गवई बंधुओं की आंखें फोड़ने की अमानुषिक घटना और दलित पैंथर का संघर्ष

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14 April, 2020

आंबेडकर के परिनिर्वाण के बाद दलित आंदोलन खत्म तो नहीं हुए, लेकिन उसकी गति धीमी और राजनीतिक मोर्चे पर दिशाहीन भी हो गई थी. वह 1970 का दशक था जब दलितों के खिलाफ उत्पीड़न की घटनाएं पूरे देश में हो रही थीं. चूंकि राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर मुखालिफत नहीं हो रहा था, इसलिए दिन पर दिन उत्पीड़कों-शोषकों का हौसला बढ़ता जा रहा था. ऐसे समय में दलित पैंथर का जन्म हुआ जिसने लोकतांत्रिक तरीकों का इस्तेमाल कर न केवल उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाई, बल्कि संघर्ष की वैचारिक जमीन भी तैयार की. इसके सह-संस्थापक ज. वि. पवार द्वारा लिखित और फारवर्ड प्रेस द्वारा प्रकाशित पुस्तक “दलित पैंथर : एक आधिकारिक इतिहास” से हम प्रस्तुत कर रहे हैं एक लोमहर्षक घटना के बाद दलित पैंथर की कार्रवाई व इसके फलाफल पर आधारित आलेख. यह घटना महाराष्ट्र के अकोला जिले के धाकली गांव की है जहां 26 सितंबर 1974 को दो गवई भाईयों की आंखें निकाल ली गई थीं. इन दोनों को न्याय दिलाने के लिए तब दलित पैंथर ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी तक का ध्यान आकृष्ट किया और जब उन्होंने इस घटना के बारे में जाना तब उनकी आंखें भी नम हो गई थीं.

अकोला जिले के धाकली गांव में 26 सितंबर 1974 को एक भयावह घटना हुई. वहां दो भाइयों को अन्याय का विरोध करने की कीमत अपनी आंखें खोकर चुकानी पड़ी. उन्हें अंधा करने की इस अमानुषिक घटना की तब तक कोई चर्चा नहीं हुई, जब तक कि मैंने 25 जनवरी, 1975 को मुंबई में एक प्रेस कांफ्रेंस आयोजित नहीं की. गांव के लोग यह तर्क दे रहे थे कि दो गुंडों को उनके किए की सजा दी गई है और इसमें कुछ भी गलत नहीं है. वे यह नहीं समझ रहे थे कि अगर उन दोनों व्यक्तियों ने कोई अपराध किया भी था, तब भी कानून अपने हाथ में लेकर उन्हें सजा देने का हक किसी को नहीं था. किसी ने यह पता लगाने का प्रयास भी नहीं किया कि क्या वे सचमुच अपराधी थे और यदि हां तो उनका अपराध क्या था.

मुझे इस भयावह घटना के बारे में जनवरी के तीसरे सप्ताह में वडाळा स्थित सिद्धार्थ विहार हॉस्टल में पता चला. मैं अक्सर वहां जाता रहता था. उस दिन अकोला जिले से आए तीन लोग वहां मेरी राह देख रहे थे, नाना रहाटे, डी.एन. खंडारे और व्ही.टी. अडकणे. धाकली के गवई बंधु उनके साथ थे. गांव के लोगों ने दोनों भाइयों की आंखें निकाल ली थीं. ऐसा नहीं था कि गांव में गवई अल्पसंख्यक थे. वहां 125 घर थे, जिनमें से 45 गवई और उनके रिश्तेदारों के थे. शालिग्राम शिंदे गांव के ‘पुलिस-पाटिल’ थे. वे धनी और बाहुबली थे और गांव वालों को डराते-धमकाते रहते थे. उनके लड़के उद्धवराव का गांव में आतंक था. शायद उसे लगता था कि उसके पिता के कारण वह अपनी मनमानी करने के लिए स्वतंत्र है. उद्धवराव अपने खेत में काम करने वाली महिलाओं को उसके साथ यौन संबंध स्थापित करने के लिए मजबूर करता था.

गोपाल नाथू गवई और बबरूवाहन नाथू गवई सगे भाई थे. गोपाल की 16 साल की बेटी गिन्यानाबाई भी खेतों में मजदूरी करती थी. वह शालिग्राम शिंदे के खेत में काम करती थी. उद्धवराव ने उससे प्रेम का नाटक करना शुरू कर दिया. गिन्यानाबाई उसके जाल में फंस गई और गर्भवती हो ग. जब गोपाल को इसका पता चला तो वे और उनके भाई बबरूवाहन शालिग्राम से मिले और उनसे कहा कि वे गिन्यानाबाई से अपने लड़के की शादी करें. गवई बंधुओं को शायद यह पता नहीं था कि किसी महिला के साथ बलात्कार करते समय वह केवल महिला होती है, परंतु जब बात विवाह की आती है तब जाति, धर्म और आर्थिक स्थिति आदि महत्वपूर्ण बन जाते हैं.

शालिग्राम ने न सिर्फ उनकी मांग खारिज कर दी, वरन गवई बंधुओं पर धमकाने और लड़की पर बलात्कार की झूठी कथा गढ़ने का आरोप लगाते हुए मुकदमें भी दर्ज करवा दिए. अदालत ने दोनों भाइयों और लड़की को बरी कर दिया. इससे पुलिस-पाटिल के जातिगत अहंकार को चोट पहुंची. उसने 26 सितंबर को गवई बंधुओं को अपने घर बुलवाया. जब वे वहां पहुंचे, तब पुलिस-पाटिल के 20 गुंडों ने उन पर हमला कर दिया. यह हमला पूर्व-नियोजित था.

धाकली, पिंजर पुलिस थाने के क्षेत्राधिकार में था. थाना प्रभारी आर.टी. पाटिल ने पहले ही शालिग्राम को यह आश्वासन दे दिया था कि वे बेखौफ होकर अपनी मनमानी कर सकते हैं. शालिग्राम के गुंडे, गवई बंधुओं पर हावी हो गए. उनमें से नौ, दोनों भाइयों के ऊपर बैठ गए और बाकी ने किसी धारदार औजार से उनकी आंखें निकाल लीं. दोनों भाइयों की आंखों से खून की धारा बह रही थी और वे उनकी आंखों के सामने छाए अंधेरे में राह ढूंढने का प्रयास कर रहे थे. इस बीच, उन्हें शालिग्राम की आवाज सुनाई पड़ी- “तुम्हें न्याय चाहिए था न? ये लो न्याय.”

धाकली, अकोला शहर से करीब 30 किलोमीटर दूर था. पीड़ितों को सरकारी अस्पताल पहुंचने के लिए कोई वाहन, यहां तक कि बैलगाड़ी भी नहीं मिली, क्योंकि सारे इलाके में पुलिस-पाटिल का आतंक था. पीड़ितों की पत्नियां उन्हें पिंजर पुलिस थाने ले गई, परंतु पुलिसवालों ने उनकी शिकायत दर्ज करने से इंकार कर दिया और उन्हें थाने से भगा दिया. गवई बंधुओं को अगले दिन अकोला के एक अस्पताल में भर्ती किया गया. इस मामले में आरोपी शालिग्राम शिन्दे, उद्धवराव शालिग्राम शिन्दे, भीमराव कापले, नामदेव जाधव, तारासिंह वंजारी, मोतीराम इंगले, बंडू इंगले, सुदाम जाधव और मानिक गावंडे थे. इस घटना की रिपोर्ट स्थानीय समाचारपत्रों में इस शीर्षक से छपी : “ग्रामीणों ने अपराधियों को सजा दी.”

दलित पैंथर के कार्यकर्ताओं, जिनमें नाना रहाटे, डी. एन. खंडारे और व्ही. टी. अडकणे शामिल थे, ने नागपुर के बबन लव्हात्रे की मदद से पीड़ितों को न्याय दिलवाने का प्रयास किया. परंतु उनके प्रयास सफल नहीं हुए क्योंकि जिला कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक ने स्थानीय पुलिस द्वारा उन्हें सुनाई गई कहानी को ही दोहरा दिया. अमरावती के उप पुलिस महानिरीक्षक ने भी स्थानीय पुलिस का समर्थन किया. इस तरह यह साफ हो गया कि स्थानीय स्तर पर गवई बंधुओं को न्याय मिलना संभव नहीं था.

अपने इलाके में न्याय पाने की क्षीण संभावना को देखते हुए रहाटे, खंडारे और अडकणे 19 जनवरी, 1975 को मुंबई के लिए रवाना हो गए और सिद्धार्थ विहार, वडाळा पहुंचे. उनसे मिलने के बाद मुझे ऐसा लगा कि शीर्ष पुलिस अधिकारियों या मंत्रियों से मिलने की बजाय हमें समाचारपत्रों से संपर्क करना चाहिए. परंतु मुझे इसमें संशय था कि यदि मैं समाचारपत्रों को प्रेस विज्ञप्ति भेजूं, तो वे उसे प्रकाशित करेंगे. इसलिए मैंने प्रेस वार्ता बुलाने का निर्णय लिया. प्रेस वार्ता कैसे आयोजित की जाती है, इस बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं थी. तब तक मैं केवल प्रेस विज्ञप्तियां जारी करता आ रहा था. पूछताछ करने पर मुझे उन स्थानों का पता चला जहां प्रेस वार्ता आयोजित की जा सकती थी. प्रेस वार्ता के लिए कांफ्रेंस रूम आरक्षित करते समय मुझसे पूछा गया कि पत्रकारों के लिए मेन्यू क्या होगा. तब मुझे पता चला कि प्रेस वार्ताओं में पत्रकारों के खाने-पीने का इंतजाम भी करना होता है.

मैं समाचारपत्रों के कार्यालयों में गया और उनके प्रतिनिधियों को प्रेस वार्ता के लिए आमंत्रित किया. निर्धारित तिथि 25 जनवरी, 1975 को मैं गवई बंधुओं के साथ प्रेस वार्ता के लिए संबंधित स्थल पर पहुंच गया. मैंने इस बारे में राजा ढाले सहित अपने बहुत कम साथियों को बताया था, क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि वहां भीड़ इकट्ठी हो और मेरा खर्चा बढ़े. मैंने लिखित वक्तव्य तैयार नहीं किया था. प्रेस वार्ता शुरू होते ही मैंने गवई बंधुओं को उनके साथ हुए अमानुषिक व्यवहार का वर्णन रिपोर्टरों से करने को कहा. गोपाल गवई दलित पैंथर के सदस्य थे और साथ ही समता सैनिक दल के कार्यकर्ता भी थे. दोनों भाइयों ने अपनी आपबीती सुनाई, जिसके बाद फोटोग्राफरों ने उनके फोटो लिए. सब कुछ सुनकर कुछ पत्रकारों को इतना धक्का लगा कि वे बिना कुछ खाए-पिए वहां से चले गए.

अगले दिन 26 जनवरी, 1975 को द टाइम्स ऑफ इंडिया ने गवई बंधुओं के चित्र के साथ उनके साथ हुए भयावह व्यवहार की खबर छापी. उस दिन गणतंत्र दिवस था और जयप्रकाश नारायण, शिवाजी पार्क में एक आमसभा को संबोधित करने वाले थे. सभा में अपने भाषण में उन्होंने कांग्रेस शासन के शोषक चरित्र को रेखांकित करने के लिए गवई बंधुओं के साथ हुई घटना का हवाला दिया. जयप्रकाश नारायण द्वारा इस घटना की निंदा करने के बाद उन कुछ अखबारों, जिन्होंने पहले इस घटना की खबर नहीं छापी थी, ने भी उसे प्रकाशित किया.

नवा काळ ने प्रेस वार्ता के अगले दिन इस समाचार को अपने मुखपृष्ठ पर इस शीर्षक से छापा- “गांव के पाटिल की बर्बरता, दो बौद्धों की आंखें निकालीं.” समाचार में हमारी इस मांग के बारे में भी लिखा गया था कि चूंकि दोनों पीड़ित हमेशा के लिए दृष्टिहीन हो गए हैं, इसलिए महाराष्ट्र सरकार को उनके शेष जीवन की सभी आवश्यकताओं को पूरा करने की जिम्मेदारी लेनी चाहिए. हमने कहा कि अगर ऐसा नहीं किया गया, तो पीड़ित मुख्यमंत्री नाईक के निवास के सामने आमरण अनशन करेंगे. महाराष्ट्र टाइम्स ने इस समाचार को चित्र के साथ प्रमुखता से प्रकाशित किया और ‘अमानुष’ शीर्षक से एक संपादकीय भी लिखा, जिसमें अपराधियों की दो महीने तक गिरफ्तारी न होने की जांच की मांग की गई थी. अखबार ने यह भी लिखा कि दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ बर्खास्तगी सहित कड़ी से कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए. अखबार ने सुझाव दिया कि पूरे गांव पर सामूहिक जुर्माना लगाया जाना चाहिए, क्योंकि वहां के एक भी रहवासी ने पीड़ितों की मदद करने की कोशिश नहीं की. मराठा ने ‘केवढे हे क्रौर्य’ (कितनी बर्बर घटना) शीर्षक से अपने संपादकीय में लिखा कि यद्यपि मुख्यमंत्री ने पीड़ितों के लिए एक हजार रुपए की सहायता की घोषणा कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली है, परंतु बेहतर यह होता कि अपराधियों के विरुद्ध त्वरित कार्रवाई की जाती. संपादकीय में यह भी कहा गया कि अगर मुंबई में इस घटना का खुलासा नहीं किया जाता, तो सरकारी मशीनरी पूरे मामले को रफा-दफा कर देती.

समाचारपत्रों में घटना की खबर छपने के बाद कई संगठनों और राजनीतिक दलों ने सरकार की कड़ी निंदा की. आरपीआई के खोब्रागड़े गुट के विधायक एस. बालाकृष्णन ने अंधे हो चुके पीड़ितों को पच्चीस हजार रुपए का मुआवजा दिए जाने की मांग की. उन्होंने विधान परिषद के उप सभापति आर.एस. गवई पर तंज कसते हुए कहा कि शायद गवई इस बात पर गर्व महसूस कर रहे होंगे कि मुंबई में खुलासे के पहले तक मामले को सफलतापूर्वक छुपाए रखा गया. भारतीय जनसंघ भी इस मामले में कूद पड़ा. उसकी मुंबई इकाई के सचिव बबन कुलकर्णी ने मामले की त्वरित जांच और दोषियों को कड़ी सजा दिए जाने की मांग की. उन्होंने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर कहा कि जनसंघ के कार्यकर्ता पीड़ितों के लिए अपने नेत्र दान करने को तैयार हैं. यह एक अजीब-सा प्रस्ताव था, क्योंकि डॉक्टर पहले ही कह चुके थे कि पीड़ितों के नेत्र प्रत्यारोपण की कोई संभावना नहीं है.

मुख्यमंत्री बसंतराव नाईक द्वारा पीड़ितों के लिए एक हजार रुपए की सहायता की घोषणा से आगबबूला राजा ढाले ने सिद्धार्थ कॉलोनी चेंबूर में एक आमसभा को संबोधित करते हुए कहा कि यदि कोई व्यक्ति मुख्यमंत्री की आंखें निकाल ले तो वे मुख्यमंत्री को एक हजार रुपए का मुआवजा देने के लिए तैयार हैं. उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री, जिनके पास गृह विभाग भी था, द्वारा इस लोमहर्षक घटना को हल्के ढंग से लेना शर्मनाक है. गवई बंधुओं द्वारा आंदोलन किए जाने की घोषणा के बाद युवक क्रांति दल जैसे कई संगठनों ने घोषणा की कि वे मुख्यमंत्री के निवास तक जुलूस निकालेंगे. इसके बाद सरकार ने एक आदेश निकालकर मालाबार हिल क्षेत्र में किसी भी प्रकार की सभा या जुलूस के आयोजन पर प्रतिबंध लगा दिया.

इस बीच इंदिरा गांधी की मुंबई यात्रा की घोषणा हुई. जब भी राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री जैसे अति महत्वपूर्ण व्यक्ति मुंबई आते थे, पुलिस मेरे पीछे पड़ जाती थी. पुलिस को डर रहता था कि ऐसे अवसर पर दलित पैंथर कोई आंदोलन आदि न करे. वैसे तो पुलिस अधिकारियों से मेरे सौहार्दपूर्ण संबंध थे परंतु ऐसे मौकों पर मैं उनसे दूरी बना लेता था. प्रधानमंत्री की यात्रा के एक दिन पूर्व, नायगांव अदालत में मेरी पेशी थी और इस कारण मैं विशेष शाखा-1 और सीआईडी के पुलिस अधिकारियों से मिलने से बच नहीं सका. अदालत में उनसे मिलने के पहले मैंने रामदास आठवले से कहा कि वे एक वक्तव्य जारी करें कि गवई बंधुओं ने प्रधानमंत्री की कार के सामने कूदकर आत्महत्या करने का निर्णय लिया है.

यह वक्तव्य अखबारों के दफ्तरों में पहुंचते ही पुलिस को इसकी खबर लग गई, क्योंकि कुछ पत्रकार पुलिस के मुखबिर होते हैं. जल्द ही पुलिस का एक दल मुझसे मिलने नायगांव अदालत पहुंच गया. वे मुझसे जानना चाहते थे कि गवई बंधु कहां हैं और किस स्थान पर अपनी जान देने का इरादा रखते हैं. वे शायद चाहते थे कि गवई बंधुओं को किसी अज्ञात स्थान पर रख दिया जाए. मैंने पुलिस अधिकारियों से कहा कि अदालत में अपना काम खत्म होने के बाद मैं यह पता लगाऊंगा कि गवई बंधु कहां हैं.

उप पुलिस आयुक्त बालचन्द्रन और सहायक पुलिस आयुक्त मोकाशी ने मुझसे कहा कि अगर गवई बंधु आत्महत्या करने का विचार त्याग दें, तो वे उनकी मुलाकात प्रधानमंत्री से करवाने के लिए तैयार हैं. मैंने उनसे कहा कि गवई बंधुओं के साथ जिस तरह का बर्बर अपराध हुआ है, उसके चलते मैं उन्हें उनकी योजना त्यागने के लिए राजी नहीं कर सकता. पुलिस गंभीर दुविधा में थी. अगर वह गवई बंधुओं को गिरफ्तार करती, तो अखबार पुलिस पर टूट पड़ते और अगर वह कुछ नहीं करती, तो गवई बंधु प्रधानमंत्री की कार के सामने कूद सकते थे. अंततः गवई बंधुओं, राजा ढाले और मेरी मुलाकात श्रीमती गांधी से करवाने के लिए बालचन्द्रन तैयार हो गए. उन्होंने कहा कि वे हम लोगों को हवाई अड्डे के विजीटर्स लाउंज तक ले जाएंगे.

ढाले और मैं हवाई अड्डे के निकट केंद्रीय लोकनिर्माण विभाग की कॉलोनी में रहने वाले मेरे भाई तुकाराम पवार से मिलने गए. वहां से हम किसी भी प्रधानमंत्री से अपनी पहली मुलाकात के लिए निकले.

1 फरवरी, 1975 को हवाई जहाज से उतरने के बाद प्रधानमंत्री को उस स्थान पर लाया गया, जहां हम लोग उनका इंतजार कर रहे थे. वहां मुख्यमंत्री, मंत्री, पुलिस महानिदेशक, मुंबई के पुलिस कमिश्नर व अन्य अधिकारी मौजूद थे. प्रधानमंत्री को उम्मीद थी कि हम लोग विनम्रतापूर्वक हाथ जोड़कर उनका अभिवादन करेंगे. परंतु हमने ऐसा नहीं किया. उन्होंने हाथ जोड़कर हमारा अभिवादन किया. मैंने तुरंत गवई बंधुओं की ओर इशारा करते हुए कहा, “अपनी आंखों से देखिए कि आपके राज में किस तरह के अत्याचार हो रहे हैं?” उन्होंने शायद ‘राज’ शब्द को ‘राज्य’ सुना और वे नाराज हो गईं. उन्होंने तल्खी से मुझसे कहा, “ये राज्य क्या तुम्हारा नहीं है?” मैंने बिना डरे जवाब दिया, “नहीं, इस तरह का अन्याय आपके राज में ही होता है.” लगभग चार मिनट तक मैं हमारे लोगों की पीड़ा और व्यथा का वर्णन करता रहा. इसी बीच मुख्यमंत्री नाईक ने हस्तक्षेप करते हुए, प्रधानमंत्री का परिचय राजा ढाले से करवाने का प्रयास किया. “ये राजा ढाले हैं,” उन्होंने कहा. वे शायद प्रधानमंत्री को याद दिलाना चाह रहे थे कि ढाले वही व्यक्ति है, जिसने राष्ट्रीय ध्वज के बारे में विवादस्पद लेख लिखा था. ढाले ने तुरंत मुख्यमंत्री से गुस्से से कहा कि वे प्रधानमंत्री से मेरी चर्चा जारी रहने दें. मुख्यमंत्री ने मुझे जहां रोक दिया था, मैंने वहीं से अपनी बात फिर शुरू की और प्रधानमंत्री को पूरे घटनाक्रम से अवगत करवाया. गवई बंधुओं ने भी उन्हें आपबीती सुनाई और न्याय की मांग की.

इस बर्बर घटना के बारे में सुनकर और पीड़ितों की आंखों के स्थान पर गड्ढों को देखकर श्रीमती गांधी की आंखों में आंसू भर आए. उन्होंने मुख्यमंत्री से तुरंत कहा कि वे मामले की पूरी जांच करवाएं. मैंने इस पर ऊंची आवाज में कहा कि “हमें महाराष्ट्र सरकार पर भरोसा नहीं है. वह दलितों की शत्रु है. अगर कोई जांच कराई जानी है, तो वह सीबीआई द्वारा करवाई जानी चाहिए.” मैंने श्रीमती गांधी को ज्ञापन सौंपा, जिसे स्वीकार कर उन्होंने उसे अपने निजी सहायक को दे दिया. जब मैंने ज्ञापन की एक प्रति मुख्यमंत्री को देनी चाही, तो वे उसे लेने में आनाकानी करने लगे. यह देखकर श्रीमती गांधी ने मुख्यमंत्री को डांट लगाई. “वो आपको ज्ञापन दे रहा है और आप उसे ले तक नहीं रहे हैं. अगर आप ऐसा व्यवहार करेंगे, तो ये लोग आपके खिलाफ हो जाएंगे.” ज्ञापन स्वीकार करने के अतिरिक्त नाईक के पास अब कोई चारा नहीं था. प्रधानमंत्री पलटीं और आगे बढ़ गईं. मैंने देखा कि वे अपनी साड़ी के पल्लू से अपनी आंखें पोंछ रही थीं. हम लोग पुलिस की गाड़ी से वापस लौटे. हमें संतोष था कि हम व्यक्तिगत रूप से गवई बंधुओं का मामला प्रधानमंत्री के सामने रख सके. बाद में उन्होंने पीड़ितों के लिए मुआवजे की घोषणा भी की.

2 फरवरी, 1975 को सभी अखबारों ने गवई बंधुओं की प्रधानमंत्री से मुलाकात की खबर प्रमुखता से छापी. मुझे पुलिस के जरिए संदेश मिला कि मुख्यमंत्री गवई बंधुओं से मिलना चाहते हैं. दोनों भाइयों के साथ मैं भी सचिवालय गया और हम लोग मुख्यमंत्री से मिले. यह बैठक मात्र औपचारिकता थी. असली चर्चा तो गृह राज्यमंत्री रत्नाप्पा कुंभार के कार्यालय में होनी थी, जहां गृह सचिव पद्माकर गवई, पुलिस महानिदेशक राज्याध्यक्ष और विधानपरिषद् के उपसभापति आर.एस. गवई मौजूद थे. कुंभार ने गोपाल गवई से घटना का विस्तृत विवरण जाना और उनसे पूछा कि वे क्या चाहते हैं. उनके सचिव और गृह सचिव चर्चा के नोट्स ले रहे थे.

हमारी बातचीत खत्म होने के बाद आर.एस. गवई ने मुझसे कहा कि मैं गवई बंधुओं को रात के भोजन के लिए उनके घर भेज दूं. उन्होंने यह भी कहा कि उनके घर रोज करीब 25 लोग भोजन करते हैं. मेरी अपेक्षा थी वे कहेंगे कि वे विधान परिषद में इस घटना पर चर्चा सुनिश्चित करेंगे. मैं उनकी बात सुनकर चिढ़ गया. मैंने उनसे कहा कि मुझे मालूम नहीं था कि उन्होंने अपने घर में मुफ्त भोजन करवाने की व्यवस्था कर रखी है, अन्यथा मैं मुंबई के सभी जरूरतमंदों को उनके घर खाना खाने भेज देता. उन्हें इस तरह की प्रतिक्रिया की उम्मीद नहीं थी. वे हमेशा अपने साथ पान का एक डिब्बा रखते थे और विधानभवन में या उससे बाहर भी हमेशा पान चबाते रहते थे. जब भी उनसे असहज करने वाला कोई प्रश्न पूछा जाता था, वे तुरंत अपने मुंह में पान ठूंस लेते थे, ताकि उन्हें आगे कोई बातचीत न करनी पड़े. उन्होंने यही किया.

उसी समय गृह सचिव पद्माकर गवई ने मुझे संदेश दिया कि मैं पीड़ितों को सीआईडी के उप महानिरीक्षक मधुकर गवई के पास ले जाऊं. पुलिस ने मुझे एक वाहन उपलब्ध करवाने की पेशकश भी की, परंतु मैंने उसे अस्वीकार कर दिया. जब मैं कुंभार के कार्यालय में घुस रहा था, तब बाहर इंतजार कर रहे कई सरकारी कर्मचारियों ने ‘जय भीम’ कहकर मेरा अभिवादन किया था. मेरी यह जिम्मेदारी थी कि मैं उन्हें दिखाऊं कि मैं सरकार से किसी तरह का लाभ नहीं ले रहा हूं.

हम लोग मधुकर गवई के कार्यालय पहुंचे. जहां वे हमारा इंतजार कर रहे थे, मेरे मना करने के बावजूद उन्होंने हम लोगों को चाय पिलवायी. मैंने उन्हें घटनाक्रम, स्थानीय पुलिस अधिकारियों के व्यवहार और उनकी रिपोर्टों के बारे में बताया. मैंने उनसे अनुरोध किया कि पुलिस को मामले की नए सिरे से जांच करनी चाहिए. मधुकर गवई गृह सचिव पद्माकर गवई के भाई थे और शायद उन्हें पहले ही गृह सचिव से निर्देश मिल चुके थे. यही कारण था कि सरकारी मशीनरी तुरंत सक्रिय हो गई. बाद में यह पाया गया कि स्थानीय पुलिस ने गलत रिपोर्ट प्रस्तुत की थी. विभिन्न संगठनों, राजनीतिक दलों और अखबारों ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की. अमरावती के डीआईजी के पास इसके सिवाय कोई विकल्प न था कि वे उनके समकक्ष मधुकर गवई को सही-सही रिपोर्ट प्रस्तुत करें. घटना की जांच ने एक नई दिशा ली और 4 फरवरी को मुख्यमंत्री ने घोषणा की कि राज्य पुलिस के उप-प्रमुख स्वयं घटना की जांच कर रहे हैं. कुंभार ने पिंजर पुलिस स्टेशन के प्रभारी इंस्पेक्टर पाटिल के निलंबन की घोषणा की, ताकि वे जांच को किसी तरह से प्रभावित न कर सकें. पुलिस ने प्रकरण को फिर से तैयार किया और आरोपियों पर भारतीय दंड संहिता की नई धाराओं के अंतर्गत आरोप लगाए गए, ताकि उन्हें और कड़ी सजा मिल सके.

गवई बंधुओं के विरुद्ध हुए अमानुषिक अपराध ने महाराष्ट्र की छवि को गहरी क्षति पहुंचाई और विपक्षी दलों को सरकार पर हमले करने का एक बड़ा मुद्दा मिल गया, विशेषकर इसलिए, क्योंकि मुख्यमंत्री स्वयं एक पिछड़ी जाति से थे. इससे राज्य की ‘शक्कर लॉबी’ (मराठा राजनेता जो सहकारी शक्कर कारखाने चलते थे) भी 12 साल से महाराष्ट्र पर राज कर रहे मुख्यमंत्री नाईक के खिलाफ उठ खड़ी हुई. दलित पैंथर, प्रधानमंत्री से मुख्यमंत्री के खिलाफ पहले ही शिकायत कर चुका था. अंततः 20 फरवरी की समाचारपत्रों ने सुर्खियों में नाईक को उनके पद से हटाए जाने का समाचार प्रकाशित किया.

गवई बंधुओं की दृष्टि को बचाना संभव नहीं था. मैंने जाने-माने नेत्र विशेषज्ञ डॉ. एम.सी. मोदी से उन्हें देखने को कहा. जांच के बाद, डॉ. मोदी ने कहा कि उनकी आँखों को न केवल फोड़ा गया था, वरन उन्हें खींचकर बाहर निकाल दिया गया था. अतः उनकी दृष्टि वापस लाना संभव नहीं था. हम लोग गवई बंधुओं की दृष्टि उन्हें नहीं लौटा सके. परंतु नाईक, जिन्होंने उनकी आंखों की कीमत 1000 रुपए लगाई थी, को अपने पद से हाथ धोना पड़ा.

बबन लव्हात्रे को शायद यह पता नहीं था कि इस मामले में ढाले और मैंने क्या प्रयास किये थे. वे जगह-जगह जाकर इस प्रकरण में कार्यवाही का श्रेय स्वयं लेने लगे. उन्होंने न केवल झूठ फैलाया वरन खुद को भी धोखा दिया. वे अपनी आदत से मजबूर थे. उदाहरण के लिए उन्होंने लिखा कि मैंने वसंत धामणकर की अंतिम यात्रा का नेतृत्व किया था. तथ्य यह था कि उस समय मैं जेल में था.

किताब : दलित पैंथर : एक आधिकारिक इतिहास

लेखक : ज. वि. पवार

प्रकाशक : फारवर्ड प्रेस