारतीय खिलाड़ियों का एक समूह था, जिन्हें उनके प्रदर्शन के आधार पर क्रमशः 50 लाख रुपए, 35 लाख रुपए और 20 लाख रुपए के वार्षिक रिटेनर्स के साथ तीन ग्रेड में विभाजित किया जाएगा. प्लेइंग इलेवन को घरेलू टेस्ट के लिए 200,000 रुपए, विदेश में एक टेस्ट के लिए 240,000 रुपए और विदेश में एक वनडे के लिए 185,000 रुपए की मैच फीस दी जाएगी. टीम के अन्य सदस्य संबंधित मैच फीस का आधा हिस्सा कमाते हैं.

इस बीच, क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया, ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेटर्स एसोसिएशन के सहयोग से काम करते हुए, टिकटों की बिक्री सहित सभी राजस्व का 25 प्रतिशत अपने अंतरराष्ट्रीय और घरेलू खिलाड़ियों के साथ साझा कर रहा था. उस समय जगमोहन बीसीसीआई अध्यक्ष थे डालमिया से जब पूछा गया कि बीसीसीआई का सकल राजस्व हिस्सा उसके खिलाड़ियों के लिए कितना होगा, तो उन्होंने आस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों को पछाड़ना सुनिश्चित किया और 26 प्रतिशत की घोषणा की. पूर्व प्रशासक के अनुसार, यह आंकड़ा तब से वही बना हुआ है: अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों के लिए 13 प्रतिशत, घरेलू क्रिकेटरों के लिए 10.4 प्रतिशत और जूनियर खेलों में 2.6 प्रतिशत.

हालांकि, 26 प्रतिशत का सीधा मतलब प्रत्येक 100 रुपए की कमाई पर 26 रुपए नहीं है. इसके बजाय, यह प्रतिशत सकल राजस्व के 30 प्रतिशत के एक हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है जो 70 प्रतिशत राज्य संघों को दिए जाने के बाद बचा रहता है. बीसीसीआई द्वारा दर्ज किए गए प्रत्येक 100 रुपए के राजस्व के लिए, जीआरएस सभी अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटरों के लिए 3.90 रुपए, सभी घरेलू क्रिकेटरों के लिए 3.12 रुपए और सभी जूनियर्स के लिए 78 पैसे है. और जो समूह पहले 100 रुपए बनाता था, वह सिकुड़ता ही गया है.

आईपीएल के बाद, जैसे ही बीसीसीआई का सकल राजस्व तेजी से बढ़ने लगा, बोर्ड, उसके पदाधिकारियों और राज्य संघ के प्रमुखों के निर्वाचक मंडल ने सकल राजस्व को फिर से परिभाषित करने का फैसला किया. आईपीएल की कमाई को तुरंत जीआरएस से बाहर कर दिया गया. जैसे ही आईसीसी के अपने मीडिया अधिकारों में विस्फोट हुआ, बीसीसीआई की हिस्सेदारी बढ़ने के साथ, वह कमाई भी सकल-राजस्व गणना से बाहर हो गई. इसके अलावा, बीसीसीआई की उत्पादन लागत भी जीआरएस पूल से काट ली गई.

दो राज्य संघों के खिलाड़ियों ने मुझे पुष्टि की कि उन्हें प्राप्त अंतिम जीआरएस आय 2017-18 सीज़न के लिए थी. एक प्रथम श्रेणी क्रिकेटर ने कहा कि उसे अपना जीआरएस प्राप्त हुए "कुछ साल" हो गए हैं. एक अन्य ने कहा कि उन्हें हाल ही में "सूचित" किया गया था कि अगली किश्त जल्द ही आ रही है. यह स्पष्ट है कि बीसीसीआई अपने वार्षिक ऑडिट में राज्यों को जीआरएस भुगतान का हिसाब रखता है, लेकिन यह खिलाड़ियों तक पहुंचेगा या नहीं इसकी गारंटी नहीं है. इस बारे में बीसीसीआई से पूछे गए मेरे सवालों पर संगठन ने जवाब दिया, ''सकल राजस्व हिस्सेदारी में कोई विचलन नहीं हुआ है और यह खिलाड़ी भुगतान प्रणाली का हिस्सा बना हुआ है. यह सूचना ग़लत है कि इसे रोक दिया गया है. पॉलिसी में कोई बदलाव नहीं हुआ है और भुगतान नियमित रूप से हो रहा है. जनरल बॉडी के निर्णयों के अनुसार खिलाड़ियों को जीआरएस का भुगतान किया जाता है.

21 मई 2017 को, कुंबले, जो उस समय भारत के कोच थे, ने एक प्रस्तुति दी जिसमें खिलाड़ी भुगतान फॉर्मूले के साथ-साथ सहायक-कर्मचारी आय में संरचनात्मक परिवर्तन शामिल था. यह अंतरराष्ट्रीय और घरेलू दोनों टीमों के लिए प्रदर्शन बोनस के साथ-साथ कप्तानों के बोनस पर आधारित था, जैसा कि विदेशों में नीति है. इसका उद्देश्य भारतीय क्रिकेटरों को अपने बोर्ड की कमाई और प्रदर्शन प्रोत्साहन के हिस्से के संबंध में अपने प्रमुख अंतरराष्ट्रीय समकक्षों के बराबर लाना था, जो एक सामंती बोर्ड द्वारा अपने विषयों को बड़े पैमाने पर दिए जाने वाले करोड़ों रुपए के पुरस्कारों की तदर्थ नीति को प्रतिस्थापित करता था, 20 जून को चैंपियंस ट्रॉफी फाइनल के बाद कप्तान विराट कोहली के साथ अपनी कोचिंग पद्धतियों के बारे में मतभेदों की अफवाहें फैलने के बाद कुंबले ने कोच पद छोड़ दिया.

सीओए की बैठक के मिनटों के अनुसार, एक प्रस्ताव था कि “बीसीसीआई के समेकित अधिशेष से एक निर्धारित फंड बनाया जाए जिसे नया प्लेयर रेवेन्यू/मुआवजा समानीकरण फंड, (पीआर/सीईएफ) कहा जाए. खिलाड़ियों के बढ़े हुए मुआवज़े/भुगतान की अदायगी के लिए उपयोग किया जाता है." इसका कुछ नतीजा नहीं निकला.

29 अक्टूबर 2019 को बीसीसीआई अध्यक्ष के रूप में गांगुली की पहली घोषणाओं में से एक, "प्रथम श्रेणी क्रिकेटरों के लिए एक अनुबंध प्रणाली" की स्थापना थी. संभावना के बारे में पूछे जाने पर, एक रिपोर्टर ने मुझे बताया कि एक पदाधिकारी ने कहा कि ऐसा होने की संभावना नहीं है क्योंकि खिलाड़ी "पहले से ही इतना पैसा कमा रहे हैं, हमें उन्हें और अधिक क्यों देना चाहिए?" घरेलू अनुबंधों का वादा कभी पूरा नहीं हुआ. यह बीसीसीआई के विश्वदृष्टिकोण की एक स्पष्ट टिप्पणी है कि वह अपने खेल समुदाय को वस्तुओं के रूप में और खिलाड़ियों द्वारा अर्जित धन को अपनी निजी संपत्ति के रूप में मानता है.

बीसीसीआई के एक अंदरूनी सूत्र ने कहा, ''वे जो भी नीतियां बनाते हैं, उसके पीछे कोई न कोई तर्क जरूर होता है. आपके अंतरराष्ट्रीय और घरेलू क्रिकेटरों के पास दो अलग-अलग ग्रेडिंग सिस्टम क्यों हैं? अगर आप अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटरों के लिए बीसीसीआई ग्रेडिंग का पालन करते हैं, तो ग्रेड पिछले सीज़न में प्रदर्शन पर आधारित होते हैं. हालांकि, घरेलू क्रिकेटरों के लिए, “जिन्होंने चालीस से अधिक मैच खेले हैं, उन्हें प्रतिदिन 60,000 रुपए मिलते हैं, चाहे कुछ भी हो. एक नवागंतुक जिसने दो सीज़न में अच्छा खेला है और दो सीज़न से आपका स्टार खिलाड़ी है, पर क्योंकि उसने बीस मैच भी नहीं खेले हैं, उसे प्रतिदिन 50,000 रुपए नहीं मिलेंगे. इन लोगों को कोई पूछने वाला नहीं है. इसलिए वे इससे बच जाते हैं.”

घरेलू क्रिकेटर भुगतान कतार में सबसे पीछे हैं, इसका कारण यह है कि उनका वेतन बड़ी खबर नहीं बनता है. एक बार जब राष्ट्रीय सितारों का ख्याल रखा जाता है और आईपीएल पर मंथन जारी रहता है, तो फोकस उस जगह से काफी दूर हो जाता है जहां बीसीसीआई का बाकी पैसा खत्म होता है - खासकर उसके राजस्व का 70 प्रतिशत जो राज्यों को जाता है.

बीसीसीआई में 38 सक्रिय राज्य संघ और तीन गैर-खिलाड़ी सदस्य शामिल हैं - क्रिकेट क्लब ऑफ इंडिया, नेशनल क्रिकेट क्लब ऑफ कोलकाता और एसोसिएशन ऑफ यूनिवर्सिटीज - जो सामूहिक रूप से इसके चुनावी कॉलेज का गठन करते हैं. वार्षिक बीसीसीआई चुनावों में अपने वोटों के माध्यम से, राज्य संघों के पास सैद्धांतिक रूप से बीसीसीआई के पदाधिकारियों को चुनने या हटाने का अधिकार होता है. ऐतिहासिक रूप से, ये चुनाव प्रमुख प्रशासकों, व्यापारिक हस्तियों, नौकरशाहों और राजनेताओं के बीच तीखी प्रतिस्पर्धा हुआ करते थे. हालांकि, हाल ही में, वे शांत मंचों में बदल गए हैं जहां व्यक्तियों को अक्सर "सर्वसम्मति से" कार्यालय के लिए चुना जाता है.

दो दशक पहले भी राज्य संघों को खुश रखना हर बीसीसीआई अध्यक्ष की प्राथमिकता हुआ करती थी. यह अंतरराष्ट्रीय मैचों, बोर्ड की दर्जनों समितियों में पदों-बैठकों में भाग लेने के लिए उदार भत्ते के साथ-और राष्ट्रीय-टीम प्रबंधकों को पुरस्कृत करके किया गया था. लेकिन 1990 के दशक में टेलीविज़न अधिकारों के आगमन और आईपीएल के पैसे की आमद ने काम को आसान बना दिया है. राज्य संघों की कार्यप्रणाली या उनके बीसीसीआई फंड कैसे खर्च किए जाते हैं, इस पर कोई सवाल नहीं उठाया गया. राज्य संघ का हिस्सा केवल उसके द्वारा प्राप्त धन की मात्रा के बारे में नहीं है, बल्कि यह समझने में भी है कि उस धन का उपयोग कैसे किया जाता है और उस जानकारी का कितना कम हिस्सा सार्वजनिक है.

2015 में बीसीसीआई अध्यक्ष शशांक मनोहर ने ब्रिटिश फर्म डेलॉइट टौचे तोहमात्सु को 27 राज्य संघों का ऑडिट करने के लिए कहा. उन्होंने कहा, "मेरे अनुसार, प्रत्येक एसोसिएशन को समान राशि का भुगतान किया गया था और इसके बावजूद, कुछ एसोसिएशन नुकसान में थीं. ऐसा नहीं हो सकता था. इसलिए मैंने यह पता लगाने का फैसला किया कि ये लोग उस पैसे का क्या कर रहे हैं जो उन्हें दिया गया है.''

इतिहासकार रामचंद्र गुहा, जो चार महीने तक सीओए में थे, ने अपनी पुस्तक द कॉमनवेल्थ ऑफ क्रिकेट: ए लाइफलॉन्ग लव अफेयर विद द मोस्ट सटल एंड सोफिस्टिकेटेड गेम नोन टू ह्यूमनकाइंड में डेलॉइट टीम से मुलाकात के बारे में लिखा है. वह लिखते हैं, ''निष्कर्ष इतने हानिकारक थे कि उन्हें दबा दिया गया. गोपनीयता खंड का उपयोग करते हुए, डेलॉइट ने हमारे साथ रिपोर्ट साझा नहीं की; लेकिन उन्होंने जो पाया उसका एक ब्योरा देने पर वे सहमत हुए.” गुहा ने नोट्स लिये. “उन्होंने राज्य संघों में सभी प्रकार की गड़बड़ियां पाईं. 'क्रिकेटिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर' के तहत, एक एसोसिएशन ने अठारह कारें खरीदी थीं. कुछ ने हस्तलिखित खाते बनाए रखे... अधिकारियों के लिए बीसीसीआई फंड से फ्लैट खरीदे गए थे. उन मार्गों की उड़ानों पर यात्रा के लिए प्रतिपूर्ति का भुगतान किया गया था जो अस्तित्व में नहीं थे. एक मामले में क्रिकेट स्टेडियम के निर्माण के लिए हस्तांतरित भूमि पर अभी भी फसलें उगाई जा रही थीं.

पत्रिका आउटलुक ने बताया कि ऑडिट प्रक्रिया से बाहर रहने वाले संघ दिल्ली, जम्मू और कश्मीर, राजस्थान और छत्तीसगढ़ थे. यह भी पाया गया कि झारखंड, ओडिशा, असम, गुजरात और गोवा संघों के अधिकारियों ने लेखा परीक्षकों के साथ पूरा सहयोग नहीं किया. एक बार जब सीओए का कार्यकाल समाप्त हो गया और बीसीसीआई अधिकारियों ने अपने बोर्ड का नियंत्रण फिर से अपने हाथ में ले लिया, तो नए सिरे से ऑडिट कराने की कोई इच्छा नहीं थी.

पुडुचेरी और चंडीगढ़ जैसे छोटे केंद्र शासित प्रदेशों जैसे नई टीमों के एक समूह को शामिल करने से धन के संभावित कुप्रबंधन के बारे में चिंताएं बढ़ गई हैं. बीसीसीआई की भ्रष्टाचार विरोधी इकाई के पूर्व प्रमुख नीरज कुमार ने अपने संस्मरण का एक अध्याय उत्तर-पूर्वी राज्यों के भ्रष्टाचार के मुद्दों को समर्पित किया है. वह अरुणाचल प्रदेश एसोसिएशन द्वारा अलीगढ़ में ट्रायल आयोजित करने जैसे उदाहरणों को याद करते हैं, जिसमें बताया गया है कि कैसे हर नए राज्य की जूनियर टीमों को प्रतिभाशाली क्रिकेटरों से भरने की उत्सुकता ने बिचौलियों के लिए एक फलते-फूलते रैकेट को जन्म दिया. युवा क्रिकेटरों के परिवारों को उनके अधिवास को साबित करने और उनकी भागीदारी को सुरक्षित करने के लिए आवश्यक दस्तावेज प्राप्त करने में सहायता करने के बदले में पैसे देने के लिए मजबूर किया गया था. “उत्तर पूर्वी राज्यों को पूर्ण सदस्यता का दर्जा देने से दुर्भाग्य से करोड़ों रुपए का नुकसान हुआ है. बिचौलियों, पदाधिकारियों और प्रशिक्षकों से जुड़े संगठित रैकेट का एकमात्र उद्देश्य युवाओं और उनके माता-पिता को धोखा देना है,” कुमार लिखते हैं. उन्होंने नोट किया कि अंडर-19 विश्व कप में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाला एक क्रिकेटर अब एक पेशेवर खिलाड़ी और अपनी उत्तर-पूर्वी टीम के लिए किट आपूर्तिकर्ता दोनों है.

कुमार लिखते हैं, "यह सोचना कि क्रिकेट में भ्रष्टाचार का मतलब केवल मैच और स्पॉट फिक्सिंग है, बड़ी समस्या को अनदेखा करना है. फिक्सिंग क्रिकेट प्रशासकों द्वारा की जाने वाली बड़े पैमाने की चालाकी का एक छोटा सा हिस्सा है. भारत में क्रिकेट द्वारा कमाए गए अच्छे राजस्व को बांट दिया जाता है, जहां पैसे का अधिकतर दुरुपयोग किया जाता है." किताब में कहीं न कहीं, कहीं भी खेलने के इच्छुक युवा क्रिकेटरों से पैसे वसूलने के बारे में बीसीसीआई की भ्रष्टाचार निरोधक और सुरक्षा इकाई को की गई शिकायतों की एक सूची दी गई है. “राज्य क्रिकेट संघ, जो स्वयं भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन के अड्डे हैं, जिला संरचनाओं की अध्यक्षता करते हैं जहां वे अपने स्वयं के चापलूसों को नियुक्त करते हैं… ऐसे नामांकित व्यक्ति आमतौर पर राज्य संघ में बड़े बॉस के रिश्तेदार या कर्मचारी होते हैं; उन्हें केवल राज्य-स्तरीय चुनावों में उनके वोट के लिए जिले में रखा जाता है. कोई नहीं जानता कि राज्य संघ हर साल बीसीसीआई से मिलने वाले अनुदान को अपने जिला संघों के साथ साझा करते हैं या नहीं. अगर करते हैं, तो उनका उपयोग कैसे किया जाता है, क्या कोई लेखा-जोखा रखा जाता है? क्या कोचिंग कैंप या चयन कैसे आयोजित किए जाते हैं, इसमें कोई पारदर्शिता है? उनकी निगरानी कौन करता है?”

15 फरवरी 2015 को जय शाह की शादी के रिसेप्शन में मोदी और अमित शाह. बीजेपी.ओआरजी

यह केवल नए बने क्रिकेट संघ नहीं हैं जहां चयन के लिए पैसे या वित्तीय अनियमितता की अफवाहें हैं. देश भर में जूनियर क्रिकेट में चयन के बदले नकद की कहानियां व्याप्त हैं. मुंबई क्रिकेट एसोसिएशन की हाल की बैठक में सभी को चेतावनी दी गई कि इस तरह की शिकायतों पर त्वरित और गंभीर प्रतिक्रिया दी जाएगी, बैठक में मौजूद एक सदस्य ने मुझे बताया.

1 अगस्त तक, बंगाल क्रिकेट एसोसिएशन, दिल्ली और जिला क्रिकेट एसोसिएशन, मुंबई क्रिकेट एसोसिएशन, गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन और तमिलनाडु क्रिकेट एसोसिएशन की वेबसाइटों पर नवीनतम वार्षिक रिपोर्ट या वित्तीय विवरण का कोई संकेत नहीं था. बीसीसीआई कोषाध्यक्ष के घरेलू संघ एमसीए ने आखिरी बार 2017-18 में वार्षिक रिपोर्ट पोस्ट की थी.

कीर्ति आज़ाद जानना चाहते हैं कि उनका घरेलू संघ, बदनाम डीडीसीए, अपने पास मौजूद पैसों और मैदानों से अपनी अकादमियां क्यों नहीं शुरू कर सकता. यह एक ऐसा प्रश्न है जो हर उस राज्य संघ पर लागू होता है जिसके पास कोई नहीं है. उन्होंने कहा, "डीडीसीए या अन्य संघों में लोग अपनी अकादमियां चला रहे हैं और एक बच्चे से हर महीने 30-40 हजार रुपए वसूल रहे हैं. दिल्ली में, हर समूह का अपना चयनकर्ता होता है और वे अपने बच्चों को चुनते हैं." उन्होंने कहा कि राज्य को बीसीसीआई की ओर से दी जाने वाली सहायता "बरमूडा ट्रेंगल की तरह एक रहस्य है."

क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ उत्तराखंड को अगस्त 2019 में आधिकारिक बीसीसीआई संबद्धता मिली और चार साल से भी कम समय में, इसने शासकीय घपलेबाजी के भयावह विवरण सामने रखे हैं. क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ उत्तराखंड के लिए महिला क्रिकेट की पूर्व सह-संयोजक वर्तमान में यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण अधिनियम के तहत आरोपों का सामना कर रही हैं, जिन पर तीन नाबालिगों द्वारा दुर्व्यवहार का आरोप लगाया गया है. इसके पहले कोषाध्यक्ष पृथ्वी सिंह नेगी को तब हटा दिया गया जब उन्होंने खातों की कमी के बारे में सवाल उठाए. नेगी ने मुझे बताया, 2019 और 21 मार्च 2021 को उनकी बर्खास्तगी के बीच, उन्हें सीएयू के खर्चों का कोई हिसाब नहीं मिला. उन्होंने कहा, ''मुझे कभी कोई लेखा-जोखा नहीं भेजा गया. इसके बजाय, एक झूठा आरोप लगाया गया कि मैं बिलों पर हस्ताक्षर नहीं करता. मेरा अनिवार्य कर्तव्य यह है कि जब बिल मेरी मेज पर आए तो मुझे बिल की जांच करनी होती है. और अगर कोई प्रश्न या आपत्ति है, तो मुझे कहना होगा कि इसे सुधारें. उन्होंने कहा, “अगर किसी विक्रेता का पैन नंबर चालान पर नहीं है, तो मुझे इसके लिए पूछना होगा. मुझे ये भी देखना है कि इस वेंडर को काम किसने दिया. वह कहां से आया? यह व्यक्ति विक्रेता कैसे बन गया?”

नेगी के निष्कासन से एक महीने पहले, वसीम जाफर ने "गैर-योग्य खिलाड़ियों के चयन मामलों में चयनकर्ताओं और सचिव के हस्तक्षेप और पूर्वाग्रह" का हवाला देते हुए उत्तराखंड के कोच पद से इस्तीफा दे दिया. इसके बाद सीएयू सचिव माहिम वर्मा ने जाफर पर टीम को धार्मिक गतिविधियों से बांटने का आरोप लगाया. वर्मा वही अधिकारी हैं जिन पर भारत के एक अंडर-19 खिलाड़ी को धमकी देने और उसके पिता से पैसे वसूलने की कोशिश करने का आरोप लगाया गया है. इस बारे में मेरे सवालों के जवाब में, वर्मा ने जवाब दिया कि चूंकि मामला विचाराधीन है, इसलिए वह इस बारे में ज्यादा कुछ बताने की स्थिति में नहीं हैं, ”लेकिन जहां तक खिलाड़ियों से पैसे वसूलने के संबंध में मेरे खिलाफ लगाए गए कोई भी आरोप हैं वह गलत हैं. यह पूरी तरह से मेरे नाम और प्रतिष्ठा को बदनाम करने के लिए किया गया है.” सीएयू वही संघ है जिसके रणजी ट्रॉफी क्रिकेटरों को कथित तौर पर 1,500 रुपए के बजाय 100 रुपए का दैनिक भत्ता दिया जाता था और जिसके केले के लिए 35 लाख रुपए और पानी की बोतलों के लिए 22 लाख रुपए का बिल आता था.

उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने सीएयू और उसके जिला संघों के "कार्य और प्रबंधन में गंभीर अवैधताओं और अनियमितताओं" की शिकायत करने वाली एक जनहित याचिका सूचीबद्ध की. जनहित याचिका में पदाधिकारियों और सदस्यों पर रिश्वत लेने, धन का दुरुपयोग करने और खिलाड़ियों के साथ दुर्व्यवहार करने का आरोप लगाया गया. देहरादून, गुड़गांव और फरीदाबाद में जबरन वसूली के आरोप में सीएयू अधिकारियों और उनके सहयोगियों के खिलाफ प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज की गई है. वर्मा ने कहा. “पीआईएल में लगाए गए सभी आरोप गलत हैं और उनमें दम नहीं है, दायर की गई ऐसी याचिकाएं एसोसिएशन के कुछ सदस्यों द्वारा एसोसिएशन के खिलाफ एक भयावह अभियान का हिस्सा हैं जो एसोसिएशन और उत्तराखंड राज्य में क्रिकेट के विकास को नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं क्योंकि वे एसोसिएशन के मौजूदा पदाधिकारियों के खिलाफ चुनाव हार गए हैं.”

बीसीसीआई जितनी आश्चर्यजनक धनराशि की घोषणा करता रहता है, उसका सत्तर प्रतिशत हिस्सा अपने राज्य संघों को सौंप दिया जाता है और अक्सर सीएयू के केलों का बिल बिल जैसे अस्पष्ट या अलेखापरीक्षित खर्चों के लिए जिम्मेदार होता है. सीओए के मिनटों में, इस आधार पर स्थापित एक ठोस फंड-संवितरण नीति का उल्लेख है कि राज्य संघों को बीसीसीआई फंड का वितरण एक समान नहीं होना चाहिए, बल्कि जरूरत, मौजूदा बुनियादी ढांचे और विकास कार्यक्रमों पर निर्भर होना चाहिए. राज्यों को बीसीसीआई के प्रति जवाबदेह बनाने की नीति को 26 जुलाई 2017 को बीसीसीआई की विशेष आम बैठक में सरसरी तौर पर खारिज कर दिया गया था. टर्की क्रिसमस के लिए मतदान क्यों करेंगे? राज्यों की फंडिंग बीसीसीआई के मनी ट्रेल्स में सबसे अधिक संरक्षित है, क्रिकेट जनसांख्यिकीय आकार, आवश्यकता या स्वतंत्र मूल्यांकन के आधार पर पुनर्गठन के खिलाफ सुरक्षा प्रदान की जाती है और इसके लाभार्थी अदृश्य रहते हैं.{पांच}

अतम जसचतमजख्चमताजइतमचवरगर भारतीय क्रिकेट में ''उगते सूरज सा कोई क्षेत्र" है जो राज्य संघों के समान धुंधलके से भरा हुआ है, तो वह जय शाह का ध्येय समूह है : महिला क्रिकेट. 2017 महिला विश्व कप में भारत की अंतिम उपस्थिति के बाद, महिलाओं का खेल व्यापक सार्वजनिक चेतना में फैल गया है और शाह बीसीसीआई में उनके पथप्रदर्शक के रूप में देखा जाना चाहते हैं. अक्टूबर 2022 में, बीसीसीआई सचिव फिर से चुने जाने के दो सप्ताह के भीतर, शाह ने भारत के अंतरराष्ट्रीय पुरुष और महिला क्रिकेटरों के लिए समान मैच फीस की घोषणा की. इसके बाद मार्च में महिला प्रीमियर लीग हुई, जिसमें बीसीसीआई ने उस तरह के वेतन की पेशकश की, जो दुनिया भर में महिला टीम के खेलों में शायद ही कभी देखा जाता है. हिंदुस्तान टाइम्स को दिए एक विस्तृत साक्षात्कार में, शाह ने कहा कि उनका मानना है कि वेतन समानता "भारतीय क्रिकेट के इतिहास में एक ऐतिहासिक क्षण" था और डब्ल्यूपीएल "आईपीएल के बाद दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी क्रिकेट लीग" थी. डब्ल्यूपीएल संख्या के आधार पर - पांच साल के मीडिया अधिकार सौदे के लिए 951 करोड़ रुपए और खिलाड़ियों का वेतन 26 साल पुराने डब्ल्यूएनबीए से ज्याद - महिला क्रिकेट एक उभरता हुआ उद्योग बन गया.

हेडलाइन बनाने वालों के बाहर की कहानियां और हेडलाइन बनाने वाले उनके आंकड़े अस्पष्ट और भयावह हैं. इस साल, देहरादून की एक विशेष पाक्सो अदालत ने सीएयू की महिला क्रिकेट के सह-संयोजक और चमोली जिला क्रिकेट एसोसिएशन के सचिव, 65 वर्षीय नरेंद्र शाह के खिलाफ एक मामले की सुनवाई की. एक किशोरी ने उन पर यौन उत्पीड़न, धमकाने और अश्लील फोन कॉल करने का आरोप लगाया था. एक बातचीत रिकॉर्ड की गई. पुलिस शिकायत में, शिकायतकर्ता के पिता, जो सितंबर में 16 साल की हो जाएगी, ने कहा कि नरेंद्र शाह कई सालों से उसे परेशान कर रहा था और उसे गलत तरीके से छू रहा था.

एफआईआर में नरेंद्र शाह पर यह भी आरोप लगाया गया है कि शिकायतकर्ता को सीएयू सचिव माहिम वर्मा और सीएयू सदस्य धीरज भंडारी, जिनका नाम वह अक्सर छोड़ देते थे, की शारीरिक जरूरतों को पूरा करना होगा. इसमें नरेंद्र पर नाबालिग को जातिवादी गाली देने का आरोप लगाया गया है: “ तुम लोग नीच जाति के लोग हो, तुम्हें उंची जाति के लोगो के साथ रहने का अधिकार तो नहीं है, फिर भी मैं तुम्हें खिला सकता हूं''  नरेंद्र को थोड़े समय के लिए गिरफ्तार कर लिया गया था, लेकिन उसकी रिमांड के लिए पुलिस की अपील को मजिस्ट्रेट ने खारिज कर दिया था, जिसमें नरेंद्र ने खराब स्वास्थ्य और आत्महत्या के प्रयास का हवाला दिया था. इस फैसले को अब चुनौती दी जा रही है. नरेंद्र को अदालत में तलब किया गया है और उस पर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत भी आरोप लगाए गए हैं. मामला विचाराधीन होने के कारण वर्मा ने इस मामले पर टिप्पणी करने से इनकार करते हुए कहा, "जैसे ही मामला सामने आया, सीएयू की शीर्ष परिषद ने श्री नरेंद्र शाह को उनके पद से हटा दिया" और मामला जांच के लिए आंतरिक शिकायत समिति में भेजा गया था.

भारतीय क्रिकेट में जिस तरह की संपत्ति उपलब्ध है और सुरक्षा उपायों की कमी है, उसे देखते हुए यह अनुमान नहीं लगाया जा सकता है कि अपने वरिष्ठों-कोचों, चयनकर्ताओं, अधिकारियों-द्वारा उत्पीड़न का सामना करने वाले क्रिकेटरों की अधिक सटीक संख्या क्या हो सकती है. खेल छोड़ चुकी महिला क्रिकेटर स्पष्ट तस्वीर खींचने में सक्षम हैं, लेकिन न तो अपने नाम और न ही उन राज्यों का खुलासा करने की शर्त पर, जिनका उन्होंने प्रतिनिधित्व किया है.

एक दशक से अधिक समय तक अपने राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाली एक क्रिकेटर को उस कोच की अनदेखी करने के कारण क्रिकेट से बाहर कर दिया गया, जिसने अंतिम एकादश में जगह देने के बदले में उससे यौन संबंध बनाने की मांग की थी. क्रिकेटर को एक श्रृंखला के लिए चुना गया, अगले दिन एक खेल में खेलने के लिए तैयार होने के लिए कहा गया और फिर छोड़ दिया गया. यह श्रृंखला के दौरान हुआ, जब तक कि एक मैच शेष रहते, वही निर्देश नहीं आया- कल के लिए तैयार रहें. आखिरी गेम से एक रात पहले रात 10 बजे कोच ने उसे किसी बहाने से अपने कमरे में बुलाया. उन्होंने कहा, "हमने इस लड़के के बारे में सुना था लेकिन नहीं पता था कि किस पर विश्वास करें."

क्रिकेटर ने कहा कि अफवाहें और संकेत थे. एक राज्य शिविर के दौरान, श्रृंखला से पहले जब कोच ने उस पर ध्यान दिया, तो शोधकर्ताओं की एक टीम महिलाओं के खेल में उत्पीड़न के बारे में डेटा इकट्ठा करने के लिए मैदान पर आई थी. उन्हें कोच की प्रतिक्रिया याद आई. “उसके चेहरे का रंग बदल गया,” उसने कहा. "उन्होंने सभी को सचेत किया कि आपको यह कहना होगा कि ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है - हमारा सहयोग बहुत अच्छा है, सुविधाएं अच्छी हैं."

जब उस रात कोच ने उसे बुलाया, तो क्रिकेटर ने अपना मोबाइल फोन बंद कर दिया और अपने कमरे का टेलीफोन भी बंद कर दिया. अगले दिन, वह फिर से खेल से बाहर हो गई और एक निराशाजनक चक्र में वापस आ गई: अपने जिले के लिए इतना अच्छा खेल रही थी कि उसे राज्य शिविर के लिए चुना जा सके, "लेकिन मैचों में नहीं खेल रही थी - मैं बस बाहर बैठती, यह तीन साल तक हुआ.” उनके राज्य की महिला क्रिकेट समिति का प्रमुख एक पुरुष था, जिसकी प्रतिष्ठा भी संदिग्ध थी. उन्होंने कहा, ''कोई भी सामने आकर इसके बारे में बोलना नहीं चाहता. इस सिस्टम से लड़ना आसान नहीं है और फिर आपका करियर है. मैं खामोश रही. मेरे पास कुछ साल बचे थे, मैंने सोचा कि मुझे खेलना चाहिए.”

जब उन्होंने यह जानने की कोशिश की कि क्या वह किसी अन्य राज्य का प्रतिनिधित्व कर सकती हैं, तो उन्हें, कई युवा भारतीय जूनियर क्रिकेटरों, पुरुष या महिला, की तरह भ्रष्टाचार के एक और दायरे के बारे में पता चला: यौन संबंधों के बारे में नहीं, बल्कि चयन के लिए सादे पैसे के पुराने तरीके के बारे में. “जब मैं अपने राज्य से एनओसी प्राप्त करने के बाद दूसरे राज्य में जाने की कोशिश कर रही थी, तो मुझे बताया गया कि दूसरे राज्य में सीनियर खेलने के लिए 5 लाख रुपए लगेंगे. आज यह लगभग सात से दस लाख है.” उन्होंने कहा कि उनका करियर अधूरा लगता है, “मैं डब्ल्यूपीएल का इंतजार कर रही थी कि यह मेरे लिए एक अवसर होगा, लेकिन जब यह आया, तो मुझे क्रिकेट छोड़ना पड़ा. मुझे बहुत बुरा लग रहा है, लेकिन कुछ चीजें खिलाड़ियों के हाथ में नहीं होतीं. हम असहाय हो जाते हैं.”

यहां जो कुछ भी होता है वह सिर्फ भाग्य का खेल नहीं है, जहां किसी का करियर चोट लगने या उस मैच में खराब प्रदर्शन के कारण समाप्त हो जाता है जहां चयनकर्ता देख रहे थे या उनकी तुलना में ज्यादा हुनरमंद खिलाड़ी थे. इसके बजाय, यह उस संस्थान का एक पहलू मात्र है जिसके पूर्व सीईओ राहुल जौहरी को यौन उत्पीड़न के आरोप में छोड़ दिया गया लेकिन लिंग संवेदीकरण प्रशिक्षण में भाग लेने की सलाह दी गई.

जब मैंने बीसीसीआई से यौन उत्पीड़न रोकथाम अधिनियम के तहत आंतरिक शिकायत समिति की अनुपस्थिति के बारे में पूछा, जो एक कानूनी आवश्यकता है, तो प्रतिक्रिया सामान्य थी. उन्होंने लिखा, “27 मई, 2023 को अहमदाबाद में आयोजित विशेष आम बैठक में पॉश नीति को अपनाने का मामला एक एजेंडा आइटम के रूप में लिया गया था. बैठक में, मुद्दे की संवेदनशीलता को देखते हुए, यह निर्णय लिया गया कि श्री देवजीत सैकिया और श्री आशीष शेलार की एक समिति को पॉश नीति के मसौदे की समीक्षा करने की जिम्मेदारी सौंपी जाएगी, क्योंकि ये दोनों पेशे से प्रतिष्ठित वकील हैं. तदनुसार, पॉश नीति को समीक्षा और अंतिम रूप देने के लिए उनके पास भेजा गया है. वे वर्तमान में पॉश नीति को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया में हैं. गौरतलब है कि बीसीसीआई फिलहाल आंतरिक समिति की नियुक्ति की प्रक्रिया में है और इस संबंध में घोषणा जल्द ही की जाएगी.''

भ्रष्ट या खराब कामकाज वाले राज्य संघों में महिला क्रिकेट की अचानक वृद्धि ने जूनियर क्रिकेट में प्रवेश करने वाले नाबालिगों की स्थिति को बहुत कमजोर बना दिया है. तथ्य यह है कि बीसीसीआई ने अभी तक अपनी खुद की एक पॉश-शासित समिति नहीं बनाई है और न ही उन मामलों पर रोक लगाई है जहां उसके राज्य-स्तरीय अधिकारियों पर उत्पीड़न, धमकी और धमकाने का आरोप लगाया गया है, जिससे अपराधियों को अधिक शक्ति मिलती है.

आईपीएल सौदे की घोषणाओं और आईसीसी राजस्व की अपडेट वितरण प्रणाली के बीच कई चेतावनियां दी गईं. मीडिया अधिकारों के अलावा, टीम इंडिया के सभी प्रायोजन समझौते भी "इस सुधार" के दौर से गुजर रहे हैं. नवंबर 2022 से, कुछ भारतीय क्रिकेट परिसंपत्तियों के मूल्यांकन में उल्लेखनीय कमी आई है. टीम किट, टीम जर्सी और श्रृंखला शीर्षक प्रायोजन के आसपास बीसीसीआई के प्रायोजन के साथ, पुराने साझेदार बाहर निकल रहे हैं और नए अल्पकालिक सौदों पर हस्ताक्षर किए जा रहे हैं.

पिछले पांच वर्षों में भारतीय टीम के पास तीन शर्ट प्रायोजक रहे हैं. मार्च 2017 में, ओप्पो ने बीसीसीआई के साथ पांच साल के समझौते के लिए 1,079 करोड़ रुपए देने का वादा किया था. 2019 में, ओप्पो इस व्यवस्था से हट गया और उन्हीं शर्तों के तहत बायजूस प्रायोजक रहा. शिक्षा-प्रौद्योगिकी फर्म बायजू ने शुरू में जून 2022 में अपने अनुबंध को अतिरिक्त 18 महीनों के लिए नवीनीकृत किया और बढ़ाया, लेकिन छह महीने बाद अपने फैसले को पलट दिया और तत्काल बाहर करने की मांग की. इसके बाद, बीसीसीआई ने 2017 में ओप्पो की विजयी बोली से "40 प्रतिशत छूट" -358 करोड़ रुपए - पर आधार मूल्य निर्धारित करते हुए एक नई जर्सी प्रायोजक की खोज शुरू की, जिसमें ओप्पो ने कथित तौर पर प्रति मैच 4.61 करोड़  रुपए  का भुगतान करने की प्रतिबद्धता जताई थी. 2022 में दो बोली लगाने वालों में से, ड्रीम 11, भारत का सबसे बड़ा फंतासी गेमिंग प्लेटफॉर्म, बीसीसीआई के आधिकारिक जर्सी प्रायोजक के रूप में उभरे, जो कथित तौर पर आधार मूल्य पर सहमत था. इसका मतलब है कि ड्रीम11 भारत के प्रत्येक मैच के लिए 3 करोड़ रुपए का योगदान देगा.

आधिकारिक किट और व्यापारिक प्रायोजकों की दुनिया में भी बदलाव हुए हैं - यानी, ऐसी कंपनियां जो टीम इंडिया की सभी तरह की जर्सी डिजाइन, निर्माण और बेचती हैं. सिग्नल के स्पोर्ट्स बिजनेस न्यूजलेटर प्लेबुक में विस्तार से बताया गया है कि भारतीय क्रिकेट में दो साल में तीन बदलाव देखने को मिले हैं. 2020 की दूसरी छमाही में, 2006 से बीसीसीआई के आधिकारिक किट प्रायोजक नाइकी ने अपने वार्षिक 370 करोड़ रुपए ($50 मिलियन) अनुबंध को नवीनीकृत नहीं करने का फैसला किया. बोर्ड ने नवंबर 2020 में एमपीएल स्पोर्ट्स के साथ तीन साल के समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसने पहले कभी खेल परिधान में काम नहीं किया था. इस समझौते के 2022 के अंत तक समाप्त होने के बाद, किलर जींस के निर्माता केवल किरण क्लोदिंग लिमिटेड नामक कंपनी ने पांच महीने की अवधि के लिए कदम रखा. नया लोगो पहली बार भारतीय क्रिकेटर युजवेंद्र चहल के ट्विटर फ़ीड पर दिखाई दिया, जब केकेसीएल ने दो मैचों के बाद मीडिया में घोषणा की कि भारतीय टीम पहले ही अपने लोगो वाली शर्ट पहनकर खेल चुकी थी. मई 2023 में, जय शाह ने अपने ट्विटर हैंडल पर घोषणा की कि एडिडास ने मार्च 2028 तक चलने वाले सौदे के लिए बीसीसीआई के आधिकारिक किट और मर्चेंडाइज प्रायोजक के रूप में हस्ताक्षर किए हैं. हालांकि आंकड़ों को गोपनीय रखा जा रहा है, इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार कहा गया कि एडिडास प्रति मैच 75 लाख रुपए का भुगतान करेगा, जो नाइकी के प्रति मैच 88 लाख रुपए से कम है.

हैदराबाद में चारमीनार के पास एक स्टॉल पर टेलीविजन में भारत और बांग्लादेश के बीच 2007 विश्व कप मैच देखते लोगा. नूह सीलम / एएफपी / गैटी इमेजिस

बीसीसीआई के लंबे समय से प्रायोजकों में से एक, पेटीएम, जिसके पास भारत की घरेलू श्रृंखला के शीर्षक अधिकार हैं, ने 2015 और 2019 के बीच प्रति मैच 2.4 करोड़ रुपए और फिर 2019 और 2023 के बीच प्रति मैच 3.8 करोड़ रुपए के लिए क्रमिक सौदे पर हस्ताक्षर किए. पेटीएम सौदा ख़त्म होने से नौ महीने पहले ही बाहर हो गया. अधिकार सितंबर 2022 और मार्च 2023 के बीच मास्टरकार्ड को हस्तांतरित कर दिए गए थे. इस साल 2 अगस्त को, बीसीसीआई ने एक नए प्रायोजक की तलाश शुरू की, जिसका आधार मूल्य 2.4 करोड़ रुपए प्रति मैच था, वही आंकड़ा जिस पर वह आठ साल पहले सहमत हुई थी. 25 अगस्त को, इसने आईडीएफसी फर्स्ट को सभी पुरुषों और महिलाओं के अंतरराष्ट्रीय, साथ ही घरेलू और जूनियर क्रिकेट के लिए अपने नए शीर्षक प्रायोजक के रूप में घोषित किया. आधिकारिक घोषणा पर कोई आंकड़ा सार्वजनिक नहीं किया गया, लेकिन रिपोर्टों का अनुमान है कि यह प्रति अंतरराष्ट्रीय मैच 4.2 करोड़ रुपए से 6.6 करोड़ रुपए के बीच है.

हालांकि ये उतार-चढ़ाव वाले सौदे बदलते आर्थिक परिदृश्य का हिस्सा हैं, जहां पहले नकदी-समृद्ध शिक्षा और फिन-टेक स्टार्ट-अप को अपनी निवेश रणनीतियों को फिर से तैयार करने के लिए मजबूर किया जा रहा है, बीसीसीआई की आधार कीमतों में कमी और बदलती प्रायोजन प्रतिबद्धताएं दो अन्य कारकों का संकेत देती हैं. यानी बाजार भारत के अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के वास्तविक मूल्य के साथ-साथ भारतीय क्रिकेट में गंभीर वित्तीय प्रतिबद्धता रखने के लिए तैयार एक अलग तरह के प्रायोजक की उपस्थिति को समायोजित कर रहा है. एमपीएल स्पोर्ट्स और ड्रीम11 दोनों के उदाहरण में, हम दो प्रतिद्वंद्वी फंतासी गेमिंग कंपनियों में क्रिकेट के दिग्गजों की एक नई प्रजाति पाते हैं. हालांकि, सरकार द्वारा ई-स्पोर्ट्स और ऑनलाइन गेमिंग पर 28 प्रतिशत वस्तु एवं सेवा कर की हालिया घोषणा से उनके मुनाफे में कटौती की उम्मीद है. चमचमाते नए अनुबंध अचानक अनिश्चित मार्गों पर चल रहे हैं.

बोर्ड के एक अधिकारी ने कहा, ''इस समय मेरा मानना है कि बीसीसीआई अपने इतिहास के संभवत: सबसे मुश्किल घोटाले से एक कदम दूर है.'' वह राज्य टी20 लीगों में फिक्सिंग घोटालों या बीसीसीआई साझेदारियों में फैंटेसी क्रिकेट की मौजूदगी के मुद्दों का जिक्र कर रहे थे. ये एक बार फिर, आईपीएल भ्रष्टाचार घोटाले की तरह, भारतीय क्रिकेट के लिए एक छवि तराशने की कसरत बन सकता है. लेकिन बीसीसीआई ने अपनी राष्ट्रीय टीम पर ध्यान केंद्रित करते हुए और आईपीएल को आगे बढ़ाते हुए अपनी राह पहले से कहीं आगे बढ़ा दी है. आज, जबकि भारतीय क्रिकेट की सतह लगातार चमक रही है, लेकिन इस चमक से पीछे की सच्चाई यह है कि इसमें राजनीति, धन, शक्ति, पहुंच और शोषण का पंजा कहीं गहरा है.


Sharda Ugra has been a sports journalist for over three decades. She has worked at The Hindu, India Today, ESPN and Mid-Day.