मोदी ने नेहरू युग वाले ऊपरी जाति के वर्चस्व को राजनीति में पुनः स्थापित किया है: प्रोफेसर सतीश देशपांडे

30 जुलाई 2019
ऋषि कोछड़/कारवां
ऋषि कोछड़/कारवां

2019 के चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की जीत को जाति की राजनीति पर राष्ट्रवाद की राजनीति की जीत की तरह परिभाषित किया जा रहा है. बीजेपी यह बता रही है कि वह राष्ट्रवाद की विचारधारा को मानती है जो विभिन्न अंतरविरोधों को पाटने में सक्षम है. यह दावा कितना सही है? इसे समझने के लिए स्वतंत्र पत्रकार एजाज अशरफ ने दिल्ली विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र के प्रोफेसर सतीश देशपांडे से बात की. देशपांडे ने जाति पर विस्तृत शोध किया है. उनका मानना है कि मोदी के नेतृत्व में बीजेपी का सत्ता में आना भारतीय राजनीति में “नेहरू युग की वापसी” है क्योंकि नेहरू युग सत्ता में ऊंची जातियों के वर्चस्व का युग था.

एजाज अशरफ: 2019 के चुनाव परिणामों का असर जाति की सियासत पर क्या दिखाई दे रहा है, खासकर हिंदी पट्टी में?

सतीश देशपांडे: अकादमिक अध्ययन पुनरावलोकन पद्धति से होता है. इस लिहाज से 2019 के लोकसभा चुनावों के असर को थोड़े समय बाद समझ पाएंगे. इसके बावजूद मैं यह कहना चाहूंगा कि जाति की सियासत में भूमिका परिपक्व हो रही है, वह ज्यादा धारदार हो रही है.

अशरफ: मीडिया में जिस तरह से बताया जा रहा है उसके उलट जाकर आप कह रहे हैं कि जाति अभी सियासत में जिंदा ही नहीं सक्रिय भी है?

देशपांडे: जी हां बिल्कुल ऐसी ही बात है और यदि ऐसा नहीं है तो यह बड़ी चौंकाने वाली बात होगी क्योंकि जाति हमारे समाज को आकार देती है और जो चीज समाज के लिए महत्वपूर्ण है वह राजनीति के लिए भी महत्वपूर्ण होगी ही. लेकिन आधुनिक भारत में, खासकर उसकी राजनीति में जाति को व्यवस्थित तरीके से गलत रूप में पेश किया गया है. मीडिया में यही दिखाई दे रहा है.

एजाज अशरफ दिल्ली में पत्रकार हैं.

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