कोविशील्ड के परीक्षण के दौरान स्वयंसेवकों में उपजी बीमारी से भारतीय नियमन पर उठते सवाल

12 जनवरी 2021
जयपुर (राजस्थान) में 18 दिसंबर 2020 को एक स्वयंसेवी कोविड-19 वैक्सीन का परीक्षण करते हुए.
विशाल भटनागर/नूर फोटो/गैटी इमेजिस
जयपुर (राजस्थान) में 18 दिसंबर 2020 को एक स्वयंसेवी कोविड-19 वैक्सीन का परीक्षण करते हुए.
विशाल भटनागर/नूर फोटो/गैटी इमेजिस

अक्टूबर 2020 में चेन्नई में एक 40 वर्षीय व्यक्ति जिन्होंने कोविशील्ड वैक्सीन के लिए नैदानिक ​​परीक्षण में भाग लिया था, अचानक बीमार पड़ गए. इस कोविड-19 वैक्सीन को सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने स्वीडिश-अमेरिकी कंपनी ऐस्ट्राजनेका और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के साथ मिलकर तैयार किया है. डॉक्टर ने उन्हें बताया कि उन्हें एंसेफैलोपैथी है, जो मस्तिष्क संबंधी तंत्रिका का विकार है. चार दिनों तक वह कभी होश में आते और फिर बेहोश हो जाते. जब वह होश में आते तब भी उनकी हालत बहुत खराब रहती और बहके-बदहवास से रहते. कुछ दिनों तक वह अपने आस-पास के लोगों से बात तक न कर सके और यहां तक कि उन्हें पहचानना भी मुश्किल हो रहा था. “एक बार तो हालत ऐसी हो गई कि उन्हें हमारे बच्चों तक के नाम याद नहीं थे," उनकी पत्नी ने मुझे बताया. एक दिन जब वह अस्पताल में थे तो एक डॉक्टर ने उनकी पत्नी को बताया कि उनकी हालत में सुधार हो रहा है. उन्होंने कहा, "मैं ये सोच कर अंदर गई कि मेरे पति बैठे होंगे और मुझे देखकर मुस्कुराएंगे लेकिन मैंने देखा कि वह बिस्तर पर लेटे हुए दीवार को घूर रहे थे. उन्होंने एक पल के लिए मेरी तरफ देखा लेकिन मुझे पहचाना नहीं. "

पुणे में स्थित सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया भारत भर में कई जगहों पर कोविशील्ड का परीक्षण कर रहा है. चेन्नई में रामचंद्र उच्च शिक्षा और अनुसंधान अस्पताल में जहां इसका परीक्षण चल रहा है, उसके शोधकर्ताओं ने 1 अक्टूबर को परीक्षण में शामिल प्रतिभागी को एक इंजेक्शन दिया. 10 दिन बाद प्रतिभागी को तंत्रिका संबंधी दिक्कतें शुरू होने लगीं. प्रतिभागी, उनकी पत्नी और उनके डॉक्टर का मानना ​​है कि परीक्षण के दौरान जो टीका उन्हें लगाया गया था उसके चलते ये लक्षण उभरे हैं लेकिन सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने कहा कि उनकी बीमारी का दवा परीक्षण से कोई लेना-देना नहीं है. परीक्षण में शामिल प्रतिभागी और सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने एक-दूसरे को कानूनी नोटिस भेजे हैं. इस पूरे प्रकरण ने वैक्सीन के उम्मीदवारों और अनुमोदित टीकों के बारे में शिकायतों के मामले में कंपनी और सरकार की प्रतिक्रिया पर सवाल उठाया है. यह भारत में नैदानिक ​​परीक्षणों में पारदर्शिता की कमी और उनके नियामक ढांचे की कमियों को भी उजागर करता है.

11 अक्टूबर को परीक्षण में शामिल प्रतिभागी जब उठे तो उन्हें तेज सर दर्द था और मतली आ रही थी. वह ज्यादातर वक्त सोते रहे लेकिन जब वह फिर से उठे तो उनके व्यवहार में गड़बड़ी दिखाई दी. वह अपने परिवेश से नाराज, चिड़चिड़े और अनजान थे. देर शाम तक उन्हें रामचंद्र उच्च शिक्षा और अनुसंधान अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उन्हें परीक्षण खुराक दी गई. वह बेहोश थे और उनकी शिराओं में तरल पदार्थ डाला गया. परीक्षण करने वाले डॉक्टरों ने 16 दिनों तक उनका इलाज किया.

प्रतिभागी की पत्नी ने मुझे बताया कि परीक्षण स्थल पर डॉक्टरों और मुख्य जांचकर्ता ने सुझाव दिया कि उनमें विटामिन की कमी हो सकती है या उन्हें स्व-प्रतिरक्षा विकार हो सकता है जिसके चलते उनकी हालत ऐसी हुई हो. हालांकि, उनकी जांच में ऐसे किसी ठोस कारण या अंतर्निहित स्थिति का पता चला जिसके चलते एंसेफैलोपैथी हो सकता था. "जब भी मैं पूछती कि उन्हें क्या समस्या हो सकती है, किस कारण से ऐसा हुआ तो वे मुझे बताते कि मुझे खुश होना चाहिए कि मेरा पति ठीक हो रहा है," उन्होंने कहा.

26 अक्टूबर को उनके परिवार ने अस्पताल से उन्हें छुट्टी देने का अनुरोध किया. तब तक प्रतिभागी थोड़ा-बहुत पहचाने लगे थे और परिवार के सदस्यों तथा स्वास्थ्य कर्मचारियों के साथ बातचीत करने में सक्षम थे. वह उल्टी किए बिना भी ठोस आहार ले रहे थे. हालांकि वह उलझन में रहे और इस बात पर ध्यान लगाने या याद करने में नाकाम रहे कि जब वह अस्पताल में थे उस दौरान क्या हुआ था. उनकी पत्नी ने मुझे बताया कि अस्पताल से छुट्टी होने के बाद भी हफ्तों तक उनकी हालत ऐसी ही रही और इसलिए परिवार ने दूसरे डॉक्टर से सलाह लेने का फैसला किया. "परीक्षण स्थल पर डॉक्टरों ने मेरे पति का इलाज किया लेकिन उन्होंने हमें यह नहीं बताया कि अचानक हुई इस बीमारी का कारण क्या है और उनकी हालत में भी कोई सुधार नहीं था ऐसी हालत में हमारे पास अन्य न्यूरोलॉजिस्ट से, जो दवा परीक्षण में शामिल नहीं थे, सलाह लेने के अलावा कोई विकल्प नहीं था," उनकी पत्नी ने मुझसे कहा.

चाहत राणा कारवां में​ रिपोर्टिंग फेलो हैं.

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