ओडिशा के "औरंगजेब" धर्मेंद्र प्रधान से राज्य के नेता नाराज लेकिन केंद्र के खुश

21 मई 2019
धर्मेंद्र प्रधान को पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का समर्थन हासिल है. क्योंकि वह पैसा जुटाने में माहिर हैं.
BJP.ORG
धर्मेंद्र प्रधान को पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का समर्थन हासिल है. क्योंकि वह पैसा जुटाने में माहिर हैं.
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23 मार्च को भारतीय जनता पार्टी की ओडिशा इकाई के उपाध्यक्ष राज किशोर दास ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया. दास ने अपने इस्तीफे के लिए केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को जिम्मेदार बताया. एक स्थानीय समाचार चैनल को दिए साक्षात्कार में दास ने कहा, “जमीनी स्तर पर काम करने वाले तमाम नेताओं के खिलाफ प्रधान षड्यंत्र करने में लगे हैं... जब प्रधान को लगा कि पार्टी में मेरा कद उनसे ऊपर हो सकता है और मेरे सामने उनकी भूमिका कमजोर पड़ सकती है वह मेरे खिलाफ षड्यंत्र करने लगे.” तीन दिन बाद, 1995 से संघ के साथ रहे एक अन्य वरिष्ठ नेता सुभाष चौहान ने भी पार्टी को अलविदा कह दिया. उन्होंने भी अपने इस कदम के लिए प्रधान को जिम्मेदार बताया. इस्तीफे के दिन चौहान ने मीडिया को बताया, “पार्टी एक व्यक्ति की जेब में है और संघ परिवार उसे बचा रहा है.” इसके अगले दिन एक साक्षात्कार में चौहान ने प्रधान का नाम लेकर कहा, “एक आदमी की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए पार्टी का इस्तेमाल हो रहा है. इस आदमी को मुख्यमंत्री कैसे बनाया जाए, कैसे इसे सत्ता तक पहुंचाया जाए. बस इस एक मानसिकता के साथ पार्टी काम कर रही है”.

2017 में हुए स्थानीय निकाय के चुनावों में बीजेपी ने 851 जिला परिषद सीटों में से 297 सीटों पर जीत दर्ज की थी. इस सफलता के बाद चौहान को आरएसएस के उन खास लोगों में से एक माना जाने लगा जिनकी बदौलत पश्चिमी ओडिशा में पार्टी ने अपने लिए जगह बनाई है. चौहान, जुलाई 2010 और अक्टूबर 2012 के बीच विश्व हिंदू परिषद की शाखा बजरंग दल के राष्ट्रीय संयोजक भी रह चुके हैं. 2014 के लोकसभा चुनावों में राज्य की 21 सीटों में से बीजेपी ने केवल 1 सीट जीती थी और चौहान बाढ़गढ़ सीट से केवल 11178 मतों से पराजित हुए थे. लेकिन उन्हें राज्य में सभी बीजेपी उम्मीदवारों से अधिक वोट मिले थे. इन दो वरिष्ठ नेताओं की पार्टी से विदाई ने राज्य में बीजेपी की जमीन हिला दी है लेकिन प्रधान ने सार्वजनिक तौर पर इस संबंध में कुछ नहीं कहा है.

गौरतलब है कि बीजेपी के भीतर प्रधान के खिलाफ विद्रोह केवल चौहान और दास तक सीमित नहीं है. राज्य में लोकसभा और विधान सभा चुनाव साथ हो रहे हैं और इसी बीच बीजेपी के कई नेता और कार्यकर्ता प्रधान के खिलाफ मोर्चाबंदी करने में लगे हैं. अप्रैल के पहले सप्ताह में बीजेपी के भुवनेश्वर कार्यालय के बाहर कम से कम दो विरोध प्रदर्शनों में मेरा जाना हुआ. इन प्रदर्शनों में प्रधान के खिलाफ नारेबाजी हुई. प्रदर्शनों में भाग लेने वाले तकरीबन 20 कार्यकर्ताओं ने प्रधान से नाराज होकर पार्टी से इस्तीफा दे दिया था. इसके बाद एक सप्ताह तक मैं प्रधान के उत्थान और बीजेपी में उनको मिलने वाली चुनौती को समझने के लिए बीजेपी के एक दर्जन से अधिक नेताओं से मिला.

धर्मेंद्र प्रधान, 1983 से संघ परिवार के सदस्य हैं और उन्हें ओडिशा आरएसएस प्रमुख विपिन बिहारी नंदा का करीबी विश्वस्त माना जाता है. बीजेपी के कई नेताओं ने मुझे बताया कि प्रधान को अमित शाह यानी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का समर्थन हासिल है. ओडिशा में राजनीतिक दलों के नेताओं से मेरी बातचीत से मुझे पता चला कि यहां आमतौर पर माना जाता है कि अमित शाह और नंदा का समर्थन प्रधान को इसलिए है क्योंकि वह पैसा जुटाने में माहिर हैं. पैसों की बदौलत पिछले 5 सालों में पार्टी ने जमीनी स्तर पर अपने पैर मजबूत किए हैं.

राज्य में बीजेपी का विस्तार करने और पार्टी और आरएसएस के नेतृत्व के समर्थन के चलते धर्मेंद्र प्रधान ओडिशा में पार्टी का चेहरा और मुख्यमंत्री पद के मजबूत दावेदार बन गए हैं. इसके बावजूद इस पद के लिए उनके सामने कई बाधाएं हैं. हालांकि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व का समर्थन उन्हें प्राप्त है लेकिन राज्य में पार्टी के नेतृत्व, खासकर पुराने नेताओं से, उन्हें गंभीर चुनौतियां भी मिल रही हैं. पार्टी के पुराने नेता इस बात से खफा हैं कि पार्टी के किसी भी पद में निर्वाचित हुए बिना प्रधान शीर्ष पर पहुंच गए हैं. प्रधान को आरएसएस के उन सदस्यों और नेताओं की नाराजगी भी झेलनी पड़ रही है जिनको उन्होंने किनारे लगा दिया है. साथ ही उन्हें बीजू जनता दल के विद्रोही वरिष्ठ नेताओं से भी चुनौती मिल रही है जो बीजेपी में अपने प्रभाव को बढ़ाना चाहते हैं. पार्टी के वरिष्ठ सदस्यों के अनुसार इन्हीं आंतरिक टकरावों के कारण बीजेपी ने हाल ही में संपन्न हुए विधान सभा चुनावों में प्रधान को पार्टी के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में सामने नहीं किया. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को सामने रख कर बीजेपी ने अपना चुनाव प्रचार किया था.

सागर कारवां के स्‍टाफ राइटर हैं.

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