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एनईपी बनाम जेन ज़ी : मोदी सरकार की शिक्षा नीति से भड़का युवा आक्रोश

20 जुलाई, 2026 को ज्योतिराव और सावित्रीबाई फुले की तस्वीर लिए संसद की ओर मार्च करते प्रदर्शनकारी छात्र. लगभग हर छात्र के पास पिछले पांच वर्षों में भारत की महंगी, नौकरशाही वाली और चरमराती उच्च शिक्षा प्रणाली से सताए जाने की कहानी थी. (कारवां के लिए शाहिद तांत्रे)
03 October, 2026

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वह 2000 दशक था. मैं बड़ी हो रही थी और मैं प्रतियोगी परीक्षा के ख़्याल से कांपने लगती थी. मैं सिर्फ़ दो बार ऐसी परीक्षाओं में बैठी और फिर तय कर लिया कि मैं इन नतीजों की घबराहट झेलने के लिए नहीं बनी हूं. अपनी दो बहनों के उलट, मैं पढ़ाई-लिखाई में ठीक-ठाक ही थी. उस दौर में लखनऊ में किसी सरकारी कॉलेज में एडमिशन पाना कोई बड़ी बात नहीं थी. फॉर्म भरते ही 12वीं के अंकों के आधार पर एडमिशन मिल जाता था. अवध गर्ल्स डिग्री कॉलेज, मेरे घर से सिर्फ़ सात किलोमीटर दूर था. बाद में, मेरे ग्रेजुएशन में इतने नंबर आ गए कि मुझे उसी यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस में मास्टर डिग्री मिल गई. जब मैं पत्रकार बनी और अख़बारों में काम करने लगी, तो शिक्षा से जुड़ी ख़बरें देखना मेरे मुख्य कामों में से एक था. दिल्ली में शिक्षा की स्थिति को देखने से पहले, मुझे अलीगढ़ जैसे यूनिवर्सिटी वाले शहरों से रिपोर्टिंग करने का मौक़ा मिला.

मेरे छात्र जीवन के दिनों से अब तक चीज़ें बहुत बदल गई हैं. इस रिपोर्ट के सिलसिले में पिछले छह महीनों में मैंने जितने भी छात्रों से बात की, लगभग हर एक से मैंने जाना कि माहौल कितना ख़राब हो गया है.

भारत की 1.4 अरब आबादी में से लगभग 40 प्रतिशत लोग 25 साल से कम उम्र के हैं. उनकी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए, उच्च शिक्षा विभाग के तहत 1,422 यूनिवर्सिटियों द्वारा संचालित 52,397 कॉलेज हैं. इनमें से ज़्यादातर राज्य-स्तरीय सरकारी और निजी यूनिवर्सिटियां हैं. शिक्षा पर होने वाले ख़र्च का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा राज्य सरकारें देती हैं. इससे यह बात समझ में आती है कि केरल और बिहार जैसे राज्यों में, जिनकी जनसांख्यिकी और साक्षरता का स्तर एक-दूसरे से बहुत अलग है, शिक्षा में सुधार के लिए अलग-अलग समाधानों की ज़रूरत है.

आमतौर पर प्रवेश परीक्षाएं हमेशा से ही प्रतिस्पर्धी रही हैं, लेकिन राज्य के ज़्यादातर सरकारी कॉलेजों में मानविकी, विज्ञान, कॉमर्स, इंजीनियरिंग या मेडिसिन के लिए आपके 12वीं के अंक ही सीट पक्की करने के लिए काफ़ी थे. जब इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी और ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज जैसे राष्ट्रीय महत्व के संस्थान खुले, तो उन्होंने अपनी प्रवेश परीक्षाएं ख़ुद तैयार कीं. हैदराबाद यूनिवर्सिटी और जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी समेत कुछ केंद्रीय विश्वविद्यालयों में भी अपनी-अपनी प्रवेश परीक्षा होती थीं, पर साथ ही इसमें हाशिए के समुदायों के लोगों के लिए विशेष प्रावधान भी थे.

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