मोदी राज में डरा हुआ व्यापारी वर्ग

04 नवंबर 2019

इस साल अप्रैल में जब लोकसभा चुनाव हो रहे थे तभी इंफोसिस के सह-संस्थापक नारायण मूर्ति ने भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम), कोलकाता के छात्रों के दीक्षांत समारोह में एक भाषण दिया. किसी पार्टी का नाम लिए बिना मूर्ति ने कहा कि कोई भी देश “विश्वास की स्वतंत्रता” और “भय से मुक्ति के बिना” आर्थिक प्रगति नहीं कर सकता. बहुतों को लगा था कि मूर्ति ने बीजेपी पर तंज कसा है. पीटीआई की एक खबर के मुताबिक अगले महीने मई में गृह मंत्रालय ने इंफोसिस की गैर सरकारी संस्था (एनजीओ) इंफोसिस फाउंडेशन का पंजीकरण रद्द कर दिया. लेकिन इंफोसिस फाउंडेशन ने वक्तव्य जारी कर बताया कि उसने स्वेच्छा से पंजीकरण रद्द किए जाने का आवेदन किया था. पीटीआई अपनी खबर पर बरकरार है और उसने उस खबर पर कोई स्पष्टीकरण जारी नहीं किया है.

अब जबकि मोदी सरकार सत्ता में लौट आई है, तो लगता है कि मूर्ति का भी हृदय परिवर्तन हो गया है. 23 अगस्त को उन्होंने कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था पिछले तीन सौ सालों की अपनी सबसे अच्छी स्थिति में है. जबकि ऐसे सबूतों का अंबार लगा है जो इस दावे को खारिज करते हैं.

बायो-फार्मास्युटिकल कंपनी बायोकॉन की चेयरपर्सन किरण मजूमदार शॉ को भी पता लग ही गया कि उनके विचारों को सरकार हल्के में नहीं लेती. जब कैफे कॉफी डे के मालिक वीजी सिद्धार्थ मृत अवस्था में पाए गए थे, तो कई लोगों ने शक जाहिर किया कि उन्होंने कर अधिकारियों द्वारा सताए जाने के बाद अपनी जान दे दी. शॉ संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार की गरीब-विरोधी नीतियों की कटु आलोचक थीं. उन्होंने भी सिद्धार्थ की मौत के बाद “कर आतंकवाद” पर चिंता व्यक्त की. शॉ ने इस साल अगस्त में समाचार पत्र टेलीग्राफ को बताया कि एक सरकारी अधिकारी ने उनकी टिप्पणी के बाद फोन कर "इस तरह के बयान" न देने की धमकी दी थी.

भारत में उद्यमी आज भी डरे हुए रहते हैं. महज कुछ उद्यमियों ने ही कर अधिकारियों द्वारा उत्पीड़न किए जाने और जबरन चंदा वसूली जैसी बातों को उठाने की हिम्मत की है. कॉरपोरेट जगत में देश में जारी आर्थिक मंदी को लेकर व्यापक असंतोष है लेकिन कुछ ही लोग ऐसे हैं जिन्होंने सार्वजनिक रूप से सरकार की आलोचना करने की हिम्मत दिखाई है. मोदी सरकार की आरोप लगाने वाली प्रवृत्ति और बदले की भावना ऐसी है कि अपनी बात कहने वालों को बुरा अंजाम भुगतना पड़ सकता है. मैंने जितने भी व्यापारियों से बात की, वे पिछले शासन को अच्छे दिनों की तरह याद करते हैं लेकिन ऐसी बातें सार्वजनिक रूप से कहने से डरते हैं. कॉरपोरेट जगत और राजनेताओं के बीच झगड़े, विशेष रूप से मोदी जैसे मजबूत राजनेता से झगड़े, के इतिहास से पता चलता है कि यह डर वाजिब है.

मुख्यमंत्री रहते हुए आलोचना के प्रति मोदी की बेरुखी जगजाहिर थी. फरवरी 2003 में, गुजरात में मुस्लिम नरसंहार के परिणामस्वरूप मिली जीत के बाद, मोदी ने भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई), जो देश का सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण व्यापार संघ है, से अपनी सार्वजनिक छवि को दुरुस्त करने के लिए एक विशेष सत्र आयोजित करने का अनुरोध किया था. इस आयोजन का नाम था- "गुजरात के नए मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ बैठक." जैसा कि कारवां के कार्यकारी संपादक विनोद के जोस ने अपनी 2012 की मोदी प्रोफाइल में बताया है, गुजरात के मुख्यमंत्री के साथ प्रख्यात व्यवसायी राहुल बजाज और जमशेद गोदरेज भी आयोजन में शामिल हुए थे. जिनमें से किसी ने भी मोदी का कोई खास सत्कार नहीं किया. बजाज ने 2002 को गुजरात के लिए "बर्बाद साल" घोषित किया. बजाज ने मोदी से पूछा, "हम कश्मीर, पूर्वोत्तर या उत्तर प्रदेश और बिहार में निवेश क्यों नहीं कर पाते? इसकी वजह महज बुनियादी ढांचे की कमी नहीं है, बल्कि इसके पीछे असुरक्षा की भावना भी है. मुझे उम्मीद है कि यह गुजरात में नहीं होगा. यह पिछले साल की दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं के कारण याद आ जाता है.”

सुजाता आनंदन वरिष्ठ पत्रकार और लेखिका हैं.

Keywords: Narendra Modi Indian businessmen
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