“मोदी सरकार ने संविधान को बदल दिया है”, मराठा और दस प्रतिशत ईडब्लूएस आरक्षण पर पूर्व न्यायाधीश के. चंद्रू से बातचीत

22 जुलाई 2019
एसआर रघुनाथन/ द हिंदू
एसआर रघुनाथन/ द हिंदू

इस साल जनवरी में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने “आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों” (ईडब्लूएस) के लिए दस प्रतिशत आरक्षण की घोषणा की. इसके तहत पात्र उम्मीदवारों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं सामाजिक और अर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग (ओबीसी) के सदस्यों को शामिल नहीं किया गया है. संविधानिक सभा और सर्वोच्च न्यायालय के कई सारे मामलों में माना गया है कि केवल आर्थिक आधार पर आरक्षण नहीं दिया जा सकता. लेकिन एक ही झटके में नरेन्द्र मोदी ने भारतीय आरक्षण नीति में लागू संवैधानिक सिद्धांतों को उलट दिया.

सामाजिक पिछड़ेपन का कारण गरीबी नहीं है. इस साल जनवरी तक संविधान में मात्र अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और ओबीसी को ही आरक्षण प्राप्त था जो ऐतिहासिक रूप से बहिष्कृत और अधिकारहीन समूह माने जाते हैं. इन श्रेणियों में पूर्व में “अछूत” माने जाने वाले, दुर्गम और बेहद पिछड़े इलाकों में रहने वाले और पारंपरिक रूप से खेती और बुनाई जैसे व्यवसाय करने वाले समूह आते हैं. इन कारणों से ये समुदाय शैक्षिक और सामाजिक दृष्टि से पिछड़ गए हैं.

लेकिन जनवरी में संविधान में 103वां संशोधन कर उपरोक्त सिद्धांतों को दरकिनार कर दिया गया. संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 में संशोधन कर भारतीय राज्य को ईडब्लूएस श्रेणी के अंतर्गत ऊपरी जातियों सहित सामाजिक रूप से अगड़े समूहों को आरक्षण दे सकने की शक्ति दे दी गई. साथ ही मोदी सरकार के दस प्रतिशत आरक्षण ने सर्वोच्च न्यायालय द्वारा आरक्षण के तय सीमा को 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 60 कर दिया.

महाराष्ट्र की आरक्षण नीति पर गत वर्ष नवंबर से ही चर्चा हो रही है जब भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने मराठा समुदाय को 16 प्रतिशत आरक्षण दे दिया था. इस साल जून में बॉम्बे हाई कोर्ट ने इस कानून को सही करार दिया है. हालांकि अदालत ने आरक्षण को घटा कर शैक्षिक संस्थाओं में 12 प्रतिशत और सरकारी नौकरियों में 13 प्रतिशत कर दिया है. महाराष्ट्र में आरक्षण का प्रतिशत 60 से अधिक हो गया है लेकिन अदालत ने इसके विरोध में दायर याचिका को खारिज कर दिया.

इन दोनों आरक्षणों को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने मामले में स्टे नहीं लगाया. इसके विपरीत जब 1990 में वीपी सिंह सरकार ने ओबीसी के लिए 27 आरक्षण लागू किया था तब सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर दो सालों तक रोक लगाए रखी थी. इसी प्रकार जब 2007 में सरकार ने केंद्रीय शैक्षिक संस्थानों में 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण लागू करने की घोषणा की थी तब भी अदालत ने इसे एक साल तक रोके रखा.

एजाज अशरफ दिल्ली में पत्रकार हैं.

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