‘सत्यशोधक’ फुले

03 जनवरी 2019

विद्या बिना मति गई, मति बिना गति गई,
गति बिना नीति गई, नीति बिना वित्त गई
वित्त बिना शूद्र चरमराये,
इतना सारा अनर्थ एक अविद्या से हुआ

-गुलामगिरी, ज्योतिबा फुले

जिन मानदण्डों के आधार पर हम सामाजिक मुक्ति के बारे में इन तीनों शख्सियतों की तुलना कर रहे हैं, उन्हीं पैमानों पर अगर महात्मा फुले को देखें तो क्या नज़र आता है. लेकिन कुछ कहने के पहले फुले के जीवन के अहम पड़ावों का विहंगावलोकन करना समीचीन होगा. 1848 - अपनी पत्नी सावित्रीबाई तथा उनकी सहपाठी/मित्रा फातिमा शेख के सहयोग से भारत में शूद्र अतिशूद्र लड़कियों के लिए पहले स्कूल की स्थापना, 1851 - सभी जाति की कन्याओं के लिए एक अन्य स्कूल, 1855 - कामगार लोगों के लिए रात्रि पाठशाला, 1856 - उनकी ‘विभाजक’ गतिविधियों के चलते उन पर जानलेवा हमला, 1860 - विधवा पुनर्विवाह की मुहिम, 1863 - विधवाओं के लिए एक आश्रयस्थल की शुरूआत, विधवाओं के केशवपन अर्थात बाल काटे जाने के खिलाफ नाभिकों की हड़ताल का आयोजन, 1868 - अपने घर का कुंआ अस्पृश्यों के लिए खोल देना, 1 जून 1873 - ‘गुलामगिरी’ उनकी बहुचर्चित किताब का प्रकाशन, 24 सितम्बर 1873 - ‘सत्यशोधक समाज’ की स्थापना, 1876-82 - पुणे म्युनिसिपल कौन्सिल के नामांकित सदस्य, 1882 - ‘स्त्री पुरूष तुलना’ की लेखिका एवं सत्यशोधक समाज की कार्यकर्ता ताराबाई शिन्दे की जोरदार हिमायत, जब उनकी उपरोक्त किताब ने रूढिवादी तबके में जबरदस्त हंगामा खड़ा कर दिया था, 11 मई 1888 - एक विशाल आमसभा में उन्हें ‘महात्मा’ की उपाधि प्रदान की गयी, 1889 - उनकी आखरी किताब ‘सार्वजनिक सत्यधर्म’ का प्रकाशन, 28 मई 1890 - पुणे में इन्तकाल.

भारत में अंग्रेजों का शासन शुरू होने से पहले प्रजा को शिक्षा देना सरकार का दायित्व नहीं माना जाता था. महात्मा फुले के जनम से पहले राजसत्ता तथा धार्मिक सत्ता ब्राह्मणों के हाथ में होने के कारण सिर्फ उन्हें ही धार्मिक ग्रंथ पढ़ने का अधिकार था. निम्न जाति के जिन व्यक्तियों ने पवित्रा ग्रंथ पढ़ने का प्रयास किया तो उन व्यक्तियों को मनु के विधान के तहत कठोर सजायें मिली थी. दलितों की स्थिति जानने के लिए पेशवाओं के राज पर नज़र डालें तो दिखेगा कि वहां दलितों को सड़कों पर घुमते वक्त अपने गले में घडा बांधना पड़ता था ताकि उनकी थूक भी बाहर न निकले. वे सड़कों पर निश्चित समय में ही निकल सकते थे क्योंकि उनकी छायाओं से भी सवर्णों के प्रदूषित होने का खतरा था. जाहिर सी बात है कि दलितों के लिए शिक्षा के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता था. वर्ष 1813 में ईस्ट इंडिया कम्पनी द्वारा जारी आदेश के तहत शिक्षा के दरवाजे सभी के लिए खुल गये. वैसे सरकार ने भले ही आदेश जारी किया हो लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति बेहद प्रतिकूल थी. ब्राह्मणों के लिये ही एक तरह से आरक्षित पाठशालाओं में जब अन्य जाति के छात्रों को प्रवेश दिया जाने लगा तब उसका जबरदस्त प्रतिरोध हुआ था.

यह कहना अनुचित नहीं होगा कि 1848 में महिलाओं के लिये खोले अपने पहले स्कूल के जरिये फुले दंपति ने उस सामाजिक विद्रोह का बिगुल फूंका जिसकी प्रतिक्रियायें 21वीं सदी में भी जोरशोर से सुनायी दे रही हैं. 1851 तक आते आते महिलाओं, शूद्रों अतिशूद्रों के लिये उनके द्वारा खोले गये स्कूलों की संख्या पांच तक पहुंची थी जिसमें एक स्कूल तो सिर्फ दलित महिलाओं के लिए था. जैसे कि उस समय हालात थे और ब्राह्मणों के अलावा अन्य जातियों में पढ़ने लिखने वालों की तादाद बेहद सीमित थी, उस समय इस किस्म के ‘धर्मभ्रष्ट’ करने वाले काम के लिये कोई महिला शिक्षिका कहां से मिल पाती. ज्योतिबा ने बेहतर यही समझा कि अपनी खुद की पत्नी को पढ़ लिख कर तैयार किया जाये और इस तरह 17 साल की सावित्रीबाई पहली महिला शिक्षिका बनीं. फातिमा शेख नामक दूसरी शिक्षित महिला ने भी इस काम में हाथ बंटाया. इस बात के विस्तृत विवरण छप चुके हैं कि शूद्रों अतिशूद्रों तथा स्त्रियों के लिए स्कूल चलाने के लिए इस दंपति को कितनी प्रताडनायें झेलनी पड़ीं यहां तक कि सनातनियों के प्रभाव में आकर ज्योतिबा के पिता गोविंदराव ने उनको घर से भी निकाला.

सुभाष गाताडे गोडसे की औलाद, बीसवीं सदी में डॉ. अम्बेडकर का सवाल, आधुनिकता आणि दलित, तर्क और विचारों से कौन डरता है?, अम्बेडकर आणि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, दीनदयाल उपाध्याय: भाजपा के 'गांधी' और जाति तोड़ो मनु​ष्य बनो के लेखक हैं.

Keywords: Casteism women’s rights caste atrocities Hindu faith
कमेंट