बिहार में प्रॉक्सी उम्मीदवारों की प्र​था को चुनौती देतीं महिलाएं

गोरखा ब्लॉक में, जिला परिषद सदस्य, मनोरमा कुमारी अपने समाज के पारंपरिक मानदंडों को धता बता रही हैं. काम करने के बजाय उन्होंने अपने दलित समुदाय के लिए बेहतर अवसर निर्मित करने का चुनाव किया है. जुंबिश
25 March, 2019

बीते साल की एक सर्द सुबह, बिहार के सगुनी गांव में, 9 महिलाओं ने ग्राम कचहरी या ग्राम अदालत की अध्यक्षता की, जिसमें शराब के सेवन, वैवाहिक विवादों और स्थानीय निवासियों को प्रभावित करने वाले अन्य मुद्दों की शिकायतें सुनी गईं. सगुनी गांव राज्य के रोहतास जिले के परसा ब्लॉक में स्थित है, इसकी पंचायत नजदीकी 13 गांवों पर अपने अधिकार क्षेत्र को लागू करती है. अदालत को संबोधित करने वाली महिलाओं को इन क्षेत्रों से प्रतिनिधि चुना गया था. 2006 में, नीतीश कुमार सरकार ने बिहार के पंचायती राज संस्थानों, या पीआरआई में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण की शुरुआत की थी. फिर भी, स्थानीय प्रशासन में सीधे तौर पर खुद को शामिल करने वाली महिलाओं का शांत विश्वास ग्रामीण बिहार में एक दुर्लभ दृश्य था.

हालांकि बिहार में एक "मौन क्रांति" लाने के लिए महिला आरक्षण का बहुत से लोगों ने स्वागत किया है, लेकिन जमीनी तौर पर इस नीति का वास्तविक सशक्तीकरण नहीं हुआ है. दिसंबर 2018 और इस साल फरवरी में, बिहार में तीन जिलों के आठ गांवों की यात्रा के दौरान, मैंने देखा कि आरक्षण नीति लागू होने के बाद एक नई प्रथा शुरू हो गई थी. महिलाएं अपने पतियों की ओर से प्रॉक्सी अधिकारियों के रूप में चुनाव लड़ती थीं, जिन्हें “मुखियापति और सरपंचपति” यानी मुखिया और सरपंच के पति कहा जाता था. हालांकि प्रॉक्सी उम्मीदवारों के रूप में चुनाव लड़ने वाली महिलाएं पूरे बिहार में यथास्थिति में दिखाई दीं, लेकिन सगुनी जैसे कई गांवों में, मैं ऐसी महिलाओं से मिली, जिन्होंने अपने पदों की शक्तियों और जिम्मेदारियों को अपनाया और अपने सार्वजनिक पद पर अपनी स्वतंत्रता का दावा किया. इन महिलाओं ने अपने गांव के अन्य लोगों को स्थानीय शासन में अधिक सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रेरित किया, लेकिन मेरी रिपोर्टिंग बताती है कि ऐसे उदाहरण अपवाद ही थे, नियम नहीं.

बिहार में पीआरआई एक त्रिस्तरीय संरचना को अपनाता है. पीआरआई संरचना के सबसे निचले स्तर पर प्रत्येक गांव या गांवों के समूह के लिए ग्राम पंचायतें हैं, उसके बाद ब्लॉक स्तर पर पंचायत समितियां और जिला स्तर पर जिला परिषदें हैं, जहां एक निर्वाचित मुखिया प्रत्येक ग्राम पंचायत की अध्यक्षता करता है, और प्रत्येक पंचायत के क्षेत्र के भीतर एक ग्राम कचहरी गांव के संबंध में न्यायिक कार्यों को करती है. ग्राम कचहरी मे भी निर्वाचित पदाधिकारी शामिल होते हैं, जिन्हें पंच के रूप में जाना जाता है, और इसका नेतृत्व सरपंच करता है.

सगुनी की ग्राम कचहरी की सरपंच बिंदू देवी ने अन्य महिला अधिकारियों को अपनी न्यायिक जिम्मेदारियों पर नियंत्रण रखने के लिए प्रेरित करने में एक बड़ी भूमिका निभाई है. बिंदू का कहना है, "पंचों को कचहरी में भाग लेने के लिए राजी करना आसान नहीं था, बजाय इसके कि उनके पति उनका प्रतिनिधित्व करें." उनके पास पटना विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर की डिग्री है, वे अपने पति मणिलाल के साथ राज्य की राजधानी में रहती हैं. प्रत्येक रविवार को, बिंदू अपने प्रशासनिक कर्तव्यों का पालन करने के लिए सगुनी से बस से पचास किलोमीटर की यात्रा करती हैं और अन्य महिला अधिकारियों को भी अपने साथ जुड़ने के लिए प्रेरित करती हैं. “वे अब भी हर हफ्ते एक बार कचहरी आने से हिचकिचाती हैं, लेकिन मैं गांव की महिलाओं को इसमें शामिल होने के लिए मना लेती हूं. अब जबकि महिला पंचों ने कचहरी में आना शुरू कर दिया है, मैं इसे एक उपलब्धि के रूप में देखती हूं.”

बिंदू कहती हैं, "शिक्षा की कमी मुख्य कारण है जो यहां महिला पद धारकों को अपने कर्तव्यों का पालन करने से रोकती है." मैंने जिस गांव का दौरा किया, वहां कई महिलाओं ने यही विचार जाहिर किए. बहुत सी महिलाओं ने मुझे बताया कि शिक्षा की कमी ने महिलाओं को निर्वाचित अधिकारियों के रूप में कार्यभार संभालने से रोका है. बिंदू आगे कहती हैं, "मेरी कचहरी के सभी पंच या तो वे होते हैं जिनकी पढ़ाई छूट गई या जो अनपढ़ हैं. कुछ महिलाएं जो हस्ताक्षर करना जानती हैं वे भी अंगूठा लगाना पसंद करती हैं. अगर हम वास्तव में राज्य भर में महिला सशक्तीकरण को देखना चाहते हैं तो इसके लिए महिलाओं की शिक्षा बहुत जरूरी है.”

उनके पति मणिलाल जनमुक्ति संघर्ष वाहिनी के राज्य संयोजक हैं, जो एक स्वतंत्र संगठन है और भारत में सात राज्यों में सामाजिक कार्य करता है. वे अक्सर अपने काम के लिए ग्रामीण बिहार की यात्रा करते हैं राज्य के वित्त विभाग द्वारा तैयार 2018-19 के बिहार आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, राज्य में 8386 ग्राम पंचायतें हैं. मणिलाल दावा करते हैं कि इनमें से 350 से भी कम पंचायतों ने नियमित रूप से अपनी ग्राम कचहरी का संचालन किया है.

दक्षिण बिहार में बाराचट्टी प्रखंड के जागीर पंचायत की स्थिति, राज्य के पंचायती राज संस्थानों में महिलाओं के प्रतिनिधित्व की अधिक सटीक तस्वीर पेश करती है. हालांकि पंचायत की मुखिया मावा देवी थीं, लेकिन कोई भी उन्हें शक्ल से नहीं पहचानता, इसके बजाय, वे सभी उनके पति कैलू मंडल को अपना नेता मानते थे.

मुखिया पद के लिए मावा के चुनाव की कहानी बिहार की पंचायत राजनीति का एक उत्कृष्ट उदाहरण है. यानी एक व्यक्ति ने नेता बनने की अपनी महत्वाकांक्षा को एक आरक्षित सीट पर अपनी पत्नी को चुनाव में उठाकर पूरा किया. मंडल को पिछले तीन पंचायत चुनावों 2001, 2006 और 2011 में हार का सामना करना पड़ा था. लगातार हार के बाद उन्होंने अप्रैल 2016 में होने वाले चुनावों के लिए मावा को उम्मीदवार के रूप में अपना नामांकन दाखिल करने के लिए मना लिया, और फिर उनके चुनाव अभियान की अगुवाई भी की.

दो मौकों पर, मैंने मावा को बात करने के लिए बुलाया- पिछले दिसंबर में और फिर फरवरी में — लेकिन दोनों ही बार, उन्होंने मुझसे बात करने से मना कर दिया और फोन अपने पति को थमा दिया. मंडल ने यह बताते हुए मेरे सभी सवालों के जवाब देने पर जोर दिया कि वे मुखियापति के रूप में अपनी क्षमता के अनुसार ऐसा करने में सक्षम हैं क्योंकि पूरे बिहार में ग्रामीण इसे राज्य के पीआरआई में एक आधिकारिक पद के रूप में मानते हैं. जब मैंने फरवरी के अंत में उनके गांव का दौरा किया, तो वे दोनों शहर से बाहर गए हुए थे, और जिन स्थानीय लोगों से मैं मिली, वे मावा देवी को नाम से नहीं पहचानते थे - वे सभी अपने मुखिया के रूप में मंडल को पहचानते थे.

मंडल महसूस करते हैं कि उन्होंने मावा देवी के चुनावी कार्यालय पर नियंत्रण करके कोई गलत काम नहीं किया है. "मेरी पत्नी ने केवल कक्षा 4 तक ही पढ़ाई की है," मंडल ने मुझे बताया. "मैंने कम से कम 10 वीं कक्षा की बोर्ड परीक्षा पास की है और मैं एक मुखिया की आधिकारिक कार्यवाही को अच्छी तरह से समझने में सक्षम हूं." मंडल ने कहा कि उनकी पत्नी उससे सीख लेगी. "वह सीख रही है, लेकिन अभी आत्मविश्वास की कमी है. मैं मुखिया के कई कर्तव्यों का निर्वहन करता हूं और खंड-विकास अधिकारी और अन्य अधिकारी मुझे अच्छी तरह से जानते हैं. मैं अपने लोगों के मुद्दों को समझता हूं और वे मुझ पर भरोसा करते हैं.”

मंडल कहते हैं कि उन्होंने अपनी पत्नी से चुनाव लड़ने को इसलिए कहा क्योंकि उनका मानना था कि "एक महिला के पास जीतने का बेहतर मौका था." उन्होंने कहा, "जब 2016 में मुखिया चुनाव के लिए उम्मीदवार का प्रस्ताव देने का सवाल हमारे सामने आया, तो मुझे किसी बाहरी व्यक्ति का नाम सुझाने में संदेह हुआ क्योंकि वे हम महादलितों के मुद्दों के साथ न्याय नहीं कर सकते. यह सत्ता हासिल करने के माध्यम से गांव के दलित जाति समूहों की मुक्ति का सवाल था.”

मणिलाल और दो अन्य कार्यकर्ताओं, जिनसे मैं उत्तर बिहार में मिली, सभी ने राज्य भर में व्यापक रूप से फैली प्रॉक्सी उम्मीदवारों की प्रथा के बारे में बात की. जिन दो कार्यकर्ताओं से मैं मिली, उनमें से एक हैं अख्तर बेगम, और दूसरी हैं स्वतंत्र महिला अधिकार कार्यकर्ता आरती वर्मा. जिन्होंने राज्य की पंचायतों में महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए काम करने वाला पटना स्थित एक गैर-सरकारी संगठन इजाद की स्थापना की है. उन्होंने मुझे बताया कि मुखियाओं के साथ बातचीत करने की कोशिश में वे राज्य के सारण और पश्चिम चंपारण जिलों में कम से कम 55 ग्राम पंचायतों का दौरा कर चुके हैं, लेकिन केवल मुखियाओं के पतियों से ही मिल सके. राज्य के सारण जिले के एक शहर छपरा में मेरी यात्रा के दौरान एक राहगीर ने ऐसे मुखियापतियों के बारे में एक मार्मिक टिप्पणी की, “चुनाव भी वही लड़ लेंगे, शासन भी वही कर लेंगे. मुखिया घर में बैठ कर चाय बना रही है.”

वास्तव में, प्रॉक्सी नामांकन का प्रचलन इतना प्रचलित हो गया था कि जुलाई 2018 में, बिहार के पंचायती राज विभाग के प्रमुख सचिव अमृत लाल मीणा ने जिला अधिकारियों को एक नोटिस जारी किया, जिसमें यह सुनिश्चित करने के लिए निर्देश दिया गया था कि महिला अधिकारियों का प्रतिनिधित्व किसी और के द्वारा नहीं किया गया है. नोटिस में कहा गया है, " यह देखते हुए कि ग्राम कचहरी और पंचायत की कार्यवाही से संबंधित बैठकों में महिला प्रतिनिधियों का प्रतिनिधित्व अन्य व्यक्तियों द्वारा किया जा रहा है, यह निर्णय लिया गया है कि नियुक्त किए गए जनप्रतिनिधियों के अलावा किसी को भी इन बैठकों में शामिल होने की अनुमति नहीं दी जाएगी." इससे पहले बिहार सरकार और उसके अधिकारियों ने भी इसी तरह के प्रयास किए कि पतियों को महिला निर्वाचित अधिकारियों का प्रतिनिधित्व करने से रोका जा सके. नवंबर में, राज्य के पंचायती राज मंत्री, भीम सिंह ने उसी समय महिला पंचायत सदस्यों को निर्देश दिया कि वे अपने पतियों को घर पर रहने के लिए कहें, जबकि बैठक में भाग लेने वाले अधिकारी और जिला अधिकारियों को ऐसे मुखियापतियों और पंचपतियों पर आपराधिक अतिचार का मामला दर्ज करने का आदेश दिया जो आधिकारिक बैठकों में अपनी पत्नी के स्थान पर खुद शामिल होना जारी रखते हैं.

बिहार के ग्रामीण-विकास सचिव अरविंद चौधरी कहते हैं, "पिछले वर्षों में पंचायत और कचहरी की कार्यवा​हियों में महिलाओं की उपस्थिति में सुधार हुआ है और क्षमता निर्माण कार्यक्रमों के जरिए उनकी सक्रिय भागीदारी में सुधार हो सकता है." चौधरी के अनुसार, महिलाओं में वित्तीय स्वायत्तता की कमी कार्यवाहियों में उनकी कम भागीदारी के कारणों में से एक था, जिसके लिए राज्य सरकार “पंचायत अधिकारियों को वित्तीय कार्यवाही के माध्यम से संचालित करने के लिए तकनीकी प्रशिक्षण और कराधान नियम पुस्तिका प्रदान कर रही थी.” उन्होंने कहा, “हम महिलाओं को अधिक सुसज्जित और आत्मनिर्भर बनाने के जरिए उनकी भागीदारी बेहतर करने के लिए तत्पर हैं. पंचायतों की वित्तीय स्वायत्तता हर सत्र में बढ़ रही है.”

मैंने राज्य के पंचायती राज विभाग के मंत्री अमृत लाल मीणा और कपिलदेव कामत से इस पर उनकी टिप्पणी के लिए संपर्क किया. इस रिपोर्ट के प्रकाशित होने तक न तो कॉल या संदेशों का जवाब दिया गया.

बिहार का राजनीतिक इतिहास बताता है कि छद्म नेतृत्व की प्रथा राज्य के शासन के शीर्ष स्तरों तक जाती है. 1997 से 2005 के बीच, राबड़ी देवी के मुख्यमंत्रित्व काल में, उनके पति लालू प्रसाद यादव, जो राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री थे, सरकार के वास्तविक प्रमुख के रूप में काम करते रहे. इसी तरह, 2011 में जनता दल (यूनाइटेड) के नेता अजय सिंह अपने आपराधिक रिकॉर्ड के कारण दारौंदा विधानसभा क्षेत्र से उपचुनाव नहीं लड़ पाए थे. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उन्हें सलाह दी कि वे जल्दी से शादी कर लें और अपनी पत्नी के नाम पर टिकट ले लें. इसके तुरंत बाद सिंह ने एक रस्म समारोह में कविता कुमारी से शादी की, जिन्होंने उस साल दारौंदा उपचुनाव जीता.

फिर भी, कुछ ऐसे सक्रिय नेता हैं जिन्होंने यथास्थिति को चुनौती दी है और उसे आगे बढ़ाया है. बिहार के सीतामढ़ी जिले की सिंहवाहिनी पंचायत में, ऋतु जायसवाल ने नरकटिया गांव से मुखिया का चुनाव लड़ने के लिए पॉश शहर दिल्ली का शहरी जीवन छोड़ दिया. हालांकि उन्होंने अपने पति के पैतृक गांव से चुनाव लड़ा, लेकिन उन्होंने अपने चुनावी अभियान के दौरान अपने नाम पर भरोसा नहीं किया और 1853 मतों के बड़े अंतर से जीत हासिल की.

जायसवाल ने मुझे बताया, "सिंघवानी से पहले, मैं एक भी गांव में नहीं गई थी." उन्होंने बताया, "यहां महिलाओं की सुरक्षा की स्थिति ऐसी थी कि महिलाएं शाम 6 बजे के बाद अपने घरों से बाहर नहीं निकलती थीं. अपनी यात्राओं पर मुझे भी यही सलाह दी गई थी. यहां घुसपैठियों के जबरदस्ती उन घरों में घुसने और महिलाओं के यौन उत्पीड़न के कई मामले सामने आए, जिनके पति बिहार से बाहर चले गए थे. शराबखोरी और घरेलू हिंसा को इस हद तक घरों में स्वीकार कर लिया गया था कि गांव में लगभग 85 महिलाएं थीं, जिन्होंने कोई रास्ता न पाकर आखिरकार आत्महत्या कर ली.”

जब मैंने उनसे उनकी पंचायत में महिलाओं की स्थिति के बारे में पूछा, तो जायसवाल ने जवाब दिया, "एक समाज जिसमें संपत्ति पर महिलाओं के अधिकार की समझ का अभाव है, उसे बुनियादी बातों से शुरू करना होगा, विकास की बात उसके बाद आएगी." उन्होंने कहा, "सीतामढ़ी जिले में रहने वाला यह समाज दशकों से अंधेरे युग में जी रहा है. मैंने महिलाओं के साथ अंतहीन बातचीत शुरू की है और उन्हें अपने पतियों के खिलाफ भी मुझे रिपोर्ट करने के लिए कह रही हूं. धीरे-धीरे एक बदलाव आएगा.”

जायसवाल पंचायत बैठकों में महिला प्रतिनिधियों की पूर्ण उपस्थिति पर जोर देती हैं. उनका मानना है कि बिहार की पंचायतों में मुखियापतियों और पंचपतियों के प्रवेश के लिए एक प्रकार की सहनशीलता है क्योंकि निर्वाचित महिला अधिकारियों ने इस धारणा को चुनौती नहीं दी है कि उनकी पहचान उनके घरों तक ही सीमित है. वे कहती हैं, "मैं पंचायत बैठकों में पद धारकों के पतियों के प्रवेश पर सवाल उठाती हूं. सरकार को इसके खिलाफ एक सख्त नियम लागू करना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि महिलाएं नेतृत्व करें और पंचायतों में सिर्फ नाम की मुखिया न रहें. क्या यह भी उचित समय नहीं है कि महिलाएं महत्वाकांक्षा के साथ चुनाव लड़ती हैं? उन्हें अपनी आवाज बुलंद करनी होगी और हमारे समाज के पितृसत्तात्मक चेहरे को फौलादी हाथों से चुनौती देनी होगी.”

39 वर्षीय गीता सागर भी एक निर्वाचित और सक्रिय जिला परिषद सदस्य के रूप में, उत्तर बिहार के ईशुपुर ब्लॉक में यथास्थिति को चुनौती दे रही हैं. जिला परिषद में गीता का कार्यकाल असाधारण रहा है. 2016 में, वे एक सामान्य सीट से चुनाव लड़ने वाली दलित उम्मीदवार के रूप में इस पद के लिए चुनी गई थीं. अपने चुनाव अभियान में विवाह और महिलाओं के अधिकारों के बारे में पारंपरिक मानदंडों पर सवाल उठाने के साहस और मुखरता के लिए अपने गांव में उन्होंने पुरुषों के बीच भी लोकप्रियता हासिल की.

मैं उनसे और उनके पति गंगा सागर से उनके आवास पर मिली. गंगा एक कोने में बैठे थे. उन्होंने कहा, "हमारी शादी गांव में पहली शादी होनी चाहिए जो बिना किसी दहेज के हुई और इसमें कोई संस्कार नहीं हुआ था." गंगा बताते हैं, "अंतर-जातीय विवाह को प्रोत्साहित करनेवाली 53 शादियों में गीता का योगदान रहा है." वे आगे कहते हैं “जमीनी स्तर पर महिला सशक्तीकरण आरक्षण से परे है, अपने अधिकारों का प्रयोग करने के लिए उन्हें सक्षम बनाने में बहुत सी चीजें शामिल हैं. अपने जीवन साथी को चुनने की आजादी उनमें से एक है.”

गीता ने महिला अधिकारियों के सामने आने वाली बाधाओं पर चर्चा की. वे कहती हैं, "यह वास्तव में निराशाजनक है कि महिलाएं अपने पद को केवल नाम के प्रधान के रूप में स्वीकार करती हैं और प्रॉक्सी द्वारा पुरुषों के शासन पर सवाल नहीं उठाती हैं. लेकिन यह भी एक वास्तविकता है कि पीआरआई में हमारे बढ़ते प्रतिनिधित्व के बाद भी, अगर कोई महिला पुरुषों के साथ कंधा मिलाना और अपने सभी आधिकारिक कर्तव्यों को स्वतंत्र रूप से करना चाहती है, तो सिस्टम के भीतर के तत्व बाधाओं को पार करते हैं. सबसे पिछड़े ग्राम समाजों में उसे अपमान, धमकियों का सामना करने के लिए मजबूत होना पड़ेगा और आराम से नहीं बैठना होगा भले ही इसके लिए उसे जेल क्यों न हो जाए. मैं हमेशा महिला पंचायत के पुरुष अधिकारियों द्वारा उनकी महिलाओं को बिगाड़ने के बारे में उपहास का सामना करती हूं."

गीता के अनुसार, महिला अधिकारियों को भाग लेने के लिए बहुत प्रोत्साहन की आवश्यकता होती है क्योंकि परंपरागत रूप से उन्होंने "किसी भी चीज के बारे में कभी कुछ नहीं कहा." जिला परिषद के अन्य अधिकारियों के साथ मेरी बातचीत से पता चला कि गीता क्षेत्र की महिलाओं के लिए एक प्रेरणादायक रोल मॉडल बन गई है. सारन जिले के मशरक ब्लॉक से जिला परिषद सदस्य प्रभाती देवी कहती हैं, "मैंने गीता को सत्ता में देखने के बाद पहली बार स्थानीय शासन में भाग लेने की ताकत हासिल की." उन्होंने कहा कि "मैंने अपने पति पर भरोसा करने के बजाय गीता से अपनी भूमिका सीखना शुरू किया."

ईशापुर ब्लॉक से लगभग 36 किलोमीटर दूर गोरखा ब्लॉक में, एक अन्य जिला परिषद सदस्य, मनोरमा कुमारी अपने समाज के पारंपरिक मानदंडों को धता बता रही हैं. 26 साल की कुमारी अपने गांव में रहती हैं. वह अभी अविवाहित हैं, काम करने के बजाय उन्होंने अपने दलित समुदाय के लिए बेहतर अवसर निर्मित करने का चुनाव किया है, वह अपनी मोटर साइकिल पर सवार होकर गांव में घूमती हैं, सफेद कुर्ता-पायजामा पहनती हैं जो पुरुषों के कपड़ों की शैली में सिले होते हैं यह उनके अपने क्षेत्र के हिसाब से अपरंपरागत कपड़े हैं.

कुमारी कहती हैं, "शिक्षा आपको सशक्त बनाती है लेकिन पंचायत स्तर पर महिलाओं की सक्रिय भागीदारी से दूर होने में मैं शिक्षा की कमी को एक महत्त्वपूर्ण कारण के रूप में नहीं देखती." “मुझे पंचायत में अपनी भूमिका को समझने के लिए अपने परिवार के किसी पुरुष से मार्गदर्शन लेने वाली महिला में भी कोई बुराई नहीं दिखती. जब वह पहली बार अपने घर के बाहर कदम रख रही हो और अपने अधिकारों से परिचित हो रही हो, तो ऐसा नहीं है कि जनप्रतिनिधि बनते ही वह सब कुछ नहीं सीख जाएगी. समस्या केवल तब है जब वे खुद को अपने परिवार के लिए प्रॉक्सी के रूप में अनुमति देती हैं और अपनी शक्तियों का एहसास नहीं करती हैं.”

बिहार में पीआरआई के बारे में जायसवाल की अन्य शिकायतें थीं. "मुझे इस बात की समस्या है कि जब सरकार एक कल्याणकारी नीति बनाती है, तो यह कहा जाता है कि इसके लाभ अंतिम आदमी तक पहुंचने चाहिए, उन लोगों तक जो जमीनी स्तर पर हैं." वे पूछती हैं, "अधिकतम ग्रामीण आबादी वाले एक राज्य में ग्रामीणों को आखिर क्यों एक अंतिम आदमी के रूप में परिभाषित किया जाता है, प्र​थम नागरिक के रूप में उन्हें क्यों नहीं परिभाषित किया जाता.” जायसवाल का यह भी मानना था कि पंचायत स्तर पर स्थानीय शासन वास्तव में स्वतंत्र नहीं, क्योंकि यह राज्य सरकार पर निर्भर है. “एक मुखिया के रूप में, मैं एक आत्मनिर्भर सरकार का हिस्सा महसूस नहीं करती. मुझे लगता है कि मैं एक ग्रामीण अधिकारी हूं जो वित्तीय मामलों में अत्यधिक निर्भरता और राज्य सरकार के हस्तक्षेप के साथ काम कर रही है. स्वशासन को मजबूत करने की जरूरत है.”

महिलाओं की भागीदारी के संबंध में, कुमारी का मानना था कि 2016 के पंचायत चुनावों के बाद से स्थिति में लगातार सुधार हुआ है. वे बताती हैं, “मैंने देखा कि महिलाएं अधिक संख्या में धीरे-धीरे आधिकारिक मामलों में दिलचस्पी ले रही हैं. वे समाज से डरती हैं - उन्हें अपने घरों में अपनी स्वतंत्रता की कीमत चुकानी पड़ती है. उन्हें अपने बच्चों की देखभाल भी करनी होती है और राजनीति में वे अनुभवहीन होती हैं. मैं इसे एक सतत प्रक्रिया के रूप में देख रही हूं, जो ग्रामीण बिहार में महिला सशक्तीकरण की दिशा में एक यात्रा है.”

यह बिहार में महिला-सशक्तिकरण कानूनों के प्रभाव पर दो-भागों की श्रृंखला का दूसरा भाग है. बिहार के निषेध कानून के प्रभाव पर पहला भाग यहां पढ़ें.


जुंबिश दिल्ली की पत्रकार हैं और द इंडियन एक्सप्रेस, द न्यू इंडियन एक्सप्रेस और अहमदाबाद मिरर में काम कर चुकी हैं.