पंजाब के बदहाल सरकारी स्कूलों में तबाह होते अनुसूचित जाति के छात्र

01 नवंबर 2019
छत्तीसगढ़ के देवगांव के एक स्कूल की तस्वीर. यह फोटो प्रतीकात्मक है.
फ्रेडरिक सोल्टन/कोर्बिस/गैटी इमेजिस
छत्तीसगढ़ के देवगांव के एक स्कूल की तस्वीर. यह फोटो प्रतीकात्मक है.
फ्रेडरिक सोल्टन/कोर्बिस/गैटी इमेजिस

जुलाई के आखिर में, जब मैंने पंजाब के श्री मुक्तसर साहिब जिले के खुंडे हलाल गांव में सरकारी हाई स्कूल का दौरा किया, तो कॉरिडोर में आठवीं के कुछ छात्र पैर पर पैर धरे बैठे थे. उनके बैग एक खाली कक्षा के अंदर जमीन पर बिखरे थे. कमरे में कोई बेंच नहीं थी. स्कूल के रिकॉर्ड रजिस्टर से पता चलता है कि कक्षा 1 से लेकर 10 तक 361 छात्रों को स्कूल में दाखिला दिया गया. इनमें से 350 यानी लगभग 97 प्रतिशत अनुसूचित जाति समुदाय से हैं.

स्कूल में एक से पांच तक की प्राथमिक कक्षाओं में नामांकित छात्रों की संख्या 2015 में 168 से गिरकर मौजूदा सत्र में 140 रह गई. इन 140 छात्रों में से 138 अनुसूचित जाति के हैं. स्कूल में सामान्य वर्ग के छात्रों की कमी का जिक्र करते हुए, हेडमास्टर जसविंदर सिंह ने कहा, "ये स्कूल, जैसा कि आपने खुद ही देखा है, केवल गरीबों के लिए बने हुए हैं."

राज्य के स्कूल-शिक्षा विभाग के आंकड़ों के अनुसार, प्राथमिक स्कूल पंजाब के सभी सरकारी स्कूलों की हालत बयान करते हैं. पिछले एक दशक में, पंजाब के सरकारी स्कूलों में छात्रों की संख्या में 1.2 लाख से भी ज्यादा की गिरावट आई है. 2009-10 के शैक्षणिक सत्र में जहां छात्रों की संख्या 2452203 थी वहीं 2018-19 के सत्र में यह संख्या घटकर 2329622 रह गई. इसके अलावा, स्कूलों में अनुसूचित जाति के छात्रों की संख्या में इसी दौरान लगभग 1.2 लाख का इजाफा हुआ. जहां 2009 में अनुसूचित जाति के छात्रों की संख्या 1418790 थी वहीं 25 जुलाई 2019 तक मौजूदा शैक्षणिक सत्र में यह संख्या बढ़कर 1537759 हो गई. 2009 में 57.8 प्रतिशत अनुसूचित जाति के छात्र थे और इस वर्ष 25 जुलाई तक यह बढ़कर 63.59 प्रतिशत हो गया. आंकड़ों से पता चलता है कि सरकारी स्कूलों में शिक्षा की खराब गुणवत्ता के कारण पहले से अधिक अनुसूचित जाति के छात्र पीड़ित हैं.

श्री मुक्तसर साहिब जिले के लकड़वाली गांव के एक जर्जर सरकारी स्कूल के प्रधानाध्यापक भारत भूषण वधवा ने मुझे बताया कि स्कूल धन की कमी झेल रहा था. पिछले साल ही 120 डेस्क खरीदे, इससे पहले तो छात्र फर्श पर बैठते थे. उन्होंने कहा, "हमने ब्लैक बोर्ड, चाक और कॉपी-किताब जैसी जरूरी चीजों के लिए अपनी जेब से पैसे दिए." शिक्षाविद प्यारे लाल गर्ग, जो पंजाब के बाबा फरीद यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंसेज के पूर्व रजिस्ट्रार हैं, ने कहा कि यह समस्या बुनियादी ढांचे से परे है.

शिक्षा क्षेत्र में काम कर रही गैर-लाभकारी संस्था, “प्रथम” की 2018 की वार्षिक शिक्षा रिपोर्ट के अनुसार, ग्रामीण पंजाब के सरकारी स्कूलों में तीसरी में पढ़ने वाले 59.5 प्रतिशत छात्र गणित में घटा के सवाल नहीं कर सकते, जबकि उनमें से 63.6 प्रतिशत बच्चे दूसरी कक्षा के बच्चों की किताब नहीं पढ़ सकते. इससे भी ज्यादा बुरा यह है कि आठवीं कक्षा में 41.6 प्रतिशत छात्र भाग के सवाल नहीं कर सकते. गर्ग के अनुसार, सरकारी स्कूलों में शिक्षक भी "सामाजिक रूप से अलग-थलग पड़े हुए छात्र ही हैं, जो मुख्य रूप से गरीब परिवारों से आते हैं."

प्रभजीत सिंह स्वतंत्र पत्रकार हैं.

Keywords: Punjab education Right to Education
कमेंट