सीबीआई ने मुजफ्फरपुर आश्रय गृह मामले में नेताओं और अधिकारियों को कैसे बचाया

20 जनवरी 2020

8 जनवरी को, केंद्रीय जांच ब्यूरो ने मुजफ्फरपुर आश्रय गृह मामले में अपनी नवीनतम स्थिति रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को एक सीलबंद लिफाफे में सौंपी. एजेंसी ने अदालत को बताया कि आश्रय गृह में कोई हत्या नहीं हुई है और सभी "35 लड़कियां जीवित हैं." इस मामले पर कारवां द्वारा की गई जांच से पता चलता है कि एक दर्जन से अधिक नाबालिग गवाहों के बयान सीबीआई के दावे को खारिज करते हैं. मामले के कानूनी दस्तावेजों की जांच से 2013 से 2018 के बीच तीस से अधिक नाबालिगों के शारीरिक शोषण और यौन शोषण के मामले में सीबीआई की जांच में अस्पष्टता का खुलासा होता है. अपनी जांच के दौरान, एजेंसी ने जानबूझकर एक दर्जन से अधिक गवाहों द्वारा मुहैया कराए गए ऐसे महत्वपूर्ण सुरागों की अनदेखी की है जो संस्थागत स्तर पर बिहार सरकार के समाज-कल्याण विभाग और कई हाई-प्रोफाइल नेताओं को कठघरे में खड़ा कर सकते हैं.

कारवां के पास मौजूद दस्तावेजों से पता चलता है कि सीबीआई की चार्जशीट इस तरह से तैयार की गई थी कि नाबालिकों के यौन शोषण के लिए केवल आश्रय गृह के कर्मचारियों, उसके मालिक ब्रजेश ठाकुर और चार सरकारी अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराया जा सके. सीबीआई ने सिर्फ उन्हीं कुछ चुनिंदा व्यक्तियों को आरोपी बनाया जिनके खिलाफ गवाहों ने बयान दिए. एजेंसी ने राज्य के समाज-कल्याण विभाग और इस मामले में शक्तिशाली नेताओं की संभावित भागीदारी को स्वीकार करने से इनकार कर दिया, बावजूद इसके कि इन बयानों में उनका नाम लिया गया था. कम से कम सात गवाहों ने सीबीआई को दिए अपने बयानों में नियमित रूप से बालिका गृह में आने वाले "बाहरी" लोगों की पहचान की है. अन्य गवाहों में ब्रजेश का किराएदार, पड़ोसी और राज्य के सामाजिक कल्याण विभाग के कम रैंक के अधिकारी शामिल हैं. किराएदार ने अपने बयान में कम से कम दो वरिष्ठ नेताओं का नाम लिया था, जिनमें से एक राज्य सभा सदस्य था और दूसरा बिहार विधान परिषद का पूर्व सदस्य था. राज्य के अधिकारियों ने आश्रय गृह के संचालन, निगरानी और धन आवंटन करने वाले सरकारी पदाधिकारियों के विशाल नेटवर्क का ब्योरा दिया है जिनकी आश्रय गृह को चलाने में सहभागिता थी.

कारवां के पास 33 पीड़ितों, ​ब्रजेश के किराएदार, पड़ोसी और उसके प्रिंटिंग प्रेस के कर्मचारी, जांच अवधि के दौरान समाज-कल्याण विभाग के आधा दर्जन सरकारी अधिकारियों, पहले जांच अधिकारी जिसने 30 मई 2018 को बालिका गृह पर छापा मारा था, के बयान और सीबीआई द्वारा दिसंबर 2018 में बिहार ट्रायल कोर्ट के सामने दायर की गई चार्जशीट मौजूद हैं. सभी बयान सीबीआई ने सितंबर 2018 से दिसंबर 2018 के बीच दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 161 के तहत दर्ज किए थे.

मामला दर्ज होने के दो महीने बाद और मामले को बिहार राज्य पुलिस से सीबीआई को स्थानांतरित करने के एक महीने बाद, अगस्त 2018 से सुप्रीम कोर्ट इस मामले की जांच को देख रही है. एजेंसी नियमित रूप से अदालत को अपडेट करती रही है, लेकिन इसकी सभी प्रगति रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में पेश की गईं. इसका मतलब है कि मामले की याचिकाकर्ता निवेदिता झा और हम सभी को अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल द्वारा अदालत की ब्रीफिंग पर भरोसा करना पड़ा है. जैसा कि कारवां की पिछली रिपोर्ट में बताया गया था कि इस आधी-अधूरी जांच में आगे समझौता किया गया. वेणुगोपाल की ताजा ब्रीफिंग और साथ ही आरोपपत्र सुप्रीम कोर्ट द्वारा दो बड़े हस्तक्षेपों पर चुप थे, जिसमें शीर्ष अदालत ने जांच में कमियों पर ध्यान दिया था और सीबीआई से मामले के विशिष्ट पहलुओं की जांच करने के लिए कहा था. अदालत ने ब्रजेश की गहन जांच करने पर जोर दिया था, जिसमें उसके राजनीतिक संबंध और मामले में सरकारी अधिकारियों की भूमिका भी शामिल थी.

20 सितंबर 2018 को चार्जशीट दाखिल होने से पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को निर्देश दिया था कि वह ​ब्रजेश की पूरी तरह से जांच करे, जिसमें उसके राजनीतिक संबंध भी शामिल हैं. अदालत ने एजेंसी से उन सभी "बाहरी लोगों" की भागीदारी का पता लगाने के लिए कहा था, जो कि आश्रय गृह के संचालन और राज्य के समाज-कल्याण विभाग से सीधे तौर पर नहीं जुड़े थे. शीर्ष अदालत ने 3 जून 2019 को एक सुनवाई में इन निर्देशों को दोहराया. 20 सितंबर 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि, "स्टेटस रिपोर्ट के अवलोकन के बाद कुछ क्षेत्र हैं जिन पर सीबीआई द्वारा आगे जांच की जाने की आवश्यकता है, वे इस प्रकार हैं ... सीबीआई को ब्रजेश ठाकुर के पिछले कामों, संबंधों और प्रभाव पर गौर करना होगा.'' बालिका गृह के अलावा, जिसे सरकारी धन से वित्तपोषित किया गया था, ​ब्रजेश कम से कम दस गैर सरकारी संगठनों को चलाता था, वह प्रेस सूचना ब्यूरो द्वारा मान्यता प्राप्त पत्रकार था, प्रिंटिंग प्रेस का मालिक था और राज्य सरकार की दो सलाहकार समितियों का सदस्य था.

सागर कारवां के स्‍टाफ राइटर हैं.

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