फेसबुक का मोदी मोह: आलोचना करने वाले पेज हो रहे ब्लॉक

02 फ़रवरी 2019
सरकार के खिलाफ बोलने और लिखने पर कार्यकर्ताओं को ब्लॉक कर चुप करने का प्रयास कर रहा फेसबुक.
शाहिद तांत्रे/कारवां
सरकार के खिलाफ बोलने और लिखने पर कार्यकर्ताओं को ब्लॉक कर चुप करने का प्रयास कर रहा फेसबुक.
शाहिद तांत्रे/कारवां

Unofficial PMO India नाम के फेसबुक पेज के 251000 फॉलोअर्स हैं. ये सत्ताधारी एनडीए सरकार के खिलाफ लगातार मीम पोस्ट करता है. 25 जुलाई 2018 को ये फेसबुक के सोशल मीडिया “कम्युनिटी स्टैंडर्ड” का शिकार हो गया. ये नियम बताते हैं कि “फेसबुक पर क्या कर सकते हैं और क्या नहीं. ये विश्व भर में लागू होता हैं.” इस पेज के लिए मुसीबत तब खड़ी हुई जब इसने पीएम नरेंद्र मोदी की एक बच्चे के साथ तस्वीर अपलोड की, जिसमें हिटलर की ऐसी ही तस्वीर लगाकर दोनों की तुलना की गई थी. कुछ ही घंटों में फेसबुक ने पहले तस्वीर हटाई और फिर पेज बंद कर दिया. यह पेज मेरे दोस्त फर्जा (जो मुंबई के बाहर से हैं) और तीन अन्य लोग चलाते हैं. जैसे ही पेज हटाया गया, फर्जा ने मुझे घबराहट में फोन किया. उन्हें डर था कि तस्वीर और पेज हटाए जाने के बाद उनके अकाउंट को हटाया जा सकता है. इसके कुछ ही घंटों बाद फर्जा समेत पेज चलाने वाले बाकी लोगों का अकाउंट 30 दिनों के लिए सस्पेंड कर दिया गया. फर्जा ने मीलों दूर से एक और इमरजेंसी कॉल करके मुझसे पूछा, “अब क्या करें?” मेरे पास इसका कोई माकूल जवाब नहीं था. 

अब ये आम हो गया है. हर हफ्ते मुझे ऐसे यूजर्स का कॉल आता है जिनका अकाउंट कम्युनिटी स्टैंडर्ड की किसी ऐसी बात का उल्लंघन करने से सस्पेंड कर दिया गया है जो अभी साफ नहीं है. ये कॉल ऐसे यूजर का होता है जिसने नरेंद्र मोदी सरकार या उससे जुड़ी विचारधारा के खिलाफ कुछ पोस्ट किया हो. 2015 से मेरे पास आए ऐसे हर कॉल को मैंने डॉक्यूमेंट किया. इससे मैंने ये समझने की कोशिश की कि क्या ये गलत एल्गोरिथ्म की वजह से अपने आप हो रहा है या फेसबुक द्वारा सस्पेंड किए जाने के पीछे कोई एजेंडा है. सस्पेंड किए जाने का समय एक से 30 दिनों का होता है. कुछ मामलों में ये समय ज्यादा भी होता है. ये साफ नहीं है कि कैसी चीज के लिए कितने दिनों तक अकाउंट को सस्पेंड किया जा सकता है.

तीन दिनों तक इस डेटा को व्यवस्थित करने पर एक ढर्रा नजर आया. जितनी भी सस्पेंड की गई प्रोफाइलें मेरे पास थीं, उन्हें फेसबुक के कम्युनिटी स्टैंडर्ड के उल्लंघन के नाम पर सस्पेंड किया गया था. जब मुझे इनमें एक समान बात नजर आई तो मैंने ज्यादातर सस्पेंड की गई प्रोफाइलों को तीन तरह की फेसबुक एक्टिविटी की कैटगरी में बांट दिया- जिन्होंने मोदी के खिलाफ मीम पोस्ट किए थे, जिन्होंने सरकार की नीतियों का विरोध किया था और ऐसी चीजों को शेयर किया था जो पिछली दो श्रेणियों में आती हों. हर मामले में कभी कोई साफ वजह नहीं दी जिससे पता चले कि किस पोस्ट ने कम्युनिटी स्टैंडर्ड का उल्लंघन किया है या किस कम्युनिटी गाइडलाइन का पालन नहीं किया है. प्रोफाइलों के फिर से बहाल होने के बाद भी इन पर कोई सफाई नहीं दी गई.

विश्व में फेसबुक के 2.27 बिलियन और भारत में 270 मिलियन एक्टिव यूजर्स हैं. फेसबुक के कई सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म हैं जिनका आर्थिक प्रभाव बहुत हैं. फेसबुक नाम के इस देश में कौन सी बातें कम्युनिटी स्टैंडर्ड का हिस्सा है वह अप्रैल 2018 तक एक रहस्य था. लेकिन फिर कंपनी ने इसे सार्वजनिक कर दिया. इस मौके पर फेसबुक की प्रोडक्ट पॉलिसी और आंतकरोध की प्रमुख मोनिका विकेर्ट ने रॉयटर्स से कहा, “कम्युनिटी स्टैंडर्ड गाइडलाइन किसी नीतियों का एक तय ढर्रा नहीं है. इसके नियम अक्सर बदल जाते हैं.” विकेर्ट ने कहा कि हर दो हफ्ते पर वो एक कॉन्टेंट स्टैंडर्ड फोरम का नेतृत्व करती हैं. इसमें वरिष्ठ अधिकारी मिलकर आपत्तिजनक कॉन्टेंट हटाने की नीतियां बनाते हैं. इस फोरम में कंपनी के नीति विभाग के अधिकारी भी होते हैं जिन्हें 100 से अधिक बाहरी संस्थाओं से जानकारी दी जाती है और इस क्षेत्र के विशेषज्ञ भी इस मामले में अपनी जानकारी देते हैं. उदाहरण के लिए, “बच्चों के शोषण और आतंकवाद के मामलों के विशेषज्ञ.”

लेकिन इन कम्युनिटी गाइडलाइन को कैसे बनाया या बदला जाता है, इसकी जानकारी उपलब्ध नहीं है. कम्युनिटी पॉलिसी को बदलना संविधान को बदलने जैसा है, जिसमें स्थिरता काफी मुश्किल होती है. इन बदलाव की खामियों की वजह से फेसबुक डिजिटल दुनिया के “बनाना रिपब्लिक” की तरह फलता-फूलता है. इसके ज्वलंत सामाजिक प्रभाव की वजह से सालों से डिजिटल अधिकार से जुड़े कार्यकर्ता फेसबुक के कम्युनिटी पॉलिसी अल्गोरिथम को ऑडिट करने का अनुरोध कर रहे हैं. लेकिन अभी तक इसका कोई फायदा नहीं हुआ है.

इंजी पेन्नू डिजिटल ऐक्टविस्ट और प्रौद्योगिकीविद हैं.

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