फोटो में चक्रवात अम्फान का कहर, आंदुल और 24 परगना की तस्वीरें 

23 मई को दक्षिण 24 परगना के बक्खाली गांव में चक्रवात अम्फान से गिरे पेड़ों के बीच से गुजरती एक महिला. चक्रवात अम्फान 20 मई को आया था और इसमें 260 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से आंधी चली थी.
फोटो एवं रिपोर्ट Ranita Roy
19 June, 2020
चक्रवात से पश्चिम बंगाल के तटीय इलाके और नदियों के किनारों में तबाही मच गई. तूफान के दौरान हुई भारी वर्षा से पूरे इलाके में बाढ़ की स्थिति आ गई. हावड़ा जिले के आंदुल की सीतलाताला में पानी भरे रास्ते को पार करती एक महिला.
सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्रों में से एक, जिला दक्षिण 24 परगना। 23 मई को तूफानी हवाओं से टूटे बिजली के खंबे के बीच उजाड़ पड़ा बक्खाली समुद्र तट.
बंगाल की खाड़ी से उठे चक्रवात, अम्फान के दौरान तूफानी हवाओं को शायद ही कभी रिकॉर्ड किया गया हो. बक्खाली में, 23 मई को एक टूटे हुए मोबाइल-टॉवर के पास एक महिला बेताबी से राहत दलों का इंतजार करती हुई. इस दौरान बिजली और सारी दूरसंचार सेवाएं ठप्प हैं.
21 मई को, चक्रवात के थमने के बाद आंदुल कस्बे की एक ग्रामीण बस्ती, उत्तर हाटगाचा के निवासी अपने घरों से बचा हुआ सामान निकालते हुए. स्थानीय निवासी सुलेना खातून, कस्बे में एनसी पॉल ब्रिज के पास रहती हैं. उनके घर पर एक विशाल पेड़ गिरने से उनका आधे से ज्यादा घर बर्बाद हो गया, उनकी रसोई पूरी तरह से तबाह हो गई। खातून के पड़ोसियों ने उनके टूटे पड़े घर से अनाज और सामान निकालने में मदद की.
23 मई को, दक्षिण 24 परगना में, लगभग पचास किलोमीटर के एक इलाके में, जो बक्खाली से पाथरप्रतिमा तक फैला हुआ है, टूटी हुई इमारतों को देखा जा सकता है. बक्खाली गांव से ठीक पहले, फिफ्थ मील के पास, चक्रवात के चलते तबाह हुए प्राथमिक स्कूल. आंधी ने स्कूल की छप्पर उड़ा दी.
आधिकारिक अनुमानों के अनुसार, दक्षिण 24 परगना जिले के लगभग चार लाख किसान इस चक्रवात से प्रभावित हुए हैं, इससे ज्यादातर की फसल पूरा तरह बर्बाद हो गई है. बक्खाली के सिक्स्थ माइल इलाके में खेती करने वाला सुपारी का किसान, जो कुछ भी बचाया जा सके उसे बचाने की कोशिश करता हुआ.
चक्रवात के अगले दिन, एक औरत जिसके घर में भारी बारिश से बाढ़ के कारण पानी भर गया था, अपने घर से जो भी सामान और कपड़े लाए जा सकते थे, लाती हुई। वह अंदुल में रेलवे स्टेशन के पास रहती है. तूफान में टूटकर आए पेड़ों ने उसके घर के रास्ते को रोक दिया था.
बक्खाली समुद्र तट और उसके आस-पास की सभी दुकानें कोविड-19 महामारी को काबू में करने के लिए लगाए गए राष्ट्रव्यापी तालाबंदी के कारण बंद कर दी गई थीं. समुद्र तट के करीब दो खोमचे चक्रवात में पूरी तरह से बर्बाद हो गए.
सुपर साइक्लोन के तत्काल बाद पीने के पानी की परेशानी खड़ी हो गई. अंदुल शहर के एक छोटे से इलाके उत्तर हाटगाचा में, स्थानीय लोगों को उत्तर हाटगाचा स्पोर्टिंग क्लब के पास स्थित क्षेत्र में एकमात्र ट्यूबवेल से पीने का पानी लाने के लिए मजबूर होना पड़ा. उनकी तकलीफों को और बढ़ाते हुए ट्यूबवेल के ठीक ऊपर एक पेड़ गिर गया था.
21 मई की सुबह, आंदुल में सीतलाताला बस्ती के पास, स्थानीय औरतें अपने घरों के रास्ते में पड़े पेड़-पौधों, उखड़ी हुई सड़क, उखड़े पड़े बिजली के खंबे के बीच से रास्ता बनाती हुईं.
चक्रवात के बाद सीतलाताला बस्ती के लोग अपने घरों की छतों को बनाने के लिए खप्पड़ ले जाते हुए.
बक्खाली समुद्र तट पर पूरी तरह ध्वस्त दो घर.
बक्खाली के सिक्स्थ माइल इलाके में एक टूटे हुए पेड़ पर बैठकर बिजली के खंबों की मरम्मत होते देखता एक नौजवान.
20 मई को जब चक्रवात अपनी पूरी तीव्रता में था, उत्तर हाटगाटा स्पोर्टिंग क्लब के नजदीक दो भीमकाय वृक्ष गिरे. इस बीच पूरे इलाके में पानी भर गया था.

20 मई की सुबह मुझे समाचारों और विंडी वेदर एप से पता चला कि पश्चिम बंगाल के दक्षिणी जिले, हावड़ा में बसा मेरा शहर आंदुल चक्रवात अम्फान की चपेट में आने वाला है. सुबह 6 बजते-बजते बारिश के साथ तेज हवा चलने लगी. शाम लगभग 4 बजे बारिश तेज हो गई और बिजली की आपूर्ति एक घंटे पहले ही कट चुकी थी. शाम 7 से रात 9 बजे के बीच हमने खिड़कियों से चक्रवात देखा. पेड़ जमीन पर गिर रहे थे और तेज हवाओं से खिड़कियां टूटी जा रही थीं.

मैं आंदुल स्टेशन के पास के अपने इलाके उत्तर हाटगाचा का हालचाल लेने रात लगभग 9.30 बजे घर से निकली. इलाके के कई बिजली के खंबे और करीब 50 पेड़ जमीन पर बिखरे पड़े थे. मेरे इलाके में प्रवेश करने वाले रास्ते को दो बड़े पेड़ों ने अवरुद्ध कर दिया था और लगातार बारिश हो रही थी.

अगली सुबह मैं सुबह 4 बजे उठी और घर से बाहर निकली. मैंने देखा कि निवासी सड़कों पर थे और उन्होंने सड़क पर गिरे पेड़ों को काटना शुरू कर दिया था. उत्तर हाटगाचा से लगभग एक किलोमीटर की दूरी पर हुगली नदी के पास दो झुग्गियां, सीतलाताला बस्ती और पंचपारा, हैं जहां गिरे हुए पेड़ों और पानी के भराव ने घरों को पूर्ण और आंशिक रूप से नष्ट कर दिया था. लगभग 150 लोग बेघर हो गए थे.

बिजली की सप्लाई अभी भी नहीं हो रही थी और पीने के पानी की कमी थी. क्षेत्र में एक ट्यूबवेल है लेकिन यह इलाके के सभी लोगों के लिए पर्याप्त नहीं था इसलिए लोगों को पीने के पानी की एक बाल्टी के लिए लंबे समय तक इंतजार करना पड़ रहा था. हावड़ा जिला इस तूफान से सबसे बुरी तरह प्रभावित हुआ था.

आठ दिनों के बाद अंततः 27 मई की शाम को, जब लोगों ने पैसा जोड़ कर एक बिजली वाले को बुलाया, जा कर बिजली की सप्लाई बहाल हो पाई. चक्रवात के दो दिन बाद, तृणमूल कांग्रेस द्वारा शासित राज्य सरकार के खिलाफ आंदुल के स्थानीय लोगों ने विरोध प्रदर्शन करना शुरू कर दिया और 23 मई को बिजली की मांग को लेकर हड़ताल की. मैंने जिन स्थानीय लोगों से बात की उनके अनुसार अगले दिन हड़ताल हिंसक हो गई. उस दिन मेरे इलाके के ग्रामीण जन बिजली की मांग को लेकर निवेदन करने प्रधान के पास गए थे. मेरे पड़ोस में रहने वाली एक 16 वर्षीय लड़की नीलाद्रि दत्ता ने मुझे बताया कि प्रधान के घर के बाहर भीड़ में गर्मा-गरम बहस होने लगी जो लगभग दो घंटे तक चली. दत्ता ने इस बहस का एक वीडियो भी रिकॉर्ड किया.

दत्ता ने मुझे बताया, "24 मई को हमारे पड़ोस में बिजली नहीं आई थी इसलिए पड़ोस के सभी लोग हमारे प्रधान के घर यह देखने के लिए गए कि हमें बिजली कैसे मिल सकती है. वह पेड़ों को काटने के लिए पूछने गए थे. उसी को लेकर हंगामा हुआ था." उन्होंने कहा कि ग्रामीणों से बात करने के लिए डिप्टी प्रधान रूपम साधुखान भी आए थे. "वह हमें यह समझाने की कोशिश कर रहा थे कि वह भी काम कर रहे हैं और हम उन्हें परेशान ना करें. इस पर आपस में झगड़ा शुरू हो गया. हमने पहले भी कहा था कि काम अच्छा नहीं हुआ है. इसीलिए मैंने सबूत के रूप में एक वीडियो बना कर रख ली. मुझे लगता है कि उन्हें मेरा वीडियो लेना अच्छा नहीं लगा, लेकिन मैं नहीं रुकी क्योंकि हमें इसकी आवश्यकता है."

प्रधान के पति सदानदा सेनापति भी वहां मौजूद थे. उन्होंने आकर दत्ता को मारा. दत्ता ने कहा, "जहां तक ​​मुझे याद है उन्होंने मुझे वीडियो लेने से रोकने के लिए ऐसा किया था. फिर वह घर के अंदर चले गए और हमें घर वापस भेज दिया गया. उन्होंने कहा कि वह काम संतोषजनक ढंग से करेंगे. हमें इसके बारे में बहुत अधिक सोचने की जरूरत नहीं है." दत्ता ने आगे बताया, "हम और लोगों को लेकर दुबारा उनके घर आए और उनसे जानना चाहा कि मुझे क्यों मारा. इस पर बहुत लड़ाई हुई लेकिन लोगों पर ज्यादा हमला नहीं हुआ केवल मारपीट की गई. अंत में वह कुछ भी सुनने के लिए तैयार नहीं हुए. सभी लोग तितर-बितर हो गए. उनके कुछ लोगों ने हमें रोका लेकिन हम अंततः घर चले गए.

23 मई को मैंने एक कार किराए पर ली और दक्षिण 24 परगना जिले के गांवों पाथरप्रतिमा, बक्खाली, फ्रेजरगंज और सिबरामपुर गई. मैं जिले के एक छोटे शहर काकद्वीप में भी गई. दक्षिण 24 परगना मेरे घर से लगभग 140 किलोमीटर दूर है और मैंने छह महीने पहले आए एक और तूफान बुलबुल के बाद क्षेत्र का दौरा किया था. मैं चक्रवात अम्फान की अभूतपूर्व तीव्रता से सबसे अधिक प्रभावित कुछ क्षेत्रों की नाजुक पारिस्थितिकी पर तूफान के प्रभाव को रिकॉर्ड करना और तुलना करना चाहती थी.

बक्खाली के पास एक जगह. जिसे फिफ्थ माइल के नाम से जाना जाता है. पर मैंने लगभग 15 लोगों को देखा. ग्रामीणों में से एक ने मुझे बताया, "हमें कुछ भी नहीं मिला. पंचायत में आने वाली सभी चीजों को उन लोगों को दिया गया है जो सत्तारूढ़ दल से जुड़े हैं. अब हम क्या करेंगे? हम कहां रहेंगे?”

क्या ऐसा पहली बार हुआ है? उस आदमी ने मुझे बताया कि उस समय भी और अब फिर से उनके घर टूट गए और वे उन्हें स्वयं ही ठीक करते हैं. "वे (प्रशासन के लोग) तभी दिखते हैं जब वोट मांग रहे होते हैं.”

उस दिन मैंने बक्खाली समुद्र तट का भी दौरा किया था. वैश्विक कोरोनोवायरस का मुकाबला करने के लिए लगाए गए राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन के कारण यहां की दुकानें पहले ही बंद हो गई थीं. वहां मैंने देखा कि दो महिलाएं समुद्र तट के पास एक टूटे हुए घर से ईंटें इकट्ठा कर रही थीं. उन्होंने मुझे बताया, “हम अपने घर के लिए इनका इस्तेमाल करेंगी जो तूफान में टूट गए हैं.” मैं समुद्र तट के पास खुली एक दुकान पर गई. दुकानदार ने मुझे बताया कि लॉकडाउन के कारण अब कोई भी खरीदारी करने के लिए इस क्षेत्र में नहीं आता है और चक्रवात के कारण यह और भी सुनसान हो गया है. “यहां खाने के लिए कुछ नहीं है क्योंकि कोई भी यहां नहीं आता है. इसलिए कुछ भी नहीं बेचा जा रहा है. भोजन के सभी पैकेट खराब हो गए हैं. यहां बिजली नहीं है और फ्रिज काम नहीं कर रहा है इसलिए कोई कोल्ड ड्रिंक भी नहीं पीता है.”

उस दिन बाद में गांव से करीब 11 किलोमीटर पहले सिबरामपुर के रास्ते में मैं दो क्षेत्रों में गया, जिसे फिफ्थ माइल और सैवन्थ माइल कहा जाता था, जो चक्रवात से बुरी तरह प्रभावित हुआ थे. सिबरामपुर से लगभग 6 किलोमीटर की दूरी के एक गांव दक्षिण दुर्गापुर के कई मुस्लिम ग्रामीण वहां मेघनाद भवन के एक स्कूल की इमारत में रह रहे थे क्योंकि वे अपना घर खो चुके थे. वहां रह रहीं महिलाओं में से एक, जो भवन के प्रथम तल पर रह रही थी, ने मुझे बताया, "हम तूफान के बाद से इस स्कूल में हैं." कई ग्रामीणों ने मुझे बताया कि उन्हें सरकार से कोई मदद नहीं मिली है. उन्होंने कहा कि उनके गांव के लगभग सभी लोगों ने स्कूल में शरण ली है.

एक ग्रामीण ने कहा, "एक बच्चा बीमार था. हम उसे दवा दिलाने के लिए पंचायत ले गए पर हमें वहां कुछ नहीं मिला." एक और ग्रामीण ने बताया, “सिर्फ हम ही जानते हैं हम कैसे गुजारा कर रहे हैं. कोई भी हमारी मदद नहीं कर रहा है. एक-एक करके हम अपने घरों को ठीक करने के लिए निकलते हैं और फिर यहां लौट आते हैं.”

तूफान में मारे गए कुल 98 लोगों में से 24 लोग दक्षिण 24 परगना जिले के हैं और अधिकारियों का अनुमान है कि अकेले इस जिले में 10 लाख से अधिक घर ढह गए हैं और लगभग चार लाख किसान तूफान से प्रभावित हुए हैं. दक्षिणी पश्चिम बंगाल के हावड़ा और दक्षिण 24 परगना सहित कुछ हिस्सों में बिजली की आपूर्ति और पीने के पानी को बहाल करने में एक सप्ताह से दस दिन तक का समय लगा और बाढ़ से दुर्गम बने दूरदराज के इलाकों या क्षेत्रों में अभी भी राहत दल नहीं पहुंचा है. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने चक्रवात के कुछ घंटों बाद स्थिति का जायजा लिया. उन्होंने कहा कि “दक्षिण और उत्तर 24 परगना “समाप्त… दक्षिण बंगाल का 99 प्रतिशत नष्ट हो गया है."

अनुवाद : अंकिता