पंजाब के 6733 लापता लोगों की जानकारी जुटाने वाले वकीलों पर क्राइम ब्रांच का शिकंजा

पीडीएपी का कहना है कि उसके पास इस पूरी समयावधि में गायब हुए और अवैध रूप से दाह संस्कार कर दिए कम से कम 6733 मामलों की जानकारी है. 2019 में उन्होंने इन मामलों पर डिसएपियर्ड पंजाब (गायब पंजाब) शीर्षक से एक डॉक्यूमेंट्री भी रिलीज की थी.
पीडीएपी का कहना है कि उसके पास इस पूरी समयावधि में गायब हुए और अवैध रूप से दाह संस्कार कर दिए कम से कम 6733 मामलों की जानकारी है. 2019 में उन्होंने इन मामलों पर डिसएपियर्ड पंजाब (गायब पंजाब) शीर्षक से एक डॉक्यूमेंट्री भी रिलीज की थी.

गृह मंत्रालय द्वारा सूचना और प्रसारण मंत्रालय को ब्रिटेन के वकील सतनाम सिंह बैंस के बारे में जानकारी भेजने के लगभग दो साल बाद 19 अप्रैल को चंडीगढ़ पुलिस ने बैंस के खिलाफ एफआईआर दर कर ली है. सतनाम ने 2008 में सिविल सोसाइटी ग्रुप पंजाब डॉक्यूमेंटेशन एंड एडवोकेसी प्रोजेक्ट (पीडीएपी) की स्थापना की थी. पीडीएपी का उद्देश्य पंजाब में अशांति से भरे 1984 और 1995 के बीच के सालों में सुरक्षा बलों द्वारा की गई ज्यादतियों को सामने लेकर आना है. पीडीएपी का कहना है कि उनके पास इस पूरी समयावधि में गायब हुए और अवैध रूप से दाह संस्कार कर दिए कम से कम 6733 मामलों की जानकारी है. 2019 में उन्होंने इन मामलों पर डिसएपियर्ड पंजाब (गायब पंजाब) शीर्षक से एक डॉक्यूमेंट्री भी रिलीज की थी. उस वर्ष गृह मंत्रालय ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को इसे “खालिस्तान समर्थक तत्वों के एजेंडे” का प्रचार करने वाली डॉक्यूमेंट्री बताया था. एमआईबी ने इसकी शिकायत चंडीगढ़ पुलिस से की लेकिन पुलिस को इस दावे के संबंध कोई सबूत नहीं मिला. एमआईबी ने यह भी उल्लेख किया कि इस साल अप्रैल में इस डॉक्यूमेंट्री को बिना सेंसर सर्टिफिकेट के दिखाया गया था. इसी अपराध के लिए सतनाम सिंह के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है.

पीडीएपी ने हिंसा पर लगाम लगाने की आड़ में राज्य में बड़े पैमाने पर हुए अपराधों को सामने लाने के लिए कठिन प्रयास किया है. अपने इस काम के आधार पर उन्होंने 1980 और 1990 के दशक में प्रशासन के मनमाने तरीके से सख्ती दिखाने के खिलाफ 14 नवंबर 2019 को पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के समक्ष एक याचिका दायर की थी. सतनाम याचिकाकर्ताओं के वकील हैं और पीडीएपी की डॉक्यूमेंट्री याचिका का एक हिस्सा है. याचिका में कहा गया है कि कई पीड़ितों के परिवारों को यह जानकारी नहीं है कि उनके परिजन जीवित हैं या मर चुके हैं. इसमें यह भी कहा गया है कि पीड़ितों के परिजनों को पीड़ितों के मृत्यु प्रमाण पत्र, पेंशन और उत्तराधिकार जैसे उनके मूल अधिकारों से सिर्फ इसलिए वंचित किया गया क्योंकि राज्य प्रशासन ने पुलिस और सुरक्षा बलों के किए अपराधों को अपराध ही नहीं माना. याचिका में इन हत्याओं की स्वतंत्र और प्रभावी जांच के साथ-साथ हत्याओं को छुपाने में शामिल लोगों के खिलाफ मुकदमा चलाने की मांग की गई है."

सतनाम के खिलाफ दर्ज किया गया यह मामला पीडीएपी और अन्य याचिकाकर्ताओं पर शिकंजा कसे जाने का संकेत देता है. एमआईबी ने पुलिस से शिकायत जुलाई 2019 में की थी लेकिन सतनाम के खिलाफ एफआईआर अप्रैल 2021 में दर्ज की गई. याचिका में सतनाम के साथी वकील राजविंदर सिंह बैंस ने बताया, “हम इसे पीड़ितों के कानूनी पक्ष को कमजोर करने और दोषी पुलिस अधिकारियों पर मुकदमा चलाने की कोशिश और जिन्हें हम मानवाधिकारों का रक्षक कहते हैं उन पर मुकदमा चलाने के प्रयास के रूप में देखते हैं."

एमआईबी में संयुक्त सचिव अशोक परमार की दिनांक 23 जुलाई 2019 की शिकायत के आधार पर प्राथमिकी दर्ज की गई है. परमार ने शिकायत में कहा है कि गृह मंत्रालय की गायब पंजाब डॉक्यूमेंट्री में खालिस्तान समर्थक तत्वों के एजेंडे का प्रचार करने की शिकायत प्राप्त हुई है. उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि पीडीएपी ने केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के प्रमाण के बिना सार्वजनिक रूप से इसका प्रदर्शन आयोजित करके सिनेमैटोग्राफ अधिनियम 1952 का उल्लंघन किया है. परमार ने डॉक्यूमेंट्री के प्रदर्शनी करने वालों और निर्माता के खिलाफ जरूरी कार्रवाई करने और की गई कार्रवाई का विवरण प्रदान करने के लिए कहा. यह मामला चंडीगढ़ सेक्टर 36 के थाने में दर्ज किया गया और सेक्टर 11 अपराध शाखा मामले की जांच कर रही है. सतनाम पर सिनेमैटोग्राफ एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज की गई है. अधिनियम के अनुसार, सीबीएफसी द्वारा प्रमाणित नहीं की गई फिल्म की सार्वजनिक रूप से प्रदर्शनी करने पर तीन साल तक की कैद या एक लाख रुपए तक का जुर्माना या दोनों हो सकता है.

चंडीगढ़ में डॉक्यूमेंट्री की प्रदर्शनी के लिए ऑडिटोरियम बुक करने वाले राजविंदर के मुताबिक सतनाम के खिलाफ मामला दर्ज करना गलत है. उन्होंने ही 25 मई 2019 को आयोजित प्रदर्शनी का सारा इंतेजाम किया था. एसोसिएशन ऑफ पेरेंट्स ऑफ डिसएपियरेंस पर्सन्स, कमेटी फॉर कोऑर्डिनेशन ऑन डिसअपीयरेंस एंड पंजाब, ह्यूमन राइट्स लॉ नेटवर्क, खालरा मिशन ऑर्गनाइजेशन, पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज और पंजाब ह्यूमन राइट्स ऑर्गनाइजेशन जैसे कई सिविल सोसाइटी संगठनों ने स्क्रीनिंग के लिए पीडीएपी का साथ दिया है. राजविंदर ने मुझे बताया, "मानवाधिकारों पर आधारित सेमिनार जिसमें दर्शक सिर्फ पीड़ित, जीवित बचे लोग, उनके परिवारों और वकीलों हों उसे शायद ही फिल्म का सार्वजनिक प्रदर्शन कहा जा सकता है." चंडीगढ़ के अलावा दिल्ली और अमृतसर में भी उस साल 26 अप्रैल और 7 जुलाई को डॉक्यूमेंट्री दिखाई गई थी.

चंडीगढ़ पुलिस के उपाधीक्षक और प्रवक्ता चरणजीत सिंह विर्क से शिकायत के बारे में पूछे जाने पर व्हाट्सएप पर मामले को लेकर कुछ मामूली जानकारी ही दी. उन्होंने बताया कि अपराध शाखा द्वारा छानबीन के बाद सतनाम सिंह और अन्य लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है. उन्होंने यह भी लिखा, "जांच के दौरान खालिस्तान समर्थक होने को लेकर कोई सबूत नहीं मिला." एमएचए के आरोप को खारिज करते हुए, राजविंदर ने मंत्रालय की सूचना को गलत और इस कदम को पागलपन करार दिया. उन्होंने कहा कि मंत्रालय का डॉक्यूमेंट्री पर आपत्ति जताना अजीब बात है. पुलिस अधिकारियों द्वारा अलग-अलग समयावधि और सरकारों में हत्याओं को अंजाम दिया गया. गृह मंत्रालय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काम करने वाले एक मानवाधिकार कार्यकर्ता और प्रतिष्ठित बैरिस्टर को इस तरह के ओछे आरोपों से निशाना बनाने पर आमादा क्यों है? यह बहुत ही शर्मनाक है." पीडीएपी और नौ अन्य व्यक्तियों ने नवंबर 2019 में याचिका दायर की थी. याचिका में कहा गया है कि इन नौ में से आठ लोगों ने पंजाब पुलिस और सुरक्षा बलों के हाथों अपने परिजनों खोया है. इसमें पंजाब सरकार, एमएचए के सचिव, भारत सरकार, पंजाब के पुलिस महानिदेशक और केंद्रीय जांच ब्यूरो को उत्तरदाता बनाया गया है.

पीडीएपी का काम मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा द्वारा पंजाब में लोगों के गायब होने पर किए गए शोध को आगे बढ़ा रहा है. खालरा पंजाब में इस तरह के मामलों की जानकारी एकत्र करने वाले पहले व्यक्ति थे. पीडीएपी की वेबसाइट के अनुसार इस काम को करने के लिए उन्होंने श्मशान में इस्तेमाल होने वाली जलाऊ लकड़ी की रसीदें और अमृतसर की नगर समिति द्वारा रखे गए रिकॉर्ड भी एकत्र किए. उन्होंने अमृतसर, तरनतारन और मजीठा जिलों के तीन श्मशान घाटों से 2000 से अधिक अवैध दाह संस्कार के सबूत एकत्र किए. अप्रैल 2019 में कारवां को दिए अपने एक साक्षात्कार में सतनाम ने कहा है, "खालरा का काम अभूतपूर्व था. बिलकुल विकीलीक्स की तरह."

16 जनवरी 1995 को खालरा ने एक प्रेस नोट के जरिए अपने इन निष्कर्षों का खुलासा किया. उसी महीने पीडीएपी की वेबसाइट में बताया गया कि उन्होंने गायब होने के इन मामलों की स्वतंत्र जांच का अनुरोध करते हुए राज्य के उच्च न्यायालय का रुख किया था. लेकिन कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी. उसी वर्ष 6 सितंबर को पंजाब पुलिस ने खालरा का अपहरण कर उन्हें मार दिया. दस साल बाद जाकर छह अधिकारियों को इस अपराध के लिए दोषी ठहराया गया. खालरा की पत्नी परमजीत कौर ने 1995 में सबूतों के साथ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. 15 नवंबर को अदालत ने सीबीआई के निदेशक को मामले की जांच के लिए एक उच्च स्तरीय टीम नियुक्त करने का आदेश दिया. तदानुसार, पीडीएपी की याचिका में कहा गया कि सीबीआई ने जांच करके पंजाब पुलिस के खिलाफ हत्या के जुर्म में कई आरोप पत्र दायर किए."

खालरा के किए काम का बड़ा परिणाम सामने आया. पीडीएपी की याचिका में बताया गया कि खालरा ने गुप्त तरीके से दाह संस्कार किए करीब 1,528 लोगों की पहचान की और पंजाब पुलिस के कई दोषी अधिकारी को सामने आए. पीडीएपी की याचिका में कहा गया, "हत्या और दाह संस्कार के सबूत उस समय इन क्षेत्रों के बाहर उपलब्ध नहीं थे." लेकिन नवंबर 2019 की याचिका में ऐसे मामलों का दायरा पंजाब के 26 जिलों और उप जिलों के साथ-साथ राज्य के बाहर तक बढ़ा दिया गया. याचिका में यह भी बताया गया कि "याचिकाकर्ताओं ने पूरे पंजाब के 1600 गांवों में 3500 से अधिक घरों में पूछताछ की हैं." उनके द्वारा एकत्र किए गए डेटा से पता चलता है कि "कैसे ये हत्याएं पूरे पंजाब में व्यवस्थित रूप से की गईं."

याचिका में कहा गया है, "इन्हें अंजाम देने का तरीका और ये आपराध अमृतसर में हुईं हत्याओं के जैसा ही हैं." इससे जुड़े सबूतों में गायब पंजाब की एक डीवीडी और पीडीएपी की रिपोर्ट की एक प्रति, अज्ञात लोगों की पहचान से जुड़े शमशान घाट के 6733 लोगों की जानकारी सहित कई दस्तावेजों को सूचीबद्ध किया गया था. याचिका में उल्लेख किया गया है कि प्रत्येक पीड़ित की पहचान अलग-अलग सबूतों जैसे एफआईआर, पीड़ित की गवाही, जलाऊ लकड़ी और श्मशान के कपड़े खरीदने की रसीदें और अज्ञात या लावारिस शवों की संख्या के आधार पर की गई थी, जो पीडीएपी की पहुंच के भीतर था.

याचिका में आगे यह भी कहा गया कि खालरा के काम को लेकर किए गए मुकदमे के बाद ही उत्तरदाताओं द्वारा शिनाख्त न करने के हठ के बावजूद 75 प्रतिशत से अधिक पीड़ितों की पहचान की गई थी. याचिकाकर्ताओं ने बताया कि प्रतिवादी जानबूझकर पीड़ितों की पहचान प्रकट नहीं करना चाहते थे. उन्होंने लिखा, "गुप्त तरीके से किए गए इन व्यवस्थित और नियोजित दाह संस्कार का कारण पीड़ितों का अपहरण कर अवैध रूप से हिरासत में रखने की बात, उनको दी गई यातनाओं, गोली और फांसी के निशान को छुपाना था."

याचिकाकर्ताओं ने बताया कि उन्हें कथित मुठभेड़ों की लगभग 1200 एफआईआर की जानकारी थी जिसमें दावा किया गया था कि हिरासत में लिए गए व्यक्ति या तो क्रॉस-फायरिंग में मारे गए या भाग गए. याचिका में उल्लेख किया गया है, "ये सभी एफआईआर आश्चर्यजनक रूप से एक जैसी ही कहानी बताती हैं जिनमें पुलिस अधिकारी मुठभेड़ के दौरान बच जाते हें और उनकी हिरासत में लिया गया व्यक्ति हमेशा गोलीबारी में मारा जाता है और इन सब में असल अपराधी की पहचान नहीं हो पाती है." याचिका में आगे लिखा है कि ऐसी 274 एफआईआरों की तारीखें श्मशान घाटों और नगर समितियों से प्राप्त अवैध दाह संस्कार की तारीखों से पूरी तरह मेल खाती हैं. "इसकी कोई जांच नहीं की जाती है और कई मामलों में पीड़ितों की पहचान भी हो जाती है लेकिन फिर भी उनका दाह संस्कार एक अज्ञात व्यक्ति के रूप में किया जाता है." पीडीएपी के समन्वयक जगजीत सिंह ने मुझे बताया कि “99 प्रतिशत मामलों में पीड़ितों को पुलिस ने पहले गिरफ्तार किया और फिर फर्जी मुठभेड़ों में मार दिया." जगजीत ने बताया कि बाटला के कुछ मामलों में एक दस्तावेज के एक कॉलम में पुलिस ने लिखा कि शव लावारिस था लेकिन वहीं उसी दस्तावेज के दूसरे कॉलम में पीड़ित का पूरा पता भी लिखा था.

जतिंदर कौर तुड़ वरिष्ठ पत्रकार हैं और पिछले दो दशकों से इंडियन एक्सप्रेस, टाइम्स ऑफ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स और डेक्कन क्रॉनिकल सहित विभिन्न राष्ट्रीय अखबारों में लिख रही हैं.

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