एशिया का पहला समाचार पत्र शुरू करने वाले ऑगस्टस हिक्की पर हमले का इतिहास

1781 में हिक्कीज बंगाल गजट की एक प्रति का पहला पन्ना. हिक्की स्वयं को बोलने की स्वतंत्रता के रक्षक के रूप में देखते थे. सौजन्य : हीडलबर्ग विश्वविद्यालय
1781 में हिक्कीज बंगाल गजट की एक प्रति का पहला पन्ना. हिक्की स्वयं को बोलने की स्वतंत्रता के रक्षक के रूप में देखते थे. सौजन्य : हीडलबर्ग विश्वविद्यालय
27 December, 2022

भारत के पहले समाचार पत्र पर लिखी एंड्रयू ओटिस की किताब हिक्कीज बंगाल गजट : द अनटोल्ड स्टोरी में कलकत्ता में रहते हुए 1780 में एशिया का पहला मुद्रित समाचार पत्र शुरू करने वाले पत्रकार जेम्स ऑगस्टस हिक्की के संघर्षों  के बारे में बताया गया है. इस समाचार पत्र के जरिए उन्होंने भारत में ब्रिटिश शासन पर सवाल उठाए; पोलिलुर की लड़ाई के भयावह प्रभावों को सबके सामने पेश किया और चर्च और ईस्ट इंडिया कंपनी में चल रहे भ्रष्टाचार को उजागर किया और प्रेस की स्वतंत्रता की वकालत की. ओटिस को लगता है कि हिक्की का समाचार पत्र विरोधाभासी किस्म का था. उदाहरण के लिए, उन्होंने महिलाओं के चरित्र के बारे पारंपरिक पुर्वाग्रहों का समर्थन करने वाले लेखों को छापा और साथ ही यह तर्क दिया कि महिलाओं को अपनी कामुकता पर नियंत्रण रखना चाहिए.

ओटिस बताते हैं कि हिक्की की विरासत अत्यधिक सरलीकरण और गलतफहमी से जुड़ी रही है. वह लिखते हैं, "ब्रिटिश साम्राज्य काल के दौरान विद्वानों ने हिक्की को ब्रिटिश साम्राज्य को कमजोर करने वाले एक बदमाश और कपटी के रूप में देखा." कुछ हालिया इतिहासकार इसके वितरित दावा करते हैं कि हिक्की का अखबार पत्रकारिता के क्षेत्र में बेजोड़ और अद्वितीय रत्न की तरह था. पत्रकार के जीवन और कार्य के बारे में बताने वाली ओटिस की पुस्तक अखबार की कुछ शेष प्रतियों और हिक्की के पत्रों सहित अभिलेखीय शोध पर आधारित है.

सर्वप्रथम वेस्टलैंड द्वारा प्रकाशित की गई और हाल ही में पेंगुइन रैंडम हाउस द्वारा पुनर्प्रकाशित इस पुस्तक के नीचे दिए गए अंश में ओटिस ने हिक्की की गिरफ्तारी का वर्णन किया है. अपने पेपर के माध्यम से हिक्की ने विशेष रूप से उस समय के गवर्नर-जनरल वॉरेन हेस्टिंग्स को "निरंकुश" बता कर विरोध किया था और कहा था कि वह नपुंसक (इरेक्टाइल डिसफंक्शन) है. हिक्की पर अंततः मानहानि का मुकदमा किया गया लेकिन उन्होंने जेल से पेपर प्रकाशित करना जारी रखा.

पढ़ें अंश :

गरूवार रात दो से तीन बजे के बीच

5 अप्रैल 1781, कलकत्ता

हिक्की चौंक कर उठे और अपने बेडरूम की खिड़की पर आ कर अंधेरे के धुंधलके में झांक कर देखने की कोशिश की. उन्होंने नीचे से चीखने-चिल्लाने की आवाजें सुनीं. "क्या है? इतना शोर क्यों है?" वह अपनी खिड़की खोल कर चिल्लाए.  उन्होंने अंधेरे में कुछ लोगों को दौड़ते देखा. तीन लोग उनके घर में घुसने की फिराक में थे. जिनमें से दो यूरोपियन थे और उन्होंने उस रस्सी को काट दिया था जिससे उनका पिछला गेट बंद था.

वह दौड़ कर नीचे आए लेकिन उनके नीचे आने से पहले ही वे लोग भाग गए. उन्होंने अपने नौकरों से पूछा कि ये लोग कौन हैं. उन्होंने बताया कि एक शहर में सार्वजनिक घर का मालिक फ्रेडरिक चार्ल्स और दूसरा थिएटर में मेसिंक का सहायक था. चार्ल्स के साथ हिक्की का संबंध दोस्ताना तो कतई नहीं था. जब उन्होंने कलकत्ता में अपने शुरुआती वर्षों में चिकित्सा का अभ्यास किया था, तब चार्ल्स ने एक बार की गई सर्जरी के लिए भुगतान करने से इनकार कर दिया था. उन्हें अपना पैसा पाने के लिए चार्ल्स पर मुकदमा करना पड़ा था.

हिक्की ने एक पल के लिए सोचा कि ये लोग रात में उसके घर में क्यों घुसेंगे? वे उस पर हमला क्यों करना चाहेंगे? फिर, सब कुछ एक पहेली की तरह सुलझ कर सामने आ गया. चार्ल्स के पीछे उन्होंने मेसिंक को देखा और मेसिंक के पीछे हेस्टिंग्स को देखा जिससे वह जान गए कि यह एक हत्या का प्रयास था. और अगर ऐसा नहीं है तो कम से कम चुप कराने की धमकी तो देना ही चाहते थे. उन्हें अपने ऊपर एक और हमले का डर था इसलिए उन्होंने अपने घर की रखवाली के लिए सिपाहियों को रख लिया और अपने नौकरों से कहा कि उनकी अनुमति के बिना किसी को अंदर न आने दिया जाए.

हो सकता है कि ऐसी चेतावनी से कमजोर दिल के लोग डर जाएं, लेकिन इस घटना ने उन्हें निडर बना दिया था. अगर यह बस चुप कराने की चेतावनी होती तो वह ठीक इसका उल्टा करता. वह डरा हुए नहीं थे. वह ठान चुके थे कि समाचार लिखने के अपने अधिकार का आत्मसमर्पण करने के बजाय, तब तक लड़ते रहेंगे जब तक उनके शरीर में एक भी सांस बाकी है. उन्हें विश्वास हो गया कि उन्हें लोगों की चेतना को जगाने और उन्हें उस अत्याचार को दिखाने की जरूरत है जिसके डर में वे जी रहे थे.

कलकत्ता के दृश्य में प्रकाशित थॉमस डेनियल की पेंटिंग में दाहिनी ओर सुप्रीम कोर्ट हाउस और राइटर्स बिल्डिंग बायीं ओर. स्रोत: नॉर्मन आर. बोबिन्स और एस.पी. लोहिया दुर्लभ पुस्तकों का संग्रह. सौजन्य : हीडलबर्ग विश्वविद्यालय

उन्होंने खुद को अत्याचारियों के लिए अभिशाप, मुक्त भाषण का रक्षक और लोगों का रक्षक के रूप में देखा. उन्होंने खुद को भ्रष्टाचार और उत्पीड़न के खिलाफ एकमात्र बची आशा की तरह देखा. उनका मानना था कि एक ऐसी जगह जहां मौलिक अधिकारों को खत्म कर दिया गया हो और जहां लोग गुलामी में रहते हों, वहां उनके जैसा कोई स्वतंत्र प्रेस वाला व्यक्ति लोगों के अधिकारों को बहाल कर सकता है और उनकी स्वतंत्रता को वापस स्थापित कर सकता है.

***

ओरिजनल बंगाल गजट के प्रिंटर की हत्या के हाल के प्रयास के चलते हिक्की ने ऐसा सोचा होगा. हिक्की का मानना था कि नियति ने तय किया है कि उन्हें भारत में अत्याचारी खलनायकों के लिए विपत्ति बनना होगा. सत्ता के निरकुंश अत्याचारियों से निडर होकर वह आगे बढ़ने और टिके रहने पर दृढ़ रहे. जब तक उनके शरीर में मांसपेशियां काम करती रहेंगी तब तक वह उन हमलों का जवाब देते रहेंगे. यदि उन्हें सत्ता के बेईमान लुटेरों के द्वेष का शिकार बन जाना पड़ा तो भी वह देशवासियों की पूंजी और प्रेस की स्वतंत्रता के लिए खुद को शहीद कर देने से पीछे नहीं हटेंगे. हिक्की प्रेस की स्वतंत्रता को अंग्रेजों और एक स्वतंत्र सरकार के अस्तित्व के लिए आवश्यक मानते हैं.

स्वतंत्रता को अत्याचारी और समुदाय के लिए हानिकारक मानने वाले विचारों को रोकने के लिए व्यक्ति को अपने सिद्धांतों, विचारों और हर काम को निडरता से सामने रखने के लिए पूर्ण स्वतंत्र होना चाहिए. प्रेस वह माध्यम है जिसके जरिए लोगों के बीच राय का प्रसार किया जाता है, (वोक्स पोपुली, वोक्स देई) लोगों की आवाज भगवान की आवाज है. यह संवैधानिक सेंसर और राजकुमारों का नियंत्रक, बुरे मंत्रियों के अत्याचार और निरंकुशता से लोगों को बचाए रखने के लिए सबसे प्रभावशाली मशीन है.

प्रेस की स्वतंत्रता इतनी मजबूत चीज है कि यदि कभी संविधान को पलट दिया जाए तो गुलामी की दयनीय स्थिति में शामिल लोग स्वतंत्र प्रेस के सहारे देश की आत्मा को जल्द ही बहाल कर सकते हैं, और बिना इसके पृथ्वी पर मौजूद सबसे बहादुर इंसान भी अपने अधिकारों और स्वतंत्रताओं को लंबे समय तक संरक्षित नहीं रख सकता. अगले कुछ हफ्तों में हिक्की का लेखन मौसम की तरह गर्म होता गया.

वह अब केवल निरंकुशता को इंगित करने वाले नहीं रह गए थे, वह लोगों से इससे लड़ने की अपील भी कर रहे थे. उनके अगले लेख सबसे उग्र थे. दो संस्करणों के बाद उन्होंने कैसियस उपनाम वाले किसी व्यक्ति द्वारा लिखा एक लेख प्रकाशित किया. कैसियस ने कंपनी के सैनिकों से कहा कि हेस्टिंग्स के लिए लड़ने से पहले उन्हें दो बार सोचना चाहिए क्योंकि हेस्टिंग्स एक राजा की तरह शासन कर रह था जिसे जीत के अपने सपनों को पाने के लिए सैनिकों का बलिदान करने में भी कोई गुरेज नहीं था. कैसियस ने सैनिकों को याद दिलाया कि उनकी अंतिम वफादारी ब्रिटिश लोगों के प्रति होनी चाहिए, न कि इस 'मुगल' के प्रति और अगर हेस्टिंग्स कंपनी के निदेशकों की बात नहीं मानता, तो उन्हें भी हेस्टिंग्स की बात नहीं मानने में कोई गुरेज नहीं होना चाहिए.

यहां तक की कैसियस नाम भी एक चतुराई थी. कैसियस रोमन सीनेटर था जिसने जूलियस सीजर को मारने और रोमन गणराज्य को बहाल करने की साजिश रची थी. यह नाम अपने आप में ही उन लोगों से सावधान रहने की एक चेतावनी थी जो सम्राट बनना चाहते हैं. प्राचीन रोम और बंगाल के बीच कैसियस का संबंध बहुत जटिल नहीं था. और उसका सबक स्पष्ट था कि उठो और हेस्टिंग्स को उखाड़ फेंको, इससे पहले कि बहुत देर हो जाए.

इस लेख ने हिक्की को राजद्रोह के कगार पर ला खड़ा कर दिया था. इसमें सुझाव दिया गया कि सेना विद्रोह करेगी और शायद तख्तापलट भी. इसमें दावा किया कि हेस्टिंग्स ने शासन करने का अधिकार खो दिया है क्योंकि उसने जीत के सपने के लिए सैनिकों के जीवन को खतरे में डाल दिया है, जो एक पागल आदमी के ख्वाब खी खातिर अपना जीवन बलिदान कर रहे हैं. हिक्की ने अपने आप को एक उत्तेजक लेखक में बदल दिया. अधिकारियों से उनकी वफादारी पर सवाल उठाने का उनका आह्वान खतरनाक था. कंपनी सेना हमेशा सबसे वफादार संस्था नहीं रही थी. इसका विद्रोह का इतिहास भी रहा था, जैसे कि 1764 में जब एक यूरोपीय विद्रोह ने एक दूसरे सिपाही विद्रोह को उकसाया था जिसे बागियों के सरगनाओं को तोपों से उड़ा कर रोका गया था. कुछ ही महीने पहले, विशाखापत्तनम के सिपाहियों ने मद्रास में युद्ध में शामिल होने के लिए नावों पर सवार होने से इनकार करते हुए दंगा कर दिया था.

हिक्की ने भी इसी तरह की एक और चिंगारी डाल दी थी. उनका अखबार सेना के अधीनस्थों के लिए एक सार्वजनिक बोर्ड था, जिससे उन्हें और उनके साथियों को अपनी राय व्यक्त करने की अनुमति मिलती थी. जीवन, स्वतंत्रता और समानता के आदर्शों से प्रेरित होकर कमजोर वर्ग तख्तापलट करने के लिए अपने अखबार का इस्तेमाल कर सकते थे. एक तख्तापलट हेस्टिंग्स के करियर और संभवतः उसका जीवन भी एक ही झटके में समाप्त कर सकता है. यदि हिक्की ने छपाई जारी रखी होती तो हेस्टिंग्स को इन जोखिमों का सामना करना पड़ता.

एक के बाद एक आए लेखों में हिक्की के लेखकों ने क्रांति की याद दिलाई. उन्होंने सुझाया कि लोगों को अपने अधिकारों के लिए खड़ा होना चाहिए, विशेष रूप से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के लिए. एक ने लिखा, "प्रेस की स्वतंत्रता से अधिक पवित्र कुछ भी नहीं है, मुझे यकीन है कि लाखों लोग इसकी वेदी पर शहीद हो जाएंगे, इसकी रक्षा करना गौरव की बात है." दूसरे ने लिखा, "इंग्लैंड में सबसे निचला वर्ग भी जीवन, स्वतंत्रता और संपत्ति को लेकर उतनी ही संरक्षित है, जितना कि सबसे बड़ा वर्ग.” एक तीसरे ने लिखा, "विशेषाधिकारों पर आक्रमण नहीं किया जाना चाहिए और न ही लोगों की स्वतंत्रता को बिना किसी संघर्ष और देशभक्तिपूर्ण विरोध के छीना जाना चाहिए."

फिर भी यह लेख केवल एक भावात्मक अवधारणा के रूप में विद्रोह की बात करते थे. लेकिन हिक्की का एक लेखक वास्तविक क्रांति की शुरुआत करने वाला था. उसके लेखक का छद्म नाम ब्रिटानिकस था. उसने दावा किया कि अगर कंपनी लोगों की सहमति के बिना उन पर कर लगाती है, "तो लोगों को इसका विरोध करने का अधिकार है और उन्हें इसके लिए लड़ना भी चाहिए. अगर उनके पास और कोई विकल्प नहीं हैं, तो कम से कम विद्रोह तो कर सकते हैं."

ब्रिटानिकस ने दावा किया कि ब्रिटिश प्रजा के अधिकारों, सदियों से चले आ रहे आम कानून और मैग्ना कार्टा जैसे दस्तावेजों का उल्लंघन किया जा रहा है. ब्रिटानिकस ने दावा किया कि बंगाल में लोगों ने करों का भुगतान किया लेकिन इसके बदले उन्हें कोई अधिकार नहीं दिया गया. उनके पास कोई संसद नहीं है. उनके पास स्वतंत्र न्यायपालिका नहीं है. उनके पास केवल हेस्टिंग्स है. और अब एक ही रास्ता है : क्रांति.

“बंगाल के निवासियों, देशवासियों और दोस्तों... उस उत्पीड़न के प्रति जो अब बेहद प्रबल हो चुक है, मैं आपको असंवेदनशील या अनजान मान कर न तो आपकी समझ को और न ही आपकी भावनाओं को गलत कहुंगा. लेकिन मैं आपको आपके उत्पीड़कों की कमजोरी और हीनता को उजागर करने, आपके अपनी ताकत पहचानने और अपनी शक्ति का आभास करने के लिए प्रेरित करना चाहता हूं.”

मूल नियम है कि सरकार लोगों के कल्याण के लिए कार्य करेगी और उस शर्त पर लोग सरकार के नियमों का पालन करेंगे. जब उस शर्त की उपेक्षा की जाती है या उसका उल्लंघन किया जाता है, तब लोग उसकी आज्ञा मानने के लिए बाध्य नहीं रह जाते हैं. हमने देखा है कि लोग सीधे आक्रमण की स्थिति में अपनी स्वतंत्रता का दावा कर सकते हैं और अपनी रक्षा कर सकते हैं ... संविधान की आत्मा को बचाए रखने के लिए लोगों के पूर्ण और निष्पक्ष प्रतिनिधित्व होना चाहिए, केवल तभी सरकार को लोगों से कर वसुलने का अधिकार होता है; यदि तब लोगों का गलत या अपूर्ण रूप से प्रतिनिधित्व किया जाता है, या बिल्कुल भी प्रतिनिधित्व नहीं किया जाता है, तो वह अधिकार खत्म हो जाता है ...

यदि मैग्ना चार्टा की भावना पूरी तरह से विलुप्त नहीं है तो लोगों को पूर्ण न्याय मिलेगा लेकिन यदि कानून और न्याय का सत्यानाश हो जाता है, यदि ब्रिटिश संविधान को उसकी जड़ से खत्म कर दिया जाता है, यदि स्वतंत्रता हमेशा के लिए खो जाती है, तो प्रत्येक अंग्रेज को ‘स्वतंत्र रहना या मरना मेरी पसंद है’ की भावना पर चलना चाहिए.

—ब्रिटानिकस

"जीना या मरना मेरी पसंद है," हिक्की के लेखक ने गणतंत्र के लिए लड़ेने वाले रोमन सीनेटर कैटो के अंतिम शब्दों को जनता को याद दिलाया, जो बादशाह के आगे झुकने क बजाए अपनी तलवार पर गिर गया था. निहितार्थ स्पष्ट था : उन्हें भी स्वतंत्रता के लिए लड़ना चाहिए क्योंकि यदि वे ऐसा नहीं करते, तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे जी रहे हैं या मर चुके हैं. यह अब किसी अन्य स्थान पर दमनकारियों के खिलाफ विद्रोह के बारे में नहीं था, यह यहां के विद्रोह के बारे में था, अभी, इसी क्षण में हेस्टिंग्स के खिलाफ.

हेस्टिंग्स पर महाभियोग. हचिंसन की पुस्तक राष्ट्रों की कहानी में प्रकाशित चित्र. हिक्की ने अपने समाचार पत्र में लेखों के माध्यम से हेस्टिंग्स का विरोध किया था. सौजन्य : हीडलबर्ग विश्वविद्यालय

मंगलवार के दिन चले हथौड़े

एक गवर्नर जो प्रेस को चुप कराना चाहता है, उसकी तुलना उन अत्याचारियों से की जा सकती है, जिन्होंने अपने गुलामों की आंखें फोड़ दीं ताकि वे बिना शिकायत चक्की पीसें.

–ब्रिटानिकस, हिक्कीज एक्सट्राओडिनेरी बंगाल गजट, 25 जून 1781

12 जून, 1781 मंगलवार की दोपहर 2 बजे, कलकत्ता

हिक्की ने अपनी खिड़की की जाली के अंतराल से झांका और देखा कि यूरोपीय और भारतीय पुलिसकर्मियों के एक सशस्त्र गिरोह ने उनके घर को घेर लिया है और हथौड़ों से द्वार को तोड़ दिया है. उनके कपड़ों पर लगे बैज से उनके कलकत्ता पुलिस होने का पता चलता था. क्या हो रहा है यह देखने के लिए सैकड़ों तमाशबीन बाहर जमा हो गए. शहर के इस हिस्से में इतने हथियारबंद लोगों का होना अजीब था. पुलिसकर्मी हिक्की का गेट तोड़ कर उनके आंगन में घुस गए. हिक्की ने अपनी तलवार पकड़ ली और उनका सामना करने के लिए बाहर दौड़ा.

उन्होंने कहा, "मैं पहले उन दोनों आदमियों को मौत के घाट उतार दूंगा जो एक कदम आगे बढ़ाने की हिम्मत दिखाएंगे. तुम लोगों को यहां किसने भेजा?"

अंडरशेरिफ ने बताया, “सर एलिय्याह इम्पे, सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने".

"आप जो कह रहे हैं उसका कानूनी नोटिस दिखाइए."

"यहां यह है, सर." उन्हें नोटिस देख कर मालूम पड़ा कि वे उन्हें मानहानि के आरोप में गिरफ्तार करने आए है. तब उन्होंने सभी को इंतजार करने को कहा.

“मुझे किसी भी तरह से छुआ नहीं जाएगा. आप कोर्ट में वापस जाएं और मुख्य न्यायधीश को मेरी ओर से बता दें कि मैं अपने राजा और देश के कानूनों का पालन करता हूं और मैं कपड़े पहन कर उनसे अदालत में मिलूंगा. उन्होंने कपड़े पहने और पैंतालीस मिनट बाद कोर्ट हाउस पहुंचे. लेकिन न्यायाधीशों ने अदालत को अगले दिन के लिए स्थगित कर दिया था और अगले दिन ही जमानत देंने के लिए कहा. उन्हे वह रात जेल में ही गुजारनी पड़ी.

अगली सुबह उन्हें अदालत में न्यायाधीशों के सामने लाया गया. कमरे के केंद्र में एक हरे रंग की मेज के सामने वह लाल कपड़े पहने बैठे थे. वकील, सहयोगी और कार्यकर्ता मधुमक्खियों की तरह इधर-उधर भाग रहे थे.

23 आदमियों की एक बड़ी जूरी किनारे पर बैठी थी. हिक्की ने उनमें से कुछ को पहचान लिया. वे लगभग सभी कंपनी के नौकर या ठेकेदार थे और कुछ के हेस्टिंग्स के साथ संबंध थे. उन्होंने मन ही मन सोचा कि "मैंने अक्सर सुना है कि क्राइस्ट को दो चोरों के बीच सूली पर चढ़ाया गया था और अब मैं पचास झूठे लोगों के बीच बहस करने जा रहा हूं." इसके बाद कोर्ट ने उनके खिलाफ लगे आरोपों को पढ़ा. उन पर मानहानि के पांच मामले थे जिनमें से तीन हेस्टिंग्स की तरफ से थे. पहला उनके लेख के लिए था जिसमें हेस्टिंग्स पर क्लाइव के "दयनीय उत्तराधिकारी" होने का आरोप लगाया गया था.

दूसरा हेस्टिंग्स को "जंगली, बंदूकधारी, अपमानजनक और दुष्ट, निरंकुश, देशद्रोही, मुगलों का एजेंट कहने और हेस्टिंग्स को नपुसंक होने की बात लिखने के लिए था. तीसरा सैनिकों को विद्रोह का आह्वान करने के लिए था."

उनके लेख ‘मिशन की भलाई’ को लेकर किरनेंडर की ओर से मानहानि के दो आरोप लगाए गए. पहला आरोप पूरी तरह से लेख को लेकर था, पवित्र सार्वजनिक भूमि पर गोदामों का निर्माण करके गबन करने पर किरनेंडर को गंदी कमाई और लालच से प्रेरित एक "धार्मिक सामरी" कहा गया था. अनाथ निधि और ग्रिफिन की विरासत से गबन करने और मिशन को गिरिजाघर फार्म की तरह चलाने का आरोप लगाया गया था.

जूरी ने सहमति जताई की कि सभी पांच मामलों में आपराधिक आरोप लगाए जाने चाहिए. न्यायधीश हाइड ने पहले जमानत के लिए 4000 रुपए भरने का सुझाव दिया. लेकिन इम्पे ने 40000 रुपए का प्रस्ताव रखा जो चैंबर्स की सहमति से जमानत राशि बन गई. यह एक बहुत बड़ी राशि थी, हिक्की ने पूरे साल अपना अखबार बेच कर जितना कमाया था उससे दुगनी. और वह जितना भुगतान कर सकते थे यह उससे कहीं अधिक था.

हिक्कीज बंगाल गजट के लिए प्रस्ताव. एक के बाद एक लेख में समाचार पत्र में हक्की लिए लिखने वाले लेखकों ने क्रांति के लहजे को बनाए रखा. उन्होंने प्रस्ताव दिया कि लोगों को अपने अधिकारों के लिए खड़ा होना चाहिए, विशेष रूप से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के लिए. सौजन्य : विकिमीडिया कॉमन्स

हिक्की ने न्यायाधीशों को जमानत कम करने के लिए दो याचिकाएं भेजीं. उन्होंने इंग्लैंड के मूलभूत दस्तावेजों में से एक, इंग्लिश बिल ऑफ राइट्स जिसमें अत्यधिक जमानत की आवश्यकता नहीं होने की बात कही गई है, का हवाला देते हुए न्यायाधीशों से कहा कि उन्होंने उचित जमानत के उनके अधिकार का उल्लंघन किया है. उन्होंने प्रमुख कानून पुस्तकों ब्लैकस्टोन की टिप्पणी, हॉकिन्स की दलीलें, और एडवर्ड कोक की रिपोर्ट का भी हवाला दिया जिसमें अत्यधिक जमानत को अभियुक्त के लिए एक बड़ी परेशानी बताया गया था. उन्होंने एक अस्पष्ट मामले ड्यूक ऑफ शोमबर्ग बनाम मुर्रे, का भी हवाला दिया, जिसमें मुर्रे पर एक अंग्रेजी लॉर्ड को बदनाम करने का आरोप लगाया गया था, एक बड़ा आरोप जिसे स्कैंडलम मैग्नेटम के रूप में जाना जाता है, लेकिन फिर भी उसे उचित राशि पर जमानत दी गई थी.

वहीं, हिक्की ने जनता से अपील करते हुए अपने अखबार में इन दो याचिकाओं में से एक को छापा और लिखा कि उन्हें इतनी बड़ी जमानत राशि का भुगतान करने को कहा गया है जबकि इंग्लैंड में पत्रकारों को बड़े अपराधों में भी कम जमानत राशि के लिए कहा जाता है. हेनरी सैम्पसन वुडफॉल की जमानत राशि आधी थी जबकि वुडफॉल पर राजा को अपमानित करने का आरोप लगाया गया था.

हिक्की ने लिखा, "मेरे खिलाफ लिए गए निर्णय इतने परेशान करने वाले और दमनकारी हैं कि मानों विचारने की शक्ति को खत्म करने के लिए यह अपनाया गया है."

उनका मतलब स्पष्ट था : बंगाल में अधिकारों को छीन लिया गया है और वह चाहते हैं कि दुनिया इसे जाने. लेकिन न्यायधीशों ने जमानत देने से मना कर दिया. हिक्की ने जेल के कमरे से ही अपने मुकदमे की तैयारी की. जेल में रहते हुए भी उन्होंने अखबार छापना जारी रखा और अपने सबसे अच्छे हथियार, व्यंग्य की ओर रुख किया. अगले हफ्ते, उन्होंने अत्याचार और भ्रष्टाचार के लिए हेस्टिंग्स, इम्पे और किरनेंडर का मजाक उड़ाते हुए एक नकली विज्ञापन छापा. उसका शीर्षक, ‘टायरनी इन फुल ब्लूम’ क्योंकि कंपनी अंदर तक पूरी तरह भ्रष्ट हो चुकी थी.