"सुरेखा भोतमांगे का नाम नहीं सुना है तो आंबेडकर को अवश्य पढ़ें", एक था डॉक्टर एक था संत का अंश

आंबेडकर ने पूरी हिम्मत से, जो हिम्मत आजकल के हमारे बुद्धिजीवी नहीं जुटा पाते, कहा था, ''अछूतों के लिए हिन्दू धर्म सही मायने में एक नर्क है.’’
17 September, 2019

जाति का विनाश लगभग अस्सी वर्ष पुराना भाषण है. एक ऐसा भाषण, जो कभी दिया न जा सका. जब मैंने इसे पहली बार पढ़ा तो लगा, मानो कोई व्यक्ति किसी घुप अंधेरे कमरे में जाए और फिर खिड़कियां खोल दे. जो कुछ भी भारतवासियों को स्कूल में पढ़ाया जाता है और जो असली वास्तविकता हम हर रोज अपने जीवन में देखते और भुगतते हैं, उसमें एक खाई है और डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर का अध्ययन उस खाई के बीच एक पुल का काम करता है.

मेरे पिता एक हिन्दू परिवार से थे, जो बाद में ब्रह्म समाजी बन गए. मैं उनसे तब तक नहीं मिली, जब तक मैं बीस-बाईस साल की नहीं हो गई. मैं कम्युनिस्ट-शासित केरल के एक छोटे से गांव आईमनम में, एक सीरियन ईसाई परिवार में, अपनी मां के साथ पली-बढ़ी. और फिर भी मेरे चारों ओर जाति की फटन और दरारें थीं. आईमनम में एक अलग 'परयां’ चर्च था जहां 'परयां’ पादरी एक 'अछूत’ धार्मिक समूह को उपदेश देते थे. हर व्यक्ति की जाति, उसके नाम से, एक-दूसरे को सम्बोधित करने के तरीके से, पेशे से, पहनावे से, उनकी तय की हुई शादियों से या उनकी बोली-भाषा से एकदम स्पष्ट हो जाती थी. इस सब के बावजूद मुझे स्कूल की किसी भी पाठ्यपुस्तक में जाति के विषय में कभी कुछ भी पढ़ने को नहीं मिला. आंबेडकर को पढ़ने से मुझे अहसास हुआ कि हमारे शैक्षणिक संसार में कितनी चौड़ी खाई है. उनको पढ़ने से यह भी साफ हो गया कि यह खाई क्यों है, और हमेशा क्यों रहेगी जब तक कि भारतीय समाज में कोई बुनियादी इन्कलाबी बदलाव नहीं आ जाता.

इंकलाब भी आते हैं, और अक्सर इंकलाबों का आगाज पढ़ने से होता है.

यदि आपने मलाला यूसुफजई का नाम सुना है लेकिन सुरेखा भोतमांगे का नहीं, तो आप आंबेडकर को अवश्य पढ़ें.

मलाला ऐसी लड़की थी जिसकी आयु मात्र पंद्रह वर्ष थी, लेकिन तब तक वह कई 'अपराध’ कर चुकी थी. पाकिस्तान की स्वात घाटी में रहती थी, बीबीसी ब्लॉगर थी, न्यूयॉर्क टाइम्स वीडियो में आई थी, और स्कूल जाती थी. मलाला डॉक्टर बनना चाहती थी, लेकिन उसके पिता उसे राजनेता बनाना चाहते थे. वह एक बहादुर बालिका थी. जब तालिबान ने फरमान जारी किया कि स्कूल लड़कियों के लिए नहीं बने हैं, अर्थात् लड़कियां स्कूल न जाएं, तब मलाला ने परवाह नहीं की. तालिबान ने धमकी दी कि यदि मलाला ने उनके विरुद्ध बोलना बन्द नहीं किया, तो उसकी हत्या कर दी जाएगी. 9 अक्टूबर, 2012 को एक बन्दूकधारी ने मलाला को स्कूल बस से नीचे घसीट लिया, और उसके सर में गोली दाग दी. मलाला को इंग्लैंड ले जाया गया जहां उसे सर्वोत्तम सम्भव चिकित्सकीय सुविधा मिली, और वह बच गई. यह एक चमत्कार ही था.

अमेरिकी राष्ट्रपति और राज्य सचिव ने मलाला को समर्थन और एकजुटता के सन्देश भेजे. विश्वविख्यात गायिका मैडोना ने उन्हें एक गीत समर्पित किया, विश्वविख्यात हॉलीवुड अभिनेत्री एंजेलिना जोली ने मलाला पर एक लेख लिखा, मलाला को नोबेल शान्ति पुरस्कार के लिए मनोनीत किया गया, टाइम पत्रिका के कवर पेज पर मलाला का चित्र प्रकाशित हुआ. हत्या के प्रयास के चन्द दिनों के भीतर गॉर्डन ब्राउन, ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री और संयुक्त राष्ट्र संघ के वैश्विक शिक्षा के विशेष दूत ने 'मैं हूं मलाला’ लोकयाचिका शुरू की जिसमें कहा गया कि पाकिस्तान सरकार सभी बालिकाओं को शिक्षा प्रदान करे. लेकिन नारीवादी एजेंडे के साथ पाकिस्तान में अमेरिकी ड्रोन हमले जारी हैं—नारीद्वेषी, इस्लामी आतंकवादियों का सफाया करने के लिए.

सुरेखा भोतमांगे चालीस वर्ष की थीं और उन्होंने भी बहुत से 'अपराध’ किए थे—वे एक महिला थीं—एक अछूत, दलित महिला—इसके बावजूद भी वे फटेहाल दरिद्र नहीं थीं. वे अपने पति से अधिक शिक्षित थीं, इसलिए अपने परिवार की मुखिया बन गई थीं. डॉक्टर आंबेडकर उनके हीरो थे. उनकी तरह ही, सुरेखा के परिवार ने भी हिन्दू धर्म त्यागकर बौद्ध धर्म अपना लिया था. सुरेखा के बच्चे शिक्षित थे. उनके दोनों बेटे सुधीर और रोशन कॉलेज गए थे. उनकी बेटी प्रियंका सत्रह वर्ष की थी और स्कूल के अन्तिम वर्ष में थी. सुरेखा और उसके पति ने महाराष्ट्र के खैरलांजी गांव में जमीन का एक छोटा-सा टुकड़ा खरीदा था. इस भूखंड के चारों ओर के खेत उस जाति के लोगों के थे जो स्वयं को सुरेखा की महार जाति से ऊंचा मानते थे. चूंकि वे दलित थीं, और उन्हें परम्परा के अनुसार एक सम्मानजनक अच्छा जीवन जीने का अधिकार 'नहीं’ था, इसलिए ग्राम पंचायत ने उन्हें बिजली कनेक्शन लेने की इजाजत नहीं दी. उन्हें अपने झोंपड़े को पक्की ईंट के घर में तब्दील करने की इजाजत भी नहीं दी गई. गांव वाले नहर के पानी से उन्हें अपने खेतों को सींचने भी नहीं देते थे, न ही वे सार्वजनिक कुओं से पानी ले सकती थीं. फिर, एक रोज गांव वालों ने, सुरेखा के खेत के बीच में से एक सार्वजनिक सड़क बनाने की कोशिश की. सुरेखा ने इसका विरोध किया तो गांव वालों ने उनके खेत में अपनी बैलगाड़ियां दौड़ा दीं. सुरेखा की पकी हुई फसल पर गांव वालों ने अपने मवेशी, छोड़ दिए.

सुरेखा झुकी नहीं. उन्होंने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई. लेकिन पुलिस ने कोई ध्यान नहीं दिया. कुछ महीने बीत गए, और फिर गांव में तनाव अपने चरम पर पहुंच गया. उन्हें चेतावनी देने के लिए गांव वालों ने उनके एक रिश्तेदार पर हमला करके, उसे अधमरा कर दिया. सुरेखा ने पुलिस में एक और शिकायत दर्ज कराई. इस बार पुलिस ने कुछ व्यक्तियों की गिरफ्तारियां कीं, लेकिन अभियुक्तों को तत्काल जमानत पर रिहा कर दिया गया. जिस दिन उन अभियुक्तों को जमानत पर रिहा किया गया (29 सितम्बर 2006), उसी शाम छह बजे, गुस्से से भरे, लगभग 70 मर्द और औरतें, ट्रैक्टरों में बैठकर आए और भोतमांगे के घर को घेर लिया. सुरेखा का पति भैया लाल, उस समय खेत में काम कर रहा था, उसने जब शोर सुना, तो वह घर की ओर दौड़ा. एक झाड़ी के पीछे छुपकर उसने भीड़ को अपने परिवार पर हमला करते देखा. वह फौरन नजदीक के शहर दुसाला भागकर गया और वहां एक रिश्तेदार की सहायता से पुलिस को फोन करने में कामयाब रहा (आपको ऐसे सम्पर्कों की जरूरत होती है कि पुलिस आपका फोन सुन ले). लेकिन पुलिस नहीं आई. भीड़ ने सुरेखा, प्रियंका और दोनों बेटों को, जिनमें से एक आंशिक रूप से अंधा था, घसीटकर घर से बाहर निकाला. भीड़ ने लड़कों को आदेश दिया कि वे अपनी मां और बहन के साथ बलात्कार करें, जब लड़कों ने यह कुकृत्य करने से साफ मना कर दिया तो उनके जननांगों को क्षत-विक्षत कर दिया गया, और अन्तत: भीड़ ने उनकी हत्या कर दी. सुरेखा और प्रियंका का गैंग-रेप किया गया और अन्तत: उनकी भी पीट-पीट कर हत्या कर दी गई. चारों शवों को पास की एक नहर में फेंक दिया गया, जहाँ वे अगले दिन पाए गए.

सबसे पहले प्रेस ने इसे एक 'नैतिक हत्या का मामला’ कहा, इशारा किया गया कि गांव वाले नाराज थे क्योंकि सुरेखा के अपने एक रिश्तेदार (जिस व्यक्ति पर पहले हमला किया गया था) से नाजायज सम्बन्ध थे. दलित संगठनों के विरोध के बाद न्याय-व्यवस्था को मजबूरन अपराध का संज्ञान लेना पड़ा. नागरिकों की तथ्य-खोज समितियों ने बताया कि सबूतों के साथ कैसे छेड़-छाड़ की गई और उन्हें कैसे तोड़ा-मरोड़ा गया. जब निचली अदालत ने अन्तत: निर्णय सुनाया, मुख्य अपराधियों को सजा-ए-मौत सुनाई गई लेकिन अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम लागू नहीं किया गया. न्यायाधीश महोदय का मानना था कि खैरलांजी की सामूहिक हत्या के पीछे बदले की भावना थी. उन्होंने कहा कि बलात्कार का कोई सबूत नहीं मिला और हत्या के पीछे कोई जातीय कोण भी नहीं था. जब कोई न्यायिक निर्णय, पहले अपराध के कानूनी ढांचे को कमज़ोर कर और फिर मृत्युदंड दे, तो ऐसा करके वह यह आधार दे देता है कि ऊपर की अदालत उस सजा को कम कर दे, या फिर उसको बिलकुल ही समाप्त कर दे. भारत में यह कोई असामान्य चलन नहीं है. किसी भी अदालत द्वारा दी गई मृत्युदंड की सजा, चाहे वह कितने भी जघन्य अपराध के लिए क्यों न हो, न्यायसंगत नहीं ठहराई जा सकती. अदालत यदि यह स्वीकार करती कि जातीय विद्वेष आज भी भारत में एक भयानक वास्तविकता है, तो यह न्याय का एक संकेत होता. लेकिन जज ने इस पूरे प्रकरण से जाति का कोण ही गायब कर दिया.

सुरेखा भोतमांगे और उसके बच्चे एक बाजारवादी लोकतंत्र में रहते थे, इसलिए संयुक्त राष्ट्र की कोई याचिका 'मैं हूं सुरेखा’ भारत सरकार को नहीं दी गई. विभिन्न राष्ट्राध्यक्षों ने समर्थन या एकजुटता के सन्देश भी नहीं भेजे. और यह दुरुस्त क्यों न हो, आखिर तो हम नहीं चाहते कि हमारे ऊपर भी 'डेजी-कटर’ बमबारी हो, और वह भी सिर्फ इसलिए कि हम जाति-व्यवस्था चलाते हैं.

आंबेडकर ने पूरी हिम्मत से, जो हिम्मत आजकल के हमारे बुद्धिजीवी नहीं जुटा पाते, कहा था, ''अछूतों के लिए हिन्दू धर्म सही मायने में एक नर्क है.’’

एक लेखक द्वारा अपने सहजीवियों के लिए, 'अछूत’, 'अनुसूचित जाति’, 'पिछड़ा वर्ग’ और 'अन्य पिछड़ा वर्ग’ जैसी शब्दावली इस्तेमाल करना ऐसा ही है जैसे किसी नर्क में जीना. लेकिन चूंकि आंबेडकर ने 'अछूत’ शब्द बेहिचक और आक्रोश के साथ प्रयोग किया, इसलिए मुझे भी यह शब्द ही प्रयोग करना है. आज 'अछूत’ शब्द के स्थान पर मराठी शब्द 'दलित’ (कुचले हुए लोग) ने ले लिया है और यह 'अनुसूचित जाति’ के पर्याय के रूप में इस्तेमाल होता है. यह एक गलत प्रथा है, जैसा कि विद्वान रूपा विश्वनाथ बताती हैं, क्योंकि 'दलित’ शब्द में वे अछूत भी समाहित हैं जिन्होंने जाति के कलंक से बचने के लिए धर्म-परिवर्तन कर लिया. (जैसे कि मेरे गांव के परयां, जो ईसाई धर्म में चले गए), जिसके बाद वे 'अनुसूचित जाति’ में नहीं रहे.पक्षपात की सरकारी शब्दावली एक ऐसी भूलभुलैया है, जिसे पढ़कर लगता है, मानो यह किसी दुराग्रही नौकरशाह द्वारा फाइल पर लिखी कोई टिप्पणी हो. इस सबसे बचने के लिए जब मैंने अतीत के सन्दर्भ में लिखा तो ज़्यादातर, 'अछूत’ शब्द प्रयोग किया है और जब मैंने वर्तमान काल के सन्दर्भ में लिखा है तो 'दलित’ शब्द का प्रयोग किया है. जब मैं उन दलितों के बारे में लिखती हूं, जिन्होंने अन्य धर्म अपना लिए, तब मैं विशिष्ट शब्द प्रयोग करती हूं जैसे दलित सिख, दलित मुस्लिम या दलित ईसाई.

अब मैं आंबेडकर के नर्क वाले बिन्दु पर वापस लौटती हूं.

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार प्रति सोलह मिनट में, एक दलित के विरुद्ध, किसी गैर-दलित द्वारा अपराध किया जाता है. प्रतिदिन चार से अधिक अछूत महिलाओं का, गैर-अछूत द्वारा बलात्कार किया जाता है. प्रत्येक सप्ताह तेरह दलितों की हत्या होती है और छह दलितों का अपहरण होता है. केवल 2012 में, जब दिल्ली में एक चर्चित गैंग-रेप और हत्या का मामला हुआ था, 1574 दलित महिलाओं का बलात्कार हुआ (मोटे तौर पर ऐसा माना जाता है कि दलितों पर अत्याचार और बलात्कार के केवल 10 प्रतिशत अपराधों की ही रिपोर्ट दर्ज की जाती है), और 651 दलितों की हत्या हुई. और यह संख्या केवल बलात्कार और हत्याओं की है. इसमें नंगा करके बाज़ार में घुमाना, जबरदस्ती मानव-मल खिलाना(सचमुच में), भूमि पर कब्जा करना, सामाजिक बहिष्कार, पेयजल के स्रोतों पर पाबन्दी शामिल नहीं है. इन आंकड़ों में ऐसे मामले नहीं आते जैसे पंजाब का बंत सिंह, एक दलित मजहबी सिख, 2005 में जिसके दोनों हाथ और एक पांव काट दिए गए—सिर्फ इसलिए क्योंकि उसने उन लोगों के खिलाफ पुलिस में केस दर्ज कराने का दुस्साहस किया था, जिन्होंने उसकी बेटी के साथ सामूहिक बलात्कार किया था. तीन अंगों से अपंग लोगों के भी कोई अलग से आंकड़े नहीं होते.

आंबेडकर ने कहा, ''यदि किसी समुदाय द्वारा मूलभूत बुनियादी अधिकारों का विरोध किया जाता हो तो कानून, कोई संसद, कोई न्यायपालिका उन अधिकारों की सही अर्थों में गारंटी नहीं दे सकती है. अमेरिकी नीग्रो, जर्मनी के यहूदी और भारत के अछूतों के लिए मूलभूत अधिकारों का क्या फायदा है? जैसा कि बर्क ने कहा था, भीड़ को दंडित करने की कोई विधि नहीं है.’’

किसी भी गांव के पुलिसकर्मी से पूछो कि उसका क्या काम है तो वह आपको शायद यह जवाब देगा, ''शान्ति बनाए रखना.’’ और अमूमन यह काम जाति-व्यवस्था बनाए रखकर किया जाता है. जबकि दलितों की आकांक्षाएँ उस 'शान्ति’ को भंग करती हैं.

आंबेडकर का भाषण जाति का विनाश भी इसी शान्ति को भंग करता है.

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वर्तमान समय के अन्य घृणित विद्वेष—जैसे दक्षिण अफ्रीका का अपारथाईड (रंग-भेद), नस्लवाद, लिंग आधारित भेदभाव और धार्मिक कट्टरवाद—को राजनीतिक तथा बौद्धिक रूप से अन्तर्राष्ट्रीय मंचों से जोरदार चुनौतियां दी गई हैं. लेकिन ऐसा क्यों है कि भारत में जाति का चलन—मानव समाज की अब तक की ज्ञात क्रूरतम ऊंच-नीच की सामाजिक व्यवस्था—इस प्रकार की समीक्षा और घोर निन्दा से बच निकलने में कामयाब रहा? ऐसा शायद इसलिए हुआ क्योंकि इसे हिन्दू धर्म में समाहित और विलीन कर दिया गया, जहां कितना कुछ अच्छा और दया-करुणा से भरा नजर आता है—रहस्यवाद, अध्यात्म, अहिंसा, सहिष्णुता, शाकाहार, गांधी, योग, हिप्पी लोग और बीटल्स बैंड—कम से कम किसी बाहरी व्यक्ति के लिए इसमें ताक-झांक करना और इसे गहराई से समझ पाना असम्भव लगता है.

समस्या और भी टेढ़ी हो जाती है जब हम देखते हैं कि रंग-भेद (अपार-थाईड) के विपरीत, जाति किसी रंग-संकेत पर आधारित नहीं है, इसलिए इसे आसानी से 'देखा’ भी नहीं जा सकता. साथ ही, रंग-भेद (अपारथाईड) के विपरीत, जाति-व्यवस्था के बहुत से जोशीले प्रशंसक मौजूद हैं, जो ऊंचे-ऊंचे पदों पर बैठे हैं. वे खुलकर तर्क देते हैं कि जाति एक सामाजिक गोंद है जो व्यक्तियों और समुदायों को बहुत ही दिलचस्प और कुल मिलाकर बहुत ही सकारात्मक तरीके से बाँधती और अलग करती है. और इसने भारतीय समाज को विभिन्न चुनौतियों को झेलने की ताकत और लचीलापन दिया है. जब जातिवादी हिंसा की तुलना नस्लवाद और रंग-भेद (अपारथाईड) की बुनियाद पर जारी हिंसा से की जाती है तो भारतीय सत्ता-वर्ग के चेहरे पीले पड़ जाते हैं. यही लोग दलितों पर उस समय टूट पड़े थे जब 2001 में डरबन में हुए, नस्लवाद के विरुद्ध विश्व सम्मेलन में, दलितों ने जाति का मुद्दा उठाने का प्रयास किया. इन लोगों ने कहा कि जाति हमारा 'आन्तरिक मामला’ है. ये लोग जाने-माने समाजशास्त्रियों के शोध को तर्क के रूप में प्रस्तुत करते और कहते हैं कि जाति का चलन, नस्लीय भेदभाव जैसा नहीं है तथा जाति नस्ल से भिन्न है. आंबेडकर भी उनसे सहमत होते. लेकिन जो तर्क सक्रिय दलित कार्यकर्ता दे रहे थे वह यह था कि हालांकि जाति और नस्ल एक समान नहीं हैं, फिर भी एक-दूसरे से तुलनीय हैं. दोनों तरह का भेदभाव जन्म-वंश के आधार पर लोगों को अपने निशाने पर रखता है.15 जनवरी, 2014 को मार्टिन लूथर किंग जूनियर की 85वीं जयन्ती के अवसर पर आयोजित वाशिंगटन डी सी के कैपिटल हिल में एक आम जनसभा में अफ्रीकी-अमेरिकी लोगों ने भारत के दलितों के लिए 'संवेदना के घोषणा-पत्र’ पर हस्ताक्षर किए. इस घोषणा-पत्र में मांग की गई कि 'भारत में दलितों का उत्पीड़न तत्काल बन्द हो.’

पहचान और न्याय, वृद्धि तथा विकास की मौजूदा बहसों में, कई जाने-पहचाने भारतीय विद्वानों के लिए जाति केवल एक प्रसंग-भर है, एक उपशीर्षक है और अक्सर एक फुटनोट-भर. मार्क्सवाद के वर्ग-विश्लेषण में जबरदस्ती इसे ठूंसकर, प्रगतिशील और वाम-झुकाव वाले बुद्धिजीवी वर्ग ने जाति को देख पाना और अधिक मुश्किल कर दिया है. यह मिटाने, अनदेखा करने की परियोजना, कई बार एक सचेत राजनीतिक कृत्य है, और कई बार उस विशेषाधिकार प्राप्त उच्च वर्ग से आता है जिसे जाति का स्वयं कोई अहसास नहीं होता, इसलिए वे ऐसा मान लेते हैं कि चेचक की तरह जाति का भी उन्मूलन हो चुका है.

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जाति की उत्पत्ति के बारे में समाजशास्त्रियों द्वारा बहसें होती रहेंगी, लेकिन इसके सांगठनिक सिद्धान्तों को समझना मुश्किल नहीं है, जो ऊँच-नीच, 'जाति अधिकारों और कर्तव्यों’ के रपटते मापक, पवित्रता और मलिनता पर आधारित हैं, और जो तौर-तरीके पहले थे और आज भी हैं, उन्हें आज भी लागू करने के लिए विवश और बाध्य किया जाता है. जाति के पिरामिड की चोटी पर बैठे लोगों को पवित्र माना जाता है और उनके बहुत सारे विशेषाधिकार हैं. पिरामिड के तल पर बैठे लोगों को मलिन, प्रदूषित माना जाता है, उन्हें कोई अधिकार तो नहीं हैं लेकिन ढेरों कर्तव्य जरूर हैं. मलिनता-पवित्रता का फार्मूला, असल में पैतृक व्यवसाय और एक विस्तृत जाति-आधारित व्यवस्था से जुड़ा हुआ है. आंबेडकर ने 1916 में (उस समय उनकी आयु मात्र 25 वर्ष थी) कोलम्बिया विश्वविद्यालय के सेमिनार के लिए एक पेपर लिखा, जिसका शीर्षक था 'भारत में जातियाँ’. इसमें उन्होंने जाति की परिभाषा दी. उनके अनुसार जाति एक अन्तर्विवाही इकाई है और एक 'खुद में बन्द वर्ग’ है. एक अन्य अवसर पर उन्होंने इसका वर्णन इस प्रकार किया, ''एक ऐसी व्यवस्था जिसमें जितना ऊपर जाएं उतना मान-सम्मान है, जितना नीचे खिसकें उतनी घृणा-अपमान है.’’

आज जिसको हम जाति-व्यवस्था के नाम से जानते हैं, हिन्दू धर्मग्रंथों में उसे वर्णाश्रम धर्म या चातुर्वर्ण अर्थात चार वर्णों की व्यवस्था के नाम से जाना जाता है. हिन्दू समाज की लगभग चार हज़ार सजातीय विवाही जातियां और उपजातियां हैं, जिनमें प्रत्येक का एक विशिष्ट वंशानुगत व्यवसाय है, और जिन्हें चार वर्णों में बांटा गया है—ब्राह्मण(पुजारी), क्षत्रिय (सैनिक), वैश्य (व्यापारी) और शूद्र (सेवक). इन वर्णों के बाहर अवर्ण जातियां हैं, अति शूद्र, अवमानवीय (मनुष्य से कमतर) जिनकी अपनी अलग श्रेणी-अनुक्रम हैं—अछूत, दर्शन-अयोग्य, समीप जाने के अयोग्य—जिनकी उपस्थिति, जिनका छूना, जिनकी परछाईं भी विशेषाधिकार प्राप्त जाति के व्यक्ति को प्रदूषित कर सकती है. कुछ समुदायों में सजातीय प्रजनन से बचने के लिए, प्रत्येक सजातीय विवाही जाति को ऐसे गोत्रों में बांटा गया है, जिनके अन्दर आपस में विवाह निषेध है. गोत्रेतर-विवाह का वैसी ही क्रूरता से अनुपालन कराया जाता है, जैसे विजातीय विवाह का—बड़े-बूढ़ों की सहमति से सर कलम करके और भीड़ द्वारा पीट-पीट कर हत्या करके. भारत के हर क्षेत्र ने बड़े प्रेम से जाति-क्रूरता के अपने अलग-अलग और अनूठे तरीकों में दक्षता हासिल कर ली है. यह अलिखित नियम-संहिता अमेरिका के नस्लवादी 'जिम क्रो’ कानून से भी कहीं ज्यादा बदतर है. पृथक् बस्तियों में रहने को मजबूर करने के अलावा, अछूतों पर उन सार्वजनिक मार्गों का प्रयोग निषेध था जिन्हें विशेषाधिकार प्राप्त जातियां प्रयोग करती थीं. दलितों को सार्वजनिक कुओं का पानी पीना मना था, वे हिन्दू मन्दिरों में प्रवेश नहीं कर सकते थे, विशेषाधिकार प्राप्त जातियों के स्कूल में उनका प्रवेश निषेध था, उन्हें अपने जिस्म का ऊपरी भाग ढकने की मनाही थी, हर प्रकार के कपड़े पहनने की उन्हें स्वतंत्रता नहीं थी, बस कुछ घटिया क़िस्म के कपड़े और आभूषण ही पहनने की उन्हें इजाजत थी. कुछ जातियों को, जैसे महार, जिस जाति में आंबेडकर पैदा हुए थे, उन्हें अपनी कमर से झाड़ू बांधना होता था ताकि उनके प्रदूषित पदचिह्नों पर खुद-ब-खुद झाड़ू लगती जाए. अन्य को अपने गले में मटकीनुमा थूकदान लटकाना होता था, ताकि उनका थूक जमीन पर गिरकर, जमीन को अपवित्र न कर दे. विशेषाधिकारप्राप्त जातियों के पुरुषों को अछूत महिलाओं के जिस्म पर अविवादित अधिकार हासिल था. प्रेम प्रदूषित करता है, लेकिन बलात्कार पवित्र है. भारत के कई हिस्सों में आज भी यह सब जारी है.

उस मानवीय या दिव्य कल्पना के बारे में कहने को और क्या बचता है, जिसने इस प्रकार की सामाजिक संरचना की परिकल्पना की?

जैसे वर्णाश्रम का धर्म अपने आप में काफी नहीं था, इसके साथ ही कर्मों का बोझ भी लाद दिया गया. उन लोगों को, जिनका जन्म अधीनस्थ जातियों में हुआ, बताया गया कि उन्हें उनके पिछले जन्मों के कुकर्मों की सजा मिल रही है. असल में वे लोग एक तरह का कारावास भुगत रहे हैं. यदि उनके द्वारा अवज्ञा या अवमानना हुई तो उनकी सजा में वृद्धि हो जाएगी, जिसका अर्थ होगा पुनर्जन्म का एक और चक्र, फिर से एक अछूत या शूद्र जाति में. इसलिए बेहतर यही है कि वे अपनी सीमाओं में रहें.

आंबेडकर ने कहा, ''जाति-व्यवस्था से बढ़कर अपमानजनक सामाजिक संगठन हो ही नहीं सकता. यह एक ऐसी व्यवस्था है जो लोगों को शिथिल, पंगु और विकलांग बनाकर, उन्हें कुछ भी उपयोगी गतिविधि नहीं करने देती.’’

दुनिया में सर्वाधिक प्रसिद्ध भारतीय, मोहनदास करमचन्द गांधी, आंबेडकर से असहमत थे. उनका विश्वास था कि जाति, भारतीय समाज की प्रतिभा का प्रतिनिधित्व करती है. 1916 में मद्रास के एक मिशनरी सम्मेलन में दिए गए एक भाषण में उन्होंने कहा :

जाति का व्यापक संगठन न केवल समाज की धार्मिक आवश्यकताओं को पूरा करता है बल्कि यह राजनीतिक आवश्यकताओं को भी परिपूर्ण करता है. जाति-व्यवस्था से ग्रामवासी न केवल अपने अन्दरूनी मामलों का निपटारा कर लेते हैं बल्कि इसके द्वारा वे शासक शक्ति या शक्तियों द्वारा उत्पीड़न से भी निपट लेते हैं. एक राष्ट्र जो जाति-व्यवस्था उत्पन्न करने में सक्षम हो उसकी अद्भुत सांगठनिक क्षमता को नकार पाना सम्भव नहीं.

1921 में उन्होंने अपनी गुजराती पत्रिका 'नवजीवन’ में लिखा:

मेरा विश्वास है कि यदि हिन्दू समाज अपने पैरों पर खड़ा हो पाया है तो वजह यह है कि इसकी बुनियाद जाति-व्यवस्था के ऊपर डाली गई. जाति का विनाश करने और पश्चिमी यूरोपीय सामाजिक व्यवस्था को अपनाने का अर्थ होगा कि हिन्दू आनुवंशिक-पैतृक व्यवसाय के सिद्धान्त को त्याग दें, जो जाति-व्यवस्था की आत्मा है. आनुवंशिक सिद्धान्त एक शाश्वत सिद्धान्त है. इसको बदलने से अव्यवस्था पैदा होगी. मेरे लिए ब्राह्मण का क्या उपयोग है यदि मैं उसे जीवन-भर ब्राह्मण न कह सकूं. यदि हर रोज किसी ब्राह्मण को शूद्र में परिवर्तित कर दिया जाए और शूद्र को ब्राह्मण में, तो इससे तो अराजकता फैल जाएगी.

हालांकि गांधी जाति-व्यवस्था के प्रशंसक थे, लेकिन वे यह भी मानते थे कि जातियों में ऊंच-नीच की श्रेणी नहीं होनी चाहिए. सभी जातियों को समान माना जाना चाहिए और अवर्ण जातियों, अति शूद्र को वर्णव्यवस्था के भीतर लाना चाहिए.

आंबेडकर की इस पर प्रतिक्रिया थी कि ''जाति-बहिष्कृत (चंडाल) लोग जाति-व्यवस्था का ही उप-उत्पाद हैं. जब तक जाति-व्यवस्था रहेगी तब तक जाति-बहिष्कृत लोग रहेंगे. कुछ भी प्रयास जाति-बहिष्कृत लोगों को बेड़ियों से मुक्त नहीं कर सकता सिवाय जाति-व्यवस्था के विनाश के.’’

अगस्त 1947 से अब तक साम्राज्यवादी ब्रिटिश सरकार और भारत सरकार के बीच सत्ता के हस्तांतरण को लगभग 70 वर्ष बीत चुके हैं. क्या जाति एक बीते जमाने की बात है? वर्णाश्रम धर्म हमारे नव 'जनतंत्र’ में अपने किस अवतार में जिन्दा है?

पुस्तक : एक था डॉक्टर एक था संत (राजकमल प्रकाशन)


अनुवाद : अनिल यादव ‘जयहिंद’, रतन लाल